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How to Protect Children to Deteriorate?

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1.बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Children to Deteriorate?),छात्र-छात्राओं को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Students from Deterioration?):

  • बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Children to Deteriorate?) यह माता-पिता,अभिभावक तथा शिक्षा संस्थानों की आम समस्या है।प्रत्येक बच्चे का स्वास्थ्य,प्रकृति,रुचि,रुझान,आदतें,संस्कार,स्वभाव,वातावरण,सोच,जीवन के आदर्श इत्यादि भिन्न-भिन्न होते हैं अतः सभी बच्चों को सुधारने के लिए एक जैसे नियम लागू नहीं किए जा सकते हैं।बच्चों की उपर्युक्त बातों अर्थात् रुचि,रुझान,आदतें,संस्कार,स्वभाव इत्यादि की पहचान करके ही अभिभावकों को उसके अनुसार सुधारने का प्रयास करना चाहिए।उदाहरणार्थ यदि बच्चों में बिगाड़ उसके मित्रों की संगत के कारण हो रहा है तो बच्चों को सामान्य शिष्टाचार की बातें सिखाने से सुधार नहीं हो सकता है।इसलिए बच्चों के मूल कारण या कारणों की पहचान करके उसके अनुसार ही सुधार की प्रक्रिया अपनाएं।
  • बच्चों तथा युवाओं को बिगाड़ने,भटकने तथा दिशाहीनता के अनेक कारण और इतने ज्यादा हैं कि उनकी एक साथ चर्चा करने के लिए एक-दो लेख पर्याप्त नहीं है बल्कि इसके लिए एक वृहद ग्रन्थ या विश्वकोश लिखना पड़ेगा तभी सभी बातों को समेटा जा सकता है।परंतु इस सारी बातों पर विचार-विमर्श का सारांश और समझदारी इसी में है कि बच्चों को बिगाड़ने के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या केवल बच्चे,माता-पिता,अभिभावक,परिवार,समाज,मित्र,शिक्षा संस्थानों का वातावरण,शिक्षक,बच्चे के मित्र,वातावरण,परिस्थिति या कोई ओर? मूल कारण या कारणों की पहचान करके सुधारने की प्रक्रिया के लिए कमर कसकर अपना कर्त्तव्य निभाना चाहिए तभी सुधार सम्भव हो सकेगा।
  • यह सुधार की प्रक्रिया तभी लागू की जा सकती है जबकि माता-पिता,अभिभावक बच्चों को समय देंगे।आप कितने बड़े जाॅब को करते हों,अपने जाॅब,नौकरी,व्यवसाय अथवा जो भी आप कार्य करते हैं उसमें कितने ही व्यस्त हों परंतु अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर अथवा निर्धारित समय पर काम को खत्म करके अपने बच्चों तथा परिवार को समय देना ही होगा।इससे न केवल आप तनाव से मुक्त होंगे बल्कि बच्चों व परिवार से जुड़ सकेंगे और सुधार की प्रक्रिया लागू कर सकेंगे।
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2.बच्चों को सुधारने के लिए अभिभावक क्या करें? (What do Parents do to Improve Their Children?): 

  • (1.)बच्चों की उन्नति,प्रगति और विकास में मित्रों का बहुत बड़ा योगदान है तो बिगाड़ने में भी उनकी अहम भूमिका होती है।अभिभावक यह ध्यान रखें कि बच्चे अच्छे मित्र ही बनाएं।अच्छे मित्रों की पहचान के लिए यह ध्यान देवें कि आपके बच्चे पर मित्र किस प्रकार का प्रभाव डाल रहे हैं? बच्चों को अच्छे मित्र बनाने के लिए प्रेरित करें।कभी-कभी बच्चों के ये तथाकथित मित्र अनुचित दबाव डालकर बच्चों को गलत कार्यों की ओर मोड़ देते हैं।इस स्थिति से बचने के लिए बच्चों में इतना नैतिक बल पैदा करें कि वे अपने मित्रों के गलत कार्यों का विरोध करना सीखें।
  • (2.)बच्चों को अत्यधिक कठोर अनुशासन में न रखें और न अत्यधिक स्वतंत्र छोड़े।बच्चों को उतनी ही स्वतंत्रता दें जिससे वे अनुशासन में रहें।उन्हें गलत कार्य करने की छूट न दें।
  • (3.)बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने में उनकी महत्वाकांक्षाओं का ध्यान रखें।उनकी कल्पनाओं और सर्जनात्मक क्षमताओं को विकसित करने में सहयोग दें।युवावस्था की ओर बढ़ते हुए लड़के-लड़कियों को अपनी गलतियों से खुद ही कुछ सीखने और सुधरने के पर्याप्त अवसर प्रदान करें।
  • (4.)अपने बच्चों की तुलना दूसरों बच्चों से करके उनकी कमियों,कमजोरियों,असफलताओं को बढ़ाने का प्रयास न करें क्योंकि इस विश्व में प्रत्येक बच्चा अद्वितीय है।प्रत्येक बच्चे की सोच,प्रतिभा,योग्यता,रुचि,रुझान,स्वभाव,आदतें,मानसिक स्थिति,बौद्धिक क्षमता एक से नहीं होते हैं,फिर अपने बच्चों की दूसरों से तुलना कर उन्हें तनावग्रस्त बनाने का प्रयास क्यों करते हैं? आपके ये प्रयास उनमें रचनात्मक सुधार तो कुछ कर नहीं पाते,हाँ उनमें हताशा,हीनता,हिंसक विचार,भय,दुर्बलता के विचार अवश्य पनपने लगते हैं।
  • (5.)बच्चों की अनुचित भ्रामक और गलत सोच,बातों व आदतों पर रोक-टोक अवश्य लगाएं।रास्ते से भटके हुए बच्चों को पटरी पर लाने के लिए उन्हें थोड़ी सी ताड़ना,रोक-टोक बहुत आवश्यक होती है।अतः उनकी बुरी आदतों के लिए उदासीनता यह सोच कर अपनाना कि बच्चा भला-बुरा खुद समझें,खतरनाक साबित हो सकती है।
  • (6.)नैतिकता,आध्यात्मिकता,सभ्यता,संस्कृति,संबंधों और साधनों की पवित्रता का सामाजिक और पारिवारिक जीवन में अपना महत्त्व है।अतः इस महत्त्व को किसी भी स्तर पर कम न आंकें।जब धार्मिक,आध्यात्मिक जीवन पद्धति नहीं अपनाई जाती है,सामाजिक वर्जनाओं और नैतिक मूल्यों की अनदेखी की जाती है तो विवाह पूर्व तथा विवाह बाधा नैतिक यौन संबंध स्थापित हो जाते हैं जो बच्चों के जीवन को पतन की ओर ले जाती है।अतः बच्चों की सोच व जीवन पद्धति को नैतिक,धार्मिक,आध्यात्मिक,संस्कारवान तथा पारदर्शी बनाएं जिससे वे कहीं भी मानसिक रूप से कमजोर होकर अनैतिक संबंधों को न अपनाएं।
  • (7.)विभिन्न उत्सवों,उत्सवों को परिवार के साथ मनाएं जिससे बच्चे परिवार से आत्मिक रूप से जुड़ना सीखें।परिवार के प्रति समर्पित भावना रखें तथा एक दूसरे का सहयोग करें।
  • (8.)मां-बाप को आपस में लड़ाई-झगड़ा,मनमुटाव करके परिवार का वातावरण तनावग्रस्त न बनाएं इससे बच्चों की मानसिकता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।माता-पिता के बीच झगड़ा,मनमुटाव हो भी जाए तो तत्काल उसको निपटा लेना चाहिए।माता-पिता का आपस में प्रेम,घृणा,तिरस्कार,आत्मीयता,सहयोग,क्रोध सबका बच्चे के मन पर प्रभाव पड़ता है।तनावपूर्ण वातावरण के कारण बच्चे प्रायः घर से भाग जाते हैं।
  • (9.)संपन्न परिवार हो अथवा अन्य मध्यमवर्गीय परिवार हो तो बच्चों की हर इच्छा,फरमाइश,जिद,मांग पूरी की जाती है तो उसके परिणाम अच्छे नहीं निकलते हैं।बच्चों के सामने अभाव,कष्ट,तकलीफ,परेशानियां भी आने दें जिससे वे अभावों इत्यादि में रहना सीखें।बच्चों को प्रलोभन देकर अपने कोई कार्य न करवाएं अथवा पढ़ाई-लिखाई हेतु प्रलोभन न दें।प्रलोभन से बच्चे अनुचित मांग रखने लगते हैं तथा उनकी मानसिकता में लोभ,लालच,स्वार्थ जैसी विकृतियां पनपने लगती हैं।
  • (10.)मां द्वारा बच्चों को गलत बात पर रोक-टोक,डांटने पर पिता को अथवा पिता द्वारा गलत बात पर रोक-टोक,डाँटने पर मां को बच्चे का पक्ष नहीं लेना चाहिए।इस प्रकार व्यवहार करने और पक्षपात बच्चे को उद्दण्ड,उच्छृंखल,अनुशासनहीन बनाता है तथा वे माता-पिता की बिल्कुल परवाह नहीं करते हैं।
  • (11.)बच्चों की किसी भी बुरी अथवा गंदी आदत,बात,रहस्य का पता चल जाए तो उन्हें ताड़ना देना,मारपीट करना अथवा अपमानित करने से उनको सुधारा नहीं जा सकता है।उन्हें गलत,बुरी,गंदी आदत,बात पर उसके भले-बुरे परिणामों से समझाएं और सहनशीलता का परिचय दें।ऐसा करने से बच्चे में सुधार करना संभव हो सकता है।
  • (12.)माता-पिता को अपना आचरण पवित्र,उज्जवल,आदर्श और सात्त्विक रखना चाहिए क्योंकि माता-पिता के आचरण का सबसे अधिक प्रभाव ही बच्चों पर पड़ता है।अपनी कथनी व करनी में अंतर न आने दें।
  • (13.)स्टेटस सिंबल को प्रदर्शित करने वाली तथा तथाकथित प्रगतिशीलता को प्रदर्शित करने वाली पार्टियों का आयोजन न करें और न ऐसी पार्टियों में हिस्सा लें क्योंकि इन पार्टियों में अक्सर भद्दे,अश्लील व भौंडे प्रदर्शन किए जाते हैं जो बच्चों को बिगाड़ने में ऐसी सीमा तक ले जाते हैं जहां से वापसी कठिन हो जाती है।
  • (14.)अपने मन में प्रतिशोध,ईर्ष्या,जलन,घृणा,तिरस्कार,कुढ़न,द्वेष जैसी भावनाओं को न पनपने दें और न ही बच्चों में ऐसे विचारों को उत्पन्न करने दें।हमेशा सात्त्विक विचार रखें और बच्चों को भी साथ सात्त्विक बनाएं।
  • (15.)अपनी जीवनशैली को सात्त्विक,सहज,सरल,धार्मिक,आध्यात्मिक तथा सादगीपूर्ण बनाएं।हाई-फाई बनने की सोच आपको व आपके बच्चों को निराशाओं,परेशानियों,अवसादो,चिंताओं,बनावटीपन की ओर धकेल देगी।
  • (16.)बच्चों की सोच चतुर (smart),आधुनिक,सकारात्मक,नवीन,प्रगतिशील होने दें और उसमें उनको सहयोग दें।अपनी परंपरागत सोच से बाहर निकलें।
  • (17.)बच्चों की प्रतिभा,खूबियों,विशेषताओं को पहचाने और उन्हें उभारने,तराशने व निखारने के अवसर दें।यदि आवश्यक हो तो प्रशिक्षण दिलाएं।
  • (18.)बच्चों के अच्छे विचारों,प्रयासों,भावनाओं का सम्मान करें और प्रोत्साहित करें।उनकी क्षमताओं,गुणों,आदर्शों में वृद्धि करने के उपाय करें क्योंकि जीवन में इनसे ही ज्ञान में वृद्धि और सफलता हासिल की जाती है।बच्चों को सुख-सुविधाओं के बजाय प्रेरणा की अधिक आवश्यकता होती है।
  • (19.)बच्चों को सामान्य शिष्टाचार सिखाएं।बड़ों को कैसे अभिवादन किया जाता है?मेहमान,अतिथि अथवा बड़े आपस में बातचीत कर रहें हो तो बच्चे वहाँ न बैठे बल्कि उनको अभिवादन करके स्वयं चले जाएं,ऐसी शिष्टता सिखाएं।
  • (20.)उचित जाॅब न मिलने के कारण बच्चे भटक जाते हैं अतः बच्चों को भविष्य निर्माण,जॉब के चुनाव तथा आत्मनिर्भर होने में आवश्यक सहयोग करें।सही लक्ष्य का चुनाव करने में मदद करें।

3.बच्चे बिगड़ने से कैसे बचे? (How to Prevent Children from Deteriorating?):

  • (1.)शैक्षिक परीक्षा में,किसी प्रतियोगिता परीक्षा में,प्रोत्साहन और अवार्ड परीक्षा में,प्रवेश परीक्षा में अथवा जाॅब मिलने पर सफलता,उपलब्धियों,उन्नति,प्रगति और विकास का श्रेय स्वयं न लेकर अभिभावकों व शिक्षकों को भी दें।इससे आपमें अहंकार नहीं पनपेगा।वस्तुस्थिति भी यही है कि किसी भी सफलता,उपलब्धि,उन्नति इत्यादि में कई व्यक्तियों की सहायता व सहयोग होता है।
  • (2.)अपनी योग्यता,क्षमता तथा परिस्थिति का सही मूल्यांकन करें और अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने का प्रयास करें।कभी-कभी काफी प्रयास करने पर भी अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार सफलता प्राप्त नहीं होती है इसलिए बड़ी सफलता प्राप्त करने के चक्कर में छोटी सफलता मिल रही हो तो उसे प्राप्त करें,नजरअंदाज न करें।
  • (3.)किसी भी पेचीदा समस्या,परेशानियों,संकट में माता-पिता,शिक्षकों का सुझाव अवश्य लें परंतु निर्णय अपनी अंतरात्मा की आवाज पर स्वयं लेना सीखें।
  • (4.)आप अपने को बदल सकते हैं परंतु दूसरों को नहीं।अतः दूसरों को अपने विचारों के अनुसार बदलने,झुकाने,सहमत करने के लिए आग्रह,प्रार्थना कर सकते हैं परंतु बाध्य नहीं।अतः दूसरे सहमत न हों और न माने,आपके अनुसार न चलें तो दुखी न हो।
  • (5.)प्रसन्नचित्त रहने,अपने विचारों को प्रकट करने,स्वाभिमानपूर्वक रहने के लिए अपने जॉब को,कर्त्तव्यों को पूर्ण निष्ठा,ईमानदारी,लगन व मेहनत के साथ करें।अपने विचारों को ही सर्वोपरि न समझें बल्कि दूसरे के विचारों का भी सम्मान करें।इससे आपमें आत्मविश्वास पैदा होगा।
  • (6.)अपनी प्रतिभा,योग्यता,क्षमताओं को पहचानें और उन्हें विकसित करने की कला सीखें।उन्हें साकार करने का भरसक प्रयास करें।
  • (7.)गलती होने पर उसे स्वीकार करें तथा उसकी पुनरावृत्ति करने की कोशिश न करें।गलती होने पर स्वीकार करने से आपमें विनम्रता विकसित होती है।इससे छोटे नहीं हो जाते हैं बल्कि यह बड़प्पन है।
  • (8.)फालतू कार्यों,तथाकथित आधुनिकता वाले कार्यों,गप्पे हाँकने,निठल्ले बैठे रहने,आलस्य,प्रमाद,निरर्थक बातों पर वाद-विवाद करने में अपने समय और शक्ति को नष्ट न करें।
  • (9.)घर के बड़े बुजुर्गों का सम्मान करें।जहां आवश्यक हो उनसे परामर्श लें।उनके निर्देशों का यथासंभव पालन करें।
  • (10.)दूसरों की बुराई करने,निन्दा करने,बुरा सोचने में न तो दिलचस्पी लें और न स्वयं करें।बल्कि दूसरों की सहायता,सहयोग कर सकें तो करें।
  • (11.)बीमारी,कठिनाई,परेशानी में यथासंभव दूसरों की सहायता करें।उनके दुःखों में सम्मिलित होने की कोशिश करें।
  • (12.)अपने विचारों को श्रेष्ठ,अच्छा,उच्च समझे परन्तु दूसरे के विचारों को भी निकृष्ट,महत्त्वहीन,बुरा,निम्न न समझें।
  • (13.)कक्षा में,यात्रा में,किसी उत्सव पर,गोष्ठी में अथवा किसी भी अवसर पर लोगों से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश करें।उनके विचारों को समझें और मान्यता दें।
  • (14.)समय का पालन करने की कोशिश करें विद्यालय हो,जाॅब हो,कोई फंक्शन हो,कोई परीक्षा हो अथवा साक्षात्कार हो तो समय पर पहुंचें।
  • (15.)क्रोध न करें यदि क्रोध आ भी जाए तो विवेक न खोएं,मानसिक नियन्त्रण रखें।क्रोध को तत्काल मन से निकाल दें और सहज व सरल बन जाएं।

4.बच्चों के बिगड़ने का दृष्टांत (The Parable of Children’s Deterioration):

  • आधुनिक युग अर्थ (धन) प्रधान युग है।धन का महत्त्व हर युग में रहा है।इसलिए भारतीय संस्कृति में चारों पुरुषार्थों में धन को भी स्थान दिया गया है।धन का उचित उपार्जन व उपयोग धर्म को जीवन में अपनाने पर की ही किया जा सकता है।परंतु आजकल के युवाओं को धन तो कमाना सिखाया जाता है और धर्म की शिक्षा-दीक्षा नहीं दी जाती है।फलस्वरूप आज के युवक-युवतियां येन-केन प्रकारेण धनोपार्जन करने का प्रयास करते हैं।धर्म के बिना धन से चिन्ता,तनाव व कई मानसिक बीमारियां उत्पन्न हो जाती है क्योंकि लोग धन कमाने के लिए पागल हो जाते हैं।आज के कई युवक-युवतियां धर्म के बिना छोटे मार्ग से (अनैतिक तरीकों) से धन कमाने को बुरा नहीं नहीं मानते हैं।अनैतिक तरीके से जैसे चोरी,छल-कपट,बेईमानी,भ्रष्टाचार,रिश्वतखोरी इत्यादि से कमाया गया धन सुख और समृद्धि का आधार नहीं बन सकता है।यहां तक ईमानदारी और मेहनत से कमाए गए धन से भी धर्म के बिना आत्मिक संतुष्टि नहीं मिल सकती है।
  • एक नगर में दो मित्र रहते थे।दोनों मित्रों ने डिग्री (आधुनिक शिक्षा) तो हासिल कर ली।परंतु डिग्री हासिल करने के बाद उन्हें जाॅब प्राप्त नहीं हो सका क्योंकि वे कोई हुनर (skill) तो जानते नहीं थे।दोनों मित्रों की प्राचीन भारतीय संस्कृति,धर्म,सत्य,सात्त्विक जीवन पद्धति तथा अच्छा आचरण करने में कोई आस्था नहीं थी।न तो शिक्षा संस्थानों,न घर-परिवार में तथा न सहपाठियों से,न समाज से तथा न अन्य व्यक्तियों से उन्हें अच्छे संस्कार मिले।
  • उन्होंने धन कमाने के लिए एक युक्ति सोची।वे गांव के प्रसिद्ध साधु के आश्रम में जाने लगे।वे बाहरी सौम्यता,सज्जनता,विनम्रता,सेवा से (ओढ़ी हुई) साधु को प्रभावित करने लगे।साधु उनके दिखावटी व्यवहार,चाल-चलन से प्रभावित हो गए।वे घंटों साधु महाराज की सेवा करते।एक दिन सेवा करते-करते उन्होंने अपनी व्यथा कही।आपसी बातचीत व व्यवहार से उन दोनों मित्रों ने यह ताड़ लिया था कि साधु महाराज के पास काफी धन-दौलत है।साधु ने उनसे कहा कि तुम्हें जॉब नहीं मिल रहा है तो स्वयं का कोई धंधा करो।उन दोनों ने कहा कि धंधा करने के लिए धन चाहिए और धन हमारे पास नहीं है।न ही घरवाले इतना धन देने में सक्षम है।यदि आप सहायता करें तो हम धन्धा कर सकते हैं।आपकी कृपा होगी और धंधा फल-फूल जाएगा तो तत्काल हम आपका धन वापस लौटा देंगे।
  • साधु महाराज उनकी हालत से द्रवित होकर ₹200000 दे दिए।दोनों मित्रों ने धंधा तो किया नहीं और ऐशो आराम से जीवनयापन करने लगे तथा फालतू के कार्यों में पैसों को बर्बाद कर दिया।जब दो-तीन साल हो गए और उन्होंने साधु को पैसा नहीं लौटाया तो साधु ने दोनों मित्रों को पैसा वापस करने के लिए तगादा किया।पहले तो दोनों मित्रों ने पैसा लौटाने के लिए हाँ देंगे ऐसा आश्वासन देते रहे।परंतु जब साधु ने ज्यादा दबाव डाला तो उन्होंने साधु को रास्ते से हटाने का निश्चय किया।
  • एक दिन वे रात को आए।उस समय साधु अकेले थे।दोनों ने साधु का मुंह बंद करके तथा लोहे के तार से साधु का गला घोट दिया।हालांकि साधु ने बचने के लिए काफी संघर्ष किया परन्तु साधु वृद्ध थे तथा वे दोनों मित्र युवा तथा शक्ति से भरपूर थे।
    इस प्रकार उस साधु की इहलीला समाप्त हो गई।परंतु उन बिगड़े हुए बच्चों का भविष्य खराब हो गया।वे पुलिस द्वारा पकड़े गए हालांकि वे जमानत पर छूट गए परंतु समाज के लोगों की नजरों से तो वे गिर ही गए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Children to Deteriorate?),छात्र-छात्राओं को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Students from Deterioration?) के बारे में बताया गया है।

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5.गणित में बड़ा होने का ख्वाब (हास्य-व्यंग्य) (Dreams of Growing up in Mathematics) (Humour-Satire):

  • नीरज:क्या तुम जानते हो मेरी खुशी का राज क्या है?
  • धीरजःअरे यार, तुम्हारा ख्वाब गणित में बड़ा होने का है।तुम हर वक्त बस गणित में बड़ा होने का ख्वाब देखते रहते हो कि ओए मैं गणित में बहुत महान बन गया।

6.बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (Frequently Asked Questions Related to How to Protect Children to Deteriorate?),छात्र-छात्राओं को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Students from Deterioration?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या बच्चों को सपने नहीं देखना चाहिए? (Shouldn’t Children Dream?):

उत्तर:सपने देखे परंतु उनको साकार करने का प्रयत्न भी करें।सपने वे होते हैं जो सोने नहीं देते हैं।अन्यथा केवल सपने देखते रहने से वे भटकने का कारण भी बन जाते हैं।

प्रश्न:2.माता-पिता को बच्चों के मित्रों पर क्या ध्यान देने की जरूरत है? (What Attention do Parents Need to Pay to Their Children’s Friends?):

उत्तर:बच्चों और बच्चों के मित्रों को यह छूट न दें कि वे देर रात तक घर लौटे और देर तक सोते रहे। बच्चों के मित्रों को चाहे जैसी फिल्में देखने,देर तक टीवी देखने की छूट न दें।याद रखें मित्रों से बच्चों का व्यक्तित्व निखरता है तो बिखर भी सकता है। बच्चों के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव मित्रों का ही पड़ता है।

प्रश्न:3.मित्र का चुनाव कैसे करें? (How to Choose a Friend?):

उत्तर:बच्चों को सम्मान गुण,कर्म,स्वभाव वाले बच्चों से ही मित्रता करनी चाहिए।पैसों की चकाचौंध से प्रभावित होकर धनाढ्य बच्चों से अथवा निम्न स्तर के बच्चों के साथ मित्रता का निर्वाह करना कठिन होता है और कई बार तो बिगाड़ का कारण भी बन जाता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Children to Deteriorate?),छात्र-छात्राओं को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Students from Deterioration?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

How to Protect Children to Deteriorate?

बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं?
(How to Protect Children to Deteriorate?)

How to Protect Children to Deteriorate?

बच्चों को बिगड़ने से कैसे बचाएं? (How to Protect Children to Deteriorate?)
यह माता-पिता,अभिभावक तथा शिक्षा संस्थानों की आम समस्या है।
प्रत्येक बच्चे का स्वास्थ्य,प्रकृति,रुचि,रुझान,आदतें,

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