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Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World

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3 3.मानवाधिकारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background of Human Rights):

1.मानवाधिकारों की प्रासंगिकता:ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान विश्व (Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World):

  • मानवाधिकार क्या हैं और ये हमारी कैसे मदद करते हैं? आइए जानते हैं मानवाधिकारों की प्रासंगिकता:ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान विश्व (Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World) के बारे में सम्पूर्ण डिटेल।स्टेप-बाइ-स्टेप।

Also Available in Hindi:3 Guidelines for Uniform Civil Code Implementation in India

2.मानवाधिकारों की प्रासंगिकता की भूमिका (The Introduction to Relevance of Human Rights):

  • मनुष्य को अपनी गरिमा व उसमें निहित प्रतिभा के विकास तथा उसे अक्षुण्य रखने के लिए जहाँ एक ओर उसे प्रकृति द्वारा उसके जन्म से ही कुछ अप्रत्याहरणीय सुविधाएं एवं साधन प्रदत्त होते हैं वहीं दूसरी और समाज एवं राष्ट्र से भी उसे कुछ सुविधाएं अपेक्षित होती हैं।जब इन्हीं सुविधाओं एवं साधनों को समाज एवं राज्य की मान्यता मिल जाती है,उस पर स्वीकृति की मुहर लग जाती है,तो ये अधिकार का स्वरूप धारण कर लेते हैं,जिनका देशकाल एवं परिस्थितियों के अनुरूप स्वरूप परिवर्तित होता रहता है।
  • इस प्रकार हम देखते हैं कि अधिकारों का सीधा सम्बन्ध मनुष्य के समाज में अस्तित्व एवं उसके व्यक्तित्व के विकास (Personality Development) से होता है।प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक लॉस्की के शब्दों में “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं,जिनके बगैर सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं  कर सकता
    है।”
  • अधिकारों (Rights) के क्रम में जब हम मानवाधिकारों (Human Rights) की बात करते हैं तो पाते हैं कि मानवाधिकारों की यह अवधारणा अधिकारों की अपेक्षा अधिक व्यापक है।मानवाधिकारों से तात्पर्य उन सब परिस्थितियों व पर्यावरण से होता है जो मानव को मानव के रूप में अपने अस्तित्व को कायम रखने व व्यक्तित्व के विकास तथा निर्माण के लिए अनिवार्य होती हैं।इस दृष्टि से मानवाधिकारों की परिधि में केवल प्राकृतिक उपहार जैसे-हवा,जल,इत्यादि ही नहीं आते बल्कि इनके साथ-साथ ससम्मान जीने,पोषण व रक्षण प्राप्त करने सहित वे सब उपागम जो व्यक्तित्व के विकास के लिए अपरिहार्य हैं जैसे-रोटी,कपडा,मकान,चिकित्सा,शिक्षा,संस्कृति आदि सभी आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जा सकता है।
  • मानव के लिए अपरिहार्य इन सब सुविधाओं को अनेक लोकतांत्रिक राष्ट्रों ने अपने नागरिकों के विकास के लिए अनिवार्य समझते हुए अपनी-अपनी सामाजिक,सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने यहाँ की राजनीतिक व्यवस्थाओं एवं मूलभूत कानून में स्थान दिया जाता है,जिन्हें मूलभूत अधिकारों (fundamental Rights) के नाम से जाना जाता है।
  • यहाँ यह स्पष्ट करना समीचीन होगा कि मूलभूत अधिकारों एवं मानवाधिकारों (Fundamental Rights and Human Rights) में बुनियादी रूप से कुछ भेद है।सभी मूल अधिकारों को मानवाधिकार नहीं माना जा सकता,जबकि सभी मानवाधिकारों को मूल  अधिकारों की श्रेणी के अन्तर्गत रखा जा सकता है।उदाहरणार्थ मत देने का अधिकार,विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इत्यादि मूलभूत अधिकार है न कि मानवाधिकार (Fundamental rights and not human rights) क्योंकि इन अधिकारों के बगैर भी मनुष्य अपना अस्तित्व कायम रख सकता है,जैसा कि
    समाजवादी देशों में होता था।इसके विपरीत जीने एवं सुरक्षा प्राप्त करने के अधिकार मूलभूत अधिकार हैं और मानवाधिकार भी,क्योंकि इनके अभाव में मनुष्य का जीवन खतरे में पड़ सकता है

Also Available in English:Human rights

3.मानवाधिकारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background of Human Rights):

  • विभिन्न राजनीतिक विद्वानों का यह मत है कि अधिकार व्यक्ति पर राज्य द्वारा किया गया कोई उपकार नहीं है,बल्कि वर्तमान में मनुष्य जिन अधिकारों का उपभोग कर रहा है,उनमें से अधिकांश अधिकार उसे जन्म से ही प्रकृति द्वारा प्राप्त होते हैं,जिनका उपभोग मानव अपनी सभ्यता के ऊषाकाल से ही रीतियों,परम्पराओं व अन्य किन्हीं रूपों में करता आया है जैसे कि जीने,पोषण एवं सुरक्षा प्राप्त करने विचरण करने,वाणी को अभिव्यक्त करने,प्राकृतिक उपहारों का उपभोग करना इत्यादि राज्य व समाज ने तो इन अधिकारों को समय-समय पर मान्यता व सुरक्षा प्रदान कर इन्हें और अधिक परिष्कृत तथा व्यापक (Refined and broadened) बनाया है।
  • प्रसिद्ध राजनीतिक उदारवादी विचारक जान लॉक का मत है कि “मनुष्य को जीवन,स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति के अधिकार प्रकृति से प्राप्त हुए हैं,जिन्हें राज्य छीन नहीं सकता।” इसी तरह सिसरो,वाल्टेयर,टामसपेन,ब्लेकस्टोन ने भी इस मत का समर्थन किया है कि मानव अधिकार प्रकृति प्रदत्त है।
  • मानवाधिकारों की प्राकृतिक व्यवस्था (Natural system of human rights) एवं मान्यता के बावजूद निरंकुश राजतंत्रों के युग में राजसत्ताओं द्वारा मनुष्यों के अधिकार छीनकर उनके ऊपर अमानुषिक अत्याचार किए जाते थे।यह वह युग था जब मनुष्यों के इन प्रकृति प्रदत्त मानवाधिकारों (Nature-Guaranteed Human Rights) की परवाह किए बिना जरा-जरा से अपराधों के लिए उन्हें अमानुषिक यातनाएं देने और जुल्म,शोषण,अन्याय,अत्याचार,उत्पीड़न का जीवन जीने को विवश किया जाता था।इन निरंकुश एवं अत्याचारी शासन व्यवस्थाओं के विरुद्ध,संघर्ष कर मनुष्य अपने प्राकृतिक एवं मानवीय अधिकारों की रक्षा करने व इनका राजसत्ताओं को एहसास दिलाने के लिए अतीत में छटपटाता रहा है।
  • ऐतिहासिक रूप से इस संघर्ष गाथा की परिणति ब्रिटेन के रनीमेड नामक स्थान पर 15 जून,1215 को तब हुई,जबकि तत्कालीन सम्राट जाॅन को वहाँ के सामन्तों द्वारा अपने परम्परागत अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर करने को विवश किया गया,जिसे ‘मैग्नाकार्टा’ या महान अधिकार पत्र के नाम से जाना जाता है।मानवाधिकारों की दुनिया (The World of Human Rights) में यह मैग्नाकार्टा ही मील का पत्थर साबित हुआ,क्योंकि इसके द्वारा जो अधिकार सामंती वर्ग को प्राप्त हुए थे वे ही कालान्तर में आम जनता को धीरे-धीरे प्राप्त होते गए।इसी प्रकार सन् 1628 में ‘अधिकार याचना पत्र (Petition Right) एवं 1689 के अधिकार पत्र (Bill of Right) द्वारा नरेश की शक्तियों पर अंकुश लगाकर सांसद अपने अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ हुए।
  • इसके उपरान्त अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अमरीका के एक राज्य वर्जीनिया का जो संविधान बना उसमें भी मानव को प्रकृति से ही स्वतंत्र एवं समान बताते हुए कुछ जन्म सिद्ध अधिकारों (Some birthright) की बात कही गई।संविधान में कहा गया कि समाज का निर्माण करते समय किसी भी संविदा द्वारा व्यक्तियों के इन अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।संयुक्त राज्य अमरीका की 4 जुलाई,1776 की घोषणा तथा सन् 1789 की फ्रांसीसी महत्त्व को प्रस्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थे।
  • प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व तक अधिकांश यूरोपीय राष्ट्रों में मानवाधिकारों के अस्तित्व एवं इनकी रक्षा की संस्कृति विकसित हो चुकी थी,लेकिन मानवाधिकारों के विकास का दुःखद पहलू यह था कि मानवाधिकारी की रक्षा (Protecting human rights) व विकास के लिए संघर्ष करने वाले राष्ट्रों ने एशियाई एवं अफ्रीकी राष्ट्रों को अपना गुलाम बनाकर उनके आर्थिक सामाजिक,सास्कृतिक एवं राजनीतिक ढाँचे को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था।इन राष्ट्रों के निवासियों के मानवाधिकारों की परवाह न करते हुए जुल्म एवं शोषण के नए-नए तरीके आविष्कारित किए जा चुके थे।प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान केवल अन्तर्राष्ट्रीय शांति ही भंग नहीं हुई,बल्कि मानवाधिकारों को भी बुरी तरह कुचला गया।
  • व्यापक पैमाने पर मानवाधिकारों के इस हनन को रोकने के लिए सर्वप्रथम ‘शान्ति स्थापना लीग’ (Peacekeeping League) नामक संस्था का गठन किया गया जिसका प्रथम अधिवेशन जून 1915 में अमरीका के फिलाडेल्फिया में हुआ।इसी क्रम में सन् 1920 में राष्ट्र संघ का गठन किया गया।अन्तरर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना एवं विवादों के पंच फैसलों द्वारा हल करने के लिए बनी इस संस्था की मौजूदगी के बावजूद भी संसार की धरती पर द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा गया।इस विश्वयुद्ध में मानवाधिकारों की खुलकर होली जलाई गई,इसमें जो जातीय जुल्मों एवं सर्वनाश के कहर ढहाए गए उनको देखकर ही सारी मानवता सिहर उठी।
    अकेले जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने साठ लाख यहूदियों की हत्या की।10 लाख यहूदियों को गैस चैम्बरों में जलाकर कुछ ही मिनिटों में (Ash in a few minutes) राख कर दिया गया।यही नहीं इन मुर्दों को भी क्षत् विक्षित् करके विभिन्न गड्डों में फेंका गया ताकि उन्हें पहचाना ना जा सके।दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमरीका ने भी छः एवं आठ अगस्त 1942 को क्रमशः हिरोशिमा एवं नागासाकी जापान के इन दो शहरों पर परमाणु बम गिराकर यहाँ के प्राणी जीवन व धन सम्पदा सहित दो लाख से अधिक लोगों को कुछ ही मिनिटों में राख के ढेर में तब्दील कर दिया।इस भीषण नरसंहार को देखकर जब प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से पत्रकारों ने तीसरे विश्वयुद्ध के बारे में पूछा तो अल्बर्ट आइस्टीन का जवाब था कि “क्षमा करें मैं तीसरे विश्वयुद्ध के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकता,लेकिन मैं चौथे महायुद्ध के सम्बन्ध में अवश्य कुछ कह सकता हूँ और वह भी अधिक निश्चितता एवं स्पष्टता के साथ कि चौथा विश्वयुद्ध कभी होगा ही नहीं,क्योंकि तीसरा पूरे जीवन को ही नष्ट कर देगा।”
  • उल्लेखनीय है कि एक ओर युद्ध लडा जा रहा था,तो दूसरी ओर सम-सामयिक रूप में मानवजाति के अस्तित्व (The Existence of Mankind) की रक्षा के लिए शान्ति स्थापना के प्रयास भी किए जा रहे थे जिनके माध्यम से मानव जाति को युद्ध की विभीषिका से बचाकर उसे शान्ति एवं सहअस्तित्व की गारटी दी जा सके।इसी क्रम में 1941 ‘अटलांटिक चार्टर’ द्वारा सभी देशों के नागरिकों को शान्ति का आश्वासन देने की बात की गई।इस चार्टर में कहा गया था कि “प्रत्येक देश की जनता को अपनी इच्छा के अनुसार सरकार चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तथा विश्व के सभी छोटे बड़े राष्ट्रों को समान स्तर पर संसार के साधन,स्रोतों का उपयोग करने का अवसर मिलना चाहिए।” युद्ध के पश्चात् न्यूरेम्बर्ग ट्रायल्स में यह निर्णय लिया गया कि “जाति हत्या जैसे जघन्य अपराध में कोई व्यक्ति यह कह कर बच नहीं सकता कि उसने राज्य की आज्ञा के पालन में यह कृत्य किया है।ऐसे कार्य मानव अधिकारों का सरासर उल्लंघन माने जाएंगे (Sheer violation of human rights)।1945 के सेनफ्रांसिसको सम्मेलन में भी मानव अधिकारों की रक्षा की बात उठाई गई।इसमें कहा गया कि विश्व के सभी देशों के नागरिकों को समान अधिकार,सम्मान और गरिमा प्रदान की जानी चाहिए।”
  • इन सब प्रयासों के फलस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय रंगमच पर शान्ति की स्थापना एवं मानव अधिकारों की रक्षा के लिए 24 अक्टूबर,1945 को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (United Nations) नाम की अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का उद्भव हुआ।इस संस्था ने मानवाधिकारों की रक्षा के पवित्र उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपने एक निकाय-आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् को यह दायित्व सौंपा कि वह मानवीय अधिकारों की रक्षा हेतु कोई ठोस योजना प्रस्तुत करे।आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् ने सयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर की धारा 68 के तहत् 1946 में श्रीमती एलोनोर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में मानवाधिकारों के प्रारूप (Drafts of Human Rights under the Presidency) की रचना के लिए एक मानवाधिकार आयोग (Human Rights Commission) गठित किया।आयोग ने मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा जून 1948 में तैयार की जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा ने 10 दिसम्बर,1948 को इसे स्वीकार कर लिया।इस दिवस को ‘मानव अधिकार दिवस’ (Human Rights Day) के रूप में मनाने का महासभा ने 1950 को प्रस्ताव पारित किया।10 दिसम्बर अल्फ्रेड नोबेल नाम की उस विभूति का जन्म दिवस है,जिसने एक तरफ विध्वंसक डायनामाइट की खोज की थी तो दूसरी ओर विश्व शान्ति का श्रेष्ठतम आविष्कार भी किया था,वह था शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार।अतः यह 10 दिसम्बर का दिवस हथियारों की बर्बरता के विरुद्ध शान्ति एवं सहअस्तित्व की भावना का प्रतीक था।

4.मानवाधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा पत्र (Universal Declaration of Human Rights):

  • मानव अधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा पत्र
  • संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा द्वारा दिनांक 10 दिसम्बर,1948 के प्रस्ताव क्रमांक 217 अ (111) द्वारा घोषित व स्वीकृत मानव अधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र की प्रस्तावना इस प्रकार है:
  • क्योंकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के अन्तर्निष्ठ गौरव तथा सम्मान एवं असंक्राम्य अधिकारों की मान्यता विश्व में स्वतन्त्रता न्याय और शान्ति की आधारशिला है।
  • क्योंकि मानवीय अधिकारों की उपेक्षा तथा असम्मान की परिणति वे बर्बर कृत्य है,जिनसे मानवता के अन्तःकरण को महान आघात पहुँचा है और संसार के निर्माण के लिए जिसमें मानव प्राणी विश्वास और बोलने की स्वतंत्रता का आनंद लेंगे साथ ही साथ भय व अभाव से मुक्ति को जनसामान्य की सर्वोच्य आकांक्षाओं के रूप में घोषणा की जाती है।
  • क्योंकि यह आवश्यक है कि मानवीय अधिकारों की न्यायपूर्ण शासन द्वारा रक्षा की जाए ताकि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ विद्रोह में अन्तिम विकल्प के रूप में किसी व्यक्ति को शरण लेने के लिए विवश होना पड़े।
  • क्योंकि यह आवश्यक है कि राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास किया जाए।
  • क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की जनता ने घोषणा पत्र के अन्तर्गत मूलभूत मानवीय अधिकारों,मानव प्राणी के गौरव तथा योग्यता में तथा स्त्रियों व पुरुषों के समान अधिकारों में अपनी श्रद्धा पुनः पुष्ट की है तथा सामाजिक उन्नति और व्यापक स्वतंत्रता के अन्तर्गत श्रेष्ठतर जीवन स्तर के सम्बर्धन के लिए निश्चय व्यक्त किया है।
  • क्योंकि सदस्य राज्यों ने स्वयं यह शपथ ली है कि वे संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग कर मानवीय अधिकारों तथा मूलभूत स्वतंत्रताओं के अनुपालन तथा उसके लिए सार्वभौमिक समादर प्राप्त करने के लिए कार्य करेगें।
  • क्योंकि इस शपथ के परिपूर्ण क्रियान्वयन के लिए इन अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की सर्वमान्य समझ सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है।
    अब इसलिए महासभा सभी लोगों तथा सभी राष्ट्रों द्वारा प्राप्त करने के लिए एक सर्वमान्य मानदण्ड के रूप में सार्वभौम मानवीय अधिकारों की घोषणा करती है,जिन्हें अन्ततः प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रत्येक अवयव इस घोषणा को निरंतर लक्ष्य रखते हुए इन अधिकारों व स्वतत्रताओं के प्रति आदर के सम्बर्धन हेतु शिक्षण व विकास के लिए अथक प्रयास करेगा तथा सदस्य राज्यों की जनता के बीच व उसके न्यायक्षेत्र में रहने वाले लोगों के इसकी प्रभावी रूप से सार्वभौमिक मान्यता व अनुपालन हेतु उन्नतशील उपाय अपनाएगा।

5.मानवाधिकारों की प्रासंगिकता का सारांश (Summary of Relevance of Human Rights):

  • (A)मानवाधिकारों की प्रासंगिकता से सम्बन्धित अनमोल बिन्दु (Precious Points Related to Relevance of Human Rights):
    (1.)मानवाधिकारों की प्रासंगिकता की भूमिका (The Introduction  to Relevance of Human Rights)
    (2.)मानवाधिकारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background of Human Rights)
    (3.)मानवाधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा पत्र (Universal Declaration of Human Rights)
    (5.)विश्व में मानवाधिकारों की स्थिति (The state of human rights in the world)
    (5.)मानवाधिकारों के उल्लंघन रोकने में असफलता के कारण (Reasons for failure to prevent human rights violations)
  • (B)छात्र-छात्राओं से मानवाधिकारों से सम्बन्धित सीधे-सीधे प्रश्न (Direct questions related to human rights from students):
    (1) क्या आप मानवाधिकारों के बारे में जानते हैं? (Do you know about human rights?)
    (2.)हमें मानवाधिकारों की जरूरत क्यों हैं? (Why do we need human rights?)
    (3.)क्या आतंकवादियों के भी मानवाधिकार होने चाहिए? (Should terrorists also have human rights?)
    (4)राष्ट्र और व्यक्ति के मानवाधिकारों में विरोधाभास हो तो किसे प्राथमिकता देंगे? क्यों? (If there is a contradiction between the human rights of the nation and the individual, who should be given priority? Why?)
    (5.)क्या मानवाधिकार राष्ट्र से भी ऊपर है? (Is human rights above the nation?)
    (6.)क्या मानवाधिकारों की सीमा रेखा नहीं होनी चाहिए? यदि हाँ तो कैसे? और नहीं तो क्यों नहीं ? (Shouldn’t human rights be borderline? If yes, how? And if not, why not?)
    (7.) मानवाधिकारों और राष्ट्र की सुरक्षा में कैसे सन्तुलन हो? (How to balance human rights and national security?)
    (8.)क्या आपके साथ कभी दुर्व्यवहार,अन्याय हुआ है? उस समय आपकी क्या प्रतिक्रिया रही? (Have you ever been mistreated, wronged? What was your reaction at that time?)
  • (9.)हमें मानविक मानवाधिकारों की याद स्वयं के साथ अन्याय होने पर ही क्यों आती है? (Why do we remember human rights only when there is injustice to our nature?)
    (10.)मानवाधिकारों का उल्लंघन रोकने के क्या उपाय हैं? क्या हमें मानवाधिकारों के प्रति सजग नहीं रहना चाहिए? (What are the ways to stop the violation of human rights? Shouldn’t we be vigilant about human rights?)
    (11.)आपके विचार से मानवाधिकारों के उल्लंघन रोकने के क्या उपाय हो सकते हैं? (What do you think can be done to prevent violations of human rights?)
    (12.) तुम्हें कैसे पता चलता है कि यहाँ पर मानवाधिकार का हनन हुआ है? किसी के मानवाधिकारों के लिए क्या आपने सहयोग किया है? क्या आप इस लेख को पढ़ने तक ही अपने आपको सीमित रखोगे? (How do you know that human rights have been violated here? Have you supported someone’s human rights? Will you limit yourself to reading this article?)
    उपर्युक्त आर्टिकल में मानवाधिकारों की प्रासंगिकता:ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान विश्व (Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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Also Available in Hindi:What is Importance of Duty in Life?

6.स्वयं के साथ अन्याय होने पर सैनिक को मानवाधिकार की याद (हास्य-व्यंग्य) (Soldier reminded of human rights when he is wronged) (humor-satire):

  • एक एक कस्बे में धारा 144 और कर्फ्यू लगा हुआ था।छात्र शहर से पढ़कर अपने कस्बे में लौट रहा।
  • सैनिक (छात्र से): कहाँ से आ रहे हैं?
  • छात्र:श्रीमन शहर दूर था,साधन न मिलने से देर हो गई।
  • सैनिकःतुम्हे पता नहीं कस्बे में कर्फ्यू है।
  • छात्र : श्रीमन,आप कहें तो घर न जाने देने पर वापस लौट जाऊँ (शहर)।
  • सैनिक (रौब से): जाओ, सीधे-सीधे घर जाओ,पीछे मुड़ कर मत देखना।
  • छात्र : ठीक है सर।
  • छात्रःसीधे-सीधे बिना पीछे घूमे जा रहा था।अचानक सैनिक ने पीछे से पीठ पर ताबड़तोड़ डण्डे से प्रहार कर दिया।छात्र बेसुध होकर गिर गया।होश आने पर चुपचाप घर चला गया।कर भी क्या सकता था।
  • एक दिन कस्बे में दंगा होने पर भारी भीड़ ने सैनिकों को घेर लिया उसमें वह सैनिक भी था।भीड़ ने उस सैनिक को पकड़ा और पीट-पीट कर मार डाला।
    सैनिक के घर वाले हम मानवाधिकार आयोग में अपील करेंगे। हमारे मानवाधिकारों का हनन हुआ है।
    छात्र (व्यंग्यपूर्वक) (सैनिक के घर वालों को): तुम्हें अपने पर बीतती है तभी मानवाधिकार याद आते हैं।

7.मानवाधिकारों की प्रासंगिकता:ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान विश्व (Frequently Asked Questions Related to Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.मानवाधिकार दिवस कब मनाया जाता है? (When is Human Rights Day celebrated?):

उत्तर:मानवाधिकार दिवस 10 दिसम्बर को मनाया जाता है जो महान् वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबल का जन्म दिन भी है।

प्रश्न:2.मानवाधिकार घोषणा पत्र में कितनी धाराएं हैं? (How many clauses are there in the Human Rights Charter?):

उत्तर:मानवाधिकार घोषणा पत्र में कुल तीस धाराएँ हैं।

प्रश्न:3.मानवाधिकारों का उल्लंघन रोकने में असफलता के मुख्य कारण कौन-कौनसे हैं? (What are the main reasons for failure to prevent human rights violations?):

उत्तर:मानवाधिकारों की दोषपूर्ण जाँच प्रक्रिया,मानवाधिशर के मुद्दे को राजनीतिक बहस का प्रश्न बनाए जाना,मानवीय अधिकारों के रक्षण हेतु कारगर संगठनात्मक व्यवस्था का अभाव,मानवाधिकार घोषणा पत्र के विरोधाभासी उपबन्ध।

प्रश्न:4.मानवाधिकारों का सबसे अधिक उल्लंघन कहाँ होता है? (Where are the most violations of human rights?):

उत्तर:तानाशाही शासकों के देश में जैसे उत्तरी कोरिया,ईराक,अफगानिस्तान आदि में।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा मानवाधिकारों की प्रासंगिकता:ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान विश्व (Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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