Indian Parliamentary System Success or Failure
1.भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता (Indian Parliamentary System Success or Failure):
- भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता (Indian Parliamentary System Success or Failure) किस पर निर्भर करती है? जानिए संसदीय प्रणाली सफल है या विफल।सम्पूर्ण डिटेल स्टेप-बाइ-स्टेप,पक्ष और विपक्ष में विश्लेषण।
Also Available in Hindi:Women Reservation Bill:Exam Key Facts
2.संसदीय लोकतंत्र स्थल संसद में सांसदोॅ का आचरण (The conduct of Members of Parliament (MPs) within the Parliament—the seat of parliamentary democracy):
- सरकार के विभिन्न स्वरूपों में संसदीय लोकतंत्र सबसे मर्यादित एवं प्रतिष्ठित स्वरूप है।लोकतन्त्र मात्र एक शासन पद्धति न होकर एक सार्थक जीवन पद्धति भी है,किन्तु स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती के उपलक्ष्य पर यदि हम भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विगत 79 वर्षों की उपलब्धियों पर एक विहंगम दृष्टि डालें,तो हमें यही दृष्टिगोचर होगा कि भारतीय लोकतंत्र आज विफलता के चरमोत्कर्ष पर विराजमान है।आज जबकि लोकतंत्र के वास्तविक आदर्शों,समानता एवं भ्रातृत्व का समाज में सर्वथा अभाव है,तो ऐसे में हम सफल लोकतंत्र की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं?
- संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली का सर्वोच्च गरिमामय स्थल संसद होता है।किन्तु संसद भवन के अन्दर हमारे जन प्रतिनिधियों का अमर्यादित आचरण जग जाहिर है। एक-दूसरे की आलोचना करना,गाली-गलौज करना,असंसदीय भाषा का प्रयोग करना आम बात है।यही हाल विधानसभाओं का है।उत्तर प्रदेश बिहार,गुजरात की विधानसभाओं ने तो सभी सीमाओं को ही तोड़ दिया।उत्तर प्रदेश विधान सभा में जूते-चप्पल तक चले।सत्ता पक्ष और विपक्ष में भ्रातृत्व की भावना का होना तो दूर की बात है,वे तो एक-दूसरे की बात सुनने तक को तैयार नहीं होते।
- उनका कार्यक्षेत्र जनता का हित न होकर एक-दूसरे की आलोचना करने तक सीमित होकर रह गया है।लोक सभा एवं विधान सभाओं में होने वाली गाली-गलौज,जूतमपैजार तथा मारपीट लोकतंत्र की मृत्यु की सूचनाएँ देते हैं।
- लोकतंत्र का मुख्य आधार चुनाव है,किन्तु यहाँ की तो चुनाव प्रणाली ही वर्षों से दोषपूर्ण रही है।कभी बूथ कैप्चरिंग तो कभी वोटर लिस्ट में मतदाताओं का नाम ही न होना,कभी एक ही व्यक्ति अनेक नामों से वोट दे आता है।लोगों को डरा धमका कर वोटों को इकट्ठा किया जाता है।धन के बल पर वोटों को खरीदा जाता है। जब जनता का मत ही निष्पक्ष न होगा,तो जनता की सरकार बनेगी कैसे?
- चुनावी दौर की अनियमितताओं से ऊबकर आज एक ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ का अपने मताधिकार के प्रति रुझान ही समाप्त हो चुका है।दो या अधिक दलों के गठबंधन या समर्थन से सरकारें बनना आम बात हो गई है।दलीय हितों की स्वाभाविक टकराहट के बाद निर्धारित अवधि से पहले ही ऐसी सरकारें धराशायी होती जा रही है,नतीजा है बार-बार चुनाव।इस तरह जनता का धन इन मध्यावधि चुनावों की भेंट चढ़ता जा रहा है,फलस्वरूप आम मध्यमवर्गीय तो आर्थिक संकट से घिरा ही है,हमारा देश भी लाखों करोड़ों के विदेशी कर्ज में डूबा है।जिस कारण मात्र क्षुधापूर्ति के लिए ही तमाम सामजिक अपराधों में वृद्धि हो रही है।
3.सांसदों की वैशाखी आरक्षण (The ‘crutch’ of reservation for Members of Parliament):
- हमारे संविधान में भारत को एक ‘धर्म-निरपेक्ष राज्य’ घोषित किया गया है,किन्तु आज तक ‘समान नागरिक संहिता’ नहीं लागू की जा सकी है,फलस्वरूप साम्प्रदायिक भावनाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है।धर्म निरपेक्षता का अर्थ सवर्ण हिन्दू का विरोध हो गया है।विभिन्न समुदायों द्वारा समय-समय पर उनके लिए अलग कानून व्यवस्था बनाने की माँग उठती रही है,किन्तु सरकार ने वोट बैंक को ध्यान में रखकर इन मांगों को समूल नष्ट करने का प्रयत्न नहीं किया।
श्रीमती गांधी की हत्या के बाद हिन्दू-सिख साम्प्रदायिकता पर नियंत्रण करने तथा पंजाब की समस्या को निपटाने के गम्भीर प्रयास नहीं किए गए।फलस्वरूप सिख साम्प्रदायिकता का विस्तार हुआ।साम्प्रदायिकता को नया बल तब मिला जब राजीव गांधी सरकार ने आगामी निर्वाचनों के मद्देनजर ‘शाहबानो केस 1985’ में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को अप्रभावी करने हेतु ‘मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक 1986’ पारित किया।इससे मुस्लिम साम्प्रदायिकतावादी नेताओं के हाथ सशक्त हुए,परिणामस्वरूप हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों को उभार मिला।साथ ही उक्त विधेयक ने देश के एक वर्ग की महिलाओं को समानता के अधिकार से भी वंचित किया,जिसका प्रयोग वे समान नागरिक संहिता होने पर अन्य महिलाओं के साथ कर सकती थीं,क्या संविधान में वर्णित ‘समानता के अधिकार’ पर कुठाराघात नहीं है,समानता के बगैर लोकतंत्र की विफलता तो पहले से ही सुनिश्चित थी। - सुदृढ लोकतंत्र का मुख्य आधार शिक्षा है,किन्तु आज हमारे देश के जिस लोकतांत्रिक परिवेश में शिक्षा के अभाव में हमारे नौनिहाल सुबह से शाम तक कंधों पर थैला लटकाए कूड़ा बटोरने में संलग्न है उस देश का लोकतंत्र तो निश्चय ही धराशायी होगा।
- राजनीति और समाज दोनों ही जगह भ्रष्टाचार की जड़ें गहराती जा रही हैं।प्रतिदिन नया घोटाला उजागर होता है,वर्ष ’96 तो ‘घोटाला वर्ष’ ही घोषित हो चुका है। सरकारी कार्यालयों में प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर चपरासी तक कोई भी रिश्वत के बगैर काम ही नहीं करना चाहता है।जिस देश का पूर्व प्रधानमंत्री ही रिश्वतकांड में लिप्त हो और वर्तमान प्रधानमंत्री परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उसके पक्ष में हो उस देश के लोकतंत्र की शोचनीय दशा का अंदाज कौन नहीं लगा सकता है? राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीतिकरण हो चुका है।शायद ही कोई पार्टी हो,जो अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को टिकट न देती हो। ऐसी परिस्थितियों में भय मुक्त समाज की कल्पना ही व्यर्थ है।
- सैद्धान्तिक रूप से देखा जाए,तो हमारे संविधान में आरक्षण की व्यवस्था पिछड़े वर्ग के हितों के लिए दस वर्षों तक की गई थी,किन्तु दलगत राजनीति के तहत और सत्ता-लोलुपता के मद्देनजर हर राजनीतिक पार्टी अपने-अपने एजेंडे में धर्म के नाम पर आरक्षण देना एक मुख्य मुद्दा बनाती है और लोगों की धार्मिक भावनाओं को उभारती है ताकि उसकी पार्टी के वोट सुरक्षित हो सके।सच पूछिये तो आरक्षण व्यक्ति विशेष की आर्थिक स्थिति को देखकर देना चाहिए न कि उसकी जाति के आधार पर।यदि एक पिछड़ी जाति का व्यक्ति किसी उच्च पद पर आसीन हो और उसी के कार्यालय में एक सवर्ण व्यक्ति चपरासी हो,तो ऐसी स्थिति में किसको आरक्षण देना उचित है?
- सुख-सुविधाओं में पल रहे दलित अफसर के लड़के को,या अभावग्रस्त सवर्ण के लड़के को।यदि आप किसी वर्ग का उत्थान करना चाहते हैं,तो उसका श्रेष्ठतम उपाय है कि उसे योग्यता प्रदान करने की व्यवस्था दी जाए,उसमें योग्यता के सृजन की क्षमता जाग्रत की जाए,यदि योग्यता के सृजन की क्षमता जाग्रत होगी तो वह समाज निश्चय ही प्रगति करेगा।आज के वैज्ञानिक युग में जब सभी देश एक-दूसरे से आगे निकलने को तत्पर हैं,तो हम आरक्षण की वैसाखियों के सहारे कब तक दौड़ेंगे।ऐसी स्थिति में हमारा पिछड़ना अवश्यम्भावी है।दलित वर्ग तथा अल्पसंख्यक मुसलमानों को स्थायी रूप से अरक्षा एवं अपमान के मध्य जीवित रहने वाले बताकर हमारे कर्णधार समाज को विभाजित ही नहीं कर रहे हैं,बल्कि इन वर्गों को परस्पर अविश्वासी बना रहे हैं।जब संविधान में उल्लिखित है कि जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा,फिर वर्षों से आरक्षण के संदर्भ पर भेदभाव क्यों हो रहा है?
4.लोकतंत्र का प्रभावी स्थल न्यायपालिका (The judiciary as an effective arena of democracy):
- लोकतंत्र की प्रभावशाली स्तम्भ न्यायपालिका भी शक के घेरे में है।हालाँकि कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका पर न्यायिक सक्रियता का आरोप लगाया जा रहा है,किन्तु सत्य तो यह है कि न्यायिक प्रक्रिया इतनी लम्बी हो चुकी है कि न्याय मिलते-मिलते इतना विलम्ब हो जाता है कि न्याय मिलना,न मिलना एकसमान होता है। कार्यपालिका द्वारा निरन्तर न्यायपालिका पर दबाव डाला जा रहा है,स्वयं मुख्य न्यायधीश इस तथ्य को स्वीकार भी कर चुके हैं।
- लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ समझे जाने वाले प्रेस और मीडिया पर कार्यपालिका द्वारा तमाम अंकुश लगाए जाते रहे हैं।कभी समाचारों में कटौती,तो कभी प्रतिष्ठित दैनिक अखबारों के विरुद्ध हल्ला बोल अभियान,वह भी उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री द्वारा और बसपा अध्यक्ष ने,तो दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में एक पत्रकार को थप्पड ही मार दिया।
- भारतीय संसदीय लोकतंत्र में बेरोज गारी,असमानता,भ्रष्टाचार एवं नैतिक पतन बढ़ रहे हैं,जिस प्रकार आत्मा के निकल जाने पर शरीर जीवित नहीं रह सकता उसी प्रकार लोकतांत्रिक सिद्धान्तों के अभाव में कोई लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता और भारतीय लोकतंत्र इसका अपवाद नहीं है।हमारे संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र की स्थापना के लिए जिन आदर्शों एवं सिद्धान्तों के बीज बोए थे,जब उनमें ही नौकरशाही और लालफीताशाही का घुन लग गया है,तो लोकतंत्र की फसल किस प्रकार सुरक्षित रह सकती है?
- भली-भाँति कैसे फल-फूल सकती है? चुनावों की समाप्त होती निष्पक्षता ने लोकतंत्र का मस्तिष्क कुंठित कर दिया है।नौकरशाही एवं भाई-भतीजावाद ने इसके दोनों हाथ काट दिए हैं।भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद ने इसके पैर तोड़ डाले हैं।विभिन्न राज्यों के मध्य बढ़ते अलगाववाद ने भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी को चरमरा दिया है।सामाजिक न्याय जोकि लोकतंत्र की वाणी है।आज मौन हो चुकी है।स्वतंत्रता,समानता एवं भ्रातृत्व की समाप्ति ने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का हनन कर दिया है और इस प्रकार आज भारतीय संसदीय लोकतंत्र दीन हीन,निरीह एवं पंगु अवस्था में पड़ा हुआ अपनी अन्तिम श्वासें गिन रहा है।
5.भारतीय लोकतंत्र की विफलता के विपक्ष में तर्क (Arguments regarding the failure of Indian democracy):
- भारत में 26 जनवरी,1950 को अपना संविधान लागू किया गया।इस संविधान के अनुसार भारत में गणतन्त्रात्मक संसदीय प्रणाली की स्थापना हुई।आज जब राष्ट्र की स्वतंत्रता के पचास वर्ष पूर्ण हो गए हैं और इस संसदीय प्रणाली पर विविध प्रकार के प्रश्न चिह्न खड़े किए जा रहे हैं जो किसी भी दृष्टि से समीचीन नहीं है।इसे निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है:
- (1.) भारत में संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत बहुदलीय प्रणाली है जिरासे राजनीतिक व्यवस्था कठोर न होकर लचीली है।इसके कारण भारतीय संसद एवं विधानसभाओं में प्रत्येक वर्ग को प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवाज बुलन्द करने में सक्षम हुआ है।
- (2.) भारतीय जनता राजनीतिक चेतना से परिपूर्ण है उसने कभी भी किसी राजनीतिक दल को उसकी गलतियों के लिए माफ नहीं किया और उसे अच्छा सबक सिखाया।1975 ई. में जब तत्कालीन प्रधानमत्री इन्दिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर जनता पर अत्याचार किए तो 1977 ई के चुनाव में उनकी करारी हार हुई और जनता पार्टी की सरकार बनी।इस पार्टी ने भी जनाकांक्षाओं का सम्यक् ध्यान नहीं रखा फलतः 1980 ई के चुनाव में ये पराजित हुए।
1987-88 ई में कांग्रेस शासन काल में अनेक घोटाले प्रकाश में आए परिणामतः 1989 ई के चुनावों में कांग्रेस परास्त हुई।इस बार भी गैर-कांग्रेसी दलों ने जनता को निराश किया और 1991 ई के चुनाव में कांग्रेस सत्तासीन हो गई,परन्तु 1991-96 के दौरान भ्रष्टाचार का ताण्डव नृत्य ऐसा चला कि भारतीय जनता ने कांग्रेस को सबक सिखलाने के लिए उसे अब तक के सबसे नीचले स्तर तक पहुंचा दिया और स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव प्राप्त हुआ। - (3.) भारत में संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत चुनाव आयोग को पर्याप्त अधिकार प्राप्त है।वह चुनावों में होने वाली गड़बडी को प्रभावपूर्ण ढंग से रोकने में पूर्णतः सक्षम है जिसका दर्शन हमें गत कुछ चुनावों में मिला। जहाँ कहीं गड़ीबड़ी हुई भी वहाँ दोबारा मतदान कराए गए।
- (4.)संकटकालीन स्थितियों में समग्र राष्ट्र एवं सभी राजनीतिक दल एक हो जाते हैं,उनमें मतैक्य हो जाता है चाहे चीन का आक्रमण रहा हो या पाकिस्तान का सभी ने हमेशा एकजुटता का परिचय दिया है स्वाभिमान पर खतरा महसूस हुआ तो सभी सीटीबीटी द्वारा जब राष्ट्रीय सुरक्षा व राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर उसका विरोध किया
- (5.)भारत क्षेत्रीय विभिन्नता वाला देश है।संसदीय प्रणाली जनता की आकांक्षाओं के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होती है।अतः यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुई है।
- (6.)इसी संसदीय प्रणाली के कारण व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के मध्य कभी भी कटुता नहीं आई।इसका कारण है कि जो भी कानून बनता है उसमें सांसदों का,जो जनप्रतिनिधि हैं,योगदान रहता है।
- (7.)संसदीय प्रजातंत्र की सफलता के लिए मतदाता का शिक्षित होना आवश्यक है ताकि वह स्वविवेक से अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके।भारत में शिक्षा के प्रसारार्थ अनेक कार्यक्रम चल रहे हैं।फलतः साक्षरता का प्रतिशत निरन्तर बढ़ता जा रहा है।केरल तो पूर्ण साक्षर राज्य बन चुका है।अन्य राज्य भी शनैः शनै: इसी ओर अपना कदम बढ़ा रहे हैं।
- (8.)संविधान में संशोधन द्वारा मताधिकार की अवस्था 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई है।इससे प्रशासन और देश की व्यवस्था में युवा वर्ग की भागीदारी बढ़ी है। साक्षरता की सर्वाधिक प्रतिशतता युवाओं में है अतः वे अपने मताधिकार का प्रयोग सोच-समझकर करते हैं। युवाओं में लगन एवं उत्साह होता है जिससे वे अपेक्षाकृत सही व्यक्ति का ही चयन करेंगे।
- (9.) भारत की स्वाधीनता की स्वर्ण जयन्ती पर संसद में चर्चा हुई जिसमें आर्थिक,सामाजिक,वैज्ञानिक,शैक्षिक,राजनीतिक,नैतिक आदि अनेक विषयों पर सासदों ने अपना मन्तव्य प्रस्तुत किया।यह संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत ही सम्भव था।इसमें जन-भावनाओं का ध्यान रखा गया।सांसदों ने दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर अपने मत प्रस्तुत किए।
- (10.) वर्तमान में हम जो निषेधात्मक प्रवृत्तियाँ देख रहे है,वे निश्चय ही दुर्भाग्य-पूर्ण किन्तु अस्थायी हैं।यदि शरीर को कोई रोग हो जाए तो क्या उसे यह कहकर छोड़ दिया जाएगा कि शरीर रोगग्रस्त है? हो सकता है रोग की चिकित्सा होने पर व्यक्ति रोगमुक्त होकर उन्नति के सर्वोच्च शिखर को चूम ले।यह सही है कि भारत की संसदीय प्रणाली कठिन परीक्षा के दौर से गुजर रही है। हिंसा,साम्प्रदायिकता,भाषा-वाद,भ्रष्टाचार आदि रोग उसे घेरे हुए हैं।क्या हम इन्हीं निषेधात्मक प्रवृत्तियों को देखकर मान लें कि संसदीय प्रणाली विफल हो गई है? नहीं आवश्यकता है एक दृढ संकल्प की।
शिक्षा,आर्थिक विकास,सामाजिक समरसता आदि के माध्यम से हम भारत में पनप रही निषेधात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त कर सकते हैं और तब भारत में अपनायी गई यह शासन प्रणाली एक ऐसे सजीव और जीवन्त राष्ट्रीय एवं सामाजिक जीवन को स्थान देगी जिसमें व्यक्ति के अधिकार और कर्त्तव्यों में सामंजस्य,व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं प्रतिष्ठा एक वास्तविकता बनकर उभरेंगे।इससे एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जिसमें शोषण,अन्याय एवं अत्याचार के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा और वर्तमान शासन-प्रणाली और अधिक सशक्त होगी।इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुनिया के नवीन स्वतंत्रता प्राप्त कई देशो में तानाशाही एवं सैनिक शासन की स्थापना हुई है,परन्तु भारतीय संसदीय प्रणाली अविच्छिन्न रूप से कार्य कर रही है। - (11.)मंत्री एवं सांसद हमेशा जनता के सम्पर्क में रहते हैं फलतः जनता के मन्तव्य को हमेशा स्थान मिलता रहा है।
- (12.)शासन परिवर्तन के समय कभी भी कोई बाधा उत्पन्न नहीं हुई।
- (13.)संसदीय प्रणाली की सफलता के लिए एक सबल विपक्ष की उपस्थिति अनिवार्य है।प्रसन्नता की बात है कि 1989 ई से लेकर आज तक जितने भी लोक सभा चुनाव हुए हैं,प्रत्येक में एक सबल विपक्ष उभरकर सामने आया है।
- (14.)संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत हमेशा वैकल्पिक शासन की व्यवस्था रही है अतः देश को कभी भी सैनिक विद्रोह या तानाशाही का सामना नहीं करना पड़ा है।
- (15.)संसदीय प्रणाली के कारण ही आज तक कोई भी नेता निरंकुश नहीं बन सका।
- उपर्युक्त बिन्दुओं के विश्लेषण के पश्चात् हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि भारत में संसदीय लोकतंत्र विफल नहीं हुआ है वस्तुतः संसदीय लोकतंत्र सम्पूर्ण देशवासियों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
Also Available in English:Parliament of India
6.भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता का सारांश (Summary of Indian Parliamentary System Success or Failure): (A)भारत में संसदीय लोकतंत्र से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ मौलिक प्रश्न (Some fundamental questions for students regarding parliamentary democracy in India):
- (1. ) भारत में संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में आपके क्या विचार है? (What are your views in favor of parliamentary democracy in India?)
(2.) भारत में संसदीय लोकतंत्र के विपक्ष में आपके क्या विचार है? (What are your views against parliamentary democracy in India?)
(3.) क्या तुमने संसदीय लोकतंत्र के बारे में विचार किया है? (Have you given thought to parliamentary democracy?)
(4.)क्या भारत में संसदीय लोकतंत्र की विफलता के कुछ उदाहरण दे सकते हो? (Can you cite examples of the failure of parliamentary democracy in India?)
(5.) तुम यह कैसे जानते हो कि लोकतंत्र सफल है या विफल है? (How do you determine whether democracy is successful or a failure?)
(6.) क्या भारत में प्रत्येक व्यक्ति लोकतान्त्रिक है? यदि हां तो कैसे ? (Is every individual in India democratic? If so, how?)
(7.) क्या तुम्हे लोकतान्त्रिक के स्तर पर गर्व है? क्यों? (Do you take pride in the democratic nature of the system? Why?)
(8.) क्या चुनाव आयोग को पर्याप्त अधिकार प्राप्त है? (Has the Election Commission been granted adequate powers?)
(9) चुनाव आयोग को और अधिक लोकतान्त्रिक कैसे बनाया जा सकता है? (How can the Election Commission be made more democratic?)
(10.)लोकतंत्र सफल बनाने के लिए क्या सुधार करना चाहिए? (What reforms should be implemented to make democracy successful?)
- (B) भारत में संसदीय लोकतंत्र विफल के विचारणीय बिन्दु (Ideological points regarding the failure of parliamentary democracy in India)
(1) संसदीय लोकतंत्र स्थल संसद में सांसदोॅ का आचरण (The conduct of Members of Parliament (MPs) within the Parliament—the seat of parliamentary democracy)
(2.) सांसदों की वैशाखी आरक्षण (The ‘crutch’ of reservation for Members of Parliament)
(3.)लोकतंत्र का प्रभावी स्थल न्यायपालिका (The judiciary as an effective arena of democracy)
(4.) भारतीय लोकतंत्र की विफलता के विपक्ष में तर्क (Arguments regarding the failure of Indian democracy)
उपर्युक्त आर्टिकल में भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता (Indian Parliamentary System Success or Failure) के बारे में विस्तार और गहराई समझाया गया है। - ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
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Also Available in Hindi:What Will Be Future of India in 2047?
7.राजनेता द्वारा शक्ति का दुरुपयोग (हास्य-व्यंग्य) (Abuse of Power by a Politician) (Satire):
- चुनाव आयुक्त ने घोषणा की कि सभी सांसद पाँच लाख की लिमिट तक चुनाव प्रचार में खर्च कर सकते हैं।सांसदों ने पाँच लाख की सीमा क्रास कर दी।
- चुनाव आयुक्त:आपको जितकी लिमिट दी गई थी,उससे बहुत ज्यादा (50 लाख) रुपये खर्च कर दी।
- जनप्रतिनिधि:श्रीमन् वो थ्योरीटिकल बात है,प्रैक्टिकली उसको फोलो कौन करता है।
- चुनाव आयुक्त: आप जो करेंगे,जनता की उस पर नजर रहती है और लोकतन्त्र की सफलता और असफलता आपके आचरण पर निर्भर रहती है।
- जन प्रतिनिधि : आप इस तरह निर्देश दे रहे जैसे सर्वसर्वा हो। हमें ही नियम,कानून सीखा रहे हो।हमारी सरकार आएगी तो तुम्हें देख लेंगे।
- चुनाव आयुक्तः हम आपके रबर स्टाम्प की तरह काम करने वाले नहीं है। आचार संहिता का खुले आप खिल्ली उड़ा रहे और ऊपर से धमकी दे रहे है।
भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता (Indian Parliamentary System Success or Failure)
8.भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता (Frequently Asked Questions Related to Indian Parliamentary System Success or Failure) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.संसदीय लोकतंत्र से क्या आशय है? (What is meant by parliamentary democracy?):
उत्तर:जब लोगों के द्वारा चुने हुए प्रतिनिध संसद में बैठकर नियम और कानून का निर्माण करते हैं तो संसदीय लोकतंत्र कहलाता है।
प्रश्न:2.लोकतंत्र को सफल और असफल बनाने वाले कौन हैं? (Who are the ones who make democracy successful and unsuccessful?):
उत्तर:लोकतंत्र को सफल और असफल बनाने वाले होते हैं:जनता,जनता के द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि और कर्मचारी तथा अधिकारी।
प्रश्न:3.लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनाव आयुक्त की क्या भूमिका है? (What is the role of the Election Commissioner in a democratic system?):
उत्तर:चुनाव आयुक्त चुनाव प्रक्रिया को सही तरीके से सम्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भारतीय संसदीय प्रणाली की सफलता या विफलता (Indian Parliamentary System Success or Failure) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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Satyam
Lekhak Ke Baare Mein (About the Author) **Satyam Narain Kumawat** **Website Name:Satyam Mathematics** *Owner:satyamcoachingcentre.in* *Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)* **Teaching Mathematics aur Anya Anubhav** ***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan ***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav ***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan* ****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science. Updated on 18.06.2026











