6 Magical Formula to Reach Destination
1.मंजिल तक पहुँचने के 6 जादुई सूत्र (6 Magical Formula to Reach Destination):
- मंजिल तक पहुँचने के 6 जादुई सूत्र (6 Magical Formula to Reach Destination) ऐसे हैं जिनसे आपकी दिशा और दशा बदल सकती है।पढ़िए इन जादुई सूत्रों को और अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए देर न कीजिए।
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2.मंजिल पर पहुंचने के डायनेमिक सूत्र (Dynamic formulas for reaching the destination):
- आपने कछुए और खरगोश की कहानी सुनी होगी।भले ही धीरे चलो परंतु लगातार चलते रहो।निरंतरता (Consistency) और नियमितता (Regularity) में ऐसा जादू है जो आपको मंजिल तक पहुंचा सकता है।
- आप दैनिक अभ्यास (Daily Practice) नहीं करेंगे तब तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते हो चाहे वो पढ़ाई हो,जाॅब (Job) हो,योग यात्रा हो अथवा अन्य कोई प्रोफेशन।दैनिक अभ्यास में वह ताकत है जिससे दूर लगने वाला लक्ष्य भी पास आ जाता है।चाहे आप रोजाना कम पढ़ें लेकिन जरूर पढ़ें।जैसे आप आधा घंटे में पांच सवाल हल करते हैं तो एक महीने में डेढ़ सौ और 12 महीने में 1800 से ज्यादा सवाल हल कर लोगे।
- यदि आपको निराशा ने घेर लिया हो,पढ़ाई में मन (Mood) ना हो या मार्क्स कम आएं हो या असफल हों तो पढ़ाई को पूरी तरह बंद करने के बजाय थोड़ी धीमी गति कर लें,लेकिन पूरी तरह पढ़ाई करना ना छोड़े।
हमारे शास्त्रकारों ने भी कर्म करने की प्रेरणा दी है।गीता का श्लोक - “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।”(2-47) - (हे अर्जुन) निष्काम कर्मों के करने का ही तुम्हें अधिकार है,कर्मफलों में तुम्हारा अधिकार नहीं है,तुम कर्मफलों के अभिलाषी अथवा सत्कर्मों के परतंत्र मत बनो,साथ ही साथ अकर्मण्य भी न बनो अर्थात् जो कुछ भी कर्म करो,फलाशा को छोड़कर निष्काम भाव से करो।गीता का यह श्लोक अत्यंत लोकप्रिय है क्योंकि इसमें अनासक्त कर्म (unattached action) करने की प्रेरणा दी गई है।
- यदि हम समझते हैं कि हमारे जीवन का कुछ लक्ष्य अथवा उद्देश्य है,तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम तब तक प्रयत्न करते रहें जब तक निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करके अपेक्षित उद्देश्य की पूर्ति न कर दें।
- गति विश्व का नियम है और वह प्रत्येक अणु-परमाणु का स्वभाव है।गतिहीन अथवा कर्त्तव्यहीन होना मृत्यु को आमंत्रण देना है।यदि हम चाहते हैं कि मृत्यु हमसे दूर रहे तो हमको निरंतर कर्म में लगे रहकर गतिशील बने रहना चाहिए।
गीतकार ने इस संदर्भ में यह महत्त्वपूर्ण बात कही है कि लौकिक अथवा पारलौकिक किसी दृष्टि से विचार कर लिया जाए,मनुष्य को कर्म तो करते ही रहना है।लोक व्यवहार की दृष्टि से हम कह सकते हैं कि कर्म न करने से हमारा शरीर निर्वाह भी नहीं हो सकता। - कर्म न करने वाले,कर्त्तव्य-पालन न करने वाले व्यक्ति को लोग कायर,प्रमादी,कामचोर आदि न मालूम क्या-क्या कहते हैं? इन समस्त लांछनों से बचने के लिए कर्म करते रहना चाहिए।
- अपने जीवन को गतिमय रखना चाहिए।पारलौकिक दृष्टि से भी गतिमय जीवन (Dynamic Life) की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है।भगवान श्रीकृष्ण भी कर्म में बरतते हैं।
- कर्म और कर्त्तव्य पालन की इतनी महिमा को जान लेने के उपरान्त हमको समझ लेना चाहिए कि हमें निरन्तर कर्म करते रहना है,कर्म के बिना न तो जीवन सम्भव है और न किसी प्रकार की उपलब्धि ही सम्भव है।
3.मंजिल तक पहुँचाने वाले कर्म करें (Do karma that leads you to your destination):
- तब हम कौन से कर्म करें? इसका उत्तर यह है कि जो भी लक्ष्य निर्धारित करें,हम जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अग्रसर हों,उसकी प्राप्ति हेतु किए जाने वाले समस्त कर्म पूरी निष्ठा के साथ करें।आवश्यक नहीं है कि हम निरंतर एवं अनवरत रूप से सफलता के सोपानों पर चढ़ते ही चले जाएं।मार्ग पर बाधाएँ,आ जाने पर,हमारा आगे बढ़ना रुक भी सकता है,हम ठोकर खाकर गिर भी सकते हैं तथा तात्कालिक दृष्टि से असफल भी हो सकते हैं।
- परंतु चलना तो है ही,रास्ते में गिर पड़ने की दशा में हमें चाहिए कि हम धूल झाड़ कर उठ बैठे और फिर आगे बढ़ने का प्रयत्न करें।काम करने वाले को दो में से एक चीज मिलती है:सफलता अथवा असफलता।असफलता के बाद व्यक्ति जैसे ही आगे बढ़ने का प्रयत्न करना आरंभ कर देता है,वैसे ही,उसी क्षण असफलता पीछे रह जाती है,और कोई व्यक्ति यह नहीं कह पाता कि इन्होंने प्रयत्न करना छोड़ दिया तथा हाथ पर हाथ रखकर बैठ गए हैं।
- यदि उसको अगले प्रयत्न की प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया जाए तो असफलता भी एक प्रकार की उपलब्धि है।तभी तो विषादग्रस्त एवं कायर की तरह व्यवहार करने वाले गांडीवारी अर्जुन को कर्म के प्रति,कर्त्तव्य पालन के प्रति प्रेरित करते हुए भगवान कृष्ण ने कहा है कि
- “या तो मरकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा जीत कर पृथ्वी को भोगेगा।इसलिए हे अर्जुन युद्ध के लिए निश्चय वाला होकर खड़ा हो।
- अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमारे मन में यदि उत्साह है और हम निष्ठापूर्वक प्रयत्न करते रहते हैं तो कोई कारण नहीं है कि हमको सफलता प्राप्त न हो,हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर न लें।
- हमें समझ लेना चाहिए कि किए गए प्रत्येक प्रयत्न के साथ,उठाए गए प्रत्येक कदम के साथ हम सफलता की ओर,अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाते हैं।जीवन और जगत के इसी सत्य को लक्ष्य करके महात्मा गांधी कहा करते थे कि सत्याग्रही की कभी हार नहीं होती है।”
- लक्ष्य पथ पर अग्रसर साधक को तथा अपने गंतव्य के प्रति बढ़ते हुए यात्री को बाधाओं का सामना करना ही पड़ता है।ऐसे भी कई अवसर उपस्थित हो जाते हैं,जब उसका धैर्य डगमगाने लगता है और सहनशक्ति जवाब सा देने लग जाती है।
ऐसे अवसरों पर ही लक्ष्य के प्रति निष्ठा एवं प्रयत्न (Loyalty and Efforts) के प्रति लग्न की परीक्षा होती है।जो अविचल बने रहते हैं,वे आगे बढ़ जाते हैं,जो डगमगा जाते हैं,वे उपहास के पात्र बन जाते हैं।महत्त्वपूर्ण यह है कि हम अंततः सफल हुए हैं अथवा नहीं।हम कितनी बार में अथवा कितनी देर में सफल हुए हैं,इसका न महत्त्व रहता है और न काल देवता इसका लेखा रखते हैं। - महाभारत के उद्योगपर्व में महाराज धृतराष्ट्र से महात्मा विदुर कहते हैं कि’पंडित एवं ज्ञानी (Schlor and learned) वह है जिसमें उद्योग के प्रति निष्ठा,दुःख सहने की शक्ति और धर्म में स्थिरता:ये गुण होते हैं।
- श्रीमद्भागवत कथा का यह कथन मनन करने योग्य है:”मनुष्य को चाहिए,सफलता हो अथवा असफलता,दोनों के प्रति समभाव रखकर अपना काम करता जाए-फल दैव की प्रेरणा से मिलते हैं।” भगवान में विश्वास करने वाले व्यक्तियों से किसी विद्वान ने कहा है कि हमें अपना कर्त्तव्य करना चाहिए।एक न एक दिन भगवान की दया अवश्य होगी।
- यह हम भी जानते हैं कि संसार में आर्किमिडीज (Archimedes),हाईपेटिया (Hypatia),ब्रह्मगुप्त,महावीराचार्य,अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein),ईसाक न्यूटन (Isaac Newton) आदि जो बड़े लोग हो गए हैं और जिनकी कीर्ति-कौमुदी द्वारा मनुष्य जाति का इतिहास प्रकाशित है।वे सब जीवन भर लक्ष्य के पथिक बने रहे थे।
4.सफलता एकाग्रता और निरंतर प्रयास पर निर्भर (Success depends on concentration and persistent effort):
- हमको सी.डब्ल्यू बैंडेल की यह बात बहुत अच्छी लगती है कि सफलता प्रतिभा और अवसर की अपेक्षा एकाग्रता और निरन्तर प्रयास पर कहीं अधिक केंद्रित है। बचपन में पढ़ाई जाने वाली राजा और मकड़े की कहानी ने भी हमको यही शिक्षा दी थी की दीवार पर चढ़ने में प्रयत्नशील मकड़ा अनेक बार गिरने के बाद भी हतोत्साहित नहीं हुआ और तब तक प्रयत्नशील बना रहा जब तक वह दीवाल के ऊपर नहीं पहुंच गया।
- हम अपने लक्ष्य को महत्त्वपूर्ण समझें और उसकी प्राप्ति हेतु प्रयत्न करते समय आनंद की अनुभूति करें,सफलता अवश्य ही हमारे चरणों में दिखाई देगी।
- विचारक थोरो प्रायः कहा करते थे कि “वही सफल होता है जिसका कार्य उसे निरंतर आनंद देता है।” मनन करने की बात यह है कि सफलता का मार्ग प्रायः एक निसैनी सा (Ladder) के समान होता है जिसमें एक-एक कदम रखकर ऊपर की ओर चढ़ना संभव होता है।
- जो लोग सफलता के मार्ग को कबंध (Headless trunk) के सहारे तय करना चाहते हैं,अथवा यह समझते हैं कि जिस प्रकार कबंध लगाकर आक्रमणकारी योद्धा किले की दीवार पर एकदम पहुंच जाता है,उसी प्रकार हम सफलता के शीर्ष पर छलांग लगाकर पहुंच सकते हैं,वे भूल जाते हैं कि कबंध के टूट जाने पर योद्धा के सामने मृत्यु होती है,दुबारा प्रयत्न के लिए कोई अवसर नहीं रह जाता है।
- हैलेन कैलर (Hellen Keller) का यह सूत्र हमारा प्रेरणा स्रोत होना चाहिए:We can do anything we want to do if we stick to it long enough अर्थात् उद्योग और अध्यवसाय द्वारा हम प्रत्येक कार्य को सफलतापूर्वक संपादित कर सकते हैं।जीवन निर्माण की यात्रा में यह ऋषि वाक्य हमारे मन में प्रतिपल निनादित होते रहना चाहिए:उठो,जागो,तब तक चलो,जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
- Q:1.निरंतर प्रयास से सफलता न मिले तो क्या करें? (What to do if you don’t get success with constant effort?)
- उत्तर:छात्र-छात्रा को सिंह के समान पुरुषार्थ करना चाहिए।भाग्य के भरोसे न बैठे रहे।अपनी संपूर्ण शक्ति,सामर्थ्य और योग्यता का उपयोग करने पर भी यदि सफलता न मिले तो इसमें अपना दोष नहीं समझना चाहिए।
- Q:2.केवल पुरुषार्थ करने पर सफलता मिल जाएगी क्या? (Will you be able to achieve success just by making effort?)
- उत्तर:नहीं,भरपूर पुरुषार्थ आत्मविश्वास के साथ करना चाहिए जब तक सफल न हो जाएं।भरपूर प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले तो भी निराश नहीं होना चाहिए।सिर्फ यह विचार करना चाहिए कि ऐसी क्या भूल-चूक हो रही है जो सफलता नहीं मिल पा रही है।अपनी भूल-चूक को समझ कर सुधार लेना चाहिए और पुरुषार्थ करना जारी रखना चाहिए।यदि फिर भी सफलता न मिले तो चिंता या शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि चिंता व शोक करने से सिवाय दुःख के और मिलता भी क्या है? शोक व चिंता से बचकर पुरुषार्थ करते रहने का यही मार्ग हमारे पूर्वजों ने बताया है।यानी चलते रहो चलते रहो अर्थात् प्रयत्न करते रहो,करते रहो अंत में सफल हो ही जाओगे।जिस प्रकार पढ़ते रहें और परीक्षा उत्तीर्ण करते रहें तो अपनी मंजिल पा ही ली।
- Q:3.बहुत मेहनत करने पर भी असफलता मिल रही है? (Even after working very hard, there is failure)
उत्तर:सफल होने में देर हो सकती है जिसके कई कारण होते हैं।मसलन काम को करने की सही विधि का ज्ञान ना होना।विवेक का उपयोग न करना।यदि आप विवेक,धैर्य और साहस के साथ प्रयत्न जारी रखेंगे तो अवश्य सफल होंगे,मंजिल मिल ही जाएगी। - Q:4.बार-बार असफलता मिले तो क्या करना चाहिए? (What should you do if you fail repeatedly?)
उत्तर:विवेक,धैर्य और साहस के साथ प्रयत्न जारी रखना चाहिए।असफलता से हताश या निराश न होकर यह सोचना चाहिए कि कहां पर त्रुटि रह गई है,उस त्रुटि को पहचान कर सुधार लेना चाहिए और प्रयत्न करते रहना चाहिए।
5.सत्यम कोचिंग सेंटर का अनुभव (Satyam Coaching Centre Experience):
- असफल होना कोई नहीं चाहता है फिर भी असफलता मिला करती है।मंजिल को न पाना कौन पसंद करेगा फिर भी लोग (विद्यार्थी) मंजिल पाने से वंचित रह जाते हैं।इसी प्रकार बाधाओं,समस्याओं और कष्टों से बचना हर कोई चाहता है फिर भी बच नहीं पाते।यह सब हमारे कर्मों का खेल है,इसके लिए हमें किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए।हमारे अर्थात् विद्यार्थी के हाथ में कर्म (अध्ययन) करना ही है,अध्ययन का फल हमारे हाथ में नहीं बल्कि नियमों और विधि-विधान के अधीन है।
हमें हमारे कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।इस संसार में कर्म फल (Result One’s deed) भोगने से कोई भी,कभी भी बच नहीं सकता। - इस रहस्य को याद रखकर दो काम करने चाहिए।एक काम तो यह कि वर्तमान में ऐसे कर्म ना करें जिनके फलस्वरूप कोई कमी रह जाए और असफलता गले लग जाए क्योंकि हमारे जीवन में कर्म का चक्र इस प्रकार चलता है कि कभी सफलता और कभी असफलता का स्वाद चखना ही पड़ता है।सफलता के बाद असफलता और असफलता के बाद सफलता आती है।यह शाश्वत नियम है।जैसे गर्मी के बाद सर्दी और फुहारों वाली वर्षा ऋतु आती ही है।पतझड़ के बाद बसंत ऋतु आती ही है।रात के बाद दिन,इसी तरह असफलता के बाद सफलता का आना हमारे कर्मों का ही परिणाम होता है।
- दूसरा काम यह करें कि संकट,विपत्ति,समस्या,कष्ट आदि कोई भी परिस्थिति सामने आए तो घबराएं नहीं,विचलित ना हों,अधीर ना हों और सद्बुद्धि,धैर्य तथा हिम्मत आदि का साथ न छोड़े हमारे सद्गुणों में ये सद्गुण ऐसे हैं जिनका यदि साथ न छोड़ा जाए तो बड़ी से बड़ी समस्या (सवालों का हल नहीं हो पाना,समस्या या प्रमेय को न समझ पाना आदि) और विपत्ति का न सिर्फ सामना ही किया जा सकता है बल्कि उनको हल भी किया जा सकता है।हमारे बुजुर्गों ने यही रास्ता बताया कि भगवान पर विश्वास (faith on God) सबसे बड़ा बल और सहारा होता है,आत्मविश्वास बहुत बड़ी शक्ति होती है सत्कर्म (सही तरीके से अध्ययन) करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है।इन सबको साथ लेकर जो भी चले हैं उन्होंने बड़े से बड़े संकटों का सामना किया है और सफल रहे हैं।
- इन तीनों में सबसे अधिक महत्त्व सत्कर्म (पुरुषार्थ) को दें।जो सत्कर्म करता है,सही तरीके से अध्ययन करता है उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है,ऐसे विद्यार्थी को किसी बड़ी विपत्ति में भगवान किसी न किसी को सहायता के लिए भेज देता है।इसीलिए कहा गया है कि भगवान उसी की सहायता करता है जो पुरुषार्थी है,स्वयं समस्याओं को परास्त करने के लिए कड़ा संघर्ष (struggle) करता है।
मंजिल (सफलता) उसी को मिलती है जिसके इरादों में हौसला है,जिसके हौसले चट्टानों से टकराने में भी पस्त न होते हों।ये बात भी कुछ हद तक ठीक है कि परिस्थितियाँ,मुसीबतें अच्छे-अच्छे प्रतिभाशाली लोगों को घुटने टेकने पर मजबूर कर देती है।लेकिन ऐसे लोगों को कोई पश्चात्ताप नहीं होता है कि उन्होंने पुरुषार्थ नहीं किया है,समस्याओं से जुझे नहीं है,संकटों का डटकर मुकाबला नहीं किया (competition) है।समस्याओं को टक्कर देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।इतना कुछ करने के बाद जो भी फल मिले उसे सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए।निराश होने या पश्चात्ताप करने से कोई फायदा नहीं है।
- प्रिय छात्र-छात्राओं हमारा अनुभव तो यही रहा है।निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि यदि मंजिल (destination) नहीं भी मिलती तो कम से कम अनुभव तो अर्जित करते हैं,जिसके आधार पर हम दूसरों को मार्गदर्शन दे सकते हैं,सफलता ही सब कुछ नहीं होती है।अन्त में हम यही कहना चाहते हैं कि
- “मुसीबतें दिल के इरादे आजमाती हैं,स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती हैं।
हौसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर ठोकरे इंसान को चलना सीखाती हैं।।”
मंजिल VS भटकने की तुलनात्मक सारणी (Comparison Table of Destination VS Bewildermerment (Misleading)
उपर्युक्त आर्टिकल में मंजिल तक पहुँचने के 6 जादुई सूत्र (6 Magical Formula to Reach Destination) के बारे में बताया गया है। - ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
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6.मंजिल पाने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (Way to get to the destination) (Humour-Satire):
- रूपसिंह परीक्षा देने जा रहा था।एग्जामिनर ने परमिशन लेटर मांगा।उसने दो परमीशन लेटर दिखाएं।
- एग्जामिनर:जब तुम अकेले परीक्षा दे रहे हो तो दो परमीशन लेटर क्यों?
- रूप सिंह:एक में फेल हो गया तो दूसरा चाहिए न।
- एग्जामिनर:अगर दोनों में उत्तीर्ण नहीं हुए तो।
- रूप सिंह:तो अप्रोच लगवा कर उत्तीर्ण हो जाऊंगा।
7.मंजिल तक पहुँचने के 6 जादुई सूत्र (Frequently Asked Questions Related to 6 Magical Formula to Reach Destination) से संबंधित अक्षर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.मंजिल पाने के लिए सबसे जरूरी क्या है? (What’s the most important thing to get to the destination?):
उत्तर:आत्म-नियन्त्रण का होना जरूरी है।यदि आत्म-नियन्त्रण है तो सारे सद्गुण एक-एक करके विकसित होने लगते हैं।
प्रश्न:2.मंजिल पाने में सबसे बड़ी रुकावट कौनसा अवगुण है? (What is the biggest obstacle to getting to the destination?):
उत्तर:मंजिल पाने में सबसे बड़ा अवगुण प्रमाद है।
प्रश्न:3.मंजिल पाने से क्या आशय है? (What does it mean to get a destination?):
उत्तर:उन्नत होना और बढ़ना ही मंजिल पाने का लक्षण है।
- **Students Se Ek Sawal*”
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