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10 Rules for Syllogism Conclusions in hindi

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1.न्यायवाक्यीय निष्कर्षों के 10 नियम हिन्दी में (10 Rules for Syllogism Conclusions in hindi):

  • क्या आप भी Competitive Exams की तैयारी कर रहे हैं और Syllogism (न्याय वाक्य) के सवालों में उलझ जाते हैं? क्या Venn Diagram बनाने के बाद भी आपका Conclusion (निष्कर्ष) गलत हो जाता है? अगर हाँ, तो आप बिल्कुल सही जगह आए हैं!आज के इस इन-डेप्थ आर्टिकल में हम 10 Rules for Syllogism Conclusions को बेहद आसान हिंदी में,प्रैक्टिकल उदाहरणों और वेन डायग्राम के साथ समझेंगे।चाहे Proposition वाक्य ‘All’ का हो, ‘Some’ का या फिर ‘No’ का,इन 10 गोल्डन नियमों को मास्टर करने के बाद रीजनिंग का यह टॉपिक आपके लिए चुटकियों का खेल बन जाएगा और परीक्षा में आपका एक भी नंबर नहीं कटेगा।तो चलिए,बिना किसी कन्फ्यूजन के Syllogism के इन जादुई नियमों को गहराई से सीखते हैं!
  • परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की प्रतियोगी की तर्कशक्ति एवं बौद्धिक योग्यता की जाँच करने के लिए पूछे जाने वाले अनेक प्रकार के तार्किक प्रश्नों में से एक प्रश्न किसी न्यायवाक्य (Syllogism) के निष्कर्ष की वैधता या अवैधता से सम्बन्धित होता है।इसके लिए प्रत्याशी वेन आरेखों (Ven Diagrams) की सहायता लेते हैं।वेन आरेख की विधि देखने में सरल परन्तु व्यवहार में कठिन होती है और इस कठिनता का कारण परीक्षा में सीमित समय का होना है।
  • इन आरेखों को खींचते समय थोड़ी-सी भी असावधानी होने पर भ्रामक स्थिति की सम्भावना रहती है। परम्परागत तर्कशास्त्र में कुछ ऐसे अकाट्य नियम है जिनका बोध होने पर निष्कर्ष की जाँच असंदिग्ध रूप से सही होती है।यदि इन नियमों की जानकारी हो जाए तो न्यायवाक्यीय तर्कना (Syllogistic reasoning) की वैधता अथवा अवैधता का अकाट्य निर्णय तत्काल ही हो जाता है।इसी हेतु इन नियमों का ज्ञान आवश्यक है:

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2.न्यायवाक्यीय नियमों का परिचय (Introduction to Syllogism Rules):

  • पश्चिमी तर्कशास्त्र के जन्मदाता दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) ने कुछ नियमों सहित वैध चिन्तन की एक ऐसी पद्धति प्रस्तुत की जो आज तक मान्य है।इस पद्धति को उसने न्यायवाक्य कहकर पुकारा।उसके अनुसार,न्यायवाक्य (Syllogism) वैध चिन्तन की वह प्रक्रिया है जिसमें किसी तर्कवाक्य के उद्देश्य और विधेय के मध्य स्थापित सम्बन्ध मध्य पद की सहायता से किसी तीसरे तर्कवाक्य के उद्देश्य (subject) और विधेय (predicate) के मध्य स्थापित किया जा सकता है।
  • उदाहरण के लिए यदि हमें यह सत्य प्राप्त है कि “सभी भारतीय देशभक्त हैं” और फिर यह ज्ञात हो कि “राम भारतीय है” तो राम के सम्बन्ध में यह वैध निष्कर्ष निकलेगा कि ‘राम देशभक्त है’।यहाँ यह स्मरणीय है कि प्रथम दो सत्यों में ‘भारतीय’ पद मध्यपद है और यही ‘राम’ को देशभक्त निष्कर्षित करने में सहायता प्रदान करता है।यहाँ जो सम्बन्ध ‘भारतीय’ और ‘देशभक्त’ के मध्य सम्बन्ध है वही सम्बन्ध ‘राम’ और ‘देशभक्त’ के मध्य स्थापित हो जाता है।इस प्रकार “राम देशभक्त है” का निष्कर्ष न केवल वैध है वरन् उपर्युक्त दो सत्यों से मात्र यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है अन्य नहीं।
  • इस वैधता के मूल में एक अटल सिद्धान्त अरस्तू ने प्रतिपादित किया था जिसे ‘Dictum de omnietnullo’ कहते है।इसका हिन्दी रूपान्तर ‘यज्जाति विधेयम् तद्व्यक्ति विधेयम’ है।इसका अर्थ है कि जो बात किसी वर्ग के सम्बन्ध में पूर्णता के साथ कही जाती है (स्वीकारात्मक या नकारात्मक) वही बात उस वर्ग की प्रत्येक इकाई के लिए कही जा सकती है।इसी सिद्धान्त पर अरस्तू की समस्त न्यायवाक्यीय तर्कना (Syllogistic Reasoning) का ढाँचा आधारित है।
    फिर भी न्यायवाक्यीय तर्कना में भ्रामक स्थितियों की सम्भावना से अरस्तू परिचित थे।अतः उन्होंने कुछ नियम सुनिश्चित कर दिए और निर्देश दिया कि यदि ये नियम भंग न हों तो निष्कर्ष निश्चय ही वैध होगा।एक उदाहरण देखिए:
    I.आकाश नीला है
    II.कमल का फूल नीला है
    III.कमल का फूल आकाश है।
  • इसमें निष्कर्ष वैध लगता है,परन्तु यह अवैध है क्योंकि इसमें प्रथम और द्वितीय वाक्यों में ‘नीला’ पद सम्बन्ध स्थापित करने के कारण मध्य पद है और यह दोनों जगह अव्याप्त है।इसलिए निष्कर्ष अवैध है।अस्तु निष्कर्ष की निश्चयात्मकता के लिए निम्नलिखित कुछ बातों को जानना आवश्यक है:

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(1) तर्कवाक्य (Logical Proposition):

  • तर्कशास्त्र में भाषागत अनेक प्रकार के वाक्यों को चार प्रकार से तर्कवाक्यों के अन्तर्गत ही रूपान्तरित करके उन्हें उद्देश्य और विधेय के रूप में रखा जाता है।व्याकरणात्मक वाक्य आज्ञावाचक,प्रश्नवाचक आदि होते हैं पर तर्कवाक्य सदैव निर्देशसूचक (स्वीकारात्मक या नकारात्मक) ही होते हैं।अत तर्कशास्त्र द्वारा निर्धारित तर्कवाक्य चार प्रकार के ही माने जाते हैं।ये इस प्रकार हैं:
    (i)पूर्णव्यापी या सर्वव्यापी अस्तिवाची (Universal affirmative)
    (ii)पूर्णव्यापी या सर्वव्यापी नास्तिवाची (Universal Negative)
    (iii)अंशव्यापी अस्तिवाची (Particular affirmative)
    (iv)अंशव्यापी नास्तिवाची (Particular Negative)
  • इन चारों प्रकार के वाक्यों को प्रतीकात्मक रूप में अरस्तू ने क्रमशः A,E,I और O के नाम से पुकारा।इसका भी कारण है।Affirmo शब्द के प्रथम दो स्वर वर्ण A व । है।अतः स्वीकारात्मक तर्कवाक्य (अस्तिवाची) A और 1 कहलाए और इसी प्रकार Nego शब्द के प्रथम दो स्वर वर्ण E और O को नकारात्मक तर्कवाक्यों का प्रतीक माना गया।ध्यान रहे कि तर्कशास्त्र में कोई तथ्य अकारण नहीं होता है।
    पूर्णव्यापी वाक्य प्रायः वे होते हैं जिनमें विधेय पद उद्देश्य पद पर पूर्ण रूप में लागू होता है जैसे “सभी बंगाली भारतीय हैं” में भारतीयता का कथन सभी बंगालियों पर लागू हैं,लेकिन अंशव्यापी वाक्य में विधेय पद का कथन उद्देश्य पद के अंशमात्र पर लागू होता है,जैसे “कुछ धनवान उदार हैं” में उदारता का कथन केवल कुछ धनवानों के ऊपर लागू होता है।इसीलिए अंशव्यापी वाक्य प्रायः ‘कुछ’ से आरम्भ होते हैं।पूर्णव्यापी वाक्यों की पहचान यद्यपि ‘सब’ या ‘सभी’ शब्द है फिर भी मुख्य बात अर्थ पर निर्भर करती है।
  • उदाहरणार्थ “मनुष्य नाशवान है” में मनुष्य पद का भाव सभी मनुष्यों से है अतः यह भी पूर्णव्यापी है।इसी प्रकार मात्र ‘सभी’ शब्द लग जाने से भी वाक्य पूर्णव्यापी नहीं भी हो सकता है,जैसे “सभी भारतीय देशद्रोही नहीं हैं” का आशय “कुछ भारतीय देशद्रोही नहीं हैं” होगा और इसे अंशव्यापी वाक्य माना जाएगा।पूर्णव्यापी नकारात्मक वाक्य की सामान्य पहचान ‘कोई’ शब्द है,जैसे “कोई कवि धनवान नहीं है।” पूर्णव्यापी वाक्य के सम्बन्ध में यह भी ज्ञातव्य है कि अगर उद्देश्य एकवचन व्यक्ति वाचक संज्ञा है या किसी विशिष्ट वस्तु का संकेत मिलता है तो वह पूर्णव्यापी तर्कवाक्य ही होता है जैसे “राम ईमानदार है” या “यह फूल लाल है”।
  • यहाँ प्रथम वाक्य में ईमानदारी सम्पूर्ण राम के अर्थ में कथित है और इसी प्रकार दूसरे वाक्य में ‘लाल’ विधेय ‘यह फूल’ की समग्रता पर लागू है।अतः दोनों वाक्य पूर्णव्यापी ही माने जाएंगे।चारों प्रकार के तर्कवाक्यों के सामान्य उदाहरण निम्नलिखित हैं:
    I.सभी मूर्ख दुस्साहसी (होते) हैं। A
    II.कोई ईमानदार व्यक्ति धनी नहीं (होता) है।E
    III.कुछ हंस काले (होते) हैं। I
    IV.कुछ गायें दुधारू नहीं (होती) हैं।O

(2) वाक्य प्रतियोगिता या तर्कवाक्यों का विरोध (Opposition of Syllogism):

  • अरस्तू ने उपर्युक्त वाक्यों का पारस्परिक सम्बन्ध भी बताया है जो सत्यता को लेकर है अर्थात् यदि एक वाक्य सत्य हो तो
    दूसरे वाक्यों की क्या स्थित होगी:इस सम्बन्ध को उसने चार प्रकार से दर्शाया जिसे ऊपर वर्गाकार चित्र द्वारा अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
    इसे समझने के लिए हम एक ही वाक्य के निम्नलिखित चारों रूपों को उदाहरण के लिए प्रस्तुत करेंगे:
    A सभी मनुष्य नाशवान है।
    E कोई मनुष्य नाशवान नहीं है।
    I कुछ मनुष्य नाशवान है।
    O कुछ मनुष्य नाशवान नहीं है।
  • अब सत्य को लेकर निम्नलिखित सम्बन्ध प्राप्त होते हैं:
    यदि A वाक्य सत्य हो तो E वाक्य असत्य
    यदि E वाक्य सत्य हो तो A वाक्य असत्य
    यदि A वाक्य असत्य हो तो E वाक्य संदिग्ध
    यदि E वाक्य असत्य हो तो A वाक्य संदिग्ध
    विपरीत सम्बन्ध
    यदि I वाक्य असत्य हो तो O वाक्य सत्य
    यदि O वाक्य असत्य हो तो I वाक्य सत्य
    यदि I वाक्य सत्य हो तो O वाक्य संदिग्ध
    यदि O वाक्य सत्य हो तो I वाक्य संदिग्ध
    अनुविपरीत सम्बन्ध
    यदि A वाक्य सत्य हो तो I वाक्य सत्य
    यदि I वाक्य असत्य हो तो A वाक्य असत्य
    यदि A वाक्य असत्य हो तो I वाक्य संदिग्ध
    यदि I वाक्य सत्य हो तो A वाक्य संदिग्ध
    उपाश्रित सम्बन्ध
    यदि A वाक्य सत्य हो तो O वाक्य असत्य
    यदि O वाक्य सत्य हो तो A वाक्य असत्य
    यदि A वाक्य असत्य हो तो O वाक्य सत्य
    यदि O वाक्य असत्य हो तो A वाक्य सत्य
    व्याघातक सम्बन्ध

\left.\begin{array} {c}\text{A वाक्य सत्य हो तो E वाक्य असत्य} \\ \text{यदि E वाक्य सत्य हो तो A वाक्य असत्य}\\ \text{यदि A वाक्य असत्य हो तो E वाक्य संदिग्ध} \\ \text{यदि E वाक्य असत्य हो तो A वाक्य संदिग्ध} \end{array} \right\} \\ \begin{array}{ccc} \quad \quad  &  \quad \quad & \quad \quad \text{ विपरीत सम्बन्ध } \end{array}
                                     
\left. \begin{array}{c} \text{यदि I वाक्य असत्य हो तो O वाक्य सत्य} \\ \text{यदि O वाक्य असत्य हो तो I वाक्य सत्य} \\ \text{यदि I वाक्य सत्य हो तो O वाक्य संदिग्ध} \\ \text{यदि O वाक्य सत्य हो तो I वाक्य संदिग्ध}  \end{array} \right\} \\ \begin{array}{ccc} \quad \quad  &  \quad \quad & \quad \quad \text{ अनुविपरीत सम्बन्ध } \end{array}
                            
\left. \begin{array}{c} \text{यदि A वाक्य सत्य हो तो I वाक्य सत्य} \\ \text{यदि I वाक्य असत्य हो तो A वाक्य असत्य} \\ \text{यदि A वाक्य असत्य हो तो I वाक्य संदिग्ध} \\ \text{यदि I वाक्य सत्य हो तो A वाक्य संदिग्ध}  \end{array} \right\} \\ \begin{array}{ccc} \quad \quad  &  \quad \quad & \quad \quad \text{ उपाश्रित सम्बन्ध } \end{array}
                               
\left. \begin{array}{c} \text{यदि A वाक्य सत्य हो तो O वाक्य असत्य} \\ \text{यदि O वाक्य सत्य हो तो A वाक्य असत्य} \\ \text{यदि A वाक्य असत्य हो तो O वाक्य सत्य} \\ \text{यदि O वाक्य असत्य हो तो A वाक्य सत्य}  \end{array} \right\} \\ \begin{array}{ccc} \quad \quad  &  \quad \quad & \quad \quad \text{ व्याघातक सम्बन्ध} \end{array}
                                

  • उपाश्रित A और I के मध्य जो सम्बन्ध है ठीक वही E और O के बीच होता है तथा व्याघात्मक A और O के बीच जो सम्बन्ध है ठीक वहीं E और I के मध्य होता है।यद्यपि उपर्युक्त सम्बन्धों का निष्कर्ष के परीक्षण में सीधा उपयोग नहीं होता है,किन्तु कभी-कभी इस तथ्य की जानकारी मदद भी देती है।

(3) पदव्याप्ति (Distribution of term):

  • प्रत्येक तर्कवाक्य में उद्देश्य और विधेय दो पद होते हैं और इनके बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाली क्रिया संयोजक (Copula) कहलाती है।साथ ही यह ध्यान रहे कि तार्किक वाक्यों की क्रिया वर्तमान काल में ही होती है।प्रत्येक तर्कवाक्य में उद्देश्य और विधेय व्याप्त या अव्याप्त होते हैं।पद व्याप्ति का अर्थ है कि पद या तो स्वयं अपनी पूर्ण व्यापकता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है या आंशिक।यदि पूर्ण व्यापकता के अर्थ में कोई पद प्रयुक्त है तो उसे व्याप्त पद कहा जाएगा,लेकिन यदि आंशिक व्यापकता के अर्थ में पद प्रयुक्त हुआ है तो उसे अव्याप्त पद माना जाता है।
  • उदाहरण के लिए “सभी जापानी कलाप्रेमी हैं” में ‘जापानी’ पद अपनी पूर्ण व्यापकता में प्रयुक्त हुआ है अर्थात् ‘कला प्रेमी’ होने का तथ्य सभी जापानियों के सन्दर्भ में है,यानी बात सभी जापानियों के लिए कही गई है।अतः ‘जापानी’ पद व्याप्त है।इसी प्रकार “कुछ जापानी कलाप्रेमी है” में ‘जापानी’ पद आंशिक व्यापकता में प्रयुक्त होने के कारण अव्याप्त है।
  • अब विधेय पद ‘कलाप्रेमी’ को लीजिए।’कला प्रेमी’ होने का तथ्य सभी जापानियों में समाप्त नहीं हुआ है।अंग्रेज,जर्मन आदि भी कला प्रेमी हो सकते हैं।दूसरे शब्दों में यह नहीं कहा गया है कि “सभी जापानी सभी कला प्रेमी हैं” अतः ‘कला प्रेमी’ पद अव्याप्त है।वैसे भी यह ध्यानेय है कि स्वीकारात्मक तर्कवाक्यों का विधेय अपने निर्देश में उद्देश्य पद के निर्देश से सदैव अधिक व्यापक होता है और उद्देश्य पद की व्यापकता में समाप्त नहीं होता है।हाँ,नकारात्मक तर्कवाक्य का विधेय पद व्याप्त हो जाता है जैसे यदि हम कहें कि “कोई आर्यसमाजी मूर्तिपूजक नहीं है” तो इसमें मूर्तिपूजा जो भी होती हो उस सबका पूर्ण निषेध आर्यसमाजी के सम्बन्ध में किया गया है।
  • इस प्रकार पद व्याप्ति का अर्थ पद स्वयं के व्याप्त भाव में प्रयुक्त होने से समझा जाना चाहिए।संक्षेप में चारों तार्किक वाक्यों के उद्देश्य और विधेय की स्थिति निम्नलिखित ढंग से निर्धारित है:
    A तर्कवाक्य का उद्देश्य व्याप्त और विधेय अव्याप्त होता है।
    E तर्कवाक्य के उद्देश्य और विधेय दोनों व्याप्त होते हैं।
    I तर्कवाक्य के उद्देश्य और विधेय दोनों अव्याप्त होते हैं।
    O तर्कवाक्य का उद्देश्य अव्याप्त और विधेय व्याप्त होता है।
  • इस तथ्य को सूत्र रूप में याद रखने के लिए ऐसा कह सकते हैं कि पूर्णव्यापी तर्कवाक्यों के उद्देश्य तथा नास्तिवाची तर्क-वाक्यों के विधेय व्याप्त होते हैं,शेष पद अव्याप्त होते हैं।

(4) न्यायवाक्य की संरचना (The structure of syllogism):

  • निम्नलिखित न्यायवाक्य का अवलोकन कीजिए:
    सभी जैनी नास्तिक होते हैं।
    साध्य वाक्य (Major Premise)
    रामप्रसाद जैनी है।
    पक्ष वाक्य (Minor Premise)
    रामप्रसाद नास्तिक है।
    निष्कर्ष (Conclusion)
  • प्रत्येक न्यायवाक्य के निष्कर्ष का विधेय साध्य पद और उद्देश्य पक्ष पद कहलाता है,क्योंकि इसमें पक्ष पद के विषय में ही साध्य पद को सिद्ध करना होता है जो निष्कर्ष बनकर हमारे समक्ष आता है।अब निष्कर्ष का विधेष पद जिस बाक्य में होता है उसे साध्य वाक्य और निष्कर्ष का उद्देश्य पद जिस वाक्य में होता है उसे पक्ष वाक्य कहां जाता है।इसी कसौटी के आधार पर उपर्युक्त न्यायवाक्य में प्रथम और द्वितीय तर्कवाक्यों को क्रमश साध्य वाक्य और पक्ष वाक्य निर्धारित किया गया है।

(5) मध्य पद (Middle Term):

  • न्यायवाक्य में साध्य पद और पक्ष पद के अतिरिक्त एक मध्य पद भी होता है।मध्य पद प्रथम दोनों वाक्यों में एक उभयनिष्ठ पद है जिसकी सहायता के बिना पक्ष पद के विषय में साध्य पद के सत्य को सिद्ध किया ही नहीं जा सकता है।उपर्युक्त न्यायवाक्य में ‘रामप्रसाद’ पक्ष पद और ‘नास्तिक’ साध्य पद है।जैनी पद के बिना रामप्रसाद को नास्तिक सिद्ध नहीं किया जा सकता था।वास्तव में मध्य पद दो सत्यों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता है।
    सभी जैनी नास्तिक हैं और चूंकि रामप्रसाद सभी जैनियों में से ही एक है अतः उसके विषय में भी नास्तिक का सत्य सिद्ध हो गया,लेकिन इस मध्य पद (इसे हेतु पद भी कहते हैं) की न्यायवाक्य में चार स्थितियों हो सकती हैं।यह साध्यवाक्य में उद्देश्य या विधेय तथा पक्ष वाक्य में भी उद्देश्य या विधेय का स्थान ग्रहण कर सकता है;देखिए:
    (I)
    सब कुत्ते चतुष्पदी हैं।
    कोई मनुष्य चतुष्पदी नहीं है।
    कोई मनुष्य कुत्ता नहीं है।
    (II)
    सब कुत्ते चतुष्पदी हैं।
    कोई चतुष्पदी मनुष्य नहीं है।
    कोई मनुष्य कुत्ता नहीं है।
  • उपर्युक्त दोनों न्यायवाक्यों में चतुष्पदी पद मध्य पद है,फिर भी पहले न्यायवाक्य में यह साध्य वाक्य का विधेय और पक्ष वाक्य का भी विधेय है,लेकिन दूसरे उदाहरण में यह साध्य वाक्य का विधेय और पक्ष वाक्य का उद्देश्य बनकर आया है।ठीक इसी प्रकार इसकी दो और स्थितियों हो सकती है।मध्य पद की इन चार स्थितियों को न्यायवाक्य के चार आकार (Four figures) कहा जाता है।निम्नांकित आरेख स्थिति को स्पष्ट करते हैं:

(6) न्यायवाक्य के नियम (Rules of Syllogism):

  • (1.) प्रत्येक न्यायवाक्य में तीन और केवल तीन ही तर्कवाक्य होने चाहिए:साध्य वाक्य,पक्ष वाक्य और निष्कर्ष वाक्य।
  • (2.)प्रत्येक न्यायवाक्य में तीन ही पद (साध्य,पक्ष और मध्य पद) होने चाहिए (ध्यान रहे कि तीनों पद दो-दो बार आते हैं)।यदि तीन पदों के स्थान पर चार पद आ जाते हैं तो चतुष्यदी दोष (Fallacy of four terms) उत्पन्न होने के कारण निष्कर्ष अवैध हो जाता है।ऐसी स्थिति चार पदों के स्पष्ट रूप से आने से या तीन पदों में ही एक पद के दो अर्थ निकलने पर भी आ सकती है।इसे द्विअर्थक,भिन्नार्थक या अस्पष्ट पद दोष (Fallacy of ambiguous term) कहते हैं।भिन्नार्थक दोष किसी भी पद (साध्य,पक्ष,मध्य) में उत्पन्न हो सकता है।एक उदाहरण देखिए:
    (क)
    रावण राम का शत्रु है।
    बालि रावण का शत्रु है।
    बालि राम का शत्रु है।
    (ख) मेरा हाथ कुर्सी को छूता है।
    कुर्सी जमीन को छूती है।
    मेरा हाथ जमीन को छूता है।
    उपर्युक्त दोनों उदाहरणों में चार-चार पद हैं।उदाहरण (क) में ‘रावण’,’राम का शत्रु’,’बालि’ और ‘रावण का शत्रु’ नामक चार पद है और इसी प्रकार उदाहरण (ख) में ‘मेरा हाथ’,’कुर्सी को छूना’,’कुर्सी’ और ‘जमीन को छूना’ नामक चार पद है।अतः दोनों उदाहरणों के निष्कर्ष अवैध है।अब द्विअर्थक पद के उदाहरण देखिए:
    स्वर्ग से बढ़कर कुछ नहीं है।
    कुछ नहीं से बढ़कर रोटी का एक टुकड़ा ही है।
    रोटी का एक टुकड़ा स्वर्ग से बढ़कर है।
    या ॥
    कन्नौज के रहने वाले कन्नौजिया (ब्राह्मण) हैं।
    रामदेव सिंह (क्षत्रिय) कन्नौज का रहने वाला है।
    रामदेव सिंह (क्षत्रिय) कन्नौजिया (ब्राह्मण) है।
    उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में ‘कुछ नहीं’ पद मध्य पद है और प्रथम ‘कुछ नहीं’ का अर्थ ‘संसार की कोई वस्तु’ से है,जबकि दूसरे ‘कुछ नहीं’ का अर्थ ‘कुछ भी न होने’ (पूर्ण अभाव) से है।अस्तु निष्कर्ष अतार्किक व असत्य भी है।इसी प्रकार दूसरे उदाहरण में ‘कन्नौजिया’ पद दोनों जगहों में अलग-अलग अर्थ देता है और निष्कर्ष अवैध एवं व्यावहारिक सत्य की दृष्टि से असत्य भी है।
  • (3.)न्याययाक्य में मध्य पद कम से कम एक बार व्याप्त अवश्य होना चाहिए अन्यथा अव्याप्त हेतु (मध्य) पद के कारण निष्कर्ष निश्चित रूप से अवैध होता है।देखिए:
    (क) सब गायें चतुष्पदी हैं।
    सब भेड़े चतुष्पदी हैं।
    सब भेड़े गायें हैं।
    (ख)सब मुसलमान एकेश्वरवादी है।
    रामप्रसाद ऐकेश्वरवादी है।
    रामप्रसाद मुसलमान है।
    (ग) सभी भारतीय सदाचारी हैं।
    कुछ सदाचारी अंग्रेज हैं।
    कुछ अंग्रेज भारतीय है।
    (घ) कुछ विद्वान भारतीय है।
    सभी जापानी विद्वान है।
    कुछ जापानी भारतीय है।
    उपर्युक्त चारों उदाहरणों में मध्य पद क्रमशः ‘चतुष्पदी’, ‘ऐकेश्वरवादी’, ‘सदाचारी’ और ‘विद्वान’ अपने-अपने न्यायवाक्यों में दोनों जगह अव्याप्त है।अतः चारों निष्कर्ष अवैध हैं।निष्कर्ष के वैध होने के लिए मध्य पद का एक बार व्याप्त होना परमावश्यक है।देखिए:
    (क) सभी ब्रह्मवादी दयालु होते हैं।
    उपमन्यु ब्रह्मवादी है।
    उपमन्यु दयालु है।
    (ख) कोई ईसाई मूर्तिपूजक नहीं है।
    राधेश्याम मूर्तिपूजक है।
    राधेश्याम ईसाई नहीं है।
    उपर्युक्त दोनों उदाहरणों (क व ख) में ‘ब्रह्मवादी’ और ‘मूर्तिपूजक’ पद मध्य पद है।(क) उदाहरण में ‘ब्रह्मवादी’ पद प्रथम तर्कवाक्य (A) में व्याप्त है और (ख) उदाहरण में ‘मूर्तिपूजक’ पद प्रथम वाक्य (E) में व्याप्त है।ध्यान रहे कि A और E तर्कवाक्यों के उद्देश्य व्याप्त होते हैं और E वाक्य का विधेय भी व्याप्त होता है।अतः दोनों उदाहरणों के निष्कर्ष वैध है।
  • (4.) न्यायवाक्य में जो पद आधार वाक्यों में अव्याप्त हो वह निष्कर्ष में व्याप्त नहीं हो सकता है और यदि ऐसा हो तो निष्कर्ष अवैध हो जाता है,जैसे:
    (क) सभी स्पष्ट वक्ता ईमानदार होते हैं।
    रामगोपाल स्पष्ट वक्ता नहीं है।
    रामगोपाल ईमानदार नहीं है।
    (ख) कोई मनुष्य पूर्ण नहीं है।
    सभी मनुष्य प्राणी है।
    कोई प्राणी पूर्ण नहीं है।
    उपर्युक्त (क) न्यायवाक्य में साध्य पद ईमानदार अव्याप्त होकर भी निष्कर्ष में व्याप्त हो गया है।इसी प्रकार दूसरे (ख) न्यायवाक्य में पक्ष पद प्राणी अव्याप्त होकर भी निष्कर्ष में व्याप्त हो गया है अतः दोनों उदाहरणों के निष्कर्ष अवैध है।
  • (5.) यदि न्यायवाक्य के दोनों आधार वाक्य नकारात्मक हों तो कोई वैध निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। देखिए:
    कोई आर्यसमाजी मूर्तिपूजक नहीं है।
    कोई मूर्तिपूजक एकेश्वरवादी नहीं है।
    कोई एकेश्वरवादी आर्यसमाजी नहीं है।
    (अवैध)
    या
    कोई गाय मनुष्य नहीं है।
    कोई मनुष्य चतुष्पदी नहीं है।
    कोई गाय चतुष्पदी नहीं है। (अवैध)
    दोनों आधार वाक्यों के नकारात्मक होने में उद्देश्य और विधेय के मध्य सम्बन्ध का निषेध होने के कारण कोई निष्कर्ष असम्भव है,क्योंकि निष्कर्ष सम्बन्धों के आधार पर ही निकलता है।ऐसे वाक्यों में मध्य पद सम्बन्ध का निषेध करता है अस्तु निष्कर्ष नहीं निकल सकता है।
  • (6.)न्यायवाक्य में यदि आधार वाक्यों में एक वाक्य निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष निषेधात्मक ही होता है,जैसे:
    (क) सब भारतीय हिन्दी भाषी हैं।
    कोई ईरानी हिन्दी भाषी नहीं है।
    कोई ईरानी भारतीय नहीं हैं।
    (ख) कोई पहलवान साहित्यकार नहीं है।
    सभी साहित्यकार भावुक हैं।
    कोई भावुक (व्यक्ति) पहलवान नहीं है।
    उपर्युक्त दोनों उदाहरणों में निष्कर्ष वैध है।
  • (7.)न्यायवाक्य में दोनों आधार वाक्य अंशव्यापी हों तो निष्कर्ष अवैध ही निकलेगा।दूसरे शब्दों में अंशव्यापी आधार वाक्यों से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।जैसे:
    (क ) कुछ भारतीय साम्यवादी हैं।
    कुछ साम्यवादी अंग्रेज हैं।
    कुछ अंग्रेज भारतीय हैं। (अवैध)
    (ख) कुछ जापानी बौद्ध हैं।
    कुछ भारतीय बौद्ध नहीं है।
    कुछ भारतीय जापानी नहीं हैं। (अवैध)
    यहाँ उदाहरण (क) में मध्य पद ‘साम्यवादी’ कहीं भी व्याप्त नहीं है और उदाहरण (ख) में अव्याप्त ‘जापानी’ पद निष्कर्ष में व्याप्त हो गया है और ऐसी ही स्थिति प्रत्येक न्यायवाक्य में होती है जब आधार वाक्य अंशव्यापी होते हैं।अतः निष्कर्ष अवैध हो जाते है।
  • (8.)यदि न्यायवाक्य के दो आधार वाक्यों में एक पूर्णव्यापी और दूसरा अंशव्यापी हो तो निष्कर्ष अंशव्यापी ही होगा।यहाँ यह स्मरणीय है कि पूर्णव्यापी और अंशव्यापी के आधार वाक्य AI,EI और AO हो सकते हैं लेकिन EO होने पर निष्कर्ष नहीं निकलेगा,क्योंकि ये दोनों आधार वाक्य निषेधात्मक होंगे और निषेधात्मक आधार वाक्यों से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है।देखिए:
    (क) सभी भारतीय आस्तिक हैं।
    कुछ जापानी भारतीय है।
    कुछ जापानी आस्तिक हैं।
    (ख) कोई भारतीय देशदोही नहीं है।
    कुछ अफ्रीकावासी भारतीय है।
    कुछ अफ्रीकावासी देशद्रोही नहीं है।
    उपर्युक्त दोनों में निष्कर्ष वैध है।
  • (9.)यदि न्यायववाज्य में दोनों आधार वाक्य अस्तिवाची हो तो निष्कर्ष मी अस्तिवाची होगा,परन्तु शर्त यह है कि अस्तिवाची तर्कवाक्यों में एक पूर्णव्यापी होना चाहिए,क्योंकि दोनों तर्कवाक्यों के अस्तिवाची अंशव्यापी होने पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। जैसा नियम सात में उल्लेख है।उदाहरणार्थ:
    सभी भारतीय राष्ट्रभक्त हैं।
    कुछ बर्मावासी भारतीय है।
    कुछ बर्मावासी राष्ट्रभक्त है। (वैध)
  • (10.)यदि न्यायवाक्य में प्रथम आधार वाक्य अंशव्यापी हो और दूसरा निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष अवैध होगा। यथा
    कुछ वृक्ष नरभक्षी है।
    कोई गाय वृक्ष नहीं है।
    कोई गाय नरभक्षी नहीं है। (अवैध)
    यह नरभक्षी पद प्रथम तर्कवाक्य में अव्याप्त है,परन्तु निष्कर्ष में व्याप्त हो गया जो नहीं होना चाहिए (देखिए नियम 4) अतः यह निष्कर्ष अवैध है।
    उपर्युक्त दस नियमों में वस्तुतः प्रथम 6 नियम मुख्य हैं। शेष 4 नियम उपनियम ही है,क्योंकि इन उपनियमों के उल्लंघन में प्रथम 6 नियमों का ही किसी न किसी भाँति उल्लधन हो जाता है।
  • (7) संयोग (Moods):
    न्यायवाक्य में चार आकारों (अर्थात् मध्य पद) को हम समझ चुके हैं।संयोग वास्तव में आधार वाक्यों की स्थिति के द्योतक है।उदाहरण के लिए न्यायवाक्य में तीनों वाक्य AAA या AEE हो सकते हैं आदि।इस प्रकार A के साथ दूसरा वाक्य क्रमशः A,E,I और O आ सकता है और 16 स्थितियों बन सकती हैं।इसी प्रकार प्रथम तर्कवाक्य E होने पर कमश A,E,I,O के आने पर भी 16 स्थितियाँ बन सकती हैं और ऐसे ही I और O के प्रथम वाक्य होने पर सोलह-सोलह स्थितियाँ बनेंगी और ये स्थिति यदि एक ही आकार की मानी जाएं तो चारों आकारों में 16×4=64 स्थितियाँ बनती है।इन स्थितियों को संयोग कहते हैं,परन्तु इन संयोगों में केवल 19 संयोग ही वैध माने गए हैं।ये इस प्रकार है:
    प्रथम आकार में (I figure)
    ΑΑΑ,ΕΑΕ,ΑΙΙ,ΕΙΟ (संयोग)
    द्वितीय आकार में (II figure)
    ΕΑΕ,ΑΕΕ,ΕΙΟ,ΑOO संयोग
    तृतीय आकार में (III figure)
    ΑΑΙ, ΑΙΙ, ΕΑΟ, ΕΙΟ, ΙΑΙ,ΟΑΟ संयोग
    चतुर्थ आकार में (IV figure)
    ΑΑΙ,ΑΕΕ,ΕΑΟ,EIO,IAI संयोग
    उपर्युक्त संयोगों के सांकेतिक नाम यूनानी भाषा में क्रमशः बारबारा,केलारेन्ट दारीई फेरिओ (प्रथम आकार),केसारे,कामेस्ट्रेस,फेस्तीनो,बारोको (द्वितीय आकार),दराप्ती,दीसामीस,दातीसो,फेलाप्टोन,बोकार्डो,फेरीसोन (तृतीय आकार),ब्रामान्टीप,कामानेस,फेसायो, फ्रेसीसोन,दीमारीस (चतुर्थ आकार)
    इन्हें क्रमश यूनानी माषा में सांकेतिक रूप से Barbara,Celarent,Darii,Ferio,Cesare,Camestres,Festino,Baraco,Datapti,Datisi,Felapton,Ferison,Disamis,Bocardo,Bramantip,Camanes,Fesapo Fresison व Dimaris लिखा जाता है।संकेत यह है कि प्रत्येक शब्द में जो स्वर वर्ण है वे मिलकर संयोग बताते हैं जैसे Barbara में तीन स्वर A,A,A है।इसका अर्थ हुआा कि इस संयोग में तीनों वाक्य A ही होंगे अर्थात् पूर्वव्यापी अस्तिवाची इसी प्रकार अन्य संयोगों से संकेत समझ लेना चाहिए।
    संक्षेप में चारों आकारों में कुछ संयोगों की पुनरावृत्ति हुई दिखाई देती है अतः यदि केवल निम्नांकित संयोग याद रखे जाएं तो तत्काल ही निष्कर्ष की वैधता और अवैधता का ज्ञान हो जाएगा।ये संयोग इस प्रकार हैं:
    ΑΑΑ,ΕΑΕ,ΑΙΙ,ΕΙΟ, ΑΕE,AOO,AAI,EAO,IAI,OAO (केवल 10 संयोग)
  • (8)कभी-कभी परीक्षा के प्रश्न-पत्रों में निष्कर्षों को आधार बाक्यों के रुपान्तरित स्वरूप में लिखकर जाँच कराई जाती है,जबकि निष्कर्ष परोक्ष (Indirect) अनुमान नहीं होता है,फिर भी वह किसी एक तर्कवाक्य का परिवर्तन होने के कारण वैध होता है।जैसे:
    सभी भारतीय विद्वान है।
    इस टापू के निवासी भारतीय है।
    निष्कर्ष I
    इस टापू के निवासी विद्वान है
    निष्कर्ष
    कुछ विद्वान भारतीय हैं।
    यहाँ निष्कर्ष I वैध है,परन्तु दूसरा निष्कर्ष प्रथम वाक्य का परिवर्तन मात्र है।अतः यह भी वैध है।इसलिए तर्कशास्त्र में अनन्तरानुमान (एक ही वाक्य से अनुमान निकालने की विधि) के दो रूपों का परिचय भी होना आवश्यक है।ये दो रूप परिवर्तन व प्रतिवर्तन (Conversion & Obversion) कहलाते हैं।
    I.परिवर्तन (Conversion):
    दिए हुए वाक्य का गुण नहीं बदला जाता है,परन्तु उद्देश्य के स्थान पर विधेय और विधेय के स्थान पर उद्देश्य रख दिया जाता है।देखिए:
    A सभी मनुष्य नाशवान हैं
    -दिया हुआ वाक्य/मूल वाक्य
    I कुछ नाशवान (प्राणी) मनुष्य है
    -परिवर्तित वाक्य
    E कोई मुसलमान मूर्तिपूजक नहीं है
    -मूल वाक्य
    E कोई मूर्तिपूजक मुसलमान नहीं है।
    -परिवर्तित वाक्य
    I कुछ कवि बंगाली हैं
    -मूल वाक्य
    I कुछ बंगाली कवि हैं
    -परिवर्तित वाक्य
    O कुछ भारतीय देशभक्त नहीं है
    -मूल वाक्य
    इसका परिवर्तन नहीं होता है।
  • स्मरणीय यह है कि A वाक्य का परिवर्तन प्रायः संकुचित होता है।केवल तभी इसका पूर्ण परिवर्तन होता है जब उद्देश्य और विधेय तुल्य बल के हो,जैसे “सब मनुष्य विवेकशील प्राणी हैं” का परिवर्तन “सब विवेकशील प्राणी मनुष्य हैं” होगा।वाक्य का परिवर्तन इसलिए नहीं होता है कि परिवर्तन में मूल वाक्य का अव्याप्त उद्देश्य परिवर्तित वाक्य में व्याप्त विधेय बन जाता है जो असंगत है।
    II.प्रतिवर्तन (Obversion):इसमें मूल वाक्य का गुण बदल जाता है अर्थात् अस्तिवाची नास्तिवाची और नास्तिवाची अस्तिवाची बनकर प्रस्तुत होता है देखिए:
    A सभी भारतीय कवि हैं। (मूल वाक्य)
    E कोई भारतीय अकवि नहीं है (प्रतिवर्तित वाक्य)
    E कोई कवि निर्दयी नहीं है (मूल वाक्य)
    A सभी कवि अनिर्दयी हैं (प्रतिवर्तित वाक्य)
    कुछ बंगाली ईमानदार हैं (मूल वाक्य)
    O कुछ बंगाली अईमानदार नहीं हैं। (प्रतिवर्तित वाक्य)
    O कुछ कवि चरित्रवान हैं। (मूल वाक्य)
    कुछ कवि अचरित्रवान हैं। (प्रतिवर्तित वाक्य)
    स्पष्ट है कि प्रतिवर्तन में AE,EA,IO और OI में रूपान्तरित हो जाता है और इस रूपान्तरण में अर्थ नहीं बदलते हैं।संक्षेप में यह एक तथ्य को नए रूप में कहने का तरीका है और साथ ही अनुमान भी है।
  • इस प्रकार न्यायवाक्य के निष्कर्षों की वैधता या अवैधता का निर्णय केवल कुछ सावधानी के साथ नियमों के आधार पर सही ढंग से किया जा सकता है और दस संयोगों का ज्ञान तो एक दृष्टि में ही बता देता है कि निष्कर्ष वैध है या अवैध है।
    उपर्युक्त आर्टिकल में न्यायवाक्यीय निष्कर्षों के 10 नियम हिन्दी में (10 Rules for Syllogism Conclusions in hindi) के बारे में विस्तृत और गहराई से बताया गया है।
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3.तर्कशास्त्री बेटा (हास्य-व्यंग्य) (Logician Son) (Humour-Satire):

  • एक बार पिता अपने बेटे जग्गू का गणित का टेस्ट ले रहा था।
  • पिता:बेटा,5 के बाद क्या आता है?
  • जग्गू:6,7
  • पिता:वाह,मेरा बेटा तो बड़ा होशियार है और 6,7 के बाद क्या आता है?
  • जग्गू:8,9,10
  • पिता:शाबास,और उसके बाद क्या आता है?
  • जग्गू:गुलाम,बेगम,बादशाह…

4.न्यायवाक्यीय निष्कर्षों के 10 नियम हिन्दी में (Frequently Asked Questions Related to 10 Rules for Syllogism Conclusions in hindi) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.पद व्याप्ति से क्या आशय है? (What do you mean by ‘term distribution’?):

उत्तर:यदि किसी वर्ग का द्योतक पद,उद्देश्य या विधेय किसी तर्कवाक्य में उस वर्ग के प्रत्येक सदस्य की ओर संकेत करता है तो उस पद को व्याप्त कहा जाता है।

प्रश्न:2.पद अव्याप्ति की परिभाषा दो। (Define term undistribution):

उत्तर:यदि किसी वर्ग का द्योतक पद,उद्देश्य या विधेय किसी तर्कवाक्य में उस वर्ग के प्रत्येक सदस्य की ओर लक्ष्य न करके “कुछ” सदस्यों को ही संकेत करता है तो उस पद को अव्याप्त कहा जाता है।

प्रश्न:3.पदों की व्याप्ति का युक्ति से क्या सम्बन्ध है? (What is the relation of the distribution of the terms to the argument?):

उत्तर:वाक्यों में पदों की व्याप्ति का युक्ति के वैध या अवैध होने से घनिष्ठ सम्बन्ध है।जैसे यदि कोई पद आधार वाक्य में व्याप्त न हो तो निष्कर्ष वाक्य में भी व्याप्त नहीं हो सकता।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा न्यायवाक्यीय निष्कर्षों के 10 नियम हिन्दी में (10 Rules for Syllogism Conclusions in hindi) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी दी गई है।

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