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Synthetic Method in mathematics

संश्लेषणात्मक विधि (Synthetic Method)

1.भूमिका (Introduction)

यह विधि विश्लेषणात्मक विधि की विपरीत एवं पूरक है। विश्लेषणात्मक विधि द्वारा ज्ञात की गई साध्य की उपपत्ति या किसी समस्या के हल को संश्लेषणात्मक विधि द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। अधिकांश पाठ्यपुस्तकें संश्लेषणात्मक विधि द्वारा लिखी गई हैं। इस विधि में ज्ञात से अज्ञात की ओर अग्रसर करते हैं और अनुमान के आधार पर निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। रेखिगणित के साध्यों में इस विधि द्वारा ज्ञात तथ्यों को आधार मानकर अज्ञात निष्कर्ष को प्राप्त करते हैं। अनुमान के आधार पर साध्य में रचना कर उसे सिद्ध किया जाता है। इस विधि में रचना का कारण नहीं दिया जाता है।
अ=ब(ज्ञात) और ब=स(ज्ञात) अतः   अ=स
इस विधि में ज्ञात बातों की सहायता से अज्ञात तथ्यों या सम्बन्धों का पता लगाया जाता है। विश्लेषणात्मक विधि में प्रक्रिया इससे उल्टी होती है। इस विधि से समस्या का हल या साध्य की उपपत्ति एवं निष्कर्ष जो पहले से ही ज्ञात होता है, क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है। किन्तु अज्ञात निष्कर्ष को ज्ञात नहीं किया जा सकता। ज्यामिति की पुस्तकों में विभिन्न साध्यों को सिद्ध करने के लिए विशेष प्रकार की रचनाओं की क्यों आवश्यकता पड़ती है, इस विधि से स्पष्ट नहीं हो पाता। चूँकि उनसे साध्यों को सिद्ध करने में सहायता मिलती है इसलिए वे उपयुक्त मानी जाती हैं। विद्यार्थियों को उन्हें रटना पड़ता है और एक बार भूल जाने पर तर्क द्वारा उनका पुन: निर्माण सम्भव नहीं होता है।

Synthetic Method in mathematics

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2.संश्लेषणात्मक विधि की विशेषताएं(Qualities of Synthetic Method) –

(1.)यह विधि सरल, सूक्ष्म और क्रमबद्ध है। किसी भी गणित सम्बन्धी हल को संगठित रूप से प्रस्तुत करने के लिए यह एक उपयोगी विधि है। पाठ्यपुस्तकों में इस विधि का उपयोग इसी कारण किया जाता है।
(2.)इस विधि द्वारा प्रस्तुत हल अथवा उपपत्ति विद्यार्थियों को सहज ही समझ में आ जाती है क्योंकि इस विधि द्वारा प्रस्तुत हल अथवा उपपत्ति का प्रत्येक पद ज्ञात सत्यों एवं सिद्धान्तों पर आधारित होता है। विद्यार्थी को केवल किसी रचना या पद विशेष को याद मात्र करना होता है जिससे निष्कर्षों या उपपत्ति ज्ञात करनी होती है।
(3.)विश्लेषणात्मक विधि के पश्चात संश्लेषणात्मक विधि का उपयोग आवश्यक है। यह विधि विश्लेषणात्मक विधि की पूरक है।
(4.)’ज्ञात से अज्ञात की ओर ‘ अग्रसर करने का सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक है तथा विद्यार्थियों के लिए सुविधाजनक है। अध्यापक के कार्य को इस विधि ने सरल बना दिया है।
(5.)यह विधि विश्लेषणात्मक विधि से सरल है तथा हल या निष्कर्ष निकालने की विधि अधिक स्थान नहीं घेरती।

3 .सीमाएँ(Limitations)

(1.)किसी साध्य अथवा समस्या का हल संश्लेषणात्मक विधि से ज्ञात नहीं किया जा सकता। समाधान के लिए विश्लेषण आवश्यक है।
(2.)संश्लेषणात्मक विधि केवल सिद्ध कर सकती है किन्तु समझा नहीं सकती क्योंकि इस विधि द्वारा यह ज्ञात नहीं किया जा सकता कि कोई रचना क्यों की गई अथवा कोई पद क्यों जोड़ा या घटाया गया है या कोई पद विशेष किस कारण से चयन किया गया है।
(3.)इस विधि से विद्यार्थियों की तर्क-शक्ति, निर्णय-शक्ति और सोचने की शक्ति का विकास नहीं हो सकता है। विद्यार्थी निष्क्रिय रहते हैं तथा उन्हें अनेक पदों को रटना पड़ता है। यदि विद्यार्थी किसी बात को एक बार भूल जाएँ तो दुबारा उसका निर्माण नहीं कर सकते।
(4.)इस विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान बालकों का स्वयं का खोजा हुआ नहीं होता। इसलिए वह स्थायी नहीं होता। बालक नि:सहाय होकर प्रत्येक बात को समझने के लिए अध्यापक पर निर्भर रहते हैं। बालक स्वयं के प्रयासों द्वारा अधिक विषय सामग्री नहीं सीख सकता। यह एक नीरस और निर्जीव विधि है।

3.अध्यापकों को सुझावSuggestion to Teachers)

(1.)गणित के विभिन्न उप-विषयों को पढ़ते समय दोनों विधियों का उपयोग करना चाहिए। विशेषकर ज्यामिति के साधनों को सिद्ध करने में अथवा समस्याओं को हल करने में सर्वप्रथम साध्य या समस्या के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण आवश्यक है जिससे कि विद्यार्थी यह समझ सकें कि कोई रचना या किसी पद का उपयोग क्यों किया गया है तथा किस प्रकार हमें ये निष्कर्ष को प्राप्त करने में उपयोगी है।
(2.)विश्लेषण के पश्चात, संश्लेषणात्मक विधि द्वारा सामग्री को प्रस्तुत किया जाए।
(3.)इस बात का ध्यान रखा जाए कि क्यों? और कैसे? प्रश्नों के उत्तर विश्लेषणात्मक विधि द्वारा बालकों को स्पष्ट हो जाएँ जिससे रटने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन नहीं मिले।
(4.)यह एक कटु सत्य है कि विश्लेषणात्मक विधि को काम में लाने से अध्यापक को समझाने में अधिक समय लग सकता है किन्तु इसको समय की बर्बादी न समझा जाए वरन् एक उपयोगी आवश्यकता माना जाए।
(5.)जहाँ तक संभव हो विद्यार्थियों को स्वयं को हल ढूँढ़ने या उपपत्ति का निर्माण करने के अवसर दिए जाएँ जिससे कि उनका अपेक्षित विकास सम्भव हो।
(6.)परीक्षाओं में ऐसे प्रश्नों को स्थान दिया जाए जो मौलिकता का परीक्षण करते हों।
(7.)पाठ्यपुस्तकें अधिकांशतः संश्लेषणात्मक विधि पर लिखी गई हैं। अतः गणित के अध्यापकों से यह अपेक्षा की जाती है कि इस कमी को स्वयं के प्रयासों द्वारा दूर किया जाए। पाठ की तैयारी करते समय विश्लेषणात्मक पक्ष के बारे में विस्तार से सोचना आवश्यक है।

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