Cristian Public Schools Ka Sach:7 Reasons for Popularity
1.ईसाई पब्लिक स्कूलों का सच:लोकप्रियता के 7 कारण (Cristian Public Schools Ka Sach:7 Reasons for Popularity):
- ईसाई पब्लिक स्कूलों का सच:लोकप्रियता के 7 कारण (Cristian Public Schools Ka Sach:7 Reasons for Popularity) के आधार पर आप तय कर पाएंगे कि क्या इनकी प्रासंगिकता तथा सार्थकता है? यदि हां तो इनमें क्या सुधार करने की आवश्यकता है?
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2.ईसाई पब्लिक स्कूलों का परिचय (Introduction to Christian Public Schools):
- भारत में प्रथम पब्लिक स्कूल शिमला में सन् 1850 में बिशप कॉटन के नाम से खुला।इसके करीब 15 वर्ष पश्चात् दूसरा पब्लिक स्कूल राजकोट में खोला गया।इन स्कूलों को मिलने वाली सफलता के मद्देनजर भारत में जगह-जगह ईसाई पब्लिक स्कूल खोले जाने लगे।आज स्थिति यह है कि हिंदुस्तान के लगभग हर नगर तथा कस्बे में ईसाई पब्लिक स्कूल खोले जा चुके हैं।इसके बावजूद समाज में इन पब्लिक स्कूलों की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।
- आज जबकि शिक्षा का वातावरण उत्तरोत्तर शिथिल एवं अराजक होता जा रहा है,कॉलेजों को राजनीति का अखाड़ा बना लिया गया है।ऐसे में दूषित राजनीति से दूर शांतिपूर्वक चलने वाले इन ईसाई पब्लिक स्कूलों का सार्थक महत्त्व है।
- ये पब्लिक स्कूल समाज में बहुत ही लोकप्रिय हैं तथा बिना किसी सरकारी सहायता के तमाम प्रतिरोधों के बावजूद अपना विस्तार करते जा रहे हैं।वर्तमान में जिस तेजी से ईसाई पब्लिक स्कूलों की माँग समाज में बढ़ती जा रही है उससे एक बात स्पष्ट है कि स्कूलों में कुछ तो ऐसा है जो इनके आकर्षण में दिनों-दिन वृद्धि हो रही है।
- क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा इन्हीं स्कूलों की तर्ज पर खोले गए नवोदय विद्यालय (Naboday Vidhyalay) और एकलव्य मॉडल स्कूल (Eklavya Residential Model School) उतने लोकप्रिय नहीं हो सके,जबकि नवोदय विद्यालयों व एकलव्य माॅडल स्कूल के लिए सरकार अच्छा खासा धन उपलब्ध कराती है,छात्रों को किसी प्रकार की फीस आदि भी नहीं देनी पड़ती,किताब,कॉपी यहां तक की भोजन,कपड़े की व्यवस्था भी सरकार की तरफ से की जाती है।
- ईसाई पब्लिक स्कूलों में फीस के नाम पर काफी मोटी रकम ली जाती है तथा तमाम अन्य मसलों पर भी अभिभावकों का शोषण होता है,मसलन किताब,कॉपी,ड्रेस आदि किसी संस्थान विशेष से खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है,जहां अभिभावक को दूना-तिगुना दाम देना पड़ता है,वाहन सुविधा तथा बिल्डिंग फण्ड के नाम पर भी खासा धन वसूल किया जाता है।
3.पब्लिक स्कूलों की लोकप्रियता के कारण (Reasons for the popularity of public schools):
- अगर लोग अपने बच्चों को इन्हीं पब्लिक स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं तथा इसमें अपनी शान समझते हैं तो कारण स्पष्ट है कि इन पब्लिक स्कूलों में उन्हें अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित नजर आता है।जिसका महत्त्वपूर्ण कारण ईसाई पब्लिक स्कूल में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी (English Medium Education) का होना है,क्योंकि अंग्रेजी भाषा पूरी दुनिया में बोली और समझी जाती है अतः अंग्रेजी का महत्त्व स्वतः ही सिद्ध है।
- भारत में राष्ट्रभाषा एवं सम्पर्क भाषा हिंदी होने के बावजूद,अंग्रेजी संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित है।
अंग्रेजी जानने वालों को समाज में सम्मान प्राप्त होता है।विभिन्न स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी (English in Competitive Exams) एक अनिवार्य विषय भी है।सत्य तो यह है कि अंग्रेजी का अच्छा जानकार ही प्रशासनिक पदों की कल्पना कर सकता है।अर्द्ध सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों में भी अंग्रेजी जानने जानने वालों को ही वरीयता दी जाती है।
ये पब्लिक स्कूल छात्रों को कड़े अनुशासन में रखते हैं तथा उन्हें प्राथमिक कक्षाओं से ही सामान्य ज्ञान का सम्यक अध्ययन कराते हैं।इस प्रकार इन ईसाई पब्लिक स्कूलों के छात्र अंग्रेजी और सामान्य ज्ञान की अच्छी जानकारी रखते हैं।
- स्कूल परिसर के बाहर का वातावरण हिंदी में होने के नाते इन्हें हिंदी पढ़ने,लिखने,बोलने-समझने में भी किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती।इस प्रकार इन पब्लिक स्कूलों से निकले छात्र किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए काफी हद तक तैयार होते हैं,जबकि अन्य विद्यालयों से निकले छात्र-छात्रा को अंग्रेजी और सामान्य ज्ञान के लिए अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ता है।
इन पब्लिक स्कूलों में क्षमता से अधिक छात्र-छात्राओं का प्रवेश नहीं लिया जाता,जिससे शिक्षण कार्य सुगमता पूर्वक संपन्न होता है।यद्यपि ये पब्लिक स्कूल अपने शिक्षकों को पर्याप्त पारिश्रमिक (Sufficient Salarary to Teacher) देते हैं,तथापि उनसे पूरा काम भी लेते हैं।यह पब्लिक स्कूल जरूरतमंद छात्र-छात्राओं को आवास भी उपलब्ध कराते हैं।जहां उनकी उचित देखभाल की जाती है। - एक विशेषता यह है कि इन स्कूलों में पाठ्यक्रम अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लिए जाते हैं अर्थात् पाठ्यक्रमों को आधुनिकतम बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता है।
इन पब्लिक स्कूलों के छात्र प्रौढ़ शिक्षा तथा अनौपचारिक शिक्षा विभाग द्वारा चलाए जा रहे साक्षरता अभियान में भी सहयोग करते हैं जिससे इन छात्र-छात्राओं में सामाजिक भावना का विकास होता है तथा समाज का भी उत्थान होता है।नियमित अध्ययन-अध्यापन भी इनकी एक विशेषता है जो हमें अन्य स्कूलों में देखने को नहीं मिलती है। - इन पब्लिक स्कूलों में स्थानीय शिक्षक ही पढ़ाते हैं।स्थानीय शिक्षकों का मेलजोल आम लोगों से रहता है।बच्चों की परफॉर्मेंस के बारे में अभिभावकों से मीटिंग (Meeting of Guardians) भी करते हैं।घर पर भी व्यक्तिगत रूप से ये शिक्षक मिलते हैं और माता-पिता से बच्चों के बारे में संवाद करते हैं।व्यक्तिगत रुचि लेकर ये बच्चों को स्कूल में भेजने के लिए प्रेरित करते हैं।छात्र-छात्रा अनुपस्थित रहता है तो तत्काल अभिभावक से संपर्क करते हैं।आजकल तो मोबाइल फोन से तत्काल संपर्क कर लेते हैं।अभिभावकों तथा छात्र-छात्राओं की शिकायत पर गौर करते हैं।
- भवन,फर्नीचर छात्र-छात्राओं के बैठने की व्यवस्था,भव्य और विशाल विद्यालय भवन,पंखे,पानी पीने की व्यवस्था,टॉयलेट,वॉशरूम आदि देखते ही लोग आकर्षित हो जाते हैं।छात्र-छात्राओं को इन विद्यालय में प्रवेश की इतनी गलाकाट प्रतिस्पर्धा है कि ये ना तो किसी भी हालत में छात्र-छात्राओं को अपने विद्यालय से जाने देते हैं और अन्य छात्र छात्राओं को प्रलोभन देकर आने के लिए आकर्षित करते हैं।
- कुछ चुनिंदा प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को फीस में भी रियायत या फ्री में शिक्षा देते हैं।ऐसी स्थिति में हर माता-पिता और अभिभावक तथा छात्र-छात्रा का यही सपना होता है कि वह पब्लिक स्कूलों में पढ़े।और इसीलिए उनके तमाम नाज-नखरे और नीति-नियमों को स्वीकार किया जाता है।
4.ईसाई पब्लिक स्कूलों में दोष (Defects in Christian Public Schools):
- ये पब्लिक स्कूल अपनी तमाम अच्छाइयों के पीछे कुछ दोष भी छुपाए हुए हैं जिसके कारण बार-बार इन स्कूलों का विरोध किया जाता है।इन स्कूलों की सबसे अहम कमजोरी (Main weakness of public schools) यह है कि ये राष्ट्रगान आदि भारतीयता का परिचायिका चीजों से परहेज करते हैं।इससे जुड़ी कुछ घटनाएं सामने भी आयी हैं।
- बहुत समय पूर्व मध्य प्रदेश के एक ईसाई पब्लिक स्कूल ने अपने ही तीन छात्रों को मात्र इसलिए स्कूल से निष्कासित कर दिया क्योंकि उन छात्रों ने नियमित होने वाली प्रार्थना के बाद जबरदस्ती राष्ट्रगान की कोशिश की थी।सारांश यह है कि इन स्कूलों में ईसाईयत तथा पाश्चात्य संस्कृति के संस्कारबद्ध मूल किए जाते हैं।
इन स्कूलों की दूसरी कमजोरी यह है कि ये स्कूल किसी चर्च या समिति द्वारा ही नियंत्रित होते हैं तथा ईसाई धर्म को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं।इन स्कूलों में अन्य धर्मों तथा रीति-रिवाजों का मखौल उड़ाने की घटनाएं भी होती रहती हैं।मुंबई के एक ईसाई पब्लिक स्कूल ने अब से करीब 30 साल पूर्व,एक छात्रा को हाथों में मेहंदी लगाकर आने के कारण कठोर सजा दी तथा कुछ दिनों तक के लिए,स्कूल से निलंबित भी किया गया। - इन दो घटनाओं से यह मत समझ लेना कि अब तस्वीर बदल गई है।अभी हाल ही में महाराष्ट्र की घटना आपको याद होगी ही।महाराष्ट्र थाने स्कूल में लड़कियों के कपड़े उतरवाकर periods की जाँच की (10 जुलाई 2025)।
- इन स्कूलों का मुख्य नियंता सामान्यतः चर्च समिति का पदाधिकारी होता है।इन पर शासन और शिक्षा विभाग का कोई खास नियंत्रण नहीं होता,जिससे ये काफी मनमानी भी किया करते हैं।भारतीय संविधान के अनुसार सभी को शिक्षा पाने का समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए,परंतु इन पब्लिक स्कूलों की फीस ज्यादा होने के कारण गरीब वर्ग के छात्र पहले ही छँट जाते हैं।इस प्रकार इन पब्लिक स्कूलों में मात्र धनीवर्ग (elite group) के छात्र ही अध्ययन कर पाते हैं अतः ये पब्लिक स्कूल समाज में वर्गभेद पैदा करते हैं।
- इन पब्लिक स्कूलों के छात्र स्वयं को अन्य छात्रों से श्रेष्ठ समझते हैं जिससे उनमें अहंकार की भावना आ जाती है,जो उन्हें अंदरूनी तौर पर खोखला करती है।ये पब्लिक स्कूल हिंदी में बात करने पर छोटे-छोटे बालकों से भी आर्थिक जुर्माना लेते हैं,जिससे बच्चों के कोमल मन में राष्ट्रभाषा हिंदी विरोध की भावना उत्पन्न होती है।
- ये स्कूल प्रायः छात्रों को भारतीय संस्कृति (Indian culture) का कम पाश्चात्य सभ्यता का अधिक महत्त्व समझाते हैं,जिससे ये छात्र भारतीय सभ्यता को हीनता की दृष्टि से देखते हैं तथा महापुरुषों का उपहास करते हैं।
- महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने कहा था “यदि किसी स्थिति में पहुंचकर एक पीढ़ी अपने पूर्वजों के प्रयासों से अनभिज्ञ हो जाती है अथवा उसे अपनी संस्कृति पर लज्जा आती है तो वह समाप्त हो जाती है।”
इस प्रकार ये पब्लिक स्कूल भारतीय संस्कृति के लिए खतरा बन सकते हैं क्योंकि ये स्कूल हमारी संस्कृति में पाश्चात सभ्यता का जहर बोल रहे हैं।
5.ईसाई पब्लिक स्कूल के सुधार हेतु सुझाव (Suggestions for Improvement in Christian Public Schools):
- समाज में यह बात प्रचलित है कि पब्लिक स्कूल के छात्र बुद्धिमान तथा योग्य होते हैं,पर यह बात पूर्णतः सत्य नहीं है क्योंकि इन स्कूलों के छात्र भी मूर्ख और अयोग्य हो सकते हैं,चूँकि इन स्कूलों में चुने हुए छात्रों को ही प्रवेश दिया जाता है अतः यदि समस्त छात्र बुद्धिमान हों तो भी यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं कई जाएगी।
हम इन स्कूलों को शासन तथा शिक्षा विभाग के अधीन कर इनमें दूषित राजनीति और भ्रष्टाचार फैलाने के हिमायती नहीं है क्योंकि सरकारी स्कूलों (Government schools) की भी स्थिति गयी-गुजरी है,पर कम से कम राष्ट्रगीत (National Anthem) राष्ट्रभाषा (Hindi Language) एवं देश की संस्कृति (Culture of Nation) से खिलवाड़ की अनुमति देने के पक्षधर भी नहीं हैं। - अगर ये ईसाई पब्लिक स्कूल सर्वोत्तम शिक्षा देने के साथ-साथ छात्र-छात्राओं में देश तथा संस्कृति के प्रति प्रेम की भावना भी भरें तो उनकी सार्थकता निर्विवाद हो जाए।
- अगर इस बात को समझ लिया जाए और अमल में ले लिया जाए तो ईसाई पब्लिक स्कूलों की नहीं,बल्कि अन्य पब्लिक स्कूलों की दशा और दिशा ठीक हो जाए।पब्लिक स्कूल भी इन्हीं पब्लिक स्कूलों के नक्शे कदम पर ही चलते हैं।कोई प्रार्थना नहीं,कोई छात्रों के व्यक्तित्व निर्माण और करियर गाइडेंस (Career guidance) की व्यवस्था नहीं फिर भी बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनका विकल्प तैयार नहीं हुआ।
6.सत्यम कोचिंग सेंटर की राय (Satyam Coaching Centre’s opinion):
- सरकारी स्कूलों की बदतर हालत (Inferior condition) तो समझ में आती है,क्योंकि व्यक्तिगत रूप से इन स्कूलों का कोई धनी-धौरी जिम्मेदार नहीं है। सरकार क्यों सोई हुई रहती है क्योंकि उन्हें सत्ता में रहने से मतलब है इसलिए इसमें (शिक्षा) छेड़खानी करना बर्र के छत्ते में हाथ डालने के समान है।वरना सरकार क्यों इतना धन खर्च करके शिक्षकों के वेतन,भवन,कर्मचारी आदि पर खर्च करेगी।
जबकि यह बात सबको मालूम है कि जब तक व्यक्ति में बदलाव नहीं होगा,व्यक्ति निर्माण का काम नहीं होगा तब तक पूरे सिस्टम और समाज में सडाँध रहेगी।व्यक्ति निर्माण का कार्य केवल और केवल शिक्षा और शिक्षा संस्थानों के द्वारा ही संभव है। - वर्तमान में ही देख लीजिए की सारे इन्तजाम और टाॅप लीडरशिप ईमानदार होने के बावजूद नीट पेपर घोटाला (NEET Paper Scam) हुआ है,हो रहा है और आगे भी होगा।इसका तात्पर्य यह नहीं है कि शक्ति और तकनीकी का इन्तजाम नहीं किया जाना चाहिए।पहले भी नीट-यूजी (NEET-UG Scam) पेपर लीक हुआ था तब हमने लेख लिखा था कि केवल तकनीकी सुधार,पूरी चाक-चौबंद व्यवस्था होने के बावजूद भी घोटाला हो सकता है,हुआ है।राजस्थान में पेपर घोटाले में सरकार के टाॅप लीडर्स की संलिप्तता उजागर हुई थी।जब तक शिक्षा में नैतिक शिक्षा,चारित्रिक शिक्षा का समावेश नहीं होगा,छात्र-छात्राओं के लिए काउंसलर की व्यवस्था नहीं होगी। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति का गठन नहीं किया जाएगा तब तक ये स्केम (Scam) चलते रहेंगे।अगर आपने पूरी मुस्तैदी से पेपर लीक होने से रोक भी दिया तो भी चरित्र के अभाव में ऐसे लोग सत्ता में आएंगे तो,वे क्या खेल खेलेंगे,अन्दाज लगाना मुश्किल नहीं है।देखिए नीट-यूजी घोटाले पर पिछला लेख।
- आपका यह प्रश्न हो सकता है कि आप भी तो उसी शिक्षा में पले बढ़े हैं और भारतीय संस्कृति को अपनाए हुए हैं।आपका कहना ठीक है,पर आप हमारे बारे में शायद पूरी तरह नहीं जानते।स्कूलों से जो शिक्षा आपको मिल रही है,वही हमें मिली थी।परन्तु हमारे ऊपर हमारी माँ के संस्कारों का प्रभाव है।हमारी माँ 105 साल की होने पर भी सुबह उसी समय 4:00 बजे उठकर नित्य कर्म करना,सत्संग करना जारी रहा था।हम उनकी दिनचर्या (Routine) को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे।105 साल की उम्र में कोई भी व्यक्ति खाट पकड़ लेता है,जल्दी उठना (Eearly wake up) तो बहुत दूर की बात है।
- हमारी माँ जीवित रहने तक हमारा इस तरह से ध्यान रखती थी जैसे माँ एक छोटे (गोद वाले बच्चे) बच्चे का ध्यान रखती है।अब माँ तो नहीं रही लेकिन उसी तरह हमारा पूरा ध्यान हमारा पुत्र रखता है।आपकी गणित की पोस्ट के लिए पूरी कोडिंग करना उसी का काम है।आप यह कह लीजिए कि वह एक तरह से टेक्निकल असिस्टेंट (Technical Assistant) की तरह है।पोस्ट के नीचे हमारा ही बायोडाटा (Bio Data) आता है,जबकि टेक्निकल असिस्टेंट के रूप में उसका भी परिचय आना चाहिए ताकि आपको भी पता लग सके।
- तो बात यह है कि हम इतने कड़े अनुशासन और नियमितता (Consistency) को कायम रखे हुए कैसे हैं।पिछले 6 साल से आपके लिए कोचिंग का कार्य संभालते हुए नई-नई पोस्ट लिखते हैं।हमने कोडिंग,ब्लॉग डिजाइन करना,पोस्ट एडिटिंग करना,वीडियो एडिटिंग करना,एसईओ (search engine optimization) ऑफ़लाइन और ऑनलाइन,फोटो एडिटिंग आदि सारे काम खुद ने सीखा है।वरना ब्लॉग पर इतनी अर्निंग भी नहीं है कि कंटेंट रायटर हायर करके ये सब काम तथा ऑफलाइन कोचिंग को चलाया जा सके।
- ये नियम,अनुशासन,नियमितता,धैर्य,सीखने की तीव्र उत्कंठा,कड़ी मेहनत,नई तकनीकी को सीखने की ललक आदि गुण हमने माँ से ही सीखें हैं।
परंतु आजकल आर्थिक,तकनीकी माहौल को देखकर तथा माता-पिता अपने कार्य में व्यस्तता के कारण हर किसी के लिए संभव नहीं है कि उसे संस्कारित किया जा सके।बच्चा सबसे अधिक शिक्षण संस्थानों और माता-पिता के संपर्क में रहता है।माता-पिता भी उन्हीं शिक्षण संस्थानों में पढ़े लिखे हुए होते हैं,जिनमें आप और हम पढ़ चुके हैं। - इसका तात्पर्य यह नहीं कि पब्लिक स्कूलों का कल्चर ही ऐसा है।हम भी पब्लिक स्कूलों के छात्र-छात्राओं को पढ़ाते हैं।हमने अंग्रेजी स्पीकिंग का कोर्स भी बहुत बच्चों को पढ़ाया हुआ है परंतु हमने तो उस कल्चर को नहीं पकड़ा।क्योंकि हमें संस्कारों,अच्छे गुणों,भारतीय संस्कृति का आदर करना आदि माँ की घूँटी से मिले हैं,इसलिए आजकल के माहौल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।वरना जिन गलियों से आप गुजर रहे हैं,उन गलियों से हम भी गुजरे हैं,परंतु हमने पतन का रास्ता नहीं अपनाया है।इसीलिए सत्यम कोचिंग सेंटर (Satyam Coaching Centre) और सत्यम मैथमेटिक्स ब्लॉग (Satyam Mathematics Blog) पर पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं हमसे खुश हैं।आप पब्लिक स्कूलों का कल्चर (Culture of Public School) तथा अंग्रेजी भाषा (English Language) क्यों पढ़ें” वाले लेख पढ़ेंगे तो आपको और जानकारी मिल जाएगी।ये दोनों पोस्ट हमने बहुत पहले लिख दिए थे।तो आप अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हुए भी भारतीय संस्कृति को अपना सकते हैं।
- भारतीय बनाम पाश्चात्य संस्कृति की तुलनात्मक सारणी (Comparison Table of Indian Culture VS Western Culture):
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7.भारतीय छात्र का कलचर (हास्य-व्यंग्य) (Culture of Indian Students) (Humour-Satire):
- अमेरिकी में मां-बाप सोचते हैं मेरा मेरा बेटा गर्लफ्रेंड के साथ गया है अब आता ही होगा।इंग्लैंड में कुछ ऐसा कहते हैं कि पता नहीं कब लौटेगा।पेरिस में यों सोचते हैं कि बेटा गर्लफ्रेंड के साथ आता ही होगा और हिंदुस्तान में इस तरह सोचते हैं अरे इतनी रात हो गई अभी बेटा और गर्लफ्रेंड सोए नहीं है।
8.ईसाई पब्लिक स्कूलों का सच:लोकप्रियता के 7 कारण (Cristian Public Schools Ka Sach:7 Reasons for Popularity) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.बच्चों को पब्लिक स्कूलों की संस्कृति से कैसे बचाएं? (How to protect children from the culture of public schools?):
उत्तर:मां-बाप को अपने बच्चों के साथ भी कुछ समय बिताना चाहिए।उन्हें व्यावहारिक,ज्ञानवर्धक और संस्कारों को विकसित करने वाली पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें।
प्रश्न:2.क्या पब्लिक स्कूलों में सुधार संभव है? (Is it possible to improve public schools?):
उत्तर:जिन पब्लिक स्कूलों के संचालक संस्कारयुक्त हैं वे तो भारतीय संस्कृति के अनुसार ढाल (पब्लिक स्कूलों को) चुके हैं परंतु जिन पर भौतिकता का पर्दा पड़ा हुआ है (ऐसे 95% स्कूल हैं) उन्हें समाज के मार्गदर्शन,अच्छे लोगों की समझाइश और नेक लोगों को अलख जगाने की जरूरत है,तभी वे सही लाइन पर आएंगे।
प्रश्न:3.पब्लिक स्कूलों में भारतीय संस्कृति के पनपने की आशा कैसे करते हैं? (How do you expect Indian culture to flourish in public schools?):
उत्तर:क्योंकि भारत की भूमि संतों और ऋषियों की भूमि है।इस मिट्टी में यह खासियत है कि जब भी संकट आया है उससे पार हुए हैं।
उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा ईसाई पब्लिक स्कूलों का सच:लोकप्रियता के 7 कारण (Cristian Public Schools Ka Sach) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते है।
- **Students Se Ek Sawal**
“aapko is article mein konsi baat pasad aayi? Kya public school mein manmani nahi hoti hai? Comment karake batayein.”
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Lekhak Ke Baare Mein (About the Author)
**Satyam Narain Kumawat**
**Website Name:Satyam Mathematics**
*Owner:satyamcoachingcentre.in*
*Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)*
**Teaching Mathematics aur Anya Anubhav**
***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan
***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav
***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan*
****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.










