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Avoid Doing Obscene Acts

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1.अश्लील हरकते करने से बचें (Avoid Doing Obscene Acts),छात्र-छात्राएँ अश्लील हरकते करने से बचें (Students Should Avoid Indulging in Obscene Acts):

  • अश्लील हरकते करने से बचें (Avoid Doing Obscene Acts) क्योंकि इससे व्यक्ति का न केवल नैतिक पतन होता है बल्कि अपने जॉब अथवा अध्ययन कार्य को भी पूर्ण एकाग्रता से संपन्न नहीं किया जा सकता है।आधुनिक जीवन शैली,पाश्चात्य सभ्यता के संपर्क,शिक्षा में भारतीय सभ्यता और संस्कृति के तत्वों को शामिल न करने,फिल्मों,टीवी के दुष्प्रभावों आदि के कारण युवावर्ग अश्लील हरकते करते हैं।
  • अश्लील हरकतें करते-करते ही व्यक्ति कामुक प्रवृत्ति का हो जाता है।अश्लील हरकते बीज है तो कामुकता वृक्ष है।कामान्ध मनुष्य अपनी काम-पिपासा को शांत करने के लिए घिनौने यौन-कृत्य व व्यापार करता है।बलात्कार और हत्या जैसे कुकर्मों में लिप्त हो जाता है।
  • यौन हरकते,अश्लील हरकते करने वाला व्यक्ति आँखों के होते हुए भी अंधा होता है।यहाँ अन्धा होने से तात्पर्य है कि लोगों का विवेक जाता रहता है अर्थात् इन्हें अच्छे-बुरे,सही-गलत की पहचान नहीं रहती है।
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2.अश्लील हरकतों के लक्षण (Symptoms of Obscene Acts):

  • अश्लीलता असभ्यता की बहुत बड़ी पहचान है और असभ्यता पशुता का लक्षण है।इसका ठीक-ठीक अर्थ है कि जो अश्लील है,वह पशु है और मनुष्य होकर पशुता का लांछन लगने से बढ़कर कोई दुर्भाग्य नहीं।
  • अतएव मनुष्य बने रहने और उससे बढ़कर देवत्व के समीप पहुंचने के लिए मनुष्य को अपने जीवन से अश्लीलता का एकदम बहिष्कार कर देना चाहिए।उसे चाहिए कि न तो स्वयं अश्लील बने और न किसी अश्लीलता को पास फटकने दे।
  • सभ्य समाज में ही उन्नति एवं प्रगति की परिस्थितियों है।क्योंकि उस समाज के सदस्य अपना समय और शक्तियां अनैतिक व्यवहार में अपव्यय न करके सभ्यतापूर्ण शालीन सृजन में ही लगाया करते हैं।
  • जिसकी दृष्टि दूषित हो चुकी है,जिसका मन मलिन और आत्मा पतित हो चुकी है,उसे अपने जीवन में उन्नति की आशा तो दूर,कामना तक नहीं करनी चाहिए।ऐसी अधो स्थिति में उन्नति असंभव है।यदि वह उसकी कामना करेगा तो उसकी आपूर्ति का असंतोष भी भोगेगा।
  • हां एक पतित मन:स्थिति वाला भी उन्नति की कामना कर सकता है,किंतु तब,जब वह पहले अपनी प्रवृत्तियों को उर्ध्वगामिनी बनाने की शपथ ले और उसका प्रयत्न करे।
  • मनुष्य को नीची स्थिति में पहुंचाने का हेतु बहुत कुछ उसकी अश्लील प्रवृत्तियाँ ही हैं।क्योंकि अश्लीलता उसको वासनाओं का गुलाम बनाए रहती है और वासनाएं उन्नति एवं प्रगति के पथ में बहुत बड़ा अवरोध है।अश्लील प्रवृत्तियों का व्यक्ति अभद्र चित्र देखकर,गन्दी कल्पना करने,गंदा वार्तालाप करने और गोपनीय दृश्य देखने में बड़ा आनंद का अनुभव किया करता है।वह एक क्षण को भी यदि कोई अश्लीलता देख लेता है तो घंटों ऊहापोह में डूबा रहता है।
  • सोते-जागते,उठते-बैठते अथवा कोई काम करते समय भी वह तब तक उन्हीं गंदी भावनाओं में गोते खाता रहता है,जब तक की उसकी वृत्तियाँ थककर शिथिल नहीं हो जातीं।इसे विषाक्त-वासनाओं की गुलामी के सिवाय और क्या कहा जा सकता है।
  • अभागे अश्लील व्यक्ति को अपनी मान-मर्यादा का तो विचार होता नहीं,वह दूसरों की भी भद्र भावनाओं तथा मान-मर्यादाओं का विचार नहीं करता।बाजारों में खुलेआम स्त्रियों के अश्लील भाव-भंगिमा पूर्ण चित्र बेचना,लोगों को ठहरकर उनको देखना,उनके विषय में वासनात्मक टिप्पणी करना,खरीदना उन्हें कोई ऐसी अभद्रता नहीं मालूम होती,जिसके लिए वे अपने आस-पास के दूसरे व्यक्तियों का ख्याल रखें।
  • सह शिक्षा के कारण छात्र-छात्राएं एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं।अक्सर लगभग 15 वर्ष की अवस्था में छात्र-छात्राओं की कामेन्द्रियाँ सक्रिय हो जाती है।यदि वे अच्छे वातावरण,अच्छे संग,अच्छे साहित्य का अध्ययन नहीं करते हैं तो छात्राओं पर भद्दे कमेंट्स करने लगते हैं,विद्यार्थी संवादों का प्रयोग करते हैं।हमारे चारों ओर टीवी,फिल्मों आदि का भी ऐसा जाल बिछा हुआ है जिससे उनकी कामेन्द्रियाँ भड़कती है।
  • यदि छात्राएं सुशील,लज्जाशील होती हैं तो उसका प्रतिकार नहीं करती हैं।जो बहादुर व निडर होती हैं वे मुंहतोड़ जवाब देती है और प्रतिरोध करती हैं।कुछ छात्राएं फिल्मी चरित्रों,टीवी के नाटक के पात्रों,मॉडलों को देखकर उनके कदम बहक जाते हैं और लड़कों की इन अश्लील हरकतों को बढ़ावा देती हैं।

3.अश्लीलता के प्रभाव (Effects of Obscenity):

  • इस प्रकार की अश्लील प्रवृत्तियों का व्यक्ति न केवल गंदे गड्ढे में पड़ा-पड़ा अपनी ही हानि करता है,बल्कि सारे समाज को दूषित कर देता है।मनुष्य की तीव्र भावनाओं में बड़ी संक्रमणशीलता होती है।वे अपनी सजातीय भावनाओं से शीघ्र संपर्क स्थापित कर उन्हें उद्बुद्ध कर देती है।
  • इस प्रकार से एक की भावनाओं से दूसरे की और दूसरे से तीसरे की अश्लील भावनाएं जाग उठती है,जिससे समाज में अश्लीलता का वातावरण छा जाता है और उसी के अनुसार गतिविधियाँ प्रारंभ हो जाती हैं।
  • तब तरह-तरह के संघर्ष,भाति-भांति की विषय-वासनाओं और अनेक प्रकार के व्यभिचारों का जन्म होने लगता है और मानव समाज पशु-समूह जैसे रूप में बदल जाता है।आदमी की उदात्त भावनाएं एवं विचार दब जाते हैं,जिससे समाज की प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जाता है।
  • कुछ समय तो अच्छे विचारों के लोग मनुष्य की निम्नता के कलंक से अश्लील वातावरण में एक परेशानी,एक विकलता,व्यग्रता अथवा दुःख अनुभव करते हैं।अश्लीलता प्रसारित करने वाले व्यक्तियों तथा कारणों का विरोध करते रहते हैं,किंतु फिर धीरे-धीरे सहिष्णु बनकर उस गंदगी को सहने के आदी हो जाते हैं और इच्छा न होते हुए भी उदासीन बन जाते हैं।
  • सरेआम गंदी गाली बकना,अश्लील गाने गाना,लड़कियों आदि स्त्रियों को देखकर छींटाकशी करना,किसी स्वांग अथवा खेल-तमाशे में अश्लील नारे मारना,सीटी बजाना आदि अश्लील प्रवृत्ति के व्यक्तियों के लिए सहज-सामान्य बातें हुआ करती हैं।अपनी इन हरकतों से उन्हें जरा भी यह लज्जा नहीं होती कि वह समाज का कितना बड़ा अहित कर रहे हैं।उस समाज का जिसमें कि वह स्वयं रहते हैं,उसके मां-बाप,भाई-बहन सभी लोग रह रहे हैं और जिस पर कि न केवल उनकी ही बल्कि उससे संबंधित सभी व्यक्तियों की उन्नति निर्भर रहती है।
  • इस सत्य के लिए तो अब किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है की वासनात्मक सुख में एक ऐसा भयंकर विष रहा करता है जो अपने गुलाम की सारी मनुष्यता को जलाकर भस्म कर देता है।जब ऐसे अस्थिर और अहितकर सुख के पीछे मनुष्य लग जाता है,तब आचरण,चरित्र और चारुता का सुख कितना महान होगा।
  • विद्यार्थियों के एक बार अश्लीलता का चस्का लग जाता है तो रात-दिन अश्लील बातों का चिंतन करता रहता है।उसका अध्ययन से ध्यान हट जाता है।वह अश्लील हरकतें करने के बारे में नई-नई युक्तियां और योजनाएं बनाता रहता है।अश्लील हरकतों के जाल में फंसने के बाद छात्र-छात्राओं को ओर कुछ अच्छा लगता ही नहीं है।वह अश्लील हरकते करने की जुगत व तिकड़में भिड़ाता रहता है।

4.अश्लीलता से बचाव करें (Protect Against Obscenity):

  • पतन के गर्त से अपनी प्रवृत्तियों को ऊंची कक्षा में पहुंचाने का प्रयत्न करना स्वयं ही उन्नति के सोपान पर पदार्पण करना है।मनुष्य जितना अपने इस प्रयत्न में सच्चा और ईमानदार रहेगा उतनी ही तेजी से ऊंची अवस्थाओं में पहुंचने लगेगा।
  • दरअसल बात यह है की अश्लील प्रवृत्तियों के व्यक्ति असामाजिक होते हैं।वह तो जबरदस्ती समाज के साथ चलना होता है और समाज उसको मजबूरन सह रहा होता है।नहीं तो ऐसे दुष्टों का स्थान तो समाज के बाहर पशुओं के साथ होना चाहिए।
  • संदेह नहीं कभी यदि यह संभव हो सके और किसी अलग बाड़े में एक साथ बांधे जा सकें,तब ठीक-ठीक उन्हें अपनी अश्लीलता की तस्वीर दिखाई दे जाए।
  • एक दुष्ट जब दूसरे दुष्ट को मजा चखाए तो साल-दो साल नहीं,माह-दो माह में ही ठीक हो जाए और तब उनको पता चले कि उनकी यह अश्लीलता,दुष्टता कितनी पीड़ादायक है,जिसको की सज्जन लोग सामाजिकता,नागरिकता,भद्रता एवं शालीनता के कारण छाती पर पत्थर रखकर सहन करते हैं।उन्हें ठीक पता चल जाए कि वे अपनी कमीनी हरकत से कितनी बड़ी असामाजिकता करते रहते हैं।
  • उदात्त भावनाओ में कैसे पुलक पैदा हो और कैसे अनुभूति प्राप्त हो,जब अज्ञानवश मनुष्य अपने मन:केंद्र में दूषित एवं दुष्ट भावनाओं की भीड़ लगाए रहता है।जिस प्रकार वह अपनी अश्लील भावनाओं का मित्र बनकर उनको पुष्ट करता और जगाता रहता है,उसी प्रकार अपना चमत्कार दिखाने के लिए एक बार ईमानदारी से शालीन भावनाओं को भी अवसर दे।
  • गंदगी किसी को तभी तक अंगीकार रहती है,जब तक उसे स्वच्छता का दर्शन नहीं होता।मनुष्य तीन दिन का पहना हुआ कपड़ा तभी तक साफ समझता रहता है,जब तक उसका धोबी उसके सामने धुले कपड़े नहीं लाता।साफ कपड़ों के सामने आते ही उसे अपने उन कपड़ों की असलियत मालूम हो जाती है,जिनको कि वह साफ समझ रहा था।
  • अश्लीलता एक आरोपित विकृति है,जबकि शालीनता मनुष्य का स्वाभाविक गुण है।अश्लीलता का अवगुण तभी तक मनुष्य को ग्राह्य रहता है,जब तक वह अपने स्वाभाविक गुण शालीनता को ऊपर नहीं लाता।
  • अस्तु,आवश्यक है कि निज के परिवार के और समाज तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए मनुष्य अपनी अश्लील प्रवृत्तियों को बलपूर्वक मिटाकर उनके स्थान पर अपने शुभ,शाश्वत और स्वाभाविक गुण शालीनता को स्थापित करे।
  • छात्र-छात्राओं को मन अपने अध्ययन पर केंद्रित रखना चाहिए और एकाग्रतापूर्वक अध्ययन में संलग्न रहना चाहिए।अश्लील बातें मन में आए तो उन्हें कम्पनी (company) नहीं देनी चाहिए।अपने आपको स्वाध्याय,सत्संग तथा सत्साहित्य का अध्ययन करने में व्यस्त रखना चाहिए।
  • अश्लीलता या अश्लील बातों का विचार या चिन्तन किया जाए तो हमारी ऊर्जा का क्षय होता है।जो ऊर्जा अध्ययन,स्वाध्याय आदि अच्छे कार्यों में खर्च होनी चाहिए उस ऊर्जा का क्षय गलत कार्यों,गलत संग,अश्लील हरकते करने आदि में खर्च होती है।
  • युवाकाल ऊर्जा को संचय करने का समय होता है और विद्याध्ययन करके ज्ञानार्जन अर्जित करने का समय है।ऐसे समय को वाहियात बातों में खर्च करने से हानि के सिवाय लाभ होता भी क्या है?
  • महापुरुषों,महान गणितज्ञों व वैज्ञानिकों के प्रेरक प्रसंगों का अध्ययन करना चाहिए।अपने शरीर व मन को स्वस्थ रखने के उपाय करने चाहिए।सुदृढ़ मनोबल व दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर अश्लील हरकतें करने की आदतों का त्याग कर देना चाहिए।

5.अश्लीलता का दृष्टांत (Instance of Obscenity):

  • एक मोटिवेशनल स्पीच के कार्यक्रम में काफी छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।वहां एक मनचली और दिलफेंक तबीयत का छात्र भी पहुंच गया।वहां सभी छात्र-छात्राओं के लिए बेंच पर बैठने की व्यवस्था थी।वह मनचली युवक एक बहुत ही सुंदर लड़की के पास बैठ गया।वह धीरे-धीरे उस छात्रा से सटता गया।वह छात्रा उस छात्रा के मन के भावों को ताड़ गई क्योंकि छात्राएं छात्रों के हावभाव,चाल,चरित्र,अश्लील हरकतों को जितनी जल्दी ताड़ लेती हैं उतनी जल्दी छात्र नहीं समझ पाते हैं।
  • वह छात्रा भले घर की थी और अच्छे संस्कारों में पली बढ़ी थी अतः चुपचाप सहन करती रही।प्रायः छात्र ऐसी स्थिति से गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं और छात्र के मौन व उपेक्षा भाव को उसका समर्थन समझ बैठते हैं।उस मनचले छात्र को भी ऐसी ही गलतफहमी हो गई और उसका हौसला बढ़ गया।लिहाजा उसने उसके पैर पर पैर रखना,पेट पर कुहनी मारना,कंधे की ओर अपना हाथ रखना आदि बेजा हरकते करना शुरू कर दिया।
  • अब उस छात्रा का धैर्य और संयम टूट गया तो उसने क्रोध भरी नजर से छात्र को देखा।उस छात्र ने मामला बिगड़ता देखकर बात को सम्हालने और मामले को पटाने के लिए उस छात्रा से पूछ लिया:माफ कीजिए,आपकी सुंदरता का राज क्या है? मैं अपनी बहन के लिए पूछना चाहता हूं।
  • उस छात्रा ने कहा जो गलती मैंने की है उसे दोहराना ठीक नहीं है।क्या आप पसंद करेंगे कि यदि आपकी बहन ही उस सुंदरता का राज जानकर सुंदर हो जाए और आपकी तरह कोई मनचला छात्र उसके पास बैठकर अपना शरीर रगड़े; उसके साथ अश्लील हरकतें करे और फिर यह पूछे कि आपकी सुंदरता का राज क्या है?
  • उपर्युक्त आर्टिकल में अश्लील हरकते करने से बचें (Avoid Doing Obscene Acts),छात्र-छात्राएँ अश्लील हरकते करने से बचें (Students Should Avoid Indulging in Obscene Acts) के बारे में बताया गया है।

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6.छात्र-छात्राओं का शोरगुल (हास्य-व्यंग्य) (Students  Hue and Cry) (Humour-Satire):

  • छात्र-छात्राओं के शोरगुल से तंग आकर अध्यापक ने प्रधानाध्यापक से कहा,इन नालायकों को स्कूल से निकाल दो।
    प्रधानाध्यापक ने तमतमाते हुए कहा:मुझे ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने इन्हें फ्री में स्कूल में भर्ती किया है।
  • अध्यापक खीझकर बोला:अरे आपने भला कहां इन्हें फ्री में भर्ती किया है,इनको पढ़ाने के लिए तो मैंने जानबूझकर विद्यालय में अपनी नियुक्ति करवाई थी।

7.अश्लील हरकते करने से बचें (Frequently Asked Questions Related to Avoid Doing Obscene Acts),छात्र-छात्राएँ अश्लील हरकते करने से बचें (Students Should Avoid Indulging in Obscene Acts) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या अश्लील कामनाएँ तृप्त हो सकती हैं? (Can Obscene Desires be Satiated?):

उत्तर:अश्लील कामनाएं ही नहीं बल्कि विषयभोग की कामनाएं,इच्छाएं कभी शांत नहीं होती हैं।यह उसी प्रकार बढ़ती है जिस प्रकार आहुति डालने से अग्नि।मनुष्य की अश्लील कामनाएं,कामुकता,विषयभोग,सांसारिक इच्छाओं और आकांक्षाओं का कोई अंत नहीं है।ये इच्छाएं और आकांक्षाएं मृत्युपर्यन्त उसे घेरे रहती है।इनसे छुटकारा पाने का एक उपाय है मन में वैराग्य का जागृत होना।
Avoid Doing Obscene Acts क्यों नुकसान के अलावा फायदा कुछ नहीं है।

प्रश्न:2.मनुष्य के कर्म किसके द्वारा होते हैं? (By Whom are Man’s Deeds Carried out?):

उत्तर:मनुष्य के कर्म मन और इंद्रियों के द्वारा होते हैं। इंद्रियाँ मनुष्य को विषयों की ओर खींचती है।साधारण व्यक्ति और छात्र-छात्राएं उनके अधीन हो जाते हैं और कुकर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं।परंतु मेधावी अथवा स्थितप्रज्ञ वह होता है जो मन और इन्द्रियों को पापमूलक विषय से बचाता है।कोई खतरा सामने आने पर वह इंद्रियों को भीतर की ओर समेट लेता है।सांसारिक,भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का यही साधन है।

प्रश्न:3.परस्त्रीगमन क्यों नहीं करना चाहिए? (Why Shouldn’t We Do Adultery?):

उत्तर:परस्त्रीगमन में वेश्यावृत्ति या किसी भी परस्त्री के साथ सहवास करना शामिल है।यह ऐसा दोष है जो मनुष्य की शक्ति और स्वास्थ्य को तो नष्ट करता ही है साथ ही इसके कारण सूजाक,उपदंश,फिरंग आदि अत्यंत घातक गुप्त रोग मुफ्त में ही गले पड़ जाते हैं।आजकल इन सभी गुप्त रोगों से भी ज्यादा भयंकर और घातक रोग ‘एड्स’ भी किसी ‘एड्सरोगी’ के साथ संभोग करने से ही होता है लिहाजा सबसे श्रेष्ठ और निरापद बात यही है कि परस्त्रीगमन भूल कर भी नहीं किया जाए।
परंतु कामवासना और अश्लीलता का एक बार चस्का लग जाता है तो उसे किसी स्त्री के साथ सहवास करने में न भय लगता है और न ही लज्जा का अनुभव होता है।वह अच्छे-बुरे और ऊँच-नीच का भी विचार नहीं कर पाता,न वह सही और गलत देख पाता है इसलिए अंधा ही होता है।मन पर बुद्धि व विवेकपूर्वक नियंत्रण करने,दृढ़ इच्छाशक्ति व संकल्प शक्ति के द्वारा कामवासना व अश्लील हरकतों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा अश्लील हरकते करने से बचें (Avoid Doing Obscene Acts),छात्र-छात्राएँ अश्लील हरकते करने से बचें (Students Should Avoid Indulging in Obscene Acts) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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