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Human Rights Articles & Global Violations: UDHR 30 Articles Explained

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5 5.मानवाधिकारों के उल्लंघन रोकने में असफलता के मुख्य कारण (Main Causes of Failure to Prevent Human Rights Violations):

1.मानवाधिकार लेख और वैश्विक उल्लंघन: यूडीएचआर 30 धाराओं की व्याख्या (Human Rights Articles & Global Violations: UDHR 30 Articles Explained):

  • मानवाधिकार लेख और वैश्विक उल्लंघन (Human Rights Articles & Global Violations) के इस लेख के दूसरे भाग में पढ़ेंगे कि मानवाधिकार की 30 धाराएं कौन-कौनसी हैं और विश्व के कितने देशों में खुलकर मानवाधिकारों का खुलकर उल्लंघन हो रहा है।

Also Available in Hindi:Relevance of Human Rights: Historical Background and Present World

2.मानव अधिकारों की सार्वभौमिक मान्यता की तीस धाराएँ (Thirty Articles of Universal Recognition of Human Rights):

  • उपर्युक्त घोषणा पत्र में तीस धाराएं हैं जो इस प्रकार हैं:
  • (1.)सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र तथा अधिकारों एवं गरिमा की दृष्टि से समान हैं।
  • (2.)प्रत्येक व्यक्ति जाति,रंग,लिंग,भाषा,धर्म,राजनीतिक अथवा सामाजिक उत्पत्ति,जन्म अथवा अन्य किसी प्रकार के भेदभाव के बिना इस घोषणा में व्यक्त किए गए सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं का पात्र है।
  • (3.)प्रत्येक व्यक्ति को जीवन,स्वतंत्रता तथा सुरक्षा का अधिकार है।
  • (4.)कोई व्यक्ति दासता या गुलामी में नहीं रखा जा सकेगा।
  • (5.)किसी व्यक्ति को क्रूर या अमानुषिक दण्ड नहीं दिया जाएगा और न ही उसके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाएगा।
  • (6.)कानून के सामने सभी समान है और किसी भेदभाव के बिना सुरक्षा के हकदार हैं।
  • (7.)सभी को कानून के समक्ष एक व्यक्ति की भाँति मान्यता प्राप्त करने का अधिकार है।
  • (8.)प्रत्येक व्यक्ति को संविधान या कानून द्वारा मिले मूलभूत अधिकारों के हनन पर सक्षम राष्ट्रीय न्यायाधिकरणों द्वारा प्रभावी प्रतिकार प्राप्त करने का अधिकार है।
  • (9.)किसी की भी मनमानी गिरफ्तारी,कैद अथवा निष्कासन नहीं किया जा सकेगा।
  • (10.)प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार व कर्त्तव्य तथा उसके खिलाफ लगे अपराधों के निर्णय के स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायाधिकरण के समक्ष बराबरी के साथ न्यायसंगत आम सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
  • (11.)प्रत्येक व्यक्ति को जिस पर दण्डनीय अपराध का आरोप है तब तक निर्दोष समझा जायेगा जब तक कि उसे खुले तौर पर अभियोग चलाकर जिसमें उसे अपने को निर्दोष प्रमाणित करने की सुविधा होगी,अपराधी सिद्ध नहीं कर दिया जाता।
  • (12.)किसी भी व्यक्ति की पारिवारिक और पत्र-व्यवहार की गोपनीयता में मनमाना दखल नहीं दिया जाएया और न उसके सम्मान एवं प्रतिष्ठा पर आधात पहुँचाया जा सकेगा।
  • (13.)(A)प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक राज्य की सीमा के भीतर कहीं भी आने जाने तथा निवास करने का अधिकार होगा।
    (B) प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश को छोडने का जिसमें उसका अपना देश भी सम्मिलित है तथा स्वदेश वापस लौटने का अधिकार है।
  • (14.)प्रत्येक व्यक्ति को उत्पीडन के विरुद्ध दूसरे देश में शरण माँगने तथा उसका लाभ लेने का अधिकार होगा।
  • (15.)प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्रीयता प्राप्त करने तथा अपनी राष्ट्रीयता बदलने का अधिकार होगा।
  • (16.)(A) पूर्ण वय प्राप्त करने पर स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति,राष्ट्रीयता या धर्म की सीमा के विवाह करने और परिवार बसाने का अधिकार प्राप्त है।
    (B) विवाह के लिए इच्छुक जोड़ों की स्वतंत्र एवं परिपूर्ण स्वीकृति के बाद ही विवाह पंजीकृत किया जाएगा।
    (C)परिवार समाज की प्राकृतिक तथा मूलभूत सामूहिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य का संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त होगा।
  • (17.)प्रत्येक व्यक्ति को अकेले तथा दूसरों के साथ सम्पत्ति रखने का अधिकार है तथा किसी को भी उसकी सम्पत्ति से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जा सकेगा।
  • (18.)प्रत्येक व्यक्ति को विचार अनुभूति तथा धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।इस अधिकार के अन्तर्गत धर्म प्रचार की स्वतंत्रता तथा धर्म या मत परिवर्तन की स्वतंत्रता भी प्राप्त होगी।
  • (19.)प्रत्येक व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।इस अधिकार के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति बिना किसी हस्तक्षेप के कोई भी मत रख सकता है।किसी भी संवाद माध्यम द्वारा सूचनाए एवं विचार खोज सकता है,प्राप्त कर सकता है और दे सकता है।
  • (20.)(A)प्रत्येक व्यक्ति को शान्तिपूर्ण सम्मेलन करने का एवं किसी स्थान पर एक साथ एकत्रित होने और मिलने-जुलने का अधिकार है।
    (B)किसी भी व्यक्ति को किसी संस्था की सदस्यता हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा।
  • (21.)प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकार में,सीधे या स्वतंत्र रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेने का अधिकार प्राप्त होगा तथा प्रत्येक व्यक्ति को उसके देश में जनसेवाएं समान रूप से उपलब्ध होगी।जनमत सरकार के अधिकार का आधार होगा,जिसकी अभिव्यक्ति नियतकालीन तथा वास्तविक निर्वाचनों द्वारा व्यक्त होगी।
  • (22.)समाज के प्रत्येक सदस्य को अपनी गरिमा के लिए अपरिहार्य आर्थिक,सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकार एवं उसके व्यक्तित्व के स्वतंत्र विकास के लिए सामाजिक सुरक्षा का अधिकार प्राप्त होगा।
  • (23.)प्रत्येक व्यक्ति को काम करने का,जीविका के लिए व्यवसाय चुनने का,काम की उचित एवं अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त करने एवं बेकारी से सुरक्षित रहने का अधिकार प्राप्त है।साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को समान कार्य के लिए समान वेतन पाने का अधिकार है।
  • (24.)प्रत्येक व्यक्ति को विश्राम एवं अवकाश का अधिकार है।
  • (25.)प्रत्येक व्यक्ति को एक ऐसा जीवन स्तर कायम करने का अधिकार है जो उसके और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं सुख के लिए पर्याप्त हो।
  • (26.)प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा पाने का अधिकार है।प्रारम्भिक शिक्षा अनिवार्य एवं नि:शुल्क होगी।
  • (27.)प्रत्येक व्यक्ति को समाज के सांस्कृतिक जीवन में स्वतंत्रतापूर्वक भाग लेने का अधिकार है।
  • (28.)प्रत्येक व्यक्ति को एक ऐसी सामाजिक तथा अन्तरर्राष्ट्रीय व्यवस्था का अधिकार प्राप्त है जिसमें इस घोषणा पत्र में निहित अधिकार व स्वतंत्रताएं पूरी तरह से उपलब्ध हो सकें।
  • (29-30)प्रत्येक व्यक्ति के समाज के प्रति कर्त्तव्य हैं जिनके द्वारा उसके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास सम्भव है।प्रत्येक व्यक्ति को अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उपभोग में उन्हीं परिसीमाओं के अधीन रहना होगा जो कानून द्वारा इस उद्देश्य से निर्धारित की गई हैं कि दूसरों के अधिकारों एव स्वतंत्रताओं को अपेक्षित सम्मान एवं प्रतिष्ठा मिल सके और लोकतांत्रिक समाज में नैतिकता सार्वजनिक शान्ति एवं लोक कल्याण की समुचित आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
  • इस प्रकार हम देखते हैं कि मानवाधिकारों की रक्षा हेतु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समुचित संवैधानिक व्यवस्था इस घोषणा पत्र के माध्यम से की गई है।इस घोषणा पत्र के जारी करने के पीछे मूल भावना यही थी कि मानवमात्र के कुछ ऐसे विश्वसनीय अधिकार हैं जो उससे छीने नहीं जा सकते और न ही कोई राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था इन्हें परिमित कर सकती है।राजनीतिक व्यवरथाएं भिन्न-भिन्न होने से मनुष्य की बुनियादी जरूरतें नहीं बदलती।अतः सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं का यह लक्ष्य होना चाहिए कि वे मनुष्य के बुनियादी अधिकारों का सम्मान करें एवं उनकी प्राप्ति में सहायक हों।

3.मानव अधिकार के क्रियान्वयन हेतु संगठनात्मक व्यवस्था (Organizational arrangements for the implementation of human rights):

  • मौलिक अधिकारी को स्वीकार करने के पश्चात् संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन् 1966 में दो संविदाओं आर्थिक,सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकार पर अन्तर्राष्ट्रीय संविदा तथा नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय संविदा तथा इसके ऐच्छिक प्रोटोकॉल को स्वीकार किया।प्रथम संविदा 3 जनवरी 1976 से तथा दूसरी संविदा 23 मार्च,1976 से लागू हो गई।इन संविदाओं द्वारा मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए एक मानवाधिकार समिति का गठन किया गया  है।जो सम्बन्धित सदस्य देशों तथा अन्य देशों को मानवाधिकार हनन सम्बन्धी शिकायतों को स्वीकार करता है तथा इस संविदा को उस राज्य में लागू कराने के लिए सम्बन्धित राज्य से बातचीत करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ ने जातीय भेदभाव एवं अन्य प्रकार की यातनाओं आदि द्वारा मानवाधिकारों के हनन के लिए एक 43 सदस्यीय मानवाधिकार आयोग तथा अल्पसंख्यकों के संरक्षण देने और भेदभाव को दूर करने के लिए एक 26 सदस्यीय विशेषज्ञों का एक उपायोग बनाया है।इस आयोग एवं उपायोग के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के अनेक अभिकरण भी इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।यहीं नहीं मानवाधिकारों के क्रियान्वयन पर निगरानी हेतु निजी स्तर पर भी प्रमुख रूप से निम्न संस्थाएं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत हैं:
  • (1.)इन्टरनेशनल लीग फार ह्यूमन राइटस (1962 में स्थापित) इसे एशियाई देशों में ‘एशिया वॉच’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • (2.)इन्टरनेशनल कमीशन फार ज्यूरिस्ट्स (1952 में स्थापित)
  • (3.)एमनेस्टी इन्टरनेशनल (1962 में स्थापित एवं 1976 में नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित)।
  • (4.)वर्किंग ग्रुप ऑफ दी कमीशन ऑफ ह्यूमन राइट्स
  • (5.)दी पॉलिटिकल कमीशन ऑफ जस्टिस एण्ड पीस

4.विश्व में मानवाधिकारों की स्थिति (The state of human rights in the world):

  • मानवाधिकारों की रक्षा हेतु उपर्युक्त संस्थानिक प्रयत्नों के बावजूद भी विश्व में मानवाधिकारों की स्थिति भयावह है।संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग आधी से अधिक आबादी मानवीय अधिकारों से वंचित है।मानव का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अधिकार है:जीने का अधिकार,लेकिन आज विश्व में लगभग 800-900 मिलियन लोग भुखमरी के कारण अपने इस अधिकार से वंचित हैं।सोमालिया में भुखमरी,इथोपिया के अकाल,सुडान व इनके जैसे अन्य अफ्रीकी देशों की भूख विकासशील देशों की गरीबी,यूगोस्लाविया रुआण्डा के गृहयुद्धों ने मानवाधिकारों को तहस-नहस कर दिया है।अभी कुछ ही समय पूर्व तक गृहयुद्ध की ज्वालाओं में झुलसे सोमालिया में शिशु मारकर खाए जा रहे थे,इथोपिया में लाखों शिशु भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर राख के ढेर में बदल गए थे।फिलिस्तीन,सूडान,थाईलैण्ड में बच्चे बेचे जा रहे थे और आज भी बेचे जा रहे है।अकेले रुआण्डा के गृहयुद्ध में हुतु एवं तुत्सी जनजातियों के मध्य फैली दुश्मनी ने दोनों समुदायों को एक दूसरे के खून का प्यासा बना दिया।अप्रैल 1994 से जुलाई 1994 के मध्य हुतु उग्रवादियों ने करीब 5 लाख लोगों का संहार किया था जिसमें से अधिकांश तुत्सी समुदाय के थे।इसी देश में अप्रैल 1995 में शरणार्थी शिविर पर सैनिकों द्वारा किए गए हमले में 8 हजार लोग एक ही दिन मारे गए।लाशों के सामूहिक अन्तिम संस्कार हेतु कब्रें खोदने के लिए बुल्डोजर्स की मदद लेनी पड़ी।जुलाई 1994 में ही इस देश में हैजे से 16 हजार से अधिक शरणार्थी मारे गए तथा इन लाशों के अन्तिम सरकार की समस्या उठ खड़ी थी।फ्रांस के शान्ति सैनिकों ने विस्फोटों के जरिए गड्ढे खोदकर दो हजार लाशों को सामूहिक रूप से दफनाया था।यूगोस्लाविया के गृहयुद्ध में कितना व्यापक नरसंहार हुआ यह तथ्य सर्वविदित है।आज के इस सभ्यता के युग में भी कुछ वर्षों पूर्व कम्पूचिया में हुए राजनीतिक विद्रोह के दौरान अकेले पालपोट की सरकार द्वारा तीस लाख लोगों की हत्या की गई।
  • मानव सर्वनाश की ये दारूण गाथाएं किस प्रकार के मानव अधिकारों के अस्तित्व की कहानी कह रही हैं? एक ओर इस संसार की धरती पर उपर्युक्त गृहयुद्धों व भुखमरी एवं अकाल के कारण मानव जीने के अधिकार से वंचित हो रहा है।तो दूसरी ओर संसार की तानाशाही ताकतें गरीब देशों पर अपनी धौंस जमाने के लिए नाभिकीय हथियारों के निर्माण एवं प्रसार में संलग्न है। प्रतिक्रियास्वरूप गरीब व विकासशील राष्ट्रों ने अपने यहाँ व्याप्त गरीबी,भुखमरी,महामारी की समस्याओं को नजरअन्दाज करके आणविक हथियारों का आविष्कार किया है और आज भी इस प्रकार के विनाशकारी हथियारों के निर्माण हेतु प्रयासरत है।इन सब परिस्थितियों को देखते हुए मानवाधिकारों का घोषणा पत्र निरर्थक जान पडता है और ये सभी देश तथा यहाँ के नागरिक इन सब थोथे मानवाधिकारों की अपेक्षा केवल शान्ति सम्मान एवं भूख के विरुद्ध रोटी के मानवीय अधिकारों की माँग कर रहे है।
  • मानवीय अधिकारों की घोषणा करते समय यह आशा व्यक्त की गई थी कि विश्व की विभिन्न सरकारें इस घोषणा पत्र को यथोचित सम्मान देते हुए ऐसी कारगर संस्थानिक व्यवस्था करेंगी जिससे मानव अधिकारों की रक्षा की जा सकेगी।व्यवहार में ऐसा नहीं हो सका उल्टे विश्व के कई देशों में अत्याचारों को ही संस्थानिक रूप दे दिया गया।आज से 44 वर्ष पूर्व एमेनेस्टी इन्टरनेशनल ने 1982 में जो रिपोर्ट मानवाधिकारों पर जारी की थी उसमें कहा गया था कि विश्व के लगभग 120 देशों में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।आज विश्व के सौ से भी अधिक देशों में लगभग 10 लाख व्यक्ति राजनीतिक अथवा धार्मिक आधारों पर बंदीगृहों में पड़े हुए है अनेक प्रकार की यातनाएं भोग रहे हैं।इनका दोष सिर्फ इतना है कि इन्होंने न्याय,समानता एवं मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई है जिसके फलस्वरूप उनकी जिन्दगी बिना मुकदमा चलाए ही जेल की सलाखों में कैद है।
  • मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों में केनसारोविबा जैसे कवि को फाँसी की सूली पर लटकाया गया है तो रिगोबर्टा मेथ्यू जैसी नोबेल पुरस्कार प्राप्त समाज सेविका को देश निकाला दिया गया है वहीं आगसांग सू की के शान्ति एवं लोकतन्त्र के संघर्ष हेतु नोबल पुरस्कार को ठोकर मारकर म्यांमार की फौजी हुकूमत द्वारा उन्हें घर के अन्दर नजरबन्द किया गया है। चीन,इजरायल,श्रीलंका,पाकिस्तान,बांग्लादेश,ईरान सहित खाड़ी के व कई अफ्रीकी देशों में क्रूर अत्याचारों को ही राजनीतिक व्यवस्था के तहत संस्थागत रूप देकर इन देशों में राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को अनावश्यक रूप से सताए जाने व हत्या किए जाने से लेकर आम सर्वहारा वर्ग को दासता एवं भुखमरी का जीवन जीने को विवश किया जा रहा है।धर्म की आड़ में मृत्यु दण्ड,छोटे-छोटे अपराधों के लिए सार्वजनिक रूप से कोड़े लगाने,पत्थर मारने,हाथ-पैर काट लिए जाने की सजाए देकर मानवाधिकारों की होली जलाई जा रही है।
  • मानवाधिकार उल्लंघन के सिलसिले में निरीह बच्चों एवं स्त्रियों पर अमानुषिक अत्याचार व उनका पाशविक दमन भी अत्यधिक होता है।गृहयुद्धों एवं अशान्तिकाल में सर्वाधिक जुल्म इन्हीं पर ढहाए जाते हैं।सोमालिया के गृहयुद्ध के दौरान यह आलम था कि यदि वहाँ एक कबीले के इलाके में दूसरे कबीले की स्त्री आ जाती थी तो वह बलात्कार का शिकार होने से नहीं बच सकती थी,बच्चा जिन्दा नहीं जा सकता था,ताजा अनुमानों के अनुसार विश्व में वर्तमान में दस से चौदह वर्ष की आयु के 4 करोड़ लड़के तथा सवा तीन लाख लडकियाँ बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत है।केवल दक्षिण एशियाई देशों में ही विश्व के कुल बाल मजदूरों के 13 प्रतिशत अर्थात् 4 करोड़ 46 लाख बच्चे मजदूरी करने के लिए अभिशप्त हैं।अन्तर्राष्ट्रीय श्रम आयोग के एक अध्ययन के अनुसार सारी दुनिया में बाल श्रमिकों की संख्या 25 करोड़ तक पहुँच चुकी है।
  • भारत में भी औसतन हर तीन बच्चों में से एक बच्चा बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत है।अकेले भारत के उड़ीसा प्रान्त में ही 50 लाख बाल श्रमिक हैं जो उस राज्य की संख्या के 50 प्रतिशत हैं।संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधि हिमबाॅड ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि प्रति सप्ताह हजारो बच्चों का खुलेआम क्रय-विक्रय होता है वह भी उनके माता-पिता की स्वीकृति से,थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक में प्रति सप्ताह 500 बच्चे औसतन बेचे जाते हैं।पाकिस्तान में हर महीने 200 से 400 युवा महिलाओं को बांग्लादेश से चोरी छुपे काम का आश्वासन देकर लाया जाता है और उन्हें वहाँ से 800 से 2000 डॉलर में दूसरे देशों के लोगों के हाथों बेच दिया जाता है।वहाँ की एक महिला कार्यकर्ता के अनुसार ऐसी लगभग दो लाख लडकियों एवं औरतों को बेचा जा चुका है।स्वयं भारत में प्रतिवर्ष 30 हजार नेपाली लड़कियाँ वेश्यावृत्ति के लिए नेपाल से लाई जाती हैं और भारतीय लडकियों को मध्यपूर्व व पश्चिम के देशों को इसी कार्य के लिए भेजा जाता है।
  • पाकिस्तान में हदूद,जिना,किसॉस और जिएत जैसे निर्मम कानूनों की आड में लाखों महिलाएं जेलखानों में कैद होकर अमानुषिक जुल्मों का सामना कर रही है।इन कानूनों ने उल्टे महिलाओं पर अत्याचार करने वालों को संरक्षण प्रदान किया है।वहाँ की एक महिला कार्यकर्ता के अनुसार पाकिस्तान में महिलाओं के साथ उनके सगे-सम्बन्धी तक बलात्कार करते हैं।पाकिस्तान के समर्थित देश संयुक्त राज्य अमरीका ने अपने रक्षा विभाग के प्रतिवेदन में कहा था कि पाकिस्तान में पाँच प्रतिशत महिलाए कैदखानों एवं फौजियों के जुल्मों को बर्दास्त कर रही है।
  • स्पष्ट है कि समूचे विश्व में मानवाधिकारों के उल्लंघन का सिलसिला जारी है।संसार में एक भी देश ऐसा नहीं है जिसमें नागरिकों को वे सब अधिकार प्राप्त हों जिनका घोषणा पत्र में उल्लेख है।जब इन देशों के साथ मानवाधिकारों के उल्लंघन की बात अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाई जाती है तो वे इसे अपनी संस्कृति या सामाजिक व्यवस्था में अनुचित हस्तक्षेप करार देते हैं।इनका तर्क रहता है कि जब विश्व के विभिन्न समाजों की अपनी-अपनी ऐतिहासिक परम्पराएं हैं,अपनी जीवन पद्धति है तो फिर सभी देशों के लिए समान मानवाधिकारों की बात कैसे की जा सकती हैं? इस तर्क में कोई मानवीयता नहीं झलकती है।यदि भारत में जातिप्रथा व अस्पृश्यता है,अफ्रीकी समाजों में रंगभेद व नस्लभेद है तो क्या इन भेदभावों के आधार पर इन देशों के लिए मानवाधिकारों की अलग परिकल्पना हो जो इन भेदभावों को संरक्षण प्रदान करती हो?

Also Available in English:Human rights

5.मानवाधिकारों के उल्लंघन रोकने में असफलता के मुख्य कारण (Main Causes of Failure to Prevent Human Rights Violations):

  • जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों के उल्लंघन को रोकने हेतु मानवाधिकार आयोग एवं उपायोग के रूप में संस्थानिक व्यवस्था है।इसके कई अभिकरण भी है,इसके अलावा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ही कई स्वयंसेवी संस्थाए भी कार्यरत हैं इस सबके बावजूद भी विश्वस्तर पर मानवाधिकार का उल्लंघन जारी है।इस असफलता क्या कारण हैं? इन पर विचार करना समीचीन है।
    मानवाधिकारों के हनन को रोकने में असफलता के कारण निम्नलिखित है:

5(1.)मानवाधिकारों के उल्लंघन की दोषपूर्ण जाँच प्रक्रिया (Flawed investigation process of human rights violations):

  • मानवाधिकार आयोग के पास विश्व के विभिन्न देशों से जो मानवाधिकारों के उल्लंघन सम्बन्धी दिन-प्रतिदिन शिकायतें प्राप्त होती हैं उन्हें,मानवाधिकार आयोग अपनी एक समिति के पास जांच हेतु भेज देता है।इस समिति में अमरीका,रूस,फ्रांस,ब्रिटेन,लेटिन अमरीका तथा अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधि होते हैं।यह समिति इन शिकायतों पर मानवाधिकारों के रक्षण के दृष्टिकोण से नहीं अपितु राजनीतिक दृष्टिकोण से विचार करती है।समिति के सदस्य अपने-अपने देश के प्रतिनिधि होने के कारण अपने देश या सरकार के दृष्टिकोण के अनुरूप ही इस बहस में भाग लेते हैं व अपने देश का बचाव करते हैं।
  • इस प्रकार की बहस के चलते समिति निष्पक्ष जाँच नहीं कर पाती।यदि जाँच निष्पक्ष रूप से करती भी है तो इसके प्रतिवेदन की सिफारिशों पर दूसरी समिति अपनी गुप्त बैठकों में विचार करती है तदोपरान्त उसके प्रस्ताव आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए जाते है।आयोग द्वारा जो प्रस्ताव पारित किए जाते हैं वे शब्दों के कठिन जाल में उलझ कर रह जाते हैं।मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने में आयोग की असफलता को स्वीकार करते हुए इसके एक डच निर्देशक श्री शिओबान बाबेन ने कहा था कि “हम मानवाधिकार उल्लंघन के बड़े मामले से निपटने में सफल नहीं हो पाते हैं,मैं इससे चिंतित हैं,यह है भी बहुत बड़ी चिंता की बात।मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि मैं जितना अच्छा काम बाहर से कर सकता हूँ उतना आयोग में रहते हुए नहीं कर सकता।”

5(2.)मानवाधिकारों के मुद्दे को राजनीतिक बहस का प्रश्न बनाए जाना (Making the issue of human rights a question of political debate):

  • यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सक्रिय पहल से अब यह धारणा बन गई है कि किसी भी देश में घटित मानवाधिकार के उल्लंघन की घटनाओं की उस देश की राजनीति या क्षेत्राधिकार से सम्बन्धित नहीं माना जा सकता,लेकिन जब किसी देश में हो रहे मानवीय अधिकारों के उल्लंघन का आरोप उस देश पर लगाया जाता है तो वह इस तथ्य से मुकुर जाता है एवं उसे अपने आन्तरिक नामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताता है,अथवा इस तरह के आरोपों को अपने देश की सम्प्रभुता के विरुद्ध निरूपित करने लगता है एवं आरोप लगाने वाले देशों की ही कई मुद्दों को लेकर आलोचना करने लगता है।चीन एवं अमरीका इसके प्रमुख उदाहरण है।इस प्रकार मानवीय अधिकार के मुद्दे राजनीतिक बहसों व बौद्धिक व्यायाम में उलझकर अपने उद्देश्य से कहीं दूर भटक जाते है।सत्ता की राजनीति मानवीय अधिकारों को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है।

5(3.)विश्व के कई देशों में मानवाधिकारों के प्रति आस्था का अभाव (Lack of faith in human rights in many countries of the world):

  • विश्व के अधिकांश देश मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों पर निगरानी रखने के लिए व समुचित कार्यवाही करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ के आधीन मानवाधिकार आयुक्त या अन्य कोई प्रभावशाली ऐजेन्सीज का विकास नहीं होने देना चाहते।उन्होंने वियना सहित कई अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में इस प्रकार के प्रस्ताव का इसलिए विरोध किया है कि इस तरह के अभिकरणों की स्थापना से उन्हें अपनी सम्प्रभुता का उल्लंघन नजर आने लगता है।वे नहीं चाहते कि मानवाधिकारों के मामले में उन पर कोई अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण हो।यद्यपि सैद्धान्तिक स्तर पर ये देश मानवाधिकारों का विरोध नहीं करते परन्तु व्यवहारिक स्तर पर इन्हें सम्मान भी नहीं देते।इन देशों का एक तर्क यह भी रहता है कि जब विश्व में ऐतिहासिक परम्पराओं व जीवन पद्धति की एकरूपता नहीं है तो सभी देशों के लिए समान अधिकारों की माँग क्यों की जा रही है,ऐसी माँग को वे अपनी सामाजिक सभ्यता में अनुचित हस्तक्षेप करार देते हैं।

5(4.)मानवीय अधिकारों के रक्षण हेतु कारगर संगठनात्मक व्यवस्था का अभाव (Lack of effective organizational arrangements to protect human rights):

  • संयुक्त राष्ट्र संघ अभी तक कोई ऐसी कारगर संगठनात्मक व्यवस्था विकसित नहीं कर सका है जिसके माध्यम से मानवाधिकारों के उल्लंघन पर निगाह रखते हुए ऐसे उल्लंघनों को सार्थक रूप में रोका जा सके तथा समुचित कार्यवाही की जा सके।इस दायित्व का निर्वहन अधिकांश स्वेच्छिक व स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा किया जा रहा है।संयुक्त राष्ट्र संघ को भी अपनी जानकारी व कार्यवाही के लिए इन्हीं संस्थाओं के प्रतिवेदनों पर निर्भर रहना पड़ता है।यह स्वयंसेवी संस्थाएं मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों पर दबाव नहीं डाल सकती।दबाव की बात तो दूर रही विभिन्न देशों की सरकारें इन  संस्थाओं के साथ सहयोग भी नहीं करना चाहती।अतः यह संस्थाएं केवल सर्वेक्षण कर रिपोर्ट दे सकती हैं और अपने संगठन के माध्यम से पीडितों की कुछ सहायता कर सकती है।

5(5.)मानवाधिकार घोषणा पत्र के विरोधाभासी उपबन्ध (Contradictory provisions of the Human Rights Declaration):

  • मानवाधिकारों की रक्षा में असफलता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा पत्र है।इसमें एक ओर तो व्यक्तियों को मानवाधिकार प्रदान किए गए हैं,लेकिन दूसरी ओर इसमें ऐसे उपबन्ध भी कर दिए गए हैं कि ये अधिकार केवल दिखावे के अलंकरण मात्र रह गए है।
  • उदाहरणार्थ घोषणा पत्र में इस बात को पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है कि घोषणा पत्र में विहित मानवाधिकार निरपेक्ष नहीं हो सकते।इसके अनुच्छेद 29 द्वारा भी इन मानवाधिकारों के उपभोग की सीमाएं निर्धारित कर दी गई है।जिनके अनुसार प्रत्येक देश के कानून के तहत ही इन मानवाधिकारों का उपभोग किया जा सकता है।यदि देश का कानून रंगभेद,नस्लभेद,सामाजिक विषमता और आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने वाला हो तो नागरिक इन भेदभावों के विरुद्ध मानवाधिकारों की माँग नहीं कर सकते।इस दृष्टि से कानून सर्वोपरि होगा तथा मानवाधिकार गौण।इस तरह के प्रावधानों के चलते मानवाधिकारों का क्या औचित्य रह जाता है?
  • जब घोषणा पत्र बना था तब इसके अध्यक्ष ने कहा था कि “यह न तो संधि है और न अन्तर्राष्ट्रीय समझौता और न यह कानून अथवा कानूनी दायित्व का विवरण है और न ही ऐसा होने का दावा करता है।”
  • इस कथन ने पूरे मानवाधिकारों को ही एक मजाक बना दिया है।जब यह न तो कानून ही है न संधि और न ही कोई समझौता तो फिर इसे सम्मान देने की आशा विभिन्न सरकारों से कैसे की जा सकती है।यह घोषणा पत्र विभिन्न देशों की सरकारों के लिए बाध्यकारी नहीं है।यह विभिन्न देशों की सरकारों की इच्छा पर निर्भर है कि वे इस घोषणा पत्र में वर्णित अधिकारों को सम्मान देती है अथवा नहीं।यदि ऐसा नहीं करते तो उनकी मानवाधिकारों के उल्लंघन की किसी कार्यवाही को किसी संधि,समझौते या कानून का उल्लंघन नहीं माना जा सकता और इन्हें मानने हेतु बाध्य भी नहीं किया जा सकता।इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई कानूनी दण्ड का प्रावधान न होने के कारण प्रत्येक देश अपनी सम्प्रभुता और सामाजिक,सांस्कृतिक परिस्थितियों की आड में मानवाधिकारों का सरासर उल्लंघन कर रहा है तथा संयुक्त राष्ट्र संघ मूकदर्शक बनकर इन उल्लंघनों की कार्यवाहियों को देख रहा है।
  • निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि विश्व स्तर पर मानवाधिकारों की घोषणा युद्ध एवं हिंसा के विरुद्ध शान्ति,घृणा के विरुद्ध सहिष्णुता एवं असहयोग के विरुद्ध सहयोग के लिए की गई थी।उपर्युक्त उद्देश्यों को प्राप्त करने में संयुक्त राष्ट्र संघ व इसका मानवाधिकार आयोग पूरी तरह से विफल रहा है।आज विश्व में नागरिक शान्ति,सम्मान एवं भूख के विरुद्ध रोटी के मानवीय अधिकारों की माँग कर रहे हैं।इस अधिकार की माँग के बगैर अन्य मानवाधिकारों का अस्तित्व निरर्थक है,अतः इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु यह समीचीन है कि मानवाधिकारों के इस घोषणा पत्र को अन्तर्राष्ट्रीय कानून का स्वरूप प्रदान करते हुए हस्ताक्षरकर्ता देशों को इस कानून के पालन हेतु बाध्य किया जाए तथा कानून के उल्लंघन की दिशा में सम्बन्धित सरकारों को मानवाधिकारों की हन्ता एवं अशान्ति को उकसाने को दोषी ठहराकर उनके विरुद्ध अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समुचित कार्यवाही के प्रावधान किए जाएं तभी मानवाधिकारों की रक्षा के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकेगा।

6.मानवाधिकार लेख और वैश्विक उल्लंघन: यूडीएचआर 30 धाराओं की व्याख्या का सारांश (Summary of Human Rights Articles & Global Violations: UDHR 30 Articles Explained):

  • (A)मानवाधिकारों से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ तार्किक प्रश्न (Some logical questions for students related to human rights): (1.)आप कैसे निर्णय लेते हैं कि दो व्यक्तियों के मानवाधिकारों में विरोधाभास होने पर, किसके मानवाधिकार न्यायोचित हैं? (How do you decide whose human rights are justified when there is a conflict between the human rights of two people?) (2.)क्या आपके वास्तविक जीवन में मानवाधिकारों के उल्लंघन का कोई मामला सामने आया है? आपकी क्या प्रतिकिग्रा रही? (Have you come across a case of human rights violation in your real life? What was your reaction?) (3.)अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वजूद के बावजूद उल्लंघन क्यों बढ़ते जा रहे हैं? (Why are violations increasing despite the existence of the International Human Rights Commission?) (4.)क्या अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग शक्तिहीन है? यदि हाँ, तो उसे शक्तिशाली बनाने के क्या उपाय हो सकते हैं? (Is the International Human Rights Commission powerless? If yes, what can be the ways to make it powerful?) (5.)क्या मानवाधिकारों में बदलाव की आवश्यकता है? हाँ/नहीं, तो क्यों? (Is there a need for a change in human rights? Yes/No, then why?) (6.)क्या आप ऐसा उदाहरण दे सकते हैं, जिसको सुनकर सम्पूर्ण मानव जाति पीड़ा से कराह हो उठी हो? (Can you give an example that made the whole human race groan with anguish?) (7.)तानाशाह हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को और पोलपोट ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, इस पर आपके क्या विचार हैं? इस प्रकार के मानवाधिकारों के उल्लंघन को कैसे रोका जाएं? (Dictator Hitler killed 60 million Jews and Pol Pot killed millions,what are your thoughts on this? How to prevent this kind of human rights violation?) (8.)क्या विकसित देशों की महत्त्वाकांक्षा के कारण UNO और अन्तर्राष्ट्रीय मानधिकार आयोग अप्रासंगिक हुआ है? (Have the UNO and the International Human Rights Commission become irrelevant due to the ambition of developed countries?) क्या मानवाधिकार राजनीति के शिकार हैं? (9.)क्या UNO के अप्रासंगिक होने का एक कारण यह भी है कि उसकी स्वयं की कोई सेना नहीं हैं? उसकी स्वयं की सेना का इन्तजाम कैसे किया जा सकता है? (Is one of the reasons why the UNO is irrelevant is that it has no army of its own? How can its own army be arranged?) (10.)विकसित देशों की महत्त्वाकांक्षा पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है? (How can the ambition of developed countries be curbed?)
  • (B)मानवाधिकारों से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ गम्भीर प्रश्न (Some serious questions for students related to human rights)
    (1.)मानव अधिकारों की सार्वभौमिक मान्यता की तीस धाराएँ (Thirty Articles of Universal Recognition of Human Rights)
  • (2.)मानव अधिकार के क्रियान्वयन हेतु संगठनात्मक व्यवस्था (Organizational arrangements for the implementation of human rights)
    (3.)विश्व में मानवाधिकारों की स्थिति (The state of human rights in the world)
    (4.)मानवाधिकारों के उल्लंघन रोकने में असफलता के मुख्य कारण (Main Causes of Failure to Prevent Human Rights Violations)
    (5.)मानवाधिकारों के उल्लंघन की दोषपूर्ण जाँच प्रक्रिया (Flawed investigation process of human rights violations)
    (6.)मानवाधिकारों के मुद्दे को राजनीतिक बहस का प्रश्न बनाए जाना (Making the issue of human rights a question of political debate)
    (7.)विश्व के कई देशों में मानवाधिकारों के प्रति आस्था का अभाव (Lack of faith in human rights in many countries of the world)
    (8.)मानवीय अधिकारों के रक्षण हेतु कारगर संगठनात्मक व्यवस्था का अभाव (Lack of effective organizational arrangements to protect human rights)
    (9.)मानवाधिकार घोषणा पत्र के विरोधाभासी उपबन्ध (Contradictory provisions of the Human Rights Declaration)
    उपर्युक्त आर्टिकल में मानवाधिकार लेख और वैश्विक उल्लंघन: यूडीएचआर 30 धाराओं की व्याख्या (Human Rights Articles & Global Violations: UDHR 30 Articles Explained) के बारे में गहराई और विस्तार से जानकारी दी गई है।
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Also Available in Hindi:UN Organisation Security Council

7.जब दरिंदों को याद आए मानवाधिकार (व्यंग्य) (When the Monsters Remember Human Rights) (Satire):

  • (घटना: बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद…)
  • बलात्कारी (वकील से): “वकील साहब, आप राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाकर हमें कैसे भी बचा लीजिए!”
  • वकील: “तुम चिंता मत करो,मैं अपनी वकालत का पूरा तर्जुबा लगाकर तुम्हें बचाऊँगा।”
    (जनता के भारी आक्रोश और आंदोलनों के दबाव में राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर देते हैं।)
  • बलात्कारी (रोते हुए): “वकील साहब,एक बार फिर से याचिका लगाइए ना!”
  • वकील: “हाँ-हाँ, फिर से लगाते हैं…”
    (राष्ट्रपति दोबारा याचिका खारिज कर देते हैं।)
  • पत्रकार (वकील से): “सजा-ए-मौत तय होने पर अब आप क्या कहेंगे?”
    वकील (गंभीर होकर): “यह तो मेरे मुवक्किलों के मानवाधिकारों का सीधा हनन है!”
  • पत्रकार: “और उस मासूम बच्ची का क्या,जिसकी दरिंदगी से हत्या कर दी गई? क्या उसके कोई मानवाधिकार नहीं थे?”
  • वकील:”अरे भाई,लड़के अभी युवा हैं,इस उम्र में थोड़ा भटकाव आ जाता है!मैं इस सजा के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court) जाऊँगा।”
  • आम नागरिक (पास खड़े होकर): “इसे कहते हैं—खिसयानी बिल्ली खम्भा नोचे!”
  • नागरिक (पुनः मुस्कुराते हुए): “वकील साहब, इतना अनुभव किस काम आया? अन्याय की पैरवी करते-करते आप अदालत में पहली बार केस लड़ रही एक महिला वकील से हार गए!”
  • (नागरिक का यह तर्क सुनते ही वकील साहब के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं।)
  • संदेश: न्याय का मतलब केवल अपराधियों के अधिकारों की रक्षा करना नहीं,बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाना और समाज को सुरक्षित बनाना है।

8.मानवाधिकार लेख और वैश्विक उल्लंघन: यूडीएचआर 30 धाराओं की व्याख्या (Frequently Asked Questions Related to Human Rights Articles & Global Violations: UDHR 30 Articles Explained) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.मानवाधिकार दिवस कब मनाया जाता है? (When is Human Rights Day celebrated?):

उत्तर:संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसम्बर,1948 को मानवाधिकार के प्रारूप को स्वीकार किया था।इसलिए इस दिवस को ‘मानवाधिकार दिवस’ के रूप में मनाने का महासभा ने 1950 को प्रस्ताव पारित किया।

प्रश्न:2.मानवाधिकारों का उल्लंघन कौन करता है? (Who violates human rights?):

उत्तर:लगभग सभी देशों में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है।तानाशाही शासक सबसे ज्यादा उल्लंघन करते हैं।उल्लंघन इसलिए होता है क्योंकि मानवाधिकारों का पालन करने की बाध्यता नहीं है।

प्रश्न:3.मैग्नाकार्टा का क्या अर्थ है? (What does Magna Carta mean?):

उत्तर:मैग्नाकार्टा का अर्थ होता है ‘महान अधिकार पत्र’। यही आगे चलकर मील का पत्थर साबित हुआ।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा मानवाधिकार लेख और वैश्विक उल्लंघन: यूडीएचआर 30 धाराओं की व्याख्या (Human Rights Articles & Global Violations: UDHR 30 Articles Explained) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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