Auspicious Versus Inauspicious Path
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1.शुभ बनाम अशुभ मार्ग (Auspicious Versus Inauspicious Path),शुभ और अशुभ में किसका चयन करें? (Which One to Choose Between Well Being and Ominous?):
- शुभ बनाम अशुभ मार्ग (Auspicious Versus Inauspicious Path) दोनों अलग-अलग है।हमें शुभ मार्ग पर चलते हुए आगे बढ़ते जाना है।शुभ के मार्ग को अपनाने में शुरू में तकलीफ होती है क्योंकि साथ में हमें अशुभ बातों को हटाना पड़ता है,इस हटाने में हमें तप करना पड़ता है।
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2.शुभ और अशुभ दो मार्ग (Two paths of good and inauspicious):
- समय ने अंगड़ाई ली,करवट बदली और फिर से हम सब एक नए वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं।2026 का आगमन इस बात का प्रमाण है कि हम 21वीं सदी की राह में 25 कदम चल चुके हैं और अब 26वें की बारी है।इन पिछले वर्षों में हमारी अंतश्चेतना में शुभाशुभ संग्राम चलता रहा है।इस संग्राम में कभी एक पक्ष भारी हुआ तो कभी दूसरा,अब तक कोई निर्णय नहीं हो सका,लेकिन अब निर्णय हो ही जाना चाहिए कि हमें लिप्सा और श्रद्धा में किसका वरण करना है।अनुभव हम सभी का एक ही कहता है कि हमारे भीतर दो प्रबल तत्त्व उपस्थित है। इनमें एक शुभ है,दूसरा अशुभ है।जब से यह जीवन व जगत बना है,तभी से अंधकार व प्रकाश की,पतन और उत्थान की,दुःख और सुख की उपस्थिति बनी हुई है।इनमें से एक से जूझने और दूसरे को अपनाने के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है,उसी से चेतना प्रखर व गतिशील होती है।
- प्रगति की राह पर इन्हीं दो पांवों के सहारे चलते हुए मंजिल तक पहुंचना संभव बन पड़ता है।जड़ व चेतन,अँधियारा व उजियारा,शुभ व अशुभ के निर्माण में विधाता की मंशा जो भी रही है,पर सच यही है।उपनिषद युग के ऋषियों ने भी श्रेय व प्रेय दो मार्गों की चर्चा की है।मार्ग दोनों ही हममें से हरेक के सामने हैं। हमारे सामने इनके चयन की स्वतंत्रता भी है।इस स्वतंत्रता के कारण ही मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता कहा गया है।उसे ही सोचना है कि वह स्वयं के उत्थान का चयन करता है,अथवा पतन का।इंसान की बुद्धि की परख भले कोई उसकी तर्क-क्षमता के आधार पर करता रहे,पर उसकी सही परख की कसौटी यही है कि वह दूरदर्शी है या अदूरदर्शी।तात्कालिक प्रलोभन प्रायः विनाश का द्वार सिद्ध होता है।तप का रास्ता,कष्ट की राहें,भले पीड़ा दें,लेकिन बाद में स्थायी सुख-शांति का द्वार खोलते हैं।
- जाल में फंस जाने वाला पक्षी,कांटे में गला फँसा लेने वाली मछली की अदूरदर्शिता सभी जानते हैं।चासनी देखकर टूट पड़ने वाली मक्खी की दुर्गति का परिचय भी सभी को है,फिर भी न जाने क्यों तत्काल सुख-भोग की आतुरता में प्रायः लोग अपना पैसा,स्वास्थ्य,सम्मान,संतोष व भविष्य बिगाड़ते रहते हैं। उन्हें यह बात पता नहीं क्यों समझ में नहीं आती कि ऊंचे उद्देश्य के लिए तप,त्याग की श्रेष्ठ दिशा में चलने पर भले ही कुछ शुरुआती घाटा हो,परंतु अंततः सुख-संतोष व प्रगति सुनिश्चित है।विद्यार्थी,एम्प्लॉइज,किसान,व्यवसायी,श्रमिक,शिल्पी,कलाकार सभी इसी ढंग से सोचते हैं और अंततः अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाते हैं।दूरदर्शी महामानव जीवन में इसी रीति-नीति को अपनाकर जीवन सौभाग्य से प्राप्त करते देखे गए हैं।हां,इसके लिए प्रत्येक को साहस व संकल्प की प्रचण्डता अनिवार्य होती है।
3.शुभ व अशुभ का संघर्ष यों ही खत्म नहीं होता (The struggle between good and bad does not end just like this):
- साहस व संकल्प की प्रचण्डता के बिना तो कहीं कोई बात नहीं बनती।आकाश को छूने वाला ऊंचा वृक्ष बनने के लिए बीज को गलना जरूरी होता है।जो बीज इतना साहस नहीं दिखा पाता,वह ज्यों का त्यों पड़ा रहता है।जो बीज गलने में हानि व बचने में लाभ देखते हैं,वे रंच मात्र भी विकसित नहीं हो पाते;जबकि गलने वाले बीजों की जड़ों को धरती माता अपनी गोद में सहेजकर पोषित करती है और आकाश उसके पुरुषार्थ का अभिसिंचन करता है।मार्ग ये दो ही हैं:श्रेय मार्ग व प्रेय मार्ग-स्वार्थ का मार्ग,परमार्थ का मार्ग।
- इन दोनों में से किसी का चयन करने की चुनौती हर युग में रही है और हमारे अपने युग में भी है।दोनों ओर लाभ है और दोनों ओर हानि भी।किसका चयन करें,किसका नहीं? हमारा यही असमंजस ही तो हमारी अपनी अंतश्चेतना का शुभाशुभ संग्राम है।जब तक स्थिति अनिर्णय की बनी रहेगी,तब तक मन तो बेचैन रहेगा ही।
- इन शुभ व अशुभवृत्तियों का महासंग्राम यों ही समाप्त नहीं होने वाला।सामान्य बुद्धि के बलबूते तो कतई नहीं।ऐसा इसलिए,क्योंकि इनमें से दोनों पक्ष अपनी सामर्थ्य व विशेषता के कारण पूर्ण प्रबल हैं।न तो इनमें से किसी की क्षमता कम है और न कोई हारने वाला है।यही वजह है कि इनके कलह वर्षों से चलती रही है।कभी एक हारता है,तो कभी दूसरा।कभी एक की जीत होती है,तो कभी दूसरे की।इस विग्रह का अंत तो सदा ही दैवी अवतरण से होता आया है।इस बार हमारे जीवन में भी कुछ ऐसा होने की जरूरत आ पड़ी है।पुराणों में अनेक कथाएं इसकी गवाही देती हैं।इन सभी कथाओं में एक बात बड़ी साफ है कि श्रेय व प्रेय की इस खींच-तान,कलहपूर्ण संघर्ष का अंत ऋतम्भरा प्रज्ञा,सद्विवेक,ऊँचे उद्देश्य के लिए संकल्पित होने वाली साहसी प्रखरता के आधार पर ही होता है।जब तक हमारी अंतश्चेतना की धरती पर इस रूप में भगवान अवतरित नहीं होंगे,तब तक मनःस्थिति में अंतर्द्वंद्व बने रहेंगे,विक्षोभ व अशांति उभरती रहेगी।शांति व संतोष का अनुभव आधे क्षण के लिए भी नहीं होगा।
- आज यह समस्या हम सबकी है,हर उस व्यक्ति की है जो जो जाग्रत है,जीवंत नहीं।जो जड़ता के अँधियारे की चादर तानकर सोए हुए हैं,उनके लिए यहां कुछ नहीं कहना।सुख-भोग की थोड़ी सी ओस की बूंदे चाट लेने पर अंतरात्मा की प्यास नहीं बुझती।लोभ या मोह के दायरे में पाई गई थोड़ी सी सफलता की स्थिति कुछ यही है।उलझन का अंत स्थायी हो,समाधान तभी है।अन्यथा असमंजस के कुचक्र में फंसे रहने से समय व श्रम की बर्बादी होती रहती है।अपने जीवन के पिछले सालों में हम सब यही अनुभव करते आए हैं,जब अब तक हमने महत्त्वपूर्ण निर्णय ही नहीं लिए तो फिर महत्त्वपूर्ण समय कैसे आएगा? कोई बात नहीं,जो पहले नहीं हो सका,उसे अब होना चाहिए।जो सालों में नहीं हुआ,वह इस साल में हो।
- सच कहें तो यह नया साल है ही इसलिए कि इस असमंजस भरी अनिश्चित स्थिति का स्थायी समाधान खोजा जाए,तभी जीवन-संपदा का महत्त्वपूर्ण उपयोग कर पाना संभव है।भटके बहुत,भ्रमित बहुत हुए,अब तो समय के इस पड़ाव पर समाधान कर ही लें।हम सब के मनोमंथन,मन की बढ़ती घुटन,बेचैनी का हल निकलना ही चाहिए।ऐसा होने पर ही हम सुनिश्चित मार्ग पर चल सकेंगे और कुछ वैसी उपलब्धियां पा सकेंगे;जिसके लिए विधाता ने हमें मानव जन्म व जीवन दिया है; जिसके लिए हमने सद्गुरु की खोज की;जिसके लिए हम अपने मिशन के कर्मठ कार्यकत्ताओं में गिने जाते हैं।
4.सभी अशुभ के लिए प्रोत्साहित करते हैं (All encourage the unlucky):
- अशुभ पक्ष तर्क देता है कि प्रत्यक्ष तो उपभोग है।उससे मिलने वाला लाभ व आनंद तो तुरंत है।ज्यादातर लोगों के जीवन की दिशा भी इसी ओर है।सगे-संबंधी भी इसी के लिए प्रोत्साहित करते हैं।सभी जब इसी ओर गतिशील हैं,तो हम क्यों नहीं? आखिर इंद्रियों को भी तो तृप्ति पाने का अधिकार है।शरीर भी थकता है,उसे आराम की चाहत होती है तो इसमें क्या गलत है? काम के साथ हास-विलास,विनोद-मनोरंजन होता रहे तो इसमें क्या गलत है? काम के साथ हास-विलास,विनोद-मनोरंजन होता रहे तो इसमें अनुचित ही क्या है? यह चिंतन-परामर्श अशुभ पक्ष का है।इस पक्ष के तर्क में तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ बताया जाता है और कहा जाता है कि भविष्य की बात सोचना बेकार है।आपके प्रत्यक्ष की उपेक्षा करके परोक्ष की उपेक्षा क्यों की जाए? जो जीवन इन तर्कों से प्रभावित होता है उसे लोभ व मोह से घिरना पड़ता है। उसकी सारी गतिविधियां वासना व तृष्णा के इर्द-गिर्द घूमती रहती है।अंहता जीवन का केंद्र बनी रहती है।समीपवर्ती वातावरण का प्रभाव भी मनोभूमि पर इसी रूप में पड़ता है।
5.शुभ पक्ष की बातें (Auspicious Side Points):
- अंतश्चेतना में उपस्थित शुभ पक्ष की बातें इससे अलग हैं।उसका कहना है कि स्रष्टा ने मनुष्य का जीवन विशेष उद्देश्य के लिए दिया है।सृष्टि में जो किसी भी प्राणी को नहीं मिला,वह मनुष्य को मिला है।मानव जीवन की संपदा भगवान के इस विश्व-उद्यान को समुन्नत बनाने के लिए,भगवान के कार्यों में उसका हाथ बँटाने के लिए है। इस मार्ग पर चलने पर ही मनःस्थिति व परिस्थिति का दैवी व दिव्य बन सकना संभव है।भवबंधनों से मुक्ति और अपूर्णता से पूर्णता की प्राप्ति का जीवन-लक्ष्य इसी मार्ग पर चलने से संभव है।आत्मसंतोष व आत्मशांति की दोनों महान उपलब्धियों के लिए यही अनिवार्य व आवश्यक है।
- शुभ पक्ष के इस तर्क में विचारशीलता है,विवेक है,जो यही सुझाते हैं कि तात्कालिक लोभ-माया के छलावा से अधिक और कुछ भी नहीं।यह चूहे को पिंजरे में फंसाकर उसकी जान लेने जैसी प्रवांचना है।लिप्सा बिजली की चकाचौंध की तरह ही चकाचौंध उत्पन्न करती व क्षण भर में गायब हो जाती है।जिव्हा का चटोरापन,अश्लील कामुकता की चमक कुछ क्षणों तक ही रहती है।इसके बाद तो पेट खराब होने और शरीर खोखला होने का संकट ही स्थायी रूप से गले पड़ता है।विलासी श्रृंगारिकता का उद्देश्य दूसरों को आकर्षित करना और अपना बड़प्पन जताना होता है,लेकिन इसका असली परिणाम होता विपरीत है।ऐसो की गिनती ओछे लोगों में की जाती है।इन्हें अप्रमाणिकता का ही प्रमाण पत्र दिया जाता है।ऐसे लोग थोड़ी देर के लिए किसी की आंखें भले लुभा लें,पर किसी का विश्वास नहीं जीत सकते।
- शुभ पक्ष की विचारशीलता,बुद्धि को निरंतर यही समझाने का प्रयास करती है कि इस मानव जन्म को जीवन-साधना में ही लगाना उचित है।इसका परिणाम वैसा ही होना चाहिए,जैसाकि महान गणितज्ञ,वैज्ञानिक और महामानव पाते रहे हैं।सुख-शांति की आकांक्षा आंतरिक उत्कृष्टता के सहारे ही पूरी होती है।साधनों की मृगतृष्णा में भटकने से थकान और परेशानी ही पल्ले पड़ती है।कस्तूरी की खोज में भटकने वाला मृग चैन तभी पाता है,जब अपनी सुगंधि का स्रोत वह नाभि में होने की जानकारी पा लेता है।सच्ची समृद्धि तो उत्कृष्ट मनःस्थिति है।उसी के आधार पर अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं।यह जान लेने पर साधनों की लालसा व उपभोग की लिप्सा का समाधान होता है।अन्यथा यह आग में घी डालते रहने की तरह घटती नहीं,बल्कि बढ़ती जाती है।
- कर्मठ विद्यार्थी और कार्यकर्त्ता स्वयं की अंतश्चेतना में इस शुभाशुभ संघर्ष को लंबे समय से सतत अनुभव करते रहे हैं।इन दिनों यह संघर्ष और भी प्रचण्ड हो गया है।यह एक ऐसा सच है,जिसे थोड़ी सी आत्मसमीक्षा के बाद जाना जा सकता है।बाहरी जीवन में विग्रह,विद्वेष,झंझट कितने कष्टकारक,कितने चिंताजनक,कितने विक्षोभयुक्त होते हैं,इसे हर कोई जानता है।जिन्होंने अपने अंतर्मन में विक्षोभ व द्वन्द्व का अनुभव किया है,वे जानते हैं कि इससे अधिक पीड़ादायक अशांति कुछ और नहीं हो सकती।जो जाग्रत है,जिनमें सचमुच जीवन है,जिनमें अपने सद्गुरु एवं परमात्मा के प्रति भक्ति है,वे चाहे तो इन दिनों यह सच अनुभव कर सकते हैं।
6.शुभ व अशुभ का निष्कर्ष (Conclusion of good and bad):
- एक ओर भगवान अपनी भुजाएं पसारे गोद में बैठाने के लिए,छाती से चिपकाने के लिए पुकार रहे हैं।दूसरी ओर लोभ-मोह के बन्धन हाथों में हथकड़ी,पांवों में बेड़ी की तरह बंधे हैं।स्वार्थपरता,अहंता कमर में पड़े रस्से की तरह जकड़े बैठी है।समझ में नहीं आ रहा कि पीछे लौटें,जहां के तहाँ खड़े रहें अथवा आगे बढ़ें? ये तीनों सवाल ऐसे हैं,जो अपना समाधान आज और अभी चाहते हैं।अब देर-सवेर करने का वक्त चला गया।पहले की तरह यदि अभी भी हम असमंजस में पड़े रहे,उपेक्षा करते गए तो समूचा जीवन खो जाने का भय है।जो बीत गया,वह बहुत था,परंतु जो शेष है,वह भी इतना है कि उसकी बर्बादी यदि रोकी जा सके,जीवनक्रम की दिशाधारा बदली जा सके,तो अभी भी उज्ज्वल भविष्य की संरचना संभव है।इन बचे हुए दिनों में भी स्वयं पार होने और दूसरों को अपनी नाव में बैठाकर पार कर सकने की परिस्थिति बनाई जा सकती है।
- हमारे लिए गुरुनिष्ठा,भगवद्निष्ठा,आत्मनिष्ठा प्रमाणित करने का यही अवसर है।अच्छा है भगवान को अपनी अंतश्चेतना के आंगन में क्रीड़ा करने का अवसर दें,शुभत्व का समर्थन करें,ऐसा विवेकपूर्ण निर्णय करें,जिसके आधार पर अपने और अपनों के जीवन में देवमानवों जैसी जीवन-नीति निर्धारित की जा सके।इस नववर्ष के लिए यह निर्धारण ही पर्याप्त नहीं,इसे क्रियान्वित करने के लिए सत्संकल्प व उत्साह भी चाहिए।इसी उमंग भरे उत्साह को व्यक्तिगत जीवन में चेतना का अवतरण कहा जा सकता है।
- इस नए साल की सुबह सबसे उपयुक्त अवसर है।अच्छा यही है कि विद्यार्थी अपनी अंतश्चेतना के शुभाशुभ संग्राम को देखें और उसके समाधान के लिए सद्विवेक से,सत्साहस से भगवान का आह्वान करें।यदि ऐसा हो सका तो अपने विद्यार्थियों की असंख्य प्रतिभाएं भगवान के चरणों में अपनी छोटी या बड़ी भाव भरी आहुतियां प्रस्तुत कर सकती हैं।पतन व पीड़ा के गर्भ में पड़ी हुई मानवता ने इसी की आर्त पुकार सुनी है।भगवान का सृष्टि रचने का उद्देश्य यही है।प्रत्येक विद्यार्थी में से हरेक की असाधारण भूमिका इस संदर्भ में हो सकती है।कठिनाई बस,एक ही है कि लोभ व मोह के रूप में अंतर्ज्योति को ग्रस लेने वाले राहु व केतु (अशुभ) के ग्रहण से किस प्रकार मुक्ति पाई जाए?
- जो अपनी अंतश्चेतना के शुभाशुभ संग्राम में शुभ पक्ष का समर्थन करेंगे,उन्हीं के लिए सज्जनों,महामानवों की तरह युग-परिवर्तन के इस समय में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा सकना संभव हो सकेगा।विद्यार्थी इस संदर्भ में अधिक गंभीर चिंतन और अधिक प्रखर साहस अपनाएँ।जिससे जिस रूप में जितना बन सके,समय,श्रम का जो अंश निकाला जा सके,उसके लिए (शुभ का वरण) अधिक से अधिक प्रयास अभी से किया जाए।इस नए वर्ष में ये सभी और ऐसे ही अन्य प्रयास पिछले सभी वर्षों से कहीं अधिक बढ़-चढ़कर हों।ध्यान रहे अगले महीने में आने वाला बसंत पर्व इसी नवजागरण की नई पुकार लेकर आ रहा है।इसे सुनना व स्वीकार करना ही हमारी,हम में से प्रत्येक की गुरुश्रद्धा और भगवद्श्रद्धा की कसौटी है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में शुभ बनाम अशुभ मार्ग (Auspicious Versus Inauspicious Path),शुभ और अशुभ में किसका चयन करें? (Which One to Choose Between Well Being and Ominous?) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:बुद्धि और कर्म में तालमेल
7.काश तुम विद्यार्थी होते (हास्य-व्यंग्य) (I Wish You Were a Student) (Humour-Satire):
- काश तुम विद्यार्थी (छात्र नहीं) होते और मैं (शिक्षक) तुम्हें गणित पढ़ाने के साथ-साथ शुभ मार्ग दिखाता और तुम समय बचाकर शुभ मार्ग को अपनाना शुरू कर देते।तब तुम दुनिया के साथ नहीं चल पाते।दुनिया वाले तुम्हें मूर्ख कहते और खिल्ली उड़ाते।फिर तुमसे पूछता पागल कौन है? तुम या मैं? और तुम उतने ही प्यार से कहते मैं (जो मैंने आपकी बात मानी)।
8.शुभ बनाम अशुभ मार्ग (Frequently Asked Questions Related to Auspicious Versus Inauspicious Path),शुभ और अशुभ में किसका चयन करें? (Which One to Choose Between Well Being and Ominous?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.शुभ का क्या अर्थ है? (What does auspiciousness mean?):
उत्तर:मंगलमय,कल्याणकर,सुखद,अनुकूल,अच्छा आदि अनेक अर्थ होते हैं।
प्रश्न:2.अशुभ का क्या अर्थ है? (What does inauspicious mean?):
उत्तर:अमंगलकारी,अनिष्टसूचक,अपवित्र,भाग्यहीन आदि अर्थ होते हैं।
प्रश्न:3.शुभचिंतक का क्या अर्थ है? (What does a well-wisher mean?):
उत्तरःकिसी की भलाई चाहनेवाला,हितैषी आदि अर्थ होता है।
प्रश्न:4.शुभकर्मा किसे कहते हैं? (What is good karma?):
उत्तर:अच्छा कार्य करने वाला,सत्कर्म करने वाला आदि।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा शुभ बनाम अशुभ मार्ग (Auspicious Versus Inauspicious Path),शुभ और अशुभ में किसका चयन करें? (Which One to Choose Between Well Being and Ominous?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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