6 Spells on How to Make Life Sadhana
1.जीवन को साधना कैसे बनाएं के 6 मंत्र (6 Spells on How to Make Life Sadhana),जीवन को साधना कैसे बनायें? (How to Make Life Sadhana?):
- जीवन को साधना कैसे बनाएं के 6 मंत्र (6 Spells on How to Make Life Sadhana) के आधार पर जीवन को ही साधना बनाने की युक्ति जानेंगे।अक्सर साधना को व्यावहारिक जीवन व सांसारिक जीवन के लिए अनुपयुक्त समझा जाता है।परंतु साधना के सही अर्थ को समझा जाए तो हर वह कार्य साधना बन जाता है जिसको करने में पवित्र भाव हो।
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2.साधना क्या है? (What is Sadhana?):
- दृढ़ अर्थों में साधना एक धार्मिक या आध्यात्मिक प्रक्रिया है,जिसकी विभिन्न संप्रदायों में अलग-अलग मान्यताएं हैं।हिंदू धर्म में यम,नियम,आसन और प्राणायाम व प्रत्याहार को बहिरंग तथा धारणा,ध्यान और समाधि को अंतरंग साधना-सोपान के रूप में स्वीकार किया गया है।जैनागमों में अनशन,अनोदरता (आहार संबंधी नियम),भिक्षाचार्य,वृत्ति-संकोच,रस-परित्याग,कायक्लेश और निर्विकारता को बहिरंग साधना की तथा प्रायश्चित्त, विनय,सेवा-परिचर्या,स्वाध्याय,ध्यान एवं कायोत्सर्ग को अंतरंग साधना अर्थात् तप की संज्ञा दी गई है।बौद्ध धर्म में स्वपीड़न और पर-पीड़न से रहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।
- परंतु साधना या तप कोई जड़ प्रक्रिया नहीं है,जिसकी नियमोंपनियमों के शिकंजे में कस दिया जाए।वह एक गत्यात्मक प्रक्रिया है,जिसका अनुगमन बदलती हुई जीवन परिस्थितियों के साथ व्यावहारिक धरातल पर होना आवश्यक है।
- परंतु साधना केवल धार्मिक कर्मकांड-सापेक्ष क्रिया मात्र नहीं है।उसको यह रूप देकर धर्माचार्यों ने मानवमात्र को एक संकुचित दायरे में बंद कर दिया है।गृहत्यागी,विरत और संन्यासी महाप्राण मनीषियों के आचार-आदर्श का मान बिंदु ही स्थापित कर सकते हैं,परंतु लोकधर्म का रूप नहीं ले सकते।आज धर्म के नाम पर नई पीढ़ी नाक-भौं सिकोड़ती है,उसका दोष किस पर है? जो धर्म या साधना पथ लौकिक जीवन के बदलते आश्रमों के साथ अपने को गत्यात्मक नहीं बनाए रख सकता,वह जनजीवन के लिए व्यावहारिक नहीं बना सकता।
- जन-समाज में अधिकांश संख्या तो गृहस्थों की है और जो नामधारी साधु-संन्यासी है,उनमें से भी अधिकांश प्रच्छन्न गृहस्थ ही हैं।फिर यम-नियम,आसन,प्राणायाम,ध्यान-धारणा समाधि की कठोर प्रक्रिया में से गुजरने की अपेक्षा किससे की जा रही है?
- साधना वेश में नहीं है।साधना क्रिया-कांडों में भी नहीं है।साधना दिखावे के लिए नहीं की जाती।साधना परंपराओं को चलाने के लिए नहीं की जाती।साधना दुनिया को उपदेश बघारने के लिए भी नहीं की जाती।आज भारत में तथाकथित साधकों की भरमार है,फिर भी साधकों और उनके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति से ऐसा वातावरण तैयार नहीं हुआ है,जैसा कि एक साधनानिष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।
- साधना वह होती है,जहां का वातावरण आनंद और प्रेममय बन जाता है।साधना वह होती है,जहाँ ईमानदारी और प्रमाणिकता मूर्त बन जाती है।ऐसी साधना क्रियाकांडों से नहीं आंतरिक पवित्रता,विशुद्ध प्रेम भावना,स्वार्थ त्याग आदि सद्गुणों के पोषण और विकास से होगी।जिस दिन इस सहज प्रक्रिया से सहज जीवन विकसित होगा,उस दिन संसार का दूसरा ही रूप होगा।आवश्यकता है,साधना के नाम पर पलने वाले भ्रमों में उलझकर व्यक्ति,जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति को साधनामय बनाए फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है?
3.साधना अर्थ से परे है (Is sadhana beyond meaning?):
- आज अपेक्षा उस साधना की,जिसका वर्णन संत कबीरदास के एक पद में किया गया है।’साधो सहज समाधि भली’ इस पद में कबीर ने नाम ‘समाधि’ का लिया है,पर वह एक संपूर्ण जीवन साधना का दर्शन है।उन्होंने सारा जीवन दर्शन ही क्रांतिकारी ढंग से प्रस्तुत कर दिया है।नित्य जीवन की सहज क्रियाओं को लेकर महात्मा कबीर ने यह व्यक्त करने का प्रयास किया है कि मनुष्य जीवन की सही दिशा और सच्ची साधना क्या है?
- जीवन अनेकमुखी होता है और विकास के रास्ते भी अनगिनत है।मनुष्य सबको तो आत्मसात कर नहीं पाता।अतः वह कोई एक मार्ग पकड़ता है और उसी के द्वारा अपने जीवन को उन्नत बनाना चाहता है।कोई भक्ति का मार्ग चुनता है;कोई धर्म मार्ग की ओर अग्रसर होता है और कोई ज्ञानयोग की तरफ उन्मुख होता है।
- विश्व में अनेक धर्मपंथ हैं और उनके अपने-अपने सिद्धांत तथा तौर-तरीके हैं और वे सब इसीलिए हैं कि उनके द्वारा स्वयं व्यक्ति का,समाज का और अंततः विश्व का कल्याण हो,दुःख मिटे।सदियों से सबकी अपनी-अपनी परंपराएं चली आ रही हैं।श्रद्धा और आस्थापूर्वक लोग उन परंपराओं पर चलते आ रहे हैं,उनको जीवन में उतारने का प्रयत्न कर रहे हैं।
- जिन महापुरुषों ने जीवन और जगत की रीति को अंतश्चक्षुओं से देखा,उन्होंने देश,काल,परिस्थितियों को ध्यान में रखकर युगानुरूप मार्ग निर्धारित किया और वही कालांतर में धर्म बन गया।वही विशिष्ट साधना का पक्ष भी बन गया।
- ‘साधना’ शब्द अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता।हमने उसमें अपना अर्थ आरोपित कर दिया है,यह अलग बात है।लेकिन शुद्ध रूप में साधना शब्द अर्थ से परे है।अर्थ उसमे तब आता है,जब कोई लक्ष्य,उद्देश्य,क्रिया प्रकट होती है।एक आध्यात्मिक संत की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अंतरिक्ष यात्री की क्रियाएं भी साधना है।एक माँ अपने बेटों के लिए,परिवार के लिए रसोई बनाती है-यह भी साधना है।इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता,लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है,तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है?
- सब प्रकार की कलाओं की सिद्धि के लिए साधना करनी पड़ती है अर्थात् एकाग्रतापूर्वक अभ्यास करना पड़ता है।परस्पर,व्यवहार को सभ्य या समाज-मान्य बनाने के लिए बचपन से ही संस्कारों द्वारा साधना करनी पड़ती है।प्रेम,उदारता,सेवाभावना आदि गुणों के लिए भी निरंतर साधना करनी पड़ती है।व्यापार-व्यवसाय में भी सैकड़ो ऐसी बातें हैं,जो बिना अभ्यास के और बिना परिश्रम के साध्य नहीं होती,इसमें भी साधना की आवश्यकता होती है।
- मतलब यह है कि साधना का कोई एक प्रकार या एक नियम नहीं है और यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग भी हो सकती है।गांधी जी ने कहा था कि मेरा जीवन ही सत्य की साधना में बीत रहा है।वे जीवनभर सत्य के प्रयोग करते रहे।उनकी हर प्रवृत्ति के पीछे सत्य का आग्रह रहा करता था।महात्मा कबीर ने अपने पद में यही बात कही है।उन्होंने जब देखा कि लोग अमुक-अमुक क्रियाओं या परंपराओं को ही धर्म-कर्म या साधन मानते हैं और उतना-सा करके समझते हैं कि वे साधक बन गए,तो उन्होंने मशाल हाथ में लेकर साधना-मार्ग को प्रकाशित किया।लोगों की आंखें खोलने का प्रयास किया कि हमारी वे सारी क्रियाएं धर्म-क्रियाएं हैं,साधनाएँ हैं,जो हम सवेरे उठने से लेकर रात को सोने तक और निद्रा में भी करते हैं।
4.साधना से सिद्धि कब प्राप्त होती है? (When does spiritual practice lead to perfection?):
- साधना को सिद्धि का रूप तभी प्राप्त होता है,जब वह साधना सहज हो जाती है।कबीर कहते हैं-“मेरा चलना ही प्रभु की परिक्रमा है,मेरा कुछ भी करना सेवा ही है,मेरा सोना ही दंडवत है,जो कुछ बोलता हूं वही जप है,जो सुनता हूं वही स्मरण है और खुली आंखों से जो कुछ देखता हूं वही भगवान का सुंदर रूप है।” कबीरदास के इस पद से एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि हमें अपने व्यक्तिगत,पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी विमुख नहीं होना चाहिए तथा नित्य जीवन की समस्त क्रियाओं में उसी विराट विभु की लीला का,विराट विश्व की सेवा का रस प्राप्त करना चाहिए।
- जीवन की साधना का सबसे बड़ा संबल हमारा कर्मरत और समाजगत आचरण है।समाज से छिटककर विशेष परिवेश को धारण करने से हम अपनी कल्पना की मुक्ति भले प्राप्त कर लें,पर इससे हमारा तथा समाज का कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा।बारह वर्ष तक साधना करके कोई व्यक्ति पानी पर चलने का अभ्यास करके चमत्कारी कहला सकता है,पर उसकी सिद्धि का कुल मूल्य केवल चार पैसा है,क्योंकि चार पैसे खर्च करके नौका में बैठकर कोई भी नदी पार कर सकता है।हमारी बहुत सारी साधनाओं के मूल में यही कम महत्त्व की बातें हैं,जिनसे हमें मुक्त होना है,अपने को सहज साधक बनाना है।
आज आवश्यकता है उस साधना की जो हल मूठ पकड़े किसान,मशीन का पहिया घुमाते श्रमिक,प्रयोगशाला में प्रयोगरत वैज्ञानिक,व्यापारी-व्यवसायी एवं कलम घिसते कर्मचारी की परस्पर भिन्न परिस्थितियों में अध्यात्म की दीप-शिखा प्रज्वलित कर सके।आज साधना की ही नहीं,अध्यात्म की नई व्याख्या के साथ उपस्थित होना है। - अतः यह खूब अच्छी तरह समझ लेने की चीज है कि साधना और अध्यात्म का परंपरा प्राप्त रूप आधुनिक जीवन के संदर्भ में निरुपयोगी बन गया है।इनकी पुराणप्रथित परिभाषा में आज की पीढ़ी के लिए कोई आकर्षण नहीं है।आशंका यह है कि ‘साधना’ और ‘अध्यात्म’ घिसे-पिटे खोटे सिक्के की तरह कहीं अपना चलन ही न गँवा बैठें।
- जब कोई कृषक लू-धूप की परवाह किए बिना हल चलाता है,तब वह साधना ही तो करता है।जरूरत तो बस इतनी है कि उसके कर्म को आत्म केंद्रित न होने देकर लोकमंगल के पवित्र भाव से संपुष्ट किया जाए,ताकि उसका वही कर्म ‘स्व’ के साथ ‘पर’ के लिए होकर उसमें भावशुद्धि की भावना भर दें और उसको आध्यात्मिक दीप्ति प्रदान कर दे।पसीना चुचुआते शरीर से मशीन के साथ जूझते श्रमिक का कर्म किस साधना से कम है? उसे साधना का पवित्र पद देने के लिए उसके साथ लोकहित का भाव जोड़ दिया जाए तो वही उसके लिए धर्म बन जाएगा।व्यापारी के धृतिसाध्य कर्म को यदि अनुचित मुनाफा कमाने के दूषण से मुक्त कर दिया जाए तो वही ‘स्व’ में ‘पर’ की साधना का पुनीत कर्म बन जाएगा।तात्पर्य यह है कि साधना या धर्म कोई ऊपर से ओढ़ी जाने वाली,अपने और दूसरों को प्रवंचित करने वाली रामनामी चादर बने तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी।यही उसके लिए सच्ची साधना होगी।
- वैज्ञानिक तथ्य तकनीकी प्रगति को झुठलाया नहीं जा सकता।उनके द्वारा प्रदत्त सुविधाओं को भी त्यागा नहीं जा सकता और उसके कारण परिवर्तित जीवन मूल्यों को भी नकारा नहीं जा सकता।साथ ही उसके आनुवंशिकी दोषों से भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता,तो फिर जो अपरिहार्य है,उसके साथ अपनी शक्ति व्यर्थ गंवाने से क्या लाभ? साधना और आध्यात्मिक उन्नयन के हमारे प्रयासों का उपादान तो आज का दिशाहारा,अशांत,स्थापित जीवन मूल्यों के प्रति अनास्थावान मानव है।हम उसी को समेटे,सहेंगे।उसे साधना और तप की नई दीक्षा दें,तभी तो कुछ काम बने।बाकी तो थोथी सिद्धांत चर्चा ही होगी।
5.तपश्चर्या के बिना साधना प्राणहीन है (Is sadhana lifeless without penance?):
- तपश्चर्या का सामान्य अर्थ है-कष्ट-कठिनाइयों को सहन करना और उसका विशिष्ट अर्थ है-ऊर्जा का संरक्षण,परिष्कार व अर्जन।तपश्चर्या वह माध्यम है,जिसके द्वारा हम इन साधनाओं को सही अर्थों में करने योग्य बनते हैं।तपश्चर्या के द्वारा हम साधनाओं के माध्यम से उत्पन्न ऊर्जा को धारण करने योग्य बनते हैं।व्यक्ति की तपश्चर्या जितनी तीव्र होगी,उतनी ही तीव्रता से उसके आंतरिक मल-विकारों का शमन होगा और उतना ही वह ऊर्जाओं को धारण करने के योग्य बनता जाएगा।
- सामान्य मनुष्य में तम व रजोगुण की बहुलता होती है। तमोगुणी व्यक्ति तंत्र-साधना की शुरुआत करने योग्य होते हैं;क्योंकि यह कर्मकांडपरक है,इसमें स्थूल तत्वों का प्रयोग है और इसका परिणाम भी तुरंत व प्रत्यक्ष होता है।तंत्र साधना करने वाले व्यक्ति इस साधना से पर्याप्त शक्ति का अर्जन तो कर लेते हैं,लेकिन साधना के मार्ग में बहुत आगे नहीं बढ़ पाते।ये केवल अपनी तपश्चर्या को सिद्धियाँ प्राप्त करने में लगा देते हैं और वहीं अटक करके रह जाते हैं।सिद्धियां प्राप्त कर लेने व शक्ति अर्जन होने पर व्यक्ति के अंदर मद व अहंकार का प्रादुर्भाव होता है जो उसे पतन की ओर ले जाता है,बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो इस स्थिति के प्रति जागरूक होते हैं और सिद्धियों से प्रभावित न होकर योग-साधना की शुरुआत करते हैं।
- निश्चित रूप से तपश्चर्या ही वह माध्यम है,जो हमें वह आधार प्रदान करती है,जिसके द्वारा हम साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं और स्वाध्याय व भगवद् भक्ति के साथ तपश्चर्या करने से उस योग्य बन जाते हैं कि चेतना के शिखर को पा सकें।जीवन में तपश्चर्या ही शक्ति-अर्जन का साधन है,ऊर्जा को धारण करने की योग्यता तपश्चर्या के माध्यम से ही मिलती है।अर्थात् जितनी कठिन तपश्चर्या होती है हमारा शरीर व मन उतनी ही अधिक तीव्र ऊर्जा को धारण करने योग्य बन जाता है।तपश्चर्या द्वारा यह आध्यात्मिक पूंजी व्यक्ति के अंदर संचित होती है,जिसके माध्यम से सृष्टि में कुछ भी किया जा सकता है,लेकिन कार्य के स्तर के अनुरूप तपश्चर्या की पूंजी होनी चाहिए।इस पूंजी के माध्यम से मनोवांछित इच्छाओं को भी पूरा किया जा सकता है।
- व्यक्ति के जीवन में साधना का प्राण तपश्चर्या है।इसी के माध्यम से वह अपनी साधना में शनैः-शनैः ऊपर उठता है।तपश्चर्या का मतलब ही है-तप का आचरण करना। इसके माध्यम से जीवन में पुण्यों का संचय होता है,व्यक्तित्व का विकास होता है,लेकिन हमारे आंतरिक मल विकार जैसे क्रोध,लोभ,अहंकार तपश्चर्या की आग को धूमिल करते हैं और हमारे मार्ग को अवरुद्ध करते हैं।तपश्चर्या वह प्रकाश है,जो हमें साधना-पथ पर आगे बढ़ाने में सहायक होता है।इस तपश्चर्या की महिमा अनंत है।इसलिए ऋषियों ने कहा है कि तपश्चर्या में प्रमाद नहीं करो,तप करते रहो।
- जो साधक किसी तरह अपनी साधना में दीर्घकाल और निरंतरता को बनाए रखते हैं,उनमें भावभरी श्रद्धा एवं अडिग निष्ठा की कमी रह जाती है।बार-बार मन में संदेह एवं चित्त में व्यग्रता पनपती रहती है-पता नहीं यह साधना सही है भी या नहीं? पता नहीं साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं? पता नहीं मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं? इस तरह से डगमगाती श्रद्धा और चंचल निष्ठा,साधक और उसकी साधना को कहीं भी नहीं पहुंचने देती।वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है,पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
उपर्युक्त आर्टिकल में जीवन को साधना कैसे बनाएं के 6 मंत्र (6 Spells on How to Make Life Sadhana),जीवन को साधना कैसे बनायें? (How to Make Life Sadhana?) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:आत्म-निरीक्षण द्वारा दोषों को दूर कैसे करें?
6.साधना समझ में न आए (हास्य-व्यंग्य) (If You Do Not Understand Spiritual Practice) (Humour-Satire):
- टीचरःअगर किसी को साधना न समझ में आए तो उसको क्या कहेंगे?
- छात्र:उसको साधना,तप या साधना के प्रकार,अंग कुछ भी बता दो,साधना का ढंग कुछ भी बता दो,उसे कौनसा समझ में आएगा।
7.जीवन को साधना कैसे बनाएं के 6 मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 6 Spells on How to Make Life Sadhana),जीवन को साधना कैसे बनायें? (How to Make Life Sadhana?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.साधना के अभ्यास में प्राण व बल कैसे आए? (How to get life and strength in the practice of spiritual practice?):
उत्तर:तप की निरन्तरता,सरस्वती मंत्र पर गहन श्रद्धा एवं अविचल अडिग निष्ठा तथा बिना थके,बिना रुके,समर्पित भावनाओं के साथ साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।
प्रश्न:2.क्या विद्यार्थी एक साधक है? (Is the student a seeker?):
उत्तर:यदि वह विद्याध्ययन को पूजा,आराधना समझकर समर्पित भाव के साथ करता है।शुद्ध भाव और पूर्ण निष्ठा के साथ अध्ययन करता है।कष्ट-कठिनाइयों को सहज भाव से सहन करता है तो उसका अध्ययन ही साधना है और इस रूप में विद्यार्थी एक साधक है।
प्रश्न:3.श्रेष्ठ साधना कौन-सी है? (What is the best spiritual practice?):
उत्तर:जब विद्यार्थी तमोगुण को पार कर सत्वगुण में प्रतिष्ठित होने लगता है।इस साधना की शुरुआत के लिए विद्यार्थी के चित्त का परिष्कार होना आवश्यक है अन्यथा इस साधना को करना,अनुभव करना व ऊर्जा को धारण करना संभव नहीं हो सकेगा।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा जीवन को साधना कैसे बनाएं के 6 मंत्र (6 Spells on How to Make Life Sadhana),जीवन को साधना कैसे बनायें? (How to Make Life Sadhana?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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