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Analytic method in mathematics

विश्लेषणात्मक विधि (Analytic Method) 

1.भूमिका (Introduction)

Analytic method in mathematics

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यह विधि विशेषत: ज्यामिति में अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है। गणित की समस्याओं के विश्लेषण में हम इस विधि का उपयोग करते हैं किन्तु ज्यामिति में साध्यों (Theorems) के अध्यापन में इसका विशेष महत्त्व है। इस विधि की सहायता से किसी भी समस्या के जटिल पक्ष का विश्लेषण कर यह ज्ञात किया जाता है कि किस प्रकार हल प्राप्त किया जा सकता है तथा इसके लिए कौनसी दशाएं आवश्यक हैं। समस्या के विभिन्न पक्षों का विच्छेदन करने को ही विश्लेषण की संज्ञा दी जाती है। इस विधि में जटिल समस्या को अनेक साधारण समस्याओं में विभाजित किया जाता है तथा उनके हल ज्ञात किए जाते हैं जिससे सम्पूर्ण जटिल समस्या के हल को ज्ञात करने में सुविधा होती है।

इस विधि के अनुसार हम अज्ञात से ज्ञात की ओर तथा निष्कर्ष से दिए हुए तथ्यों की ओर अग्रसर करते हैं। किसी साध्य की उत्पत्ति की खोज अथवा किसी निर्मेय की रचना संश्लेषणात्मक विधि से सम्भव तथा बोधगम्य नहीं होती। किसी साध्य या समस्या को किसी विशेष विधि से क्यों सिद्ध या हल किया जा रहा है या कोई रचना विशेष क्यों आवश्यक है? – इन प्रश्नों का उत्तर विश्लेषणात्मक विधि से ही सम्भव है। जितनी भी गणित की पाठ्य-पुस्तके लिखी गई हैं उनमें विश्लेषणात्मक विधि का उपयोग नहीं किया गया है।
यदि हमें ज्ञात है कि ‘अ’ सत्य है और यह सिद्ध करना हो कि ‘ब’ भी सत्य है तो विश्लेषणात्मक विधि के अनुसार हम कहेंगे कि ‘ब’ तब सत्य हो सकता है जब ‘अ’ सत्य हो तथा ‘ब’ एवं ‘अ’ परस्पर बराबर हों। केवल विश्लेषण के द्वारा ही विद्यार्थी जान सकते हैं कि किसी साध्य को हल करने के लिए हमें कौन-कौनसी बातें जानना चाहिए तथा उनका उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। इसके लिए चिंतन की विश्लेषणात्मक विधि को अपनाना आवश्यक है।
जीवन में हम जब भी किसी जटिल समस्या का समाधान ढूँढ़ते हैं तो विश्लेषणात्मक विधि के द्वारा ही समस्या के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण कर समाधान ढूँढ़ने का प्रयत्न करते हैं। इस विधि से विद्यार्थियों में अन्वेषण करने की क्षमता का विकास होता है तथा आत्म-निर्भरता की भावना को बल मिलता है। विद्यार्थियों को उत्पत्ति के प्रत्येक पक्ष का स्पष्टीकरण मिलता है तथा वे स्वयं नवीन उत्पत्ति का निर्माण करते हैं।

2.उदाहरण (Example)

Analytic method in mathematics

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parallelogram

3..विश्लेषणात्मक विधि की विशेषताएं

(1.)किसी साध्य को सिद्ध करने के लिए अथवा निर्मेय का हल ढूँढ़ने के लिए क्यों कोई रचना की गई? इसका आभास तभी मिलता है जब हम चिंतन की विश्लेषणात्मक विधि को अपनाते हैं। किसी साध्य की उत्पत्ति की खोज तथा निर्मेय की रचना विश्लेषणात्मक विधि से बोधगम्य होती है।
(2.)इस विधि से विद्यार्थी स्वयं किसी नवीन समस्या का हल अथवा साध्य की रचना व उपपत्ति खोज सकता है। इस विधि में हल उपपत्ति को रटने की आवश्यकता नहीं है।
(3.)इस विधि से विद्यार्थी में अन्वेषण करने की क्षमता और आत्मनिर्भरता की भावना का उदय होता है।
(4.)इस विधि द्वारा बालकों में तर्कशक्ति, विचार शक्ति और निर्णय शक्ति का विकास होता है तथा समस्याओं का विश्लेषण करने की क्षमता में वृध्दि होती है।
(5.)इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान स्थायी होता है तथा बालकों में खोज करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। बालक नवीन ज्ञान के लिए जिज्ञासु रहता है।
(6.)पाठ्यपुस्तकों में दी गई साध्यों की उपपत्तियां बालकों के लिए रहस्यात्मक नहीं रहतीं।
(7.)इस विधि में स्पष्ट करने की क्षमता निहित है तथा इसको जीवन के अनेक समस्याओं को समझने एवं हल करने में काम में लाया जाता है।

4.सीमाएँ(Limitations)

(1.)इस विधि से हल ज्ञात करने में अधिक समय लगता है क्योंकि तर्क करने की प्रक्रिया लम्बी होती है। विद्यार्थियों को समस्या की जड़ तक जाना पड़ता है।
(2.)विद्यार्थियों को संसूचनाएँ कम मिलती हैं तथा सीखने की मात्रा संश्लेषणात्मक विधि की तुलना में कम होती हैं।
(3.)यह विधि छोटे बालकों के लिए अधिक उपयोगी है क्योंकि छोटी उम्र के बालकों में अपेक्षित स्तर की तर्क शक्ति नहीं होती।
(4.)प्रत्येक अध्यापक इस विधि का सफलता से प्रयोग नहीं कर सकता।
(5.)इस विधि के प्रयोग से निर्धारित समय में पाठ्यक्रम को समाप्त नहीं किया जा सकता है।
(6.)इस विधि का उपयोग तभी सम्भव है जब हमें ज्ञात तथ्य तथा अज्ञात निष्कर्षों की जानकारी हो। ज्यामिति के साध्यों में ‘दिया हुआ’ तथा ‘सिद्ध करना है’, जैसी स्थिति जीवन की अनेक परिस्थितियों में अधिकांशतः उपलब्ध नहीं होती।

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