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7 Best Spells of How to Be Teacher

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1.शिक्षक कैसा हो के 7 बेहतरीन मंत्र (7 Best Spells of How to Be Teacher),शिक्षक का चरित्र कैसा हो? (What Should Be Character of Teachers?):

  • शिक्षक कैसा हो के 7 बेहतरीन मंत्र (7 Best Spells of How to Be Teacher) में बताया गया है कि आधुनिक भारत के निर्माण में शिक्षक का योगदान उत्कृष्ट हो,इसके लिए शिक्षक का चरित्र और चिंतन कैसा होना चाहिए।आज भी समाज शिक्षक से आशा क्यों लगाए हुए हैं?
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2.शिक्षक पायनियर है (The teacher is a pioneer):

  • शिक्षक भवितव्यता की उज्ज्वल भव्यता का वास्तुकार होता है।वर्तमान समाज और सामाजिकता के ध्वंसावशेष को वही फिर से पुनर्स्थापित कर सकता है।ध्वंस के अंतिम क्षणों का तात्पर्य है-निर्माण का आरंभिक चरण,जिनमें भव्य एवं वैभव की कुशल कारीगरी शुरू होती है।शिक्षक ही शिल्पकार है,जो मानव निर्माण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है तथा इनके माध्यम से समाज एवं राष्ट्र की दशा एवं दिशा बदल देता है।वह भव्य भवन के निर्माण में नींव का पत्थर भी रखता है तथा चमचमाते कँगूरों को संवारने का कार्य भी संभालता है।
  • शिक्षा के इस वर्तमान समय में शिक्षकों की संख्या में कमी नहीं है,कमी है तो शिक्षकों के स्तर एवं गुणवत्ता में। यह बात कहने-लिखने एवं सुनने में अप्रिय भले लगे,परंतु सचाई यही है।अगर ऐसा नहीं तो फिर क्यों कोई विष्णुगुप्त पैदा नहीं होता,जिसने अखंड भारत के निर्माण के लिए एक दासी-पुत्र को चंद्रगुप्त के रूप में खड़ा कर दिया था।वही महाभारत के पश्चात विशाल भारत का संचालक बना।इस संदर्भ में पाल गुडमैन ने अपनी किताब ‘ग्रोइंग अप एब्सर्ड’ में उल्लेख किया है कि मनुष्य जाति ने जिन-जिन साधन-सुविधाओं की आकांक्षा की थी,वे सब पूरी हो।मनुष्य जाति ने जो-जो सपने देखे थे,वे भी लगभग पूरे हो चुके हैं।इतने पर भी आज जैसी दारुण एवं करुण स्थिति कभी नहीं रही।इसकी तीव्रता में कमी के स्थान पर दिन दूनी-रात चौगुनी बढ़ोतरी होती जा रही है।गुडमैन कहते हैं कि आधुनिक सुविधाओं के अम्बार में मनुष्यता के शिक्षक दब गए हैं।मनुष्य जाति के उद्धारक एवं चिंतक वर्ग मृतप्राय हो गए हैं।
  • यूरोपीयन रहस्यवादी ‘मेस्टर एकहार्ट’ के अनुसार शिक्षक वह व्यक्ति है,जिसने अपने जीवन में चरित्र,चिंतन एवं व्यवहार के बीच सामंजस्य एवं समरसता पैदा कर दी हो।विचारों को व्यावहारिक जीवन में उतारने के लिए बौद्धिक कुशलता एवं भावात्मक संप्रेषण शैली की जरूरत पड़ती है।बौद्धिकता एवं भावात्मकता,यह दोनों प्राचीनतम भाषाएं हैं,जिनको मनुष्य ने अपने विकास की प्रारंभिक अवस्था से ही अपनाया है।अतः आवश्यक है कि सीखने वाला इन दोनों क्रियाओं में पारंगत एवं प्रवीण हो।इसके साथ ही उसमें उसका अनुभव का रस घुला हुआ हो।इसी से एक व्यक्तित्ववान शिक्षक पैदा होता है,जो अपने परिकर और परिसर को ज्ञानमय वातावरण से आपूरित कर देता है।परंतु चौंकाने वाली बात है कि आज शिक्षकों का घोर अभाव तथा इसके नाम पर व्यवसाय करने वाले श्रमिकों की बहुलता है,जिनकी निष्ठा शिक्षण में कम अर्थोपार्जन में अधिक है।ये किसी अच्छे साधन-सुविधा वाले पद के लिए अपने गरिमामय पद को छोड़ सकते हैं।

3.शिक्षक समाज का आईना है (Teachers are the mirror of society):

  • हमारे प्राचीन आचार्यों के अनुसार शिक्षक कोई पद नहीं है,बल्कि यह विकसित व्यक्तित्व की विशेष अवस्था है।इन्हीं विशिष्ट और वरिष्ठ व्यक्तित्व संपन्न शिक्षकों ने मानव की अनगढ़-असंभव भीड़ एवं समुदाय को समाज का स्वरूप दिया।भीड़-झुंड समाज नहीं होता है।समाज एक विशिष्ट व्यवस्थाक्रम का नाम है,इसका अपना स्वरूप है,जिसके साथ शिक्षक के अंतर्संबंध गहनता से जुड़े हैं।इसे शारीरिक कोशों (सेल्स) के द्वारा जाना जा सकता है।व्यक्ति की देह का निर्माण इन कोशिकाओं के माध्यम से होता है।व्यक्ति के समान ये सभी कोशिका अपने में स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं।इतने पर भी इन कोशिकाओं के संजाल को शरीर नहीं कहा जा सकता है।कोशिकाएं ऊतक बनती हैं,उत्तक से तंत्र बनता है और तन्त्रों से अंगों का निर्माण होता है तथा सभी अंग-उपांग मिलकर शरीर बनाते हैं।ठीक इसी प्रकार व्यक्ति को भी समता की कई प्रक्रियाओं से गुजारकर समाज की संरचना बनाई गई है।समता से प्रादुर्भाव होने के कारण इसे समाज कहा गया है।
  • समाज एवं एकता रूपी इस समाज को बुनने एवं गढ़ने का श्रेय समाज के प्रकाश स्तम्भ शिक्षक को जाता है।उसने ‘सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ के प्रबलतम पुरुषार्थ के द्वारा ही इस कार्य को संपन्न किया है।शिक्षक ने ‘समानों मंत्र: समिति: समानी’ सूत्र को अपनाकर एक झुंडरूपी समुदाय को तराशकर सभ्य समाज का निर्माण किया।अन्यथा आज भी मानव पाषाणयुगीन जीव-जंतुओं के समान अविकसित रूप में विचरण करता रहता,कभी भी सभ्यता की चरमोत्कर्ष सीमा को स्पर्श नहीं कर पाता।
  • शिक्षक सदैव समाज का हितचिंतन करता रहता है। चिंतन की गहराई से उपजे उसके विचार समाज की समस्याओं का समाधान खोजते हैं तथा पाते हैं।वह विचार को क्रियारूप में परिणत करना जानता है तथा समाज के सभी वर्गों को इसकी कला सिखाता है।वह सिखाता है कि कैसे सिद्धांत जीवन में व्यवहार किए जाते हैं,कैसे नीति-नियमों को अपनाकर व्यवस्था का रूप दिया जाता है,कैसे संयम,सहयोग एवं सहकारिता को स्वीकार कर एक नूतन औचित्यपूर्ण परंपरा का विकास किया जाता है? वह समझता है कि हम कैसे एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनें।दूसरों के दुःख में दुःखी तथा सुख में प्रसन्न होने की कला में पारंगत करना वह सबको सिखाता है।
  • शिक्षक को समाज का आर्किटेक्ट,इंजीनियर,वैज्ञानिक,सेवक आदि समझा जा सकता है।शिक्षक विचारक भी होता है और विचार न कर सके तो उसे समझने वाला अवश्य होता है।शिक्षक की सर्वोपरि विशेषता है कि वह समाज में लोकसेवी गढ़ सके,जो समाज को सर्वांगीण एवं समुचित रूप से समृद्धि एवं समुन्नत कर सके।शिक्षक ऐसे समाज की परिकल्पना करता है,जहां पर जीवन के सभी आयाम विकसित हो सकें,कोई भी न छूटें।वह समाज को मानव निर्माण की टकसाल बनाने की दिव्य कल्पना करता है। ऐसे सभ्य समाज उसके उच्च एवं उदात्त विचारों की ही देन हैं,जहां पर सभी वर्ग के लोग अपने-अपने सामर्थ्य के अनुरूप बढ़ सकें और उनको बढ़ने के लिए समुचित व्यवस्था दी जा सके।
  • आज जो समस्याओं की हुँकार,मानवता की चीत्कार सुनाई पड़ रही है,उसके पीछे इस व्यवस्था का टूटना एवं बिखरना है।जब हर व्यक्ति अपने ही स्वार्थ-लिप्सा एवं मदांध-अंधकार में चूर हो,तब सबके कदम ‘संघं शरणम गच्छामि’ का अनुपालन करें तो कैसे? ऐसी दशा में घर के आंगन,देश के प्रांगण और वसुधव्यापी प्रसार में विभाजन की रेखाएं,बंटवारे की दीवारें न खिंचेगी तो और क्या करेंगी?

4.विचारक और शिक्षक का दायित्व (Responsibility of the Thinker and Teacher):

  • इस संदर्भ में सिस्टर निवेदिता की कृति ‘दि बेस ऑफ इंडियन लाइफ’ स्पष्ट करती है कि निर्माण के प्राथमिक दौर में विचारक,शिक्षक,लोकसेवी,यहां तक कि व्यवस्थापक-प्रशासक सभी एक समान दायित्व एवं कार्य को संभालते थे।ए० जोली ने अपने शोध निबंध ‘ओरिजिन ऑफ सोसाइटी’ में इसी तथ्य का समर्थन किया है।मिसोपोटामिया,सुमेर,मिस्र आदि प्राक् ऐतिहासिक समाजों का उद्धरण देते हुए उनका मानना है कि मनुष्य के आविर्भाव के साथ ही शिक्षक का उदय हुआ।शिक्षक अपने समूह का सर्वोपरि था,प्रकाश स्तंभ था।समाज की संरचना के तार उसी की कुशलता से बुने गए।विस्तार एवं फैलाव के साथ इन तार एवं तंतुओं में गांठे एवं उलझने बढ़ी।इससे निपटने के लिए दो विभाग हुए।एक ने विचार और शिक्षण को संभाला तथा दूसरे ने व्यवस्था और लोकसेवा का उत्तरदायित्व लिया।
  • समाज का स्वरूप नित नूतन रूप में विकसित होता गया।विस्तार की इस व्यापकता एवं जटिलता में कहीं कोई ऐसी समस्या खड़ी ना हो जाए कि सारे जहां को प्रभावित कर दे,इसलिए कार्यों में विभाजन की परंपरा चल पड़ी।इस कारण विचारक और शिक्षक अलग-अलग हुए।विचारक शोध-अन्वेषण में जुटे,शिक्षक शिक्षण में जुटे,मूलतः लोक शिक्षण में। विचारक व्यास द्वारा सूत,शौनक,जैमिनी जैसे अनेक लोक-शिक्षकों का निर्माण,वैशम्पायन द्वारा याज्ञवल्क्य की गलाई-ढलाई आदि की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।सनतकुमार ने नारद को खड़ा किया।सभी लोकसेवा के क्षेत्र में उतरे जहां अगणित लोकसेवी उपजे-पनपे। प्रशिक्षित लोक-शिक्षकों द्वारा गढ़े गए लोकसेवियों ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का दायित्व संभाला।इस प्रकार समाज तंत्र मजबूत या सुदृढ़ हुआ।
  • लोक-शिक्षक का दायित्व अत्यंत दुरूह था।सरल,सुबोध एवं सुगम भाषा में जनता को समझाने का कार्य,जो उन पर आ पड़ा था।इसी क्रम में कथाशैली,प्रवचन,ब्राह्मण एवं साधु परंपरा का आविर्भाव हुआ।इसका स्वरूप उपनिषदों एवं पुराणों में मिलता है।बौद्धों में जहां एक और जातक कथाएं हैं,वहीं दूसरी ओर शून्यवाद की जटिल मीमांसा भी है।जैन कथाएं और स्याद्वाद की परिकल्पना इसी की देन है।इसके पश्चात ईशा के वचनामृत में दार्शनिकता कम हुई।
  • रक्तवाही नलिकाओं की तरह फैलाई गई सांस्कृतिक ऊर्जा के संवहन तंत्र में शिक्षक ने ही हृदय की भूमिका निभाई।विचारकों ने भले बौद्धिक भार उठाया हो,मस्तिष्क का दायित्व लिया,परंतु लोक जीवन की आपदा-विपदा की धड़कनें उसी का जीवन रहा है।कहीं कोई जीवन-अंग प्राण-संचार के अभाव में सूख तो नहीं रहा,लोक सेवा रूपी श्वेत-रक्तकण श्याम तो नहीं हो रहे,इसकी पूरी साज-संभाल शिक्षक के कंधों पर आ पड़ती रही है।

5.प्रतिभाशाली शिक्षकों ने संस्कृति को बचाया (Talented teachers saved the culture):

  • संस्कृतियों के उदय एवं सभ्यताओं के विकास की भूमि में जो भी तत्व अंकुरित-पल्लवित हुए सभी को प्राण शिक्षक से ही प्राप्त हुआ है।अरब सभ्यता के विकास में अलबेरूनी की कुशलता थी।यूनान के उत्कर्ष की गाथा सुकरात,प्लेटो,जेनो,एपीक्यूरस के बिना अधूरी है।अरस्तू ने सिकंदर को खड़ा किया।उसने सिकंदर को पढ़ाया था कि तुम भारत से एक शिक्षक लाना।रोम की जिस महान् सभ्यता का गुणगान किया जाता है,इसके मूल में सिसरो के श्वेत रक्तकण बहे हैं,अकेला सीजर क्या कर सकता था।इटली की सभ्यता की कहानी दांते से पूरी होती है।ईसाइयत को उत्तुंग शिखर पर प्रतिष्ठित करने में आंगस्टिन,एंथोनी,एकहार्ट की पीढ़ियाँ रहीं।
  • भारत के लोक-शिक्षण तंत्र में महाभारत से विकृति एवं विकार का दौर प्रारंभ हुआ।चाणक्य,बुद्ध,शंकर,रामानुज इस तंतुजाल का नवीनीकरण करने में प्राणपण से जुटे रहे।इन प्रयासों के बावजूद लोक-शिक्षक की व्यापक सेना तो नहीं तैयार हो पाई,किंतु पुरुषार्थ-प्रयास से इस दिव्य परंपरा को जीवित अवश्य रखा।इसी वजह से जिस ऋषि संस्कृति की विरासत का गान हम करते हैं,उसकी सांसे रुकी नहीं,चल रही हैं।इसी थमी सांस को तीव्र करने,मृतप्राय प्रवाह को प्रचंड धारा में बदल देने हेतु प्रतिभाओं की मांग है,जो पुनः समाज,सामाजिकता एवं जीवन मूल्यों की नवीन वसुधव्यापी सेतुबद्धता का निर्माण कर सके।इस महान कार्य में हम सबका योगदान होना चाहिए।

6.शिक्षकों पर महान उत्तरदायित्व (Great responsibility on teachers):

  • हमारे धर्मशास्त्रों में माता-पिता आचार्य तीनों को बालक के जीवन निर्माण में महत्त्वपूर्ण माना है।मां-बाप उसका पालन-पोषण करते हैं,संवर्द्धन करते हैं तो आचार्य उसके बौद्धिक,आत्मिक,चारित्रिक गुणों का विकास करता है,उसे जीवन और संसार की शिक्षा देता है।उसकी चेतना को जागरूक बनाता है।इसीलिए हमारे यहाँ आचार्य गुरु को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है,उसे पूजनीय माना गया है।आचार्य के शिक्षण,उसके जीवन व्यवहार,चरित्र से ही बालक जीवन जीने का ढंग सीखता है,आचार्य की महती प्रतिष्ठा हमारे यहां इसीलिए हुई।
  • पुरानी आचार्य परंपरा परिस्थितिवश समय के परिवर्तन के कारण समाप्त हो गई है फिर भी आज का शिक्षक अध्यापक बहुत कुछ अंश में उसका ही आधुनिक रूपांतरण है।समय के साथ शिक्षा-पद्धति,पाठ्यक्रम आदि में परावर्तन हो सकता है,लेकिन गुरु और शिष्य का संबंध सदैव रहता है और रहेगा।
  • आज हमारे यहां शिक्षक हैं,अध्यापक हैं,वे छात्रों को निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षण भी देते हैं किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण बात जीवन निर्माण का व्यावहारिक शिक्षण आज नहीं हो पाता।आज गुरु-शिष्य,शिक्षक और छात्र का संबंध पहले जैसा नहीं रहा।केवल कुछ अक्षरीय ज्ञान दे देने,एक निश्चित समय तक कक्षा में उपस्थित रहकर कुछ पढ़ा देने के बाद शिक्षक का कार्य समाप्त हो जाता है तथा पाठ पढ़ने के बाद विद्यार्थी का।
  • अध्यापक और विद्यार्थी के बीच जो स्नेह,भाव,आत्मीयता,सौहार्द्र,समीपता की आवश्यकता है,वह आज नहीं है और यही कारण है कि आज का विद्यार्थी डिग्री,डिप्लोमा ले लेता है लेकिन व्यावहारिक जीवन का शिक्षण,चरित्र ज्ञान,उत्कृष्ट व्यक्तित्व का उसमें अभाव रहता है।इन सबके बिना विद्या अधूरी है।जो जीवन को प्रकाशित न करे,पुष्ट न बनाए वह विद्या किस काम की?
    चरित्र निर्माण की व्यावहारिकता की शिक्षा पुस्तकों से नहीं मिल सकती।वह भी व्यक्ति की समीपता से,उसके चरित्र,आचरण को देखने,समझने से प्राप्त होती है,जो आज की शिक्षा पद्धति में नहीं के बराबर है।निःसंदेह हमारी प्राचीन शिक्षा-पद्धति में इसका बहुत ध्यान रखा गया था।आचार्य और विद्यार्थी का सहजीवन आश्रमों में बीतता था।उस समय विद्यार्थी पाठ ही नहीं सीखता था अपितु आचार्य के जीवन से चरित्र,व्यवहार को सीख लेता था।
  • इसी शिक्षा के संबंध में एक महान् सत्य हमने सीखा था। हमने यह जाना था कि मनुष्य से ही मनुष्य सीख सकता है।जिस तरह जल से जलाशय भरता है,दीप से ही दीप जलता है,उसी प्रकार प्राण से प्राण सचेत होता है।चरित्र को देखकर ही चरित्र बनता है।गुरु के संपर्क-सानिध्य,उनके जीवन से प्रेरणा लेकर ही मनुष्य-मनुष्य बनता है।आज का शिक्षक महोदय प्राण नहीं दे सकता,चरित्र नहीं देता,वह पाठ दे सकता है।इसीलिए आज का छात्र किसी दफ्तर,अदालत का एक बाबू बन सकता है लेकिन मनुष्य नहीं बन पाता।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में शिक्षक कैसा हो के 7 बेहतरीन मंत्र (7 Best Spells of How to Be Teacher),शिक्षक का चरित्र कैसा हो? (What Should Be Character of Teachers?) के बारे में बताया गया है।

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7.टीचर का वजन कम (हास्य-व्यंग्य) (Teacher’s weight loss) (Humour-Satire):

  • टीचर (अन्य टीचर से):यार,आज मेरा वजन कम हो गया है।
  • मित्र टीचर:जरूर तुमने स्नान किया है।तेरे शरीर में बदबू आती है,छात्र-छात्राएँ तुमसे कैसे पढ़ते होंगे,तुमसे क्या सीखेंगे? इस शरीर को पाल-पोसकर,मोटा-तगड़ा करके क्या करोगे,जब तुम्हारा चरित्र ही खोटा होगा तो शरीर से क्या हासिल कर लोगे?

8.शिक्षक कैसा हो के 7 बेहतरीन मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 7 Best Spells of How to Be Teacher),शिक्षक का चरित्र कैसा हो? (What Should Be Character of Teachers?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.शिक्षक व विद्यार्थी के बीच कैसा संबंध है? (What is the relationship between the teacher and the student?):

उत्तर:आज शिक्षक व विद्यार्थी के बीच बहुत बड़ी खाई पैदा हो गई है-संबंधों की।यद्यपि इसका कारण आज की सामाजिक,राजनीतिक परिस्थितियाँ भी हैं लेकिन जो शिक्षक है,अध्यापक है,व्यक्तिगत तौर पर इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

प्रश्न:2.शिक्षक की परीक्षा कैसे होती है? (How is the teacher’s exam done?):

उत्तर:विद्यार्थी अध्यापक की शिक्षा प्रतिदिन,प्रति घंटे,प्रतिक्षण ही लेते रहते हैं।वे कक्षा में अध्यापक को देखते हैं,पढ़ाते देखते हैं,सद्व्यवहार और दुर्व्यवहार करते देखते हैं और फिर कक्षा के बाहर दूसरों के साथ मिलते-जुलते भी देखते हैं।वे जैसा अध्यापक को देखते हैं वैसा ही स्वयं भी सीखते हैं,करते हैं।

प्रश्न:3.छात्र-छात्राओं में अनुशासनहीनता के जिम्मेदार कौन हैं? (Who is responsible for indiscipline among students?):

उत्तर:छात्र-छात्राओं में बढ़ती हुई अनुशासनहीनता,उच्छृंखलता,चारित्रिक त्रुटियों के लिए कुछ सीमा तक शिक्षकों को भी उत्तरदायी मानना ठीक ही होगा।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा शिक्षक कैसा हो के 7 बेहतरीन मंत्र (7 Best Spells of How to Be Teacher),शिक्षक का चरित्र कैसा हो? (What Should Be Character of Teachers?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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