Menu

Character is a System of Education: Why is Character Building Basis of True Education?

Contents hide

1.चरित्र निर्माण शिक्षा पद्धति हो: चरित्र निर्माण ही सच्ची शिक्षा का आधार क्यों है? (Character is a System of Education: Why is Character Building Basis of True Education?):

  • चरित्र निर्माण शिक्षा पद्धति हो (Character is a System of Education) में जानिए कि क्यों शिक्षा पद्धति का आधार चरित्र निर्माण हो? सच्ची शिक्षा का आधार क्या है? चरित्र निर्माण कैसे किया जा सकता है? आदि।

Also Available in Hindi:7 Top Tips of How to Build Character

2.शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य (The true purpose of education):

  • शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मानव की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना है।ज्ञान मानव में स्वभाव सिद्ध है,कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता,सब अंदर है। सामान्य भाषा में हम जो कहते हैं कि मनुष्य जानता है,यथार्थ में मनस् शास्त्र की भाषा में कहा जाना चाहिए कि वह आविष्कार करता है,अनावृत्त या प्रकट करता है।इस ज्ञान के प्रकटीकरण में जो उद्यत हो,वही शिक्षार्थी है।यथार्थ मायने में जो इस प्रक्रिया में सहायक है,उसे ही शिक्षक कहा गया है।
    प्राचीन भारत की वैदिक शिक्षा प्रणाली का अध्ययन करने से इन्हीं विचारों की पुष्टि होती है।समय के उलट फेर एवं विदेशी प्रभाव के कारण सब कुछ उल्टा हो गया है।आज शिक्षा स्वाभाविक विकासक्रम न रहकर विविध जानकारियों के ढेर-के-ढेर समेटने के रूप में हो गई है। इन जानकारियों को मार पीटकर,डरा-धमकाकर जबरन मस्तिष्क में ठूँस देने को सार्थकता माना जा रहा है।
  • यदि इस सार्थकता के औचित्य पर विचार किया जाए तो उसकी त्रुटियाँ सामने आ जाती हैं।वस्तुतः कूड़े के ढेर को दिमाग में इकट्ठा कर लेना किसी तरह भी सार्थक नहीं माना जा सकता है।विवेकयुक्त बुद्धि का आश्रय लेकर जीवन-निर्माण,चरित्र-निर्माण तथा मनुष्य निर्माण में सहायक विचारों को अनुभूत करने की आवश्यकता है।
  • आज विद्यालयों के वातावरण को देखने से शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों की मनःस्थितियाँ प्रकट हो जाती हैं।इन दोनों के रहन-सहन,बातचीत इस बात को स्पष्ट कर देते हैं कि कोई भी शिक्षा की गरिमा के अनुकूल नहीं।
  • इस घटिया स्थिति के पैदा होने,उद्देश्यविमुख होने का कारण क्या है? इन कारणों को खोजकर इनका निवारण किस प्रकार किया जाए? उल्टी स्थिति को उलटकर कैसे सीधा किया जाए? इन प्रश्नों पर चिंतन करने से यही स्पष्ट होता है कि धर्म और नैतिकता का अभाव ही इस स्थिति का कारण है।इनके उपयुक्त समावेश से स्थिति फिर सुधर सकती है।
  • आज शिक्षाशास्त्र के अनेकानेक पंडित इसी बात पर जोर दे रहे हैं।1982 में नियुक्त हुए हंटर आयोग से लेकर कोठारी आयोग (1964) तक नियुक्त किए जाने वाले सभी आयोगों और समितियों ने शिक्षा संस्थानों में आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान किए जाने का समर्थन किया है।हाल में गठित हुए शिक्षा आयोग रिपोर्ट में पृष्ठ 206 पर उल्लेखित किया गया है कि सामाजिक,नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा के लिए सचेत और संगठित प्रयास किए जाने चाहिए।

3.नीति और धर्म का साम्प्रदायिरता से सम्बन्ध (The relationship of ethics and righteousness (Dharma) with sectarianism):

  • नीति और धर्म का किसी भी सांप्रदायिकता से कोई संबंध नहीं।ये तो मानव के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने वाले तत्त्व हैं,जिनका समावेश पूर्वकाल से रहा है और आज भी अपेक्षित है।ऐतिहासिक कालक्रम की दृष्टि से विचार करने पर यह सुस्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में आश्रमों,मध्य भारत में मुस्लिम मकतबों,मदरसों एवं हिंदुओं की पाठशालाओं में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग थी।अँगरेजों ने भारतीय शिक्षा नीति को धार्मिक और नैतिक शिक्षा से बिलकुल पृथक कर दिया।इसका एकमात्र कारण भारत निवासियों को शारीरिक नहीं,अपितु मानसिक रूप से पूर्णरूपेण अपना गुलाम बनाना था।उन्होंने राज्य द्वारा संचालित विद्यालयों में इस शिक्षा का पूर्ण निषेध करके नीति और धर्म की अवहेलना का अनुसरण किया। स्वतंत्र भारत में मानसिक गुलामी से जकड़े लोगों ने भी उसी नीति को अपनाया।
  • यदि इस मानसिक गुलामी के लबादे को झटक दिया जाए तो शिक्षा में धर्म और नैतिकता की अनिवार्यता सिद्ध हो जाती है।जिस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य मानव की समग्र उन्नति करना है,जो उसको सत्यं शिवं सुंदरम् के अधिक-से-अधिक निकट लाने का प्रयास करती है,वह इस कार्य में किसी भी प्रकार नीति और धर्म की अवहेलना नहीं कर सकती।
  • नीति-धर्म और शिक्षा अपने स्वाभाविक स्वरूप में एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं।इनमें से किसी एक को विलग कर देने से उनका स्वरूप स्वाभाविक न रहकर विकृत हो जाता है।सी. ए. बारवेल ने ‘दि न्यू डिक्शनरी ऑफ थॉट्स’ के पेज 405 पर स्पष्ट किया है,”कुछ लोग नैतिकता को धर्म से अलग करना चाहते हैं,पर धर्म के आधार के बिना नैतिकता का अंत हो जाएगा।” इनके आंतरिक संबंधों को स्पष्ट करते हुए प्रो. ए. एन. ह्वाइटहेड ने लिखा है, “शिक्षा का सारतत्त्व यह है कि वह धार्मिक होती है।जिस प्रकार शिक्षा को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता,उसी प्रकार शिक्षा को नैतिकता से भी पृथक करना असंभव है।” हरबर्ट का कथन है, “समग्र रूप में नैतिक शिक्षा,शिक्षा से पृथक नहीं है।”
  • निस्संदेह शिक्षा,धर्म व नैतिकता एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं।इन दोनों के अभाव में शिक्षा में विकृति आना स्वाभाविक है।आज छात्रों में व्याप रही चरित्रहीनता,अनुशासनहीनता मर्यादाओं के अभाव का एकमात्र कारण है कि अँगरेजियत की नकल करके इनको बहिष्कृत कर दिया गया है।धर्म में सांप्रदायिक कट्टरता जैसी कोई बात नहीं है।इसका तत्त्वदर्शन सबके लिए सर्वकाल में समान रूप से उपादेय है।
    विश्वविद्यालयों में व्याप्त उच्छृंखलता को दूर करने के संबंध में एक आयोग का गठन हुआ था।उसने अपने प्रतिवेदन में बताया,”यदि हम अपनी शिक्षण संस्थाओं में से आध्यात्मिक प्रशिक्षण को निकाल देंगे तो हम अपने संपूर्ण ऐतिहासिक विकास के विरुद्ध कार्य करेंगे।”

4.शिक्षार्थी-शिक्षक दोनों की भूमिका (The roles of both the learner and the teacher):

  • धर्म को हेय,रूढ़िवादी ठहराना तथा धर्म-निरपेक्षिता की आड़ में इसका तिरस्कार करना,किसी भी तरह उपयुक्त नहीं।महात्मा गाँधी ने इस धर्म निपरेक्षता को किंकर्तव्यविमूढ़ता से उबारते हुए कहा था,”मेरे लिए नैतिकता,सदाचार और धर्म पर्यायवाची शब्द हैं। नैतिकता के आधारभूत सिद्धांत सभी धर्मों में समान हैं। इन्हें बालकों को निश्चित रूप से पढ़ाया जाना चाहिए।”
  • जैसे-जैसे मानसिक गुलामी कम होती जा रही है,वैसे-वैसे बुद्धिजीवियों,देश के कर्णधारों को इसका महत्त्व भी समझ में आता जा रहा है।स्वतंत्रता के पश्चात डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित शिक्षा आयोग ने धर्म और नैतिकता को शिक्षा के अभिन्न अंग बनाने पर बल दिया।इसी प्रकार श्री प्रकाश की अध्यक्षता में गठित धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा समिति ने जनवरी 1970 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया,”प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक इसका सुरुचिपूर्ण ढंग से समावेश किया जाना चाहिए।”
  • विभिन्न शिक्षा विशारदों,शिक्षा आयोगों के विचारों तथा प्रतिवेदनों के अनुसार इसका महत्त्व सुस्पष्ट हो जाता है,पर मात्र कागजी स्तर पर होने वाले कार्य इस समस्या का समाधान कर सकें,यह असंभव है।शिक्षक राष्ट्र-मंदिर के कुशल शिल्पी हैं।शिक्षार्थी अनगढ़ मिट्टी के समान हैं। विद्यालय इनको मजबूत ईंटों में ढालने वाली टकसाल के समान है।शिक्षा वह विधा है,जिससे इनको ढाला तथा राष्ट्रमंदिर को गढ़ा जाता है।
    धर्म और नैतिकता ही वह आग है,जिससे इन कच्ची ईंटों को मजबूती व सौंदर्य प्राप्त हो सकता है अन्यथा इसके अभाव में तो गढ़ाई की सुंदरता के बाद भी कच्चापन रह जाएगा।शिक्षा एवं विद्या का सार्थक समन्वय इसीलिए जरूरी है।
  • इस शिल्पकला के लिए शिक्षार्थी-शिक्षक दोनों को ही अपनी भूमिका समझनी होगी,मनः स्थिति को सुयोग्य बनाकर इस निर्माण कार्य में जुट जाना होगा।इसमें जुट पड़ने से ही राष्ट्र निर्माण,जीवन-निर्माण तथा चरित्र निर्माण के महान कार्य संभव बन पड़ेंगे।इसको कुशलतापूर्वक निभाने में इनमें से किसी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए।ऐसा कर पाने से ही फिर उपनिषद् काल के विद्यार्थी की तरह ‘दृढ़‌निष्ठो बलिष्ठो,यशस्वी भव’ की स्थिति निश्चित रूप से आ सकेगी।

Also Available in English:Character education

5.शिक्षा ऐसी हो,जो काम आए (Education should be practical and useful):

  • सरकारी शिक्षण पद्धति जैसी भी कुछ चल रही है,उसमें समयानुरूप परिवर्तन की बात उन राजनेताओं पर छोड़ देना चाहिए,जो उस तन्त्र को चलाते और पाठ्य-पुस्तकों का निर्धारण करते हैं।सर्वसाधारण के लिए उस परिवर्तन का आन्दोलन खड़ा करने की अपेक्षा-वह अच्छा है कि जिस प्रकार की उपयुक्तता आवश्यकता समझी जाती है,उसे स्वयं कार्यान्वित करने के लिए यथासम्भव कदम उठाएँ।
  • गाँधीजी के सर्वोदय कार्यक्रम इसी आधार पर बने और चले थे।ऐलोपैथी के विरोध में उन्होंने उरुली कांचन का प्राकृतिक चिकित्सा आश्रम बनाया था और मिलों से झगड़ने की अपेक्षा चर्खा आन्दोलन को गति दी थी। रचनात्मक कार्यक्रम खड़े करने की अपनी विशेषता है। उसके पीछे कुछ कर गुजरने वाले कर्मठों की क्षमता निखरती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।जबकि नुक्ता-चीनी करते रहने और दोष निकालते रहने वालों को झंझट खड़े करने के अतिरिक्त कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण जैसा हाथ नहीं लगता।
  • वर्तमान शिक्षा के बारे में यह तथ्य सर्वविदित है कि अंग्रेजी शासन के दिनों,अंग्रेजी भाषी बाबू लोग तैयार करने की दृष्टि से इसका ढाँचा बनाया और प्रचलन किया गया।उन दिनों अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में यह प्रणाली उपयुक्त सिद्ध हुई।तब से लेकर अब तक यह ढर्रा चला आ रहा है।अपने लोगों में से कितने है।शिक्षाविद इसी विभाग का संचालन करते रहे,पर उन्होंने बदली हुई परिस्थतियों को समझने और त‌नुकूल परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं समझी।इसे दुर्भाग्य,ही कहना चाहिए कि हमारे बच्चे उस भारी और खर्चीले छकड़े को यथावत खींचते चले जाते हैं और निरर्थकता सामने आती है,तो सिर धुनकर पछताते हैं।
    अब हर साल स्कूल-कॉलेजों से इतने विद्यार्थी निकलते हैं कि उन सबकी इच्छा के अनुरूप नौकरी मिलना सर्वथा असम्भव हो गया है।पारिवारिक परम्परा के कृषि,शिल्प,व्यवसाय उन्हें सुहाते नहीं हैं।श्रम भी अधिक पड़ता है और जिस साहबी ठाठ-बाट की हवा पढ़ाई के दिनों लगी,उसकी पूर्ति का भी कोई तुक नहीं बैठता। उनके अनुरूप काम नहीं मिलता।काम के अनुरूप वे फिट नहीं बैठते।ऐसी दशा में बेकारी के असमंजस भरे दिन उन्हें गुजारने पड़ते हैं।इन विपन्न दिनों में वे अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाने से लेकर जो कुछ भला-बुरा सूझता है,कर गुजरते हैं।
  • कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने में प्रायः 14 वर्ष लगते हैं। खाने,पहनने,जेब खर्च,पुस्तकें,फीस आदि को मिलाकर औसत 200 रुपए मासिक खर्च जोड़ा जाये तो ढाई हजार प्रति वर्ष के हिसाब से 35 हजार बैठते हैं।खर्च होने वाली राशि का ब्याज जोड़ा जाय तो वह सत्तर होती है।उसे डिपोजिट में जमा कर दिया जाता,तो प्रायः 800 रुपया मासिक ब्याज सौ पीढ़ी तक मिलती रहती और जब चाहा जाता,वह धन लौटाया जा सकता था।इतने लम्बे समय सिरखाऊ श्रम और वजनदार धन लगाने के उपरान्त भी बेकारी,कुढ़न और पश्चाताप ही हाथ लगे,तो समझना चाहिए कि कहीं कोई बड़ी भूल हो गई।कुछ नहीं तो इसके बदले जीवनोपयोगी ज्ञान और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व तो हाथ लगना ही चाहिए।इस दृष्टि से भी उपलब्ध शिक्षा आवारा जैसी प्रतीत होती है।
  • जीवनोपयोगी ज्ञान में स्वास्थ्य-संरक्षण,मानसिक सन्तुलन,व्यवहार-कौशल,पारिवारिक स‌द्भाव जैसी गुण,कर्म,आलस्य,प्रमाद,उच्छृंखलता,अहंता जैसे दुर्गुणों का तो समापन होना ही चाहिए।व्यक्ति और समाज के समक्ष उपस्थित अनेकानेक समस्याओं का स्वरूप,कारण और निवारण से तो अवगत होना ही चाहिए।जिन्हें इन विषयों की आवश्यक जानकारी न हो,उसे अनपढ़ों में ही समझना चाहिए,भले ही उसने किसी भी कक्षा तक पढ़ लिया हो।
    अच्छा हो कि विचारशील लोग आलोचना करते रहने की अपेक्षा ऐसा शिक्षातन्त्र खड़ा करें,जो बिना सरकारी सहायता के भी चल सके।जिसमें उपलब्धियाँ प्राप्त करना आवश्यक न हो,उसे चलाने के लिए रिटायर्ड लोग भी काम दे सकते हैं।मिस्त्री,कारीगरों से भी काम चलाया जा सकता है।इसमें आधा समय जीवन में काम आने वाले विषयों का पुस्तकीय ज्ञान और आधे में आजीविका उपार्जन के लिए अभ्यास-श्रम कराया जाय।किसी को इतिहास,भूगोल जैसे विषयों में विशेष रुचि हो,तो वह उसकी पूर्ति विद्यालय में रहने वाली चुनी हुई पुस्तकों के माध्यम से करता रह सकता है।
  • परीक्षा साप्ताहिक या मासिक रूप से होती रहे,जिससे प्रगति का अनुमान लगता रहे।वार्षिक परीक्षा पद्धति ही दोषपूर्ण है।साल भर मटरगश्ती करने वाले लड़के अनैतिक तिकड़में भिड़ाकर पास होने की कोशिश करते हैं।कुन्जियों,गैस पेपरों से भी बहुत कुछ काम चल जाता है।इस प्रकार उत्तीर्ण होने वाले लड़के भी योग्यता की दृष्टि से अयोग्य ही पाए जाते हैं।स्कूल-कॉलेजों का वातावरण जैसा उच्छृंखल और खर्चीला है,वह भी किसी से छिपा नहीं है।समानान्तर शिक्षातन्त्र खड़े करने वालों के विद्यालयों और छात्रावासों का वातावरण ऐसा हो,जिसमें नियमितता,अनुशासन,सुव्यवस्था,परिश्रम,खेलकूद आदि का समावेश रहे।फीस देकर और महँगा रहन-सहन वहन करने पर जितना खर्च आता है,उतना ही मासिक व्यय वहन करने भर से समानान्तर शिक्षा का काम चल सकता है।इसके लिए अच्छा हो कि धर्मशाला वाले इन विद्यालयों के लिए अपने भवन दे दें।मुफ्त में समर्थों को भी खाना खिलाने या ठहराने से मुफ्तखोरी की बुराई ही बढ़ती है।किराये से या बिना किराये से लेने की बात सोचनी चाहिए।इनके लिए उपरोक्त विषयों की कामचलाऊ पुस्तकों के उपयोगी अध्याय पाठ्यक्रम में रखे जा सकते हैं या अपनी निज की पाठ्य-पद्धति रखी जा सकती है,जैसा कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन या प्रयाग महिला विद्यापीठ ने अपना रखी थी।इसके लिए विद्यार्थी प्राप्त करने के लिए घर-घर जाना होगा और समझाना होगा कि वर्तमान परिस्थितियों में बच्चों को सरकारी नौकरियों की दृष्टि से पढ़ाना सर्वथा अदूरदर्शिता है।अगले दिन शिल्प,उद्योग और व्यवसाय के हैं,उसी दिशा में सोचने और गुजारा चलाने की बात सोचनी चाहिए।सबसे बड़ी बात है,बच्चों को व्यवहारकुशल एवं प्रतिभावान व्यक्तित्व विनिर्मित करने की।इसके लिए समानान्तर विद्यालयों का ढाँचा खड़ा करना ही बुद्धिमत्तापूर्ण हो सकता है,जो इन्हें खड़ा कर सकेंगे,वे एक बड़ा मिल खोलने या चलाने से अधिक यशस्वी होंगे।
  • सरकारी पढ़ाई में सबसे बड़ा दोष यह है कि निरर्थक विषयों की तोता रटन्त करनी पड़ती है।उस श्रम के भविष्य में कुछ काम न आने की बात सोचकर शिक्षार्थी ऊबते और खुराफातों की ओर मन चलाते हैं।यदि काम में आने वाले और जीवन को प्रगतिशील बनाने वाले विषय पढ़ने पड़े,तो उनमें रुचि बढ़ेगी और मस्तिष्कीय विकास को सहज ही असाधारण लाभ मिलेगा।सरकारी प्रमाण-पत्रों का बाजार रेट अब निरन्तर गिरता जा रहा है।उसकी ओर से हाथ खींचकर काम आने वाली शिक्षा पर ध्यान दिया जाय,तो पढ़ाई छोड़ने के बाद किसी को पछताने या असमंजस में पड़ने की आवश्यकता न पड़ेगी-यह समझा जा सके और आकर्षक बनाया जाय,तो निश्चय ही पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी मिलने लगेंगे।कक्षा 6 से 10 तक चार वर्ष का कोर्स पर्याप्त है या 18 वर्ष की आयु होने तक का प्रशिक्षण भारत जैसे गरीब देश के लिए पर्याप्त हो सकता है।
  • लड़कों की भाँति लड़कियों के लिए भी समानान्तर शिक्षा नितान्त आवश्यक है।सरकारी स्कूलों में पाँचवीं कक्षा तक लड़के-लड़की साथ-साथ पढ़ें।इसके उपरान्त उनके भावी जीवन को ध्यान में रखते हुए,पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाये और ऐसे ही वातावरण में उन्हें पढ़ने का प्रबन्ध किया जाय।लड़कों को समाज सम्पर्क रखने के लिए व्यवहारकुशलता और आजीविका उपार्जन के लिए आरम्भ से ही अपना ध्यान मोड़ना और तद्नुरूप पढ़ने में श्रम,समय और धन लगाना चाहिए। लड़कियों का कार्यक्षेत्र परिवार संचालन है।ये विवाहित-अविवाहित जिस भी स्थिति में रहें,उन्हें परिवार संस्था की सुयोग्य संचालिका-शिक्षिका बनना चाहिए।सरकारी नौकरियों के फेर में उन्हें भी अन्धी दौड़ दौड़ना नहीं चाहिए।बच्चों व घर को अस्त-व्यस्त करके ही महिलाएँ नौकरी कर सकती हैं।फिर अफसरों के उचित-अनुचित दबाव न मानने पर ऐसी जगह ट्रांसफर पर जाना पड़ता है,जहाँ जिन्दगी ही दूभर हो जाए।
  • गृह विज्ञान वर्तमान विज्ञानों में सबसे बढ़कर और सबसे महत्त्वपूर्ण है।समाज को नये नागरिक यदि शानदार स्तर के बनाकर दिए जा सकें।एक परिवार को सुव्यवस्थापूर्वक चलाते हुए अनेक प्रकृति के लोगों को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र की दिशा में बढ़ाया जा सके,तो यह एक बहुत बड़ी बात है।यह कार्य प्रधानतया महिलाएँ कर सकती हैं।बच्चों के साथ दिन भर और बड़ों के साथ 18 घण्टे रहती हैं,इस बीच वे घर-गृहस्थी के सामान्य काम करती हुई भी यदि व्यक्तित्व निखारने वाली प्रेरणा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देती रहे,तो वे अपने कार्यक्षेत्र को हीरे-मोतियों से सजा हुआ बना सकती हैं।
    गृहस्थ जीवन से सम्बन्धित इतनी अधिक समस्याएँ हैं,जिन्हें लड़कों के कार्यक्षेत्र से किसी भी प्रकार कम नहीं समझा जा सकता।गृह प्रबन्ध को ठीक तरह चलाने,विभिन्न प्रवृत्ति के चित्र-विचित्र स्वभाव वालों को मिठास की आग में तपाकर,यदि टेढ़े से सीधा किया जा सके तो उस कौशल की मुक्त कण्ठ से सराहना ही की जायेगी।गृहलक्ष्मी स्तर का बजट बनाकर घर चलाने वाली महिलाओं के घर में दरिद्रता फटकने भी नहीं पाती।
  • गर्भावस्था और शिशु-पालन की मुसीबत ऐसी है,जिसके सम्बन्ध में समुचित जानकारी रहने पर ही अपने और बच्चे के प्राण बचते हैं।दस वर्ष की आयु तक के बच्चे प्रायः माँ से ही चिपके रहते हैं।इस अवधि में ही बालकों को गुण-कर्म-स्वभाव की दृष्टि से मदालसा की तरह संस्कारवान बनाया जा सकता है।इस सन्दर्भ में महिलाओं की ही भूमिका सर्वोपरि होती है।परिवार छोटा होने पर भी एक पूरा साम्राज्य है।उसका सुसंचालन उन नारियों के लिए ही सम्भव है,जिन्हें पुरातनकाल में गृहलक्ष्मी और नाम के साथ देवी शब्द जोड़कर उनकी गरिमा को वरिष्ठ बताया जाता रहा है।
  • लड़कियों की भी समानान्तर व्यवस्था होनी चाहिए। व्यावहारिक ज्ञान और अभ्यास का जिसमें समावेश हो,उसी को नारी के लिए उपयुक्त शिक्षा कहा जा सकता है।इसके लिए कदाचित नया पाठ्यक्रम ही बनाना या छापना पड़े।नोट लिखकर भी ऐसी शिक्षा अनुभवी शिक्षक इन जानकारियों की दे सकते हैं।जिस-तिस पुस्तक के कुछ अध्याय भी कुछ काम दे सकते हैं। लड़कियों की शिक्षा गृहलक्ष्मी स्तर की होनी चाहिए।यह किस प्रकार बन पड़े ? यह अपनी बच्चियों के हित में स्वयं ही सोचना चाहिए और सोचते ही न रहकर उसका ऐसा ढाँचा खड़ा करना चाहिए,जिसमें पढ़कर निकली हुई लड़कियाँ गृह और सुसराल में भरपूर सम्मान,यश एवं स्नेह प्राप्त कर सके।
  • ऐसे कन्या विद्यालयों में छठी कक्षा से लेकर दसवीं तक का प्रबन्ध किया जाये और अठारह वर्ष की आयु होने तक इसी प्रशिक्षण में पढ़ने के साथ-साथ पढ़ाने के काम में भी लगाए रखी जाएँ।उन्हें ऐसे गृह उद्योग भी सिखाए जाएँ जिससे वे आजीविका उपार्जन करने में सफल रहें और स्वावलम्बी बनें।बिना नौकरी किए ही समय पड़ने पर भली प्रकार काम चला सकें।यही आज की शिक्षा का स्वरूप लड़के-लड़कियों के लिए बनाया जाना चाहिए।यह कार्य समजासेवी संस्थाएँ ही कर सकती है। इस दिशा में अब अधिक देरी न कर शीघ्र कदम उठा लेना ही श्रेयस्कर है।

6.चरित्र निर्माण शिक्षा पद्धति हो: चरित्र निर्माण ही सच्ची शिक्षा का आधार क्यों है का सारांश (Summary of Character is a System of Education: Why is Character Building Basis of True Education?):

  • (A)चरित्र प्रधान शिक्षा पद्धति हो से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ व्यावहारिक प्रश्न (Some practical questions for students regarding a character-based education system):
    (1.)चरित्र प्रधान शिक्षा पद्धति क्यों होना जरूरी? (Why is a character-based education system necessary?)
    (2.)क्या आज की शिक्षा में चारित्रिक गुण सम्मिलित नहीं है? (Are character traits not included in today’s education?)
    (3.)आज की शिक्षा पद्धति में चारित्रिक गुण कैसे सम्मिलित कर सकते? (How can character traits be incorporated into the current education system?)
    (4.)यदि शिक्षण संस्थानों में चारित्रिक गुण सम्मिलित न हो तो चारित्रिक गुणों की शिक्षा कैसे दी जा सकती है? (If character traits are not integrated into educational institutions, how can instruction regarding them be imparted?)
    (5.)चारित्रिक गुणों के अभाव में शिक्षार्थी की हालत कैसी होती है? (What is the state of a learner in the absence of character traits?)
    (6.)चारित्रिक शिक्षा की महत्ता क्यों है? (Why is character education important?)
    (7.)चारित्रिक गुण और शिक्षा में क्या सम्बन्ध है? (What is the relationship between character traits and education?)
    (8 )शिक्षा और चरित्र निर्माण का सही संतुलन कैसे सम्भव है? (How can a proper balance between education and character building be achieved?)
    (9.)क्या तुमने चारित्रिक गुणों को धारण करने के बारे में चिन्तन किया है? (Have you reflected on cultivating character traits?)
    (10.) क्या तुम चारित्रिक गुणों के बारे में दूसरों से बात करोगे? (Will you discuss character traits with others?)
  • (B)चरित्र प्रधान शिक्षा पद्धति के स्वर्णिम बिन्दु (Key highlights of a character-based education system):
    (1.)शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य (The true purpose of education)
    (2 )नीति और धर्म का साम्प्रदायिरता से सम्बन्ध (The relationship of ethics and righteousness (Dharma) with sectarianism)
    (3.)शिक्षार्थी-शिक्षक दोनों की भूमिका (The roles of both the learner and the teacher)
    (4.)शिक्षा ऐसी हो,जो काम आए (Education should be practical and useful)
    उपर्युक्त आर्टिकल में चरित्र निर्माण शिक्षा पद्धति हो: चरित्र निर्माण ही सच्ची शिक्षा का आधार क्यों है? (Character is a System of Education: Why is Character Building Basis of True Education?) के बारे विस्तार और गहराई से बताया गया है।
  • ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
    * 👥 **मित्रों के साथ शेयर करें:** ज्ञान बांटने से बढ़ता है,इसलिए इसे अपने दोस्तों के साथ ज़रूर साझा करें।
    * 🔔 **वेबसाइट को फॉलो करें:** अगर आप यहाँ पहली बार आए हैं, तो हमारे **ईमेल सब्सक्रिप्शन** को फॉलो करें।साथ ही, **Push Notification (घंटी के आइकॉन) को भी अलाउ (Allow) करें** ताकि हर नए ज़रूरी आर्टिकल और टेस्ट सीरीज़ का नोटिस आपके मोबाइल पर तुरंत मिल जाए!
    * 💬 **अपने सुझाव दें:** यदि आपकी कोई समस्या है या कोई सुझाव देना चाहते हैं,तो नीचे **कमेंट** करके हमें ज़रूर बताएं।
    **पूरा आर्टिकल पढ़ने के लिए आपका स्वागत है!** 🙏

Also Available in Hindi:How to Develop Character with Success?

7.चारित्रिक शिक्षा की क्या जरूरत है? (हास्य-व्यंग्य) (What is need for character education?) (Humour and Satire):

  • एक शिक्षा निदेशक स्कूलों के निरीक्षण पर निकले।निरीक्षण के दौरान शिक्षक चारित्रिक गुण के बारे में छात्र-छात्राओं को बता रहे थे।
  • निदेशक (टीचर से) : आप ये क्या पढ़ा रहे हैं?
  • टीचर: श्रीमन्,चारिभिक गुणों के बारे में बता रहा हूँ।
  • निदेशक : ये तो सिलेबस में है ही नहीं,फिर आप अलग ही अपनी बीन क्यों बजा रहे हैं?
  • टीचर: श्रीमन्,मैं दिनभर चारित्रिक गुणों को लेकर ही नहीं बैठा रहता है।परन्तु रोटी में जितना नमक जरूरी है,उसी प्रकार जीवन में चारित्रिक गुणों की जरूरत है।
  • निदेशक (व्यंग्यपूर्वक) : आपको जितने निर्देश दिए गए है उतना और वही करना है।अपनी ही तूती बजाने की जरूरत नहीं है।
  • टीचर: श्रीमन ये तो कोई बात नहीं हुई कि आप जैसा निर्देश,आदेश दें और बच्चों के हित का ध्यान न रखें।सोचिए चरित्र निमणि के बिना बच्चों का भविष्य कैसा होगा।और बच्चों के भविष्य निर्माण के बिना देश का भविष्य कैसा होगा।

8.चरित्र निर्माण शिक्षा पद्धति हो: चरित्र निर्माण ही सच्ची शिक्षा का आधार क्यों है? (Frequently Asked Questions Related to Character is a System of Education: Why is Character Building Basis of True Education?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.शिक्षा हमारे अन्दर कैसा बदलाव करती है? (How does education change us?):

उत्तर:शिक्षा हमारा पूरी तरह से रूपान्तरण कर देती है,पूरी तरह से कायाकल्प कर देती है।

प्रश्न:2.शिक्षा का प्रारम्भ कहाँ से होता है? (Where does education begin?):

उत्तर:शिक्षा का प्रारम्भ शैशवावस्था से प्रारम्भ हो जाता है,जिसे माँ द्वारा प्रारम्भ किया जाना चाहिए।

प्रश्न:3.शिक्षा के बारे में संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। (Write a brief note about education):

उत्तर:वर्तमान में जो शिक्षा दी जाती है वह छात्र-छात्राओं के किसी काम नहीं आती है।शिक्षा चारित्रिक गुणों का समावेश होना चाहिए और व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा चरित्र निर्माण शिक्षा पद्धति हो: चरित्र निर्माण ही सच्ची शिक्षा का आधार क्यों है? (Character is a System of Education: Why is Character Building Basis of True Education?) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *