The Truth of Communal Conflict in India: Causes and Analysis
1.भारत में सांप्रदायिक टकराव का सच: कारण और विश्लेषण (The Truth of Communal Conflict in India: Causes and Analysis):
- भारत में सांप्रदायिक टकराव का सच: कारण और विश्लेषण (The Truth of Communal Conflict in India) जानिए।साम्प्रदायिक टकराव की ऐतिहासिक भूमिका और सम्पूर्ण विश्लेषण।किस प्रकार साम्प्रदायिकता के विष वृक्ष को समाप्त किया जा सकता है।
Also Available in Hindi:Review of Secularism in Indian Context
2.साम्प्रदाविकता का कटु यथार्थ (The bitter reality of communalism):
- कटु यथार्थ: किसी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अनेक सांप्रदायों की मौजूदगी मात्र को ही यदि साम्प्रदायिक संघर्ष का मूल कारण बताया जाय तो इसे सम्प्रदाय और सभ्यता दोनों के वास्तविक अर्थ की अज्ञानता का सूचक माना जायेगा।किसी भी समाज में एकाधिक सम्प्रदायों का होना सामाजिक चेतना का स्वाभाविक एवं अनिवार्य पहलू है।तर्क चाहे जो भी हो,व्यावहारिक सत्य यही है कि कोई भी समाज एकल साम्प्रदायिक (यूनी कम्यूनल) हो ही नहीं सकता।यदि किसी समाज में केवल एक ही धर्म के अनुयायी मौजूद हों तो उसमें भी साम्प्रदायिक विभाजन हो ही जाएगा।यदि समाज ईसाई हो तो उसका अन्तर्विभाजन कैथोलिक,प्रोटेस्टेंट,ग्रीक आर्थोडॉक्स आदि में,यदि इस्लामिक हो तो शिया,सुन्नी,अहमदिया इत्यादि में और यदि हिन्दू हो शैव,वैष्णव,शाक्त वगैरह के रूप में उसका विभिन्न सम्प्रदायों में विभाजन होता रहा है।
- अन्तर्विभाजन ही नहीं,इनमें आपसी संघर्ष भी होता रहा है और दिलचस्प बात तो यह है यह संधर्ष किसी एक धर्म के निभिन्न संप्रदायों में जिस मुकाम को छूता रहा है उसकी कड़वाहट को व्यापक धर्मों के आपसी संघर्ष की कड़वाहट से किसी मायने में कम नहीं रहा है।फिर भी जहाँ “समय के साथ सब कुछ बदल जाता है,समय पर घाव को भर देता है” की सिद्ध मान्यता का मजाक उड़ाते हुए विभिन्न इस्लामी संप्रदायों का आपसी तथा हि-दुओं और मुसलमानों का पारस्परिक वैमनस्य आज न केवल जारी है बल्कि कभी-कभी तो इसकी धार पहले से भी ज्यादा पैनी दिखाई देने लगती है,वहीं दूसरी ओर ईसाई-यहूदी का संघर्ष खत्म हो गया,कैथोलिक प्रोटेस्टेंट का झगड़ा समाप्त हो गया,शैव-वैष्णव की लड़ाई भी खत्म हो गई।शिया-सुन्नी और हिन्दू-मुस्लिम के लफड़े आज तक बदस्तूर जारी हैं।
ये लफड़े ही हैं झगड़े नहीं,क्योंकि शिया-सुन्नी या हिन्दू-मुसलमान अपने निजी जीवन में आमतौर पर आज भी बड़े प्रेम से रहते हैं,परस्पर सहयोग करते हैं।ये एक-दूसरे को देखते ही आपस में झगड़ नहीं पड़ते।फिर भी एक ऐसा वैमनस्य इनमें है जिसकी कोख से पैदा होने वाले सांप्रदायिक दंगों का खौफ इनकी जेहन से कभी दूर नहीं हो पाता।इस प्रसंग में हम स्थानाभाव के कारण सांप्रदायिकता के मूल कारणों की समीक्षा केवल हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के संदर्भ में ही करेंगे।
3.साम्प्रदायिकता की गहरी जड़ें (The deep roots of communalism):
- गहरी जड़ें: कोई भी आक्रामक शक्ति जब विजित देश में स्थापित होती है तो शुरुआती दौर में स्थानीय जनता के भीतर उसके प्रति वैर-भाव स्वाभाविक है।भारत पर भिन्न-भिन्न जातियों संस्कृतियों के आक्रमण हुए और सबके प्रति भारतीयों के मन में नफरत की भावना की झलक तत्कालीन साहित्यों में पाई जाती है।यवन,शक,कुषाण,हुण,पल्लव आदि जितनी जातियों ने भारत पर आक्रमण किए सभी के साथ यहाँ के पूर्व निवासियों का सामयिक वैमनस्य रहा।कालांतर में जब ये जातियाँ भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अंग बन गयीं तो इनके प्रति शुरू हुई कड़वाहट घुलते-घुलते अन्ततः समाप्त हो गयी।लेकिन 712 ई. में कश्मीर के शासक दाहिर पर मुहम्मद बिन कासिम के सफल इस्लामी आक्रमण से शुरू हुए दौर का चरित्र पूर्ववर्ती आक्रमणों से सर्वथा भिन्न रहा।समस्त पूर्ववर्ती आक्रमण मूलतः सैनिक और राजनैतिक थे जबकि इस्लामी आक्रमण सांस्कृतिक भी था।इसके साथ भारत में सांस्कृतिक वर्चस्व की जबरदस्त होड़ शुरू हो गयी।कोई भी पक्ष दबने को तैयार नहीं था।
- भारत में मुस्लिम शासन की विधिवत् व व्यापक शुरुआत मुहम्मद गोरी की पृथ्वीराज पर 1192 ई. को तराइन विजय के बाद 1205 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा भारत के शासन की बागडोर संभालने के साथ हुई।इसी के साथ हिन्दू और मुस्लिम संरकृतियों के बीच वर्चस्व के संघर्ष का सिलसिला भी परवान चढ़ने लगा। परंपरावादी हो चुके हिन्दुओं की संकुचित मानसिकता तथा विजेताओं के तलवार की ताकत ने ऐसा माहौल बनाया कि भारत में इस्लाम संस्कृति का परचम बुलन्दियों को छूने लगी।ज्यादातर दबी कुचली लेकिन कुछ अग्रणी हिन्दू जातियों के लोग भी इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए मजबूर होने लगे।हिन्दुओं के भीतर,एक उभरती हुई प्रतिद्वन्दी संस्कृति के प्रति अविश्वास,असुरक्षा और द्वेष का भाव बढ़ने लगा। हालांकि बीच-बीच में धर्मनिरपेक्षता तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता को जरूरी समझकर इसे बढ़ाने की कोशिश करने वाले मुस्लिम शासकों का भी अभाव न रहा।लेकिन शायद इन महान शासकों से ज्यादा प्रभाव उन्हीं शासकों का रहा जो भारत को दारुल इस्लाम में तब्दील करने का ख्वाब देखा करते थे।लेकिन ख्वाब देखने वाले शासकों को दोषी ठहराना नासमझी होगी,क्योंकि ये जिस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते थे उसका भारतीय संस्कृति की मुख्य धारा-हिन्दू संस्कृति में समावेश नामुमकिन था।
- इस्लाम मुहम्मद साहब एवं परवर्ती खलीफाओं की ताजातरीन शिक्षाओं पर आधारित होने के कारण किसी सांस्कृतिक सहयोग का तलबगार नहीं था,बल्कि सच तो यह है कि यह अपनी तुलना में विश्व की सभी,खासकर मूर्ति पूजक हिन्दू संस्कृति को,अत्यन्त तुच्छ भी मानता था।अतः मुस्लिम विजेताओं के लिए अपने सांस्कृतिक विस्तार के अलावा और कोई मार्ग न था क्योंकि वे स्वयं हिन्दू संस्कृति को स्वीकार नहीं सकते थे,हिन्दू समाज किसी अकेले मुसलमान को शासक मान नहीं सकता था,इसलिए मुस्लिम शासकों को अपना जनाधार तैयार करने के लिए भारतीय समाज का कुछ इस्लामीकरण भी करना पड़ा।
यूँ तो मुस्लिम विजेता धरती के जिस टुकड़े पर भी पहुँचे उसका इस्लामीकरण करने में पूरी तरह सफल रहे,लेकिन भारत में उनका पाला एक ऐसी संस्कृति से पड़ गया जिसका स्वाभिमान अदम्य और जिजीविषा अपार थी।मुस्लिम शासकों की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत एक इस्लामिक राष्ट्र न तो बन सका,न बन सकता था।इस सच्चाई को स्वीकार करके जिन शासकों ने ‘सर्व धर्म समभाव’ की नीति अपनाई वे महान कहलाए,जबकि अपेक्षाकृत अधिक चारित्रिक दृढ़ता एवं प्रशासनिक सूझ-बूझ से संपन्न होने के बावजूद जिन्होंने इस सच्चाई को नजरअंदाज किया वे हमेशा के लिए कलंकित तो हो ही गए,उनके प्रभाव ने मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं का मन मैला कर दिया। - मुसलमानों पर इसका व्यापक प्रभाव यह रहा वे स्वयं को हिन्दू समाज की तुलना में शासक समझने लगे और उन्हें हिकारत की नजर से देखने लगे।इतिहास के इस नंगे यथार्थ ने दोनों समुदायों के बीच अविश्वास और घृणा के मेल से बनी कुंठा की एक ऐसी खाई खोद दी जिसे आपसी सौहार्द की तमाम कोशिशों के बावजूद पाटा न जा सका।प्रतापी मुगल शासन के दौरान बाबर से शुरू की गई उभय समुदायों के बीच सौहार्द स्थापना की कोशिश अकबर महान के हाथों परवान चढ़ने के जहाँगीरी इंसाफ तक महफूज रहती हुई शाहजहाँ के समय से फिर अधोमुख होने लगी तथा औरंगजेब के हाथों इसका अंतिम संस्कार हो गया।औरंगजेब के काल में ही हिन्दू गौरव के पुनरूत्थान की कोशिशों का सिख और मराठा नेताओं के नेतृत्व में पूरे शबाब पर होना औरंगजेबी शासन के दौरान उभरी हुई हिन्दू प्रतिक्रिया का ऐसा प्रमाण है जिसे आज के कुछ स्वनामधन्य इतिहासविदों द्वारा औरंगजेब के अधीन स्थित हिन्दू मनसबदारों की सर्वाधिक संख्या मात्र के आधार पर इसे सर्वाधिक धर्मनिरपेक्ष मुगल बादशाह सिद्ध करने की कोशिश से नकारा नहीं जा सकता।
हिन्दू पद ‘पादशाही’ का शिवाजी द्वारा दिया गया नारा,औरंगजेब की अदूरदर्शी नीति के विरुद्ध हिन्दू प्रतिक्रिया की सामयिक और स्वाभाविक उपज के अतिरिक्त और कुछ नहीं था।
- लेकिन अच्छाई हो या बुराई,चरमोत्कर्ष के बाद उसका ह्रास प्रकृति का नियम है।औरंगजेबी शासन के दौरान जो वैमनस्य फैला उसके परिणामों के मद्देनजर हिन्दू और उससे भी ज्यादा मुसलमानों ने यह महसूस किया कि इन दो समुदायों के बीच पैदा हो चुकी खतरनाक दूरी को मिटाये बगैर भारत का,जिसमें साथ-साथ रहने के लिए हिन्दू-मुस्लिम दोनों मजबूर थे,और भारतीय मुगल साम्राज्य का बने रह पाना संभव नहीं।लिहाजा 1707 में बहादुरशाह प्रथम की ताजपोशी के बाद हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को दूर करने के जोरदार प्रयास शुरू हुए और इसका सिलसिला 1857 तक जारी रहा।
लेकिन इसी बीच एक ऐतिहासिक दुर्घटना हो गई जिसने उभय समुदाय के बीच सामंजस्य और भाईचारे की कोशिशों को इस तरह नाकाम किया कि अन्ततः 1947 में न केवल देश का विभाजन हुआ,बल्कि संप्रदाय के नाम पर खंडित हो चुके भारत में भी हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की धार ज्यों की त्यों बनी रह गई।भारत में अंग्रेजों का आगमन निस्ससन्देह भारतीय सभ्यता के इतिहास का सर्वाधिक घृणित अध्याय है।अंग्रेजों द्वारा आर्थिक लूट और सामाजिक फूट के अलावा इस देश में और कुछ नहीं किया गया।जो लोग भारत में अंग्रेजी शासन को आधुनिकता का कारण सिद्ध करते हैं वे तत्कालीन विश्व की सिमटती हुई दूरियों से पैदा होने वाले उस माहौल को नजरअंदाज कर जाते हैं जिसमें हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे पर आधारित भारतीय समाज खुद-ब-खुद आधुनिक सभ्यता की काबिले तारीफ कड़ी बन गया होता।लेकिन अंग्रेजों ने भारत में सांप्रदायिक सौहार्द की आगे बढ़ती धारा को वापस मोड़ दिया। 1857 के महासमर के दौरान ही ब्रिटिश हुकूमत ने समझ लिया था कि संगठित भारतीय समाज को दबाये रख पाना उसके लिए असंभव होगा। - प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी सत्ता को दिया गया विभिन्न भारतीय वर्गों (राजनीतिक,सैनिक व जातीय) का सहयोग ही वह बुनियादी कारण था जिसने भारत में ब्रिटिश शासन का उन्मूलन हो जाने से रोक दिया।अंग्रेजों ने परिस्थिति की समीक्षा की और पाया कि भारतीय समाज की अग्र वैमनस्यताएँ या मतभेद किसी योग्य भारतीय नेतृत्व के तहत समाप्त भी हो सकते हैं,लेकिन अपर्याप्त कोशिशों के कारण जीवित बचा हुआ हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्यता का भूत यदि जगा दिया जाय तो उसके भय से सहमे हुए भारतीय समाज को चिरकाल तक गुलाम बनाए रखा जा सकता है।और साजिश शुरू हो गई।
Also Available in English:Communal
4.साम्प्रदायिक गदर (Communal upheaval):
- सर्वप्रथम गदर के फौरन बाद मुसलमानों के उत्पीड़न का सिलसिला शुरू हुआ।उन हिन्दुओं को खुशी हुई जो इस्लाम को हिन्दुत्व के लिए खतरा मानने और अंग्रेजी हुकूमत को हिन्दू समाज को मुस्लिम वर्चस्व से छुटकारा दिलाने का जरिया समझने के भ्रम में थे।मुस्लिम उत्पीड़न का हिन्दू सियासतदारों की ओर से विरोध न होने की वजह से मुसलमानों का मन दुःखी हुआ,उन्होंने अपने आपको अकेला समझ लिया।अब अंग्रेजों ने दूसरी चाल चली।अब उन्होंने मुसलमानों का हितैषी बनने का नाटक खेला।मोहरे के रूप में सैयद अहमद खान को इस्तेमाल किया गया।मुस्लिम समाज को यह समझाने की कोशिश की गई कि वे ‘शासक वर्ग’ हैं।यदि भारत में अंग्रेजी राज खत्म हो गया तो अब शासक ‘हिन्दू वर्ग’ होगा और मुसलमान हिन्दू शासन के अधीन दोयम दर्ज की प्रजा बन कर रह जाएगा।लिहाजा सबसे पहले मुसलमानों को अंग्रेजों के साथ मिलकर अपना सामाजिक,शैक्षणिक व सियासी स्तर ऊँचा करना चाहिए।
- आजादी वगैरह की बातें फिलहाल मुसलमानों के लिए खतरनाक है।इतिहास का यह पन्ना कितना दिलचस्प है कि जो सैयद अहमद 1844 तक कहा करते थे कि “याद रखिये,हिन्दू और मुसलमान शब्द केवल धार्मिक भेद बताने के लिए हैं:अन्यधा हिन्दू,मुस्लिम या ईसाई,जो भी इस देश में रहते हैं एक और एक ही राष्ट्र के हैं।इन सभी पंथों को एक ही राष्ट्र कहा जा सकता है,इन सभी को देशहित में एकसूत्रबद्ध होना ही चाहिए।देश की भलाई सबकी भलाई है।”वही 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का विरोध कर रहे थे और मुसलमानों को समझा रहे थे कि कोई भी राजविरोधी संगठन उनके लिए अहितकर सिद्ध होगा क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में बहुसंख्यक हिन्दुओं का वर्चस्व कायम हो जाएगा,मुसलमान दबा दिए जाएंगे।उन्होंने मुस्लिम समाज को राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक बदरूद्दीन तैयबजी जैसे राष्ट्रवादी मुसलमानों के बहकावे में न आने की सलाह दी।अपनी साजिश की दूसरी कड़ी की सफलता से प्रफुल्लित अंग्रेजों ने सैयद अहमद खान को “सर सैयद बनाकर सर पर बिठा लिया।
- अपनी इस एक मात्र नामसमझी के बावजूद सर सैयद एक अच्छे आदमी थे और गुसलमानों के वे सच्चे हितैषी थे।मुस्लिम समाज को आधुनिकता से जोड़ने की चिन्ता जितनी उन्हें थी,शायद ही किसी अन्य को रही होगी।लेकिन उनकी एक भूल ने भारत में साम्प्रदायिकता की राह को और पुख्ता कर दिया।मुसलमानों का एक बड़ा तबका उनकी रहनुमाई पर यकीन करता था।इस मनःस्थिति का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने 1909 ई. में एक तीसरी चाल चली।मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से मशहूर प्रतिवेदन के तहत इस वर्ष सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का ऐसा जाल फेंका गया जिसके दूरगामी परिणाम हुए।साम्प्रदायिक हितों की रक्षा के नाम पर 1906 ई. में मुस्लिम लीग का अस्तित्व तो पहले ही सामने आ गया था।अंग्रेजों ने सांप्रदायिक भावनाओं को उभार कर इसे और मजबूत बनाना शुरू कर दिया।
इसका दुःखद पहलू यह रहा कि उसके समानान्तर हिन्दू प्रतिक्रिया का भी प्रारंभ हो गया और मुस्लिम सांप्रदायिकता के अनुपात में ही इसकी,धार भी पैनी होती गयी।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,हिन्दू महासभा,रामराज्य परिषद् तथा जनसंघ जैसे सामाजिक-राजनैतिक संगठनों के उदय के पीछे हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य जनित अविश्वास एवं असुरक्षा की भावना की मौजूदगी से उपजे प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।हालांकि घोषित रूप में इन संगठनों का उद्देश्य मुस्लिम समाज का तिरस्कार या उत्पीड़न न होकर हिन्दुत्व और भारतीय अस्मिता का पुनरूत्थान ही रहा,लेकिन इनके आविर्भाव ने मुसलमानों के अन्दर पूर्ववर्ती अविश्वास एवं असुरक्षा की भावना को बढ़ाया ही,घटाया कभी नहीं।
5.साम्प्रदायिक त्रासदी (Communal tragedy):
- ऐतिहासिक त्रासदी : हालांकि पहले से अंग्रेजों की नीतियों के कारण हिन्दू-मुसलमान दोनों में साम्प्रदायिकता की आग भड़क चुकी थी,लेकिन उभय पक्ष में एक प्रभावशाली समानान्तर पीढ़ी भी थी जो इस आग को बुझाने के लिए कटिबंद्ध थी।मुसलमानों में भी खान अब्दुल गफ्फार खान,बदरूद्दीन तैयबजी,मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे जुझारू नेता ओर अशफाक उल्लाह खाँ जैसे क्रांतिवीर मौजूद थे जो हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर तथा द्विराष्ट्र सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध थे; तो दूसरी ओर हिन्दू समाज में तो वर्चस्व ही ऐसे लोगों का था जो साम्प्रदायिक भावनाओं से सर्वथा दूर थे।महात्मा गांधी,पंडित नेहरू,सुभाष चन्द्र बोस जैसे तमाम नेता ऐसे थे जो हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को भारतीयता का सर्वोत्तम पहलू मानते थे।फिर भी अंग्रेज सर सैयद अहमद,मुहम्मद इकबाल और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे भ्रमित नेताओं तथा उनके अनुयायियों को यह समझाने में कामयाब रहे कि अखण्ड भारत में हिन्दू वर्चस्व के अधीन मुसलमानों का जीवन और स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रहेगा।वास्तव में स्वतन्त्रता की पूर्व संध्या पर अल्पसंख्यकों के जातीय हित की बात उठाकर अंग्रेजों ने एक अत्यन्त घृणित चाल चली।हालांकि इस विषय में गहरी छानबीन अभी शेष है,लेकिन लगता यही है कि अंग्रेजी हुकूमत अन्त तक भारत में बने रहने का बहाना खोजती रही।द्विराष्ट्र सिद्धान्त और अल्पसंख्यक हित की बात उठाकर उन्होंने यह सोचा कि राष्ट्रवादी मुसलमान अथवा समस्त हिन्दू वर्ग भारत विभाजन को नकार देगा।ऐसा होते ही देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो जायेगी,जिसे बहाना बनाकर ब्रिटिश राज भारत में बना रहेगा।ब्रिटिश शासन ने आजादी की शर्त ही यह रखी थी कि भारत को उसी रूप में आजाद किया जायेगा,जिसे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों वर्ग स्वीकार करेंगे।
- सांप्रदायिक भावना से ओत-प्रोत मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय विभाजन से पीछे एक कदम भी हटने को तैयार न था और जब तक विभाजन की बात मानकर इस वर्ग को सहमत न किया जाता तब तक आजादी के फरमान पर अंतिम हस्ताक्षर हो नहीं सकता था।अजीब स्थिति थी,एक ओर विभाजन तो दूसरी ओर गृहयुद्ध की आग में जलता हुआ गुलाम देश।किसी एक की अस्वीकृति दूसरे की अनिवार्य स्वीकृति थी।राष्ट्रवादियों के राष्ट्र प्रेम और गांधी के सिद्धान्तों की हत्या अपरिहार्य हो गयी। गांधी की हत्या तो बाद में हुई,उनके विचारों की एवं भावनाओं की हत्या तो पहले हो चुकी थी
- उपर्युक्त विकल्पों-विभाजन या गुलामी के साथ गृहयुद्ध में किसे चुना जाना चाहिये था,यह शुरू से ही विवाद का विषय रहा है और ऐसा मानने वालों की कमी आज भी नहीं,जो विभाजन के चयन को अनुचित मानते हैं।जो भी हो,देश को एक भयानक त्रासदी से गुजरना ही था:यदि वह त्रासदी विभाजन की न होती तो गुलामी और गृहयुद्ध की होती।देश का विभाजन हुआ और मुसलमानों को एक पृथक् राष्ट्र मानने वालों ने पाकिस्तान बना लिया।
6.साम्प्रदायिकता विरासत की भूल (The error of the communal legacy):
- विरासत की भूल: लेकिन खण्डित भारत में भी साम्प्रदायिक वैमनस्यता का भूत ज्यों का त्यों बना रहा। एक देसी कहावत है “जिसके चलते बंटवारा हुआ,वही गले पड़ गया।” साम्प्रदायिकता की जिस आग को बुझाने के लिए विभाजन का कड़वा घूँट गांधी,सीमान्त गांधी और मौलाना आजाद जैसे लोगों को पीना पड़ा वही आग भारत के हिस्से में आ गयी।इसके पीछे कारण निस्सन्देह आजाद भारत के प्राथनिक नीति निर्माताओं की भयानक भूल रही।साम्प्रदायिक आधार पर देश के विभाजन के बावजूद मुसलमानों को यहीं रह जाने के लिए प्रेरित करना तथा उन्हें भेदभाव रहित जीवन
की गारंटी देना निश्चित रूप से भारतीय सभ्यता व संस्कृति का सर्वाधिक स्वर्णिम अध्याय है।
लेकिन इसके आगे एक जबरदस्त भूल हो गयी जिसे सुधारने की कोशिश तो क्या की जाती,उल्टे इसे दिन-प्रतिदिन बढ़ावा दिया जाता रहा,सिर्फ घटिया - राजनीतिक स्वार्थ के लिए।जरूरत भारत में रह गए मुसलमानों को यह समझाने और विश्वास दिलाने की थी कि वे कोई अल्पसंख्यक नहीं बल्कि राष्ट्र की मुख्यधारा हैं।जिन्होंने अपने आपको अल्पसंख्यक माना वे तो पाकिस्तान चले गए।अब जो भी भारत में हैं उसका भारत पर समान अधिकार है,अब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का भेद देश में रहा ही नहीं।लेकिन ऐसी भावना मुसलमानों में नहीं भरी गयी बल्कि शुरू से ही उन्हें यह समझाया और विश्वास दिलाया जाता रहा कि अल्पसंख्यक के बोध से उपजा भय ही साम्प्रदायिक भावना का पहला और अंतिम कारण होता है।इसका प्रमाण खुद भारत में ही मिल जाता है।
- जिन अन्य अल्पसंख्यकों (हालांकि ऐसा लिखना सिर्फ भाषाई सीमाजन्य मजबूरी है) के भीतर अपने अल्पसंख्यक होने का बोध नहीं,उन्हें कोई भय नहीं और इसीलिए उनके भीतर कोई साम्प्रदायिक भावना भी नहीं है।सर्वोत्तम उदाहरण है:पारसी समुदाय,जिसने देश के लिए सर्वोत्तम कर्त्तव्य किया,जिसके ऊपर इस देश को गर्व है और जो स्वयं इस देश की राष्ट्रीय धारा में इस तरह गुंथे हुए हैं कि उन्हें अपनी संख्या के बारे में सोचने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी।स्थिति तो यह है कि अगर अल्पसंख्यक होने के आधार पर इस वर्ग को विशेष कुछ देने की पेशकश की गई तो यह उसे ठुकरा देगा क्योंकि यह अपने आपको अल्पसंख्यक मानता ही नहीं।दरअसल किसी राष्ट्र के लिए अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की भावना ही खतरनाक है।जब तक और जिन वर्गों में यह भावना बनी रहेगी तब तक उन वर्गों में साम्प्रदायिकता का जहर भी मौजूद रहेगा।
7.साम्प्रदायिकता का एकमात्र इलाज (The only remedy for communalism):
- एकमात्र इलाज: साम्प्रदायिक दुर्भावना का एकमात्र इलाज यह है कि जैसे भी हो जाति,धर्म,संप्रदाय को व्यक्त करने वाली वर्गीय भावना को मिटाया जाय।लोगों को यह विश्वास दिलाया जाय कि भारतीय राष्ट्र का निर्माण व्यक्तियों से होता है;वर्गों,जातियों और संप्रदायों से नहीं।राष्ट्र की दृष्टि से प्रत्येक नागरिक एक व्यक्ति है,हिन्दू,मुसलमान,सिख,ईसाई या पारसी नहीं।राष्ट्रीय परिदृश्य से उन समस्त संकेतों को मिटाना होगा,उन सभी कानूनों को खत्म करना होगा जो जातीय और साम्प्रदायिक वर्गों के आधार पर राष्ट्रीय संरचना को नाजायज तरीके से परिभाषित करते रहते हैं।
- कहने की जरूरत नहीं कि इस कार्य की शुरुआत सर्वोत्तम रूप में तो सामाजिक स्तर से हो सकती है,जैसा कि पारसी समाज की ओर से किया जाता रहा है;लेकिन अन्य सामुदायिक संदर्भों में यदि ऐसा हो सकने की स्थितियाँ मौजूद न हों तो इसकी कोशिश राजनीतिक स्तर पर भी होनी चाहिए।इसके लिए राजनीतिज्ञों को अपने राजनीतिक फायदे की कीमत पर कोशिश करनी चाहिए।माना कि साम्प्रदायिक भावनाओं को बनाए रखने और जब-तब उन्हें उभारते रहने से कुछ लोगों को सस्ते में ही संसद और विधानसभाओं की कुछ सीटें हासिल हो जाती रही हैं लेकिन राष्ट्रहित में इस घृणित लोभ का संवरण करना ही होगा।वरना,ध्यान रहे,इतिहास किसी को माफ नहीं करता और इसका विश्लेषण बड़ा क्रूर होता है।विजय तो खैर अन्ततः सत्य की ही होगी,लेकिन एक घृणित झूठ के सहारे नाजायज सियासी उपलब्धियाँ हासिल करने वाले एक दिन राक्षसों की श्रेणी में रखे जायेंगे।
8.भारत में सांप्रदायिक टकराव का सच: कारण और विश्लेषण का सारांश (Summary of The Truth of Communal Conflict in India: Causes and Analysis):
- (A)भारत में साम्प्रदायिक टकराव से संबंधित छात्र-छात्राओं से कुछ संवेदनशील प्रश्न (Some sensitive questions for students regarding communal conflict in India):
(1.)क्या संप्रदाय को राष्ट्रीयता से अलग रखना चाहिए? (Should sectarian identity be kept separate from national identity?)
(2.)आप राष्ट्र और संप्रदाय में से किसको वरीयता देते हैं? (Which do you prioritize: the nation or the sect/community?)
(3.)क्या किसी सांप्रदायिक व्यक्ति को खुश करने के लिए समझौता करना राष्ट्र के हित में है? (Is it in the national interest to compromise in order to appease a communal individual?)
(4.)सांप्रदायिक टकराव के मुख्य कारण क्या हैं? (What are the main causes of communal conflict?)
(5.)आपके विचार से सांप्रदायिक टकराव को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए? (In your opinion, what measures should be taken to prevent communal conflict?)
(6) यदि कोई साम्प्रदायिक नेता आपस में कटुता फैलाए तो आप क्या करेंगे? (What would you do if a communal leader incited animosity?)
(7.)साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए कुछ उपयोगी सुझाव क्या हो सकते हैं? (What are some useful suggestions for fostering communal harmony?)
(8.)क्या शिक्षण संधानों में साम्प्रदायिक शिक्षा मिलनी चाहिए?शिक्षण संस्थानों को साम्प्रदायिकता से कैसे मुक्त रखें? (Should sectarian/religious instruction be provided in educational institutions? How can educational institutions be kept free from communalism?)
(9.)क्या साम्प्रदायिकता को जड़ से खत्म किया जा सकता है? (Can communalism be eradicated completely?)
(10.)अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के प्रबन्धकों की धारणा क्या है? (What is the perspective of the administrators of minority educational institutions?)
(11.)संविधान के अनुच्छेद 19(1) तथा 25(1) में क्या कहा गया है? (What is stated in Articles 19(1) and 25(1) of the Constitution?)
(12.) क्या संविधान में साम्प्रदायिक शिक्षा देने की अनुमति है? (Does the Constitution permit the imparting of sectarian/religious education?)
- (B)साम्प्रदाधिक टकराव से सम्बन्धित महत्वपूर्ण पाइंट्स (Key points regarding communal conflict):
(1.)साम्प्रदायिकता का कटु यथार्थ (The bitter reality of communalism)
(2.) साम्प्रदायिकता की गहरी जड़ें (The deep roots of communalism)
(3.) साम्प्रदायिक गदर (Communal upheaval)
(4.)साम्प्रदायिक त्रासदी (Communal tragedy)
(5.)साम्प्रदायिकता विरासत की भूल (The error of the communal legacy)
(6.)साम्प्रदायिकता का एकमात्र इलाज (The only remedy for communalism)
उपर्युक्त आर्टिकल में भारत में सांप्रदायिक टकराव का सच: कारण और विश्लेषण (The Truth of Communal Conflict in India: Causes and Analysis) के बारे में विस्तार और गहराई से जानकारी दी गई है। - ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
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9.इस तरह फैलता है साम्प्रदायिकता का जहर (हास्य-व्यंग्य) (This Is How the Poison of Communalism Spreads) (Satire):
- एक बार एक कस्बे में दंगा फैल गया।एक व्यक्ति (दूसरे धर्म का) अपने काम से चला जा रहा था।कस्बे के मार्केट में धारा-144 और कर्फ्यू लगा हुआ था।एक व्यक्ति ने पीछे से आकर उसके लट्ठ मारा।उसके खून बहने लगा।
- बहुसंख्यक समुदाय के एक व्यक्ति ने उसे लताड़ा।तुमने अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति क्यों मारा।
व्यक्ति:वह विधर्मी था। - अन्य व्यक्ति: तो क्या हुआ,क्या यह देश उनका नहीं है?
- व्यक्ति: हम भी तो उधर जाते हैं तो वे हमें मारते हैं।
- अन्य व्यक्ति: तुम जैसे लोगों की वजह से ही तो साम्प्रदायिकता का जहर फैलता है।आज दुनिया एक ग्लोबल विलेज की तरह बनती जा रही है परन्तु तुम जैसे लोगों की मानसिकता नहीं बदलती है।
- व्यक्ति: अरे यार हमारे समाज में,तुम गाँधीजी कहाँ से पैदा हो गये है।
- अन्य व्यक्ति: दुनिया चाँद-सितारों पर चहुँच चुकी है और तुम अभी भी दकियानूसी बातें करते हो।
व्यक्ति अन्य व्यक्ति के तर्कों से इतना प्रभावित हुआ कि उसे पश्चाताप होने लगा।
10.भारत में सांप्रदायिक टकराव का सच: कारण और विश्लेषण (Frequently Asked Questions Related to The Truth of Communal Conflict in India: Causes and Analysis) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.भारत में सांप्रदायिक टकराव क्यों होता है? (Why do communal clashes occur in India?):
उत्तर:संकीर्ण मानसिकता और अपने धर्म और श्रेष्ठ मानने तथा सदियों से अपनी जड़ जमायी हुई अपने धर्म की मान्यताओं से चिपके रहने के कारण।
प्रश्न:2.भारत की विशेषता क्या है? (What is the speciality of India?):
उत्तर:सर्व धर्म समभाव और दूसरे धर्म की मान्यताओं,परम्पराओं का आदर करना।
प्रश्न:3.क्या साम्प्रदायिक टकराव जड़मूल से खत्म किया जा सकता है? (Can communal conflict be eradicated from the root?):
उत्तर:नहीं साम्प्रदायिक टकराव को कम किया जा सकता है लेकिन जड़मूल से खत्म करना बहुत मुश्किल है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भारत में सांप्रदायिक टकराव का सच: कारण और विश्लेषण (The Truth of Communal Conflict in India: Causes and Analysis) के द्वारा प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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Lekhak Ke Baare Mein (About the Author) **Satyam Narain Kumawat** **Website Name:Satyam Mathematics** *Owner:satyamcoachingcentre.in* *Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)* **Teaching Mathematics aur Anya Anubhav** ***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan ***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav ***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan* ****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science. Updated on 18.06.2026











