Importance of Values in Students life: How to Adopt in Your Life?
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1.छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्वः इसे अपने जीवन में कैसे अपनाएं? (Importance of Values in Students life: How to Adopt in Your Life?):
- छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्वः इसे अपने जीवन में कैसे अपनाएं? (Importance of Values in Students life: How to Adopt in Your Life?),जानिए? इस लेख में मूल्य क्या हैं और उन्हें अपनाने की जरूरत क्यों हैं? एक छात्र के लिए कौन-कौन से मूल्य हो सकते हैं?
Also Available in Hindi:Make Life Better Through Values
2.मूल्यों का अर्थ और महत्त्व (Meaning and Significance of Values):
- चरित्र निर्माण में मूल्यों और आदर्शों का बड़ा महत्त्व होता है।मूल्य एक प्रकार का मानक है।
मनुष्य किसी वस्तु,क्रिया,विचार को अपनाने के पूर्व यह निर्णय करता है कि वह उसे अपनाए या त्याग दें।जब ऐसा विचारभाव व्यक्ति के मन में निर्णयात्मक ढंग से आता है,तो वह मूल्य कहलाता है। - मूल्यों की परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि एक छात्र के लिए मूल्यों की महत्ता क्या है? छात्र जीवन पूरे जीवन की नींव का कार्य करता है और इस छात्र जीवन में जिन मूल्यों की नींव लग जाती है तो पूरा जीवन उसी प्रकार प्रकार जीता है तथा आजीवन उन्हें पूरा करने का प्रयास करता है।बौद्धिक मूल्यों में निरीक्षण शक्ति,तर्क शक्ति,विचार एवं चिन्तन शक्ति (Thought and Thinking Power) आत्मनिर्भरता और कठिन परिश्रम आदि सम्मिलित हैं।सांस्कृतिक मूल्यों में समानता,समरूपता,क्रमबद्धता,नियमितता आदि शामिल हैं।अनुशासनात्मक मूल्यों में शुद्धता,मौलिकता,क्रमबद्धता,ईमानदारी,एकाग्रता,कल्पना,आत्म-विश्वास,शीघ्र समझने की शक्ति,स्मृति आदि का प्रशिक्षण मिल सके जिससे छात्र-छात्रा का मस्तिष्क अनुशासित हो जाए।इसी प्रकार नैतिक मूल्यों में स्वच्छता,यथार्थता,समय की पाबन्दी (Time Management),सच्चाई,ईमानदारी,न्यायप्रियता,कर्त्तव्यनिष्ठा,आत्म-नियन्त्रण,धैर्य,आत्म-सम्मान आदि गुणों का विकास किया जाता है।
- कुछ मूल्य सापेक्षिक महत्त्व रखते हैं।जैसे एक छात्र द्वारा कक्षा में या घर पर दूसरे छात्र-छात्रा की समस्या का समाधान करना या सहायता करना अच्छा कार्य है। परन्तु परीक्षा में किसी छात्र-छात्रा द्वारा प्रश्न या सवाल का उत्तर पूछना या बताकर सहायता करना निन्दनीय है (It is reprehensible to state the answer)।सतही तौर पर इस प्रकार की सहायता करना उचित लग सकता है परन्तु कोई भी मूल्य ऐसा नहीं है जिसके किसी समय हुए उल्लंघन के लिए कोई-न-कोई औचित्यपूर्ण बहाना खोज न लें।किसी भी छात्र-छात्रा द्वारा एक भी अपवाद खोज लेने पर मूल्यों की महत्ता समाप्त हो जाती है।
- बिना मूल्यों का विकास किए,चाहे वे नैतिक,आध्यात्मिक,सांस्कृतिक,बौद्धिक या कोई भी मूल्य हों,छात्र-छात्रा द्वारा प्राप्त सफलता बिना नमक के रोटी खाना है।जैसे नमक के बिना रोटी स्वादिष्ट नहीं लगती है उसी प्रकार बिना मूल्यों के जीवन जीना,सफलता अर्जित करना हमें आन्तरिक उल्लास (Inner Euphoria) प्रदान नहीं करती है।
- मूल्यों से हमारा जीवन महक उठता है,खिल उठता है।छात्र-छात्राओं को जीवन क्षेत्र में कदम-कदम पर मूल्यों का पालन करने की जरूरत पड़ती है और मूल्यों का विकास करने पर हमें इनकी महत्ता का ज्ञान होता है।
3.मूल्यों की सभी क्षेत्रों में अवमानना (Defamation of Values in All Areas):
- यद्यपि हमें निशाशावादी नहीं होना चाहिए तथापि हमें ऐसा महसूस होता है कि मूल्यों में गिरावट के कारण भविष्य अन्धकारमय है।जिस गति से युवा पीढ़ी की आस्था डगमगा या समाप्त हो रही है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि जल्दी ही लोगों का मूल्यों से विश्वास (Belief in values) उठ जाएगा तथा समाज में नैतिकता का भी अन्त हो जाएगा।
- सामाजिक मूल्यों में ह्रास के कारण हमारे बीच सामाजिक पार्थक्य पनप रहा है।अपने आस-पास के परिवेश में हमारी रुचि समाप्त हो रही है।सोशल मीडिया,इंटरनेट पर सर्फिग,टीवी पर आपत्तिजनक सामग्री और अश्लील फिल्मों (Obscene Movies) ने हमारे जीवन का लगभग अन्त कर दिया है।अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए हमें किसी भी सीमा तक गिरने में हिचकिचाहट महसूस नहीं होती है।हमें दिखावा पसन्द है,दिखावा कर हम गौरवान्वित महसूस करते है तथा अनेक लोग तो शायद दिखावा करने (Showing off) के लिए ही जीते हैं।भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने में हमारे अन्दर की मानवीयता कुण्ठित हो रही है।
- महानगरों की स्थिति विकराल रूप ग्रहण कर चुकी है।अधिकांश नर-नारी धनार्जन करने में व्यस्त हैं।अनेक लोग मलिन बस्तियों में जीवन गुजारते हैं व गरीबी ने मूल्यों में उनकी आस्था घटा दी है।संस्थाएँ अपनी व्यवस्था कायम नहीं रखा पा रही हैं।शिक्षा की व्यवस्था भी जर्जर होने वाली है।दहेज,अस्पृश्यता,दवाओं की लत,युवाओं में नशाखोरी (drug-addiction),करों की चोरी,दो नम्बर के धन का संग्रह,कालाबाजारी,धार्मिक उन्माद व सामाजिक-आर्थिक न्याय में कमी आदि ने हमारी नयी सदी की सुखद भविष्य की आशाओं पर पानी फेर दिया है।
- राजनीतिनों की अदूरदर्शिता (Short-sightedness of politicians) व हठधर्मिता निरन्तर मानव मन को उद्वेलित व तनावग्रस्त कर रही है।रोटी के टुकड़ों व रोजगार के लिए भीषण प्रतियोगिता है।सभी ज्यादा से ज्यादा टुकड़ों को बलपूर्वक या फुसलाकर हड़पने के चक्कर में हैं व ऐसा करते समय सभी मूल्य मानकों को शक्ति अर्जित करने के प्रयासों की आंधी में फेंक दिया जाता है।बुद्धिजीवी भी आज संकुचित सुरक्षित निवासों में पलायन करने के लिए सचेष्ट हैं या वे अलग-अलग पड़ गए हैं।संवेग तर्क पर हावी है।जनसाधारण समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की मार से कराह रहा है।तथाकथित मूल्यों व मूल्य-विमुख नेताओं की पूजा हो रही है।
- गम्भीर विद्यार्थी (serious students) स्वयं को विरोधों व भ्रमों में खोया हुआ महसूस करते है।दोहरे नैतिक मानदण्ड आज के जीवन के घर बन गये हैं। लोगों से आज विद्यार्थी कथनी व करनी में छल-कपट सीख रहे हैं।वे भी सामने कुछ कहते हैं व बाद में कुछ और करते हैं।कभी-कभी ऐसा लगता है जो नेता मूल्यों के पक्ष में अधिक तर्क देता है या मूल्यवादी बनने का दिखावा करता है वह अधिक मात्रा में छल-बल प्रपंच का सहारा लेता है व भ्रष्ट होता है (The leader is corrupt)।आज सामाजिक जीवन में मूल्य परिलक्षित नहीं हो पा रहे हैं।व्यक्ति जातिवादी होने लगा है।दूसरों को नीचा दिखाना उसे उचित लगता है।अनेक लोगों को अपना जीवन भार सदृश लगता है।मूल्यों पर अहंवादिता व स्वार्थपरता के रोगागुओं ने आक्रमण कर दिया है।मानव मन दिग्भ्रमित हो रहा है।
वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियाँ भविष्य में हमारे अस्तित्व को शर्मनाक बना सकती हैं।सुखद भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए मूल्यों की शिक्षा अपरिहार्य है।आवश्यक मूल्यों के ह्रास तथा समाज में बढ़ रही कटुता के प्रति अधिक चिन्ता के कारण सामाजिक व नैतिक मूल्यों के विकास के लिए शिक्षा को एक सशक्त साधन बनाने हेतु पाठ्यक्रम में पुनः समायोजन की आवश्यकता है।
4.विद्यार्थी में मूल्यों का विकास कैसे संभव है!(How is Value Development Possible in Students!):
- शिक्षा की व्यवस्था व्यक्ति को बेहतर मानव बनाने के लिए की जाती है।शिक्षित मानव में मानवीय गुण होने ही चाहिए तथा उसे तेजी से बदल रहे इस विश्व में मानवता के कल्याण का विकास हेतु अपना योगदान देने के लिए तत्पर व सक्षम भी होना चाहिए।हमारी शिक्षा व्यक्ति को मूल्यों को समझने,उन्हें व्यवहार में लाने हेतु इच्छुक व तत्पर बनाने तथा मूल्य-संकट की परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना करने में सक्षम बनाने में अधिक कारगर नहीं हो पा रही है।
वैसे मूल्य सिखाना एक कठिन कार्य है परन्तु यह कार्य शिक्षकों को करना ही है।यदि शिक्षक ने मूल्यों को आत्मसात कर लिया है और अपने विषय को पढ़ाते समय वह उपयुक्त समय पर उपयुक्त विषय-वस्तु चुनकर मूल्यों को उभारने हेतु दृढ़ प्रतिज्ञ व प्रयासरत रहता है तो वह मूल्यों को विद्यार्थियों को सम्प्रेषित कर सकता है। विद्यालय के विभिन्न पाठ्य सहगामी क्रिया-कलापों व विद्यार्थी की दिनचर्या को सुसंयोजित करके भी प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से मूल्यों की शिक्षा दी जा सकती है। विद्यालय का मूल्य प्रधान परिवेश मूल्यों के बीजारोपण,अंकुरण व वृद्धि में सहायक हो सकता है। - शिक्षक विद्यालयों में अनेक पाठ्य सहगामी क्रियाओं का आयोजन कर विद्यार्थियों मूल्य विषयक मान्यताओं को व्यवहारपरक बनाने की कोशिश कर सकते हैं।दुर्भाग्यवश आज अनेक विद्यालयों ने अपने कार्यकलापों को शैक्षिक क्षेत्र तक ही सीमित कर रखा है तथा पाठ्य सहगामी क्रियाओं की उपेक्षा की जा रही है।शिक्षकों तथा छात्रों के बीच तालमेल (Synergy between teachers and students) और अनौपचारिक सम्पर्क के अभाव में सामूहिक जीवन,सांस्कृतिक कार्यकलाप तथा खेलकूद या तो होते ही नहीं है अथवा उनका उपयोग बहुत कम किया जाता है।
- खेल खेलना तिरस्कार योग्य क्रिया का रूप ले चुका है। सामूहिक विद्यार्थी व्यक्तिगत मतभेद,ईर्ष्या व पक्षपात की भावनाएँ भुलाकर खेलते हुए दिखाई दे जाते है। अनेक बार खेल के मैदान खेल के दौरान संघर्ष-क्षेत्र में बदल जाते है व श्रेष्ठ खेल (Not being able to play the best game) न दिखा पाने पर प्रतियोगी टीमों के सदस्य खेल भावना का निरादर करने लगते हैं।खेल-शिक्षक का खिलाडियों के साथ सम्पर्क अल्पकालीन ही रहता है व इस कारण वह विद्यार्थियों के मूल्य विकसित करने में स्वयं को असहाय पाता हैं।
- अनेक विद्यालयों में वर्ष पर्यन्त कोई-न-कोई उत्सव,पर्व या सह-शैक्षिक कार्य ही आयोजित होता रहता है। दुर्भाग्यवश ये आयोजन मात्र औपचारिकताओं की पूर्ति तक सीमित रहते है उनमें उद्देश्यनिष्ठता,सृजनात्मकता व व्यवस्था की कमी होती है तथा विद्यार्थियों के मूल्यों को विकसित करने पर कम ध्यान दिया जाता है।अनेक आयोजन में घिसे-पिटे प्रवचन (Worn-out sermons) सुनने की बाध्यता,अस्वस्थ मनोरंजन व आमोद-प्रमोद,बिना मन के पीडितों की सहायता करना,आडम्बरयुक्त भौतिक व्यवस्था,परम्परागत व फिल्मी गानों का गायन,साथियों पर व्यंग्य करने व उनका उपहास करने की क्रियाएँ आदि अवांछनीय तत्व उभर कर सामने आया करते हैं।इनके कारण सह-शैक्षिक आयोजन की उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है।
- विद्यालयों में प्रार्थना में अनेक विद्यार्थी विविध कारणों से भाग नहीं लेते हैं या अनुष्ठानों की तरह सर्वशक्तिमान के प्रति आत्म-निवेदन करते हैं।प्रतिज्ञा को कहना भी हास्यास्पद लगता है व कही गई बातों का अनुसरण करने में विद्यार्थियों को शर्म भी आती है।तोते की तरह रटकर वाचन को सकारात्मक रूप से प्रबलित किया जाता है तथा कथनी और करनी में अन्तर के लिए कोई निषेधात्मक प्रबलक प्रयुक्त नहीं होता।कई लोग प्रार्थना या प्रतिज्ञा के शब्दों व वाक्यों को भी नहीं बोलते तथा अपने होठों की फुसफुसाहट सुनाकर स्वयं की चतुराई का परिचय देते हैं।अनेक बार हमारे शिक्षक व प्रधानाचार्य उपयुक्त समय पर प्रार्थना स्थल पर नहीं पहुँचते फिर विद्यार्थी भी उनका अनुचित आचरण का अनुकरण करने में कोई चूक नहीं करते।
- कुछ शिक्षक ऐसे भी होते हैं जिनकी बातों और व्यवहार में कथनी और करनी में अन्तर देख लेता है तब मूल्यों की शिक्षा निष्प्रभावी हो जाती है।
शिक्षक व शिक्षार्थी आराम से गपशप या बातचीत में तल्लीन रहते है।विद्यार्थी भी प्रार्थना के समय आँखें बन्द कर खड़े तो रहते हैं।परन्तु उनका मन कहीं और होता है। - प्रधानाध्यापक या अतिथियों के नीति सम्बन्धी प्रवचन विद्यार्थियों पर अपना प्रभाव नहीं डाल पाते क्योंकि वे बोझिल,कोरे आदर्शवादी भाषण और अप्रासंगिक लगते है।
5.छात्रा-छात्राओं में मूल्यों का विकास कैसे करें? (How to Develop Values in Students?):
(1.) प्रार्थना सभा (Prayer meeting):
- प्रत्येक विद्यालय में एक प्रार्थना-स्थल होता है जहाँ सभी शिक्षक व विद्यार्थी एकत्र होते हैं तथा सर्वव्यापी व सर्वशक्तिमान के सामने नतमस्तक होकर सम्पूर्ण शुद्धता के साथ याचना करते हैं,आत्म-निवेदन करते हैं,धन्यवाद ज्ञापन करते हैं व सत्यता के मार्ग पर चलने की क्षमता की माँग करते हैं।शिक्षक सुरुचिपूर्ण ढंग से लय व गति के साथ प्रार्थना गाने वाले विद्यार्थियों को चुन सकते हैं।संगीत के उपकरणों का प्रयोग कर आत्म-विभोर होकर गायी जाने वाली प्रार्थना अन्तरतम मानव मन व हृदय में श्रद्धा भक्ति का संचार करती है।
- समय-समय पर विद्यार्थियों को प्रार्थना के अर्थ व उसमें निहित विचारों की उपयोगिता भी स्पष्टतः समझानी चाहिए।प्रार्थनास्थल पर विद्यार्थियों को आत्मानुशासन (self-discipline),मौन ध्यान,एक-दूसरे की लय में व उचित गति से गायन करने आदि में दीक्षित किया जाना चाहिए।प्रार्थना-सभा के कार्यक्रम को रोचक तथा प्रेरणास्पद बनाने के लिए भिन्न-भिन्न दिवसों पर प्रार्थना के उपरान्त शिक्षक या विद्यार्थी द्वारा मूल्य सापेक्ष प्रेरक प्रसंग,सूक्ति कथन,कहानी,जातक कथाओं व संवादों आदि का प्रस्तुतीतकरण कराया जा सकता है।ये कार्यकलाप मूल्य आधारित होने चाहिए।
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(2.) जयन्ती व पर्व (Jubilee & Celebration):
- भारत में विभिन्न धर्मो व मतों के अनुयायी रहते हैं तथा वे अनेक पर्वो व उत्सवों का आयोजन करते हैं।दीपावली,रक्षाबन्धन,होली,रामनवमी,दशहरा,ईदुलफितुर,मुहर्रम,बारावफात,बुद्ध पूर्णिमा,कृष्ण जन्माष्टमी,क्रिसमस डे,गुड फ्राइडे,महावीर जयन्ती,गुरु नानक जन्म-दिवस आदि पर्वों को सम्बन्धित धर्मो के लोग सविश्वास मनाते हैं।इनके अलावा हम 15 अगस्त,26 जनवरी,शिक्षक दिवस,बाल दिवस,राष्ट्रीयता एकता दिवस,गाँधी जयन्ती,सुभाष जयन्ती,विवेकानन्द जयन्ती आदि का भी आयोजना करते हैं।
- इन अवसरों पर धर्म-निरपेक्षता का निर्वाह करते हुए हम सम्बन्धित महापुरुषों के जीवन के प्रेरक प्रसंगों का दृश्य-श्रव्य रूप में अर्थात् व्याख्यान व झाँकियों के माध्यम से प्रभावोत्पादक प्रस्तुतीकरण कर सकते हैं,यथाः श्रीराम से सम्बन्धित शबरी के बेर,कृष्ण-सुदामा प्रसंग,ईसामसीह से सम्बन्चित कोढ़ियों की सेवा,सिद्धार्थ-हंस का प्रसंग,नानक का मस्जिद प्रसंग,बुद्ध जी से सम्बन्धित सुजाता की खीर आदि।
- इनके माध्यम से विद्यार्थियो में भेदभाव न करने (Not discriminating),प्रेम,सेवाभाव,अनुशासन,आत्म-सम्मान,मैत्री,सत्यनिष्ठा,भक्ति,श्रम के प्रति निष्ठा,परोपकार,त्याग,धर्म-निरपेक्षता आदि मूल्य विकसित किये जा सकते हैं।इन मूल्यों के सशक्त संस्कार उत्पन्न करने के प्रयास करके विद्यार्थियों को दिशा-बोध कराना चाहिए।
(3.) वार्षिकोत्सव (Annual Function):
- प्रत्येक शैक्षिक सत्र के अन्त में वार्षिकोत्सव में साहित्यिक,सांस्कृतिक,स्काउटिंग,पुरस्कार वितरण,नैतिक मूल्यों व अन्य मूल्यों के पालन में उल्लेखनीय कार्य करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित व पुरस्कृत करने आदि जैसे क्रियाकलाप आयोजित किए जा सकते हैं।इससे साहस,धैर्य,सहयोग,सेवाभाव,अनुशासन,न्यायप्रियता (righteousness),श्रम के प्रति निष्ठा,निष्ठा,सौन्दर्य-बोध,ईमानदारी,स्वच्छता,भ्रातृत्व,विनम्रता,उत्तरदायित्व आदि मूल्य विकसित किये जा सकते है।
(4.) खेलकूद तथा योगासन (Sports and Yoga):
- आजकल योगासन और खेलों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है।खेल में बच्चे अपनी सुध-बुध खो देते है।जब तक थक नहीं जाते तब तक बच्चे खेलते रहते हैं व अपनी स्वतन्त्रता का आनन्द उठाते हैं।मूल्यों के विकास में उनकी भूमिका उल्लेखनीय होती है।खेलते समय उचित खेल भावना के प्रदर्शन पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए।खेल में अनैतिक आचरण व अनुशासनहीनता से बचने के प्रयास सकारात्मक रूप से प्रोत्साहित किये जाने चाहिए।
- खेल और योगासन के मैदान मूल्य-प्रयोगशालाएँ हैं।मैदान में खेलते समय विद्यार्थी प्रयोग करते हैं।खेलते समय हर पल अनुशासित रहकर वह प्रारम्भिक निराशाओं के बावजूद ईर्ष्या,घृणा,द्वेष,चालबाजी,हिंसा आदि से बचता है और अपना खेल जारी रखता हैं।गलत आचरण करने वाले विद्यार्थियों को कुछ या अधिक समय के लिए खेल,खेलने से रोका जा सकता है।खेलकूद के माध्यम से सत्य बोलने,सहयोग (cooperation),प्रेम,अहिंसा,सहनशीलता,भ्रातृत्व,समानता (equality) आदि मूल्य विकसित किए जा सकते हैं।शारीरिक व्यायाम तथा योग क्रियाओं के माध्यम से स्वास्थ्य,सहयोग,व्यवस्था,सौन्दर्यबोध,सहयोग,सहिष्णुता,शालीनता आदि मूल्य विकसित किए जा सकते हैं।
6.विद्यार्थी स्वयं मूल्यों का विकास कैसे करें? (How Can Students Develop Values on Their Own?):
- (1.) शारीरिक रूप से विकलांग छात्र-छात्राओं को पढ़ने में सहयोग करना,उनको रास्ता या सड़क पार करवाना।पानी पीने या लघुशंका में तकलीफ हो तो सहयोग करना।इससे आपकी खुद की पढ़ाई परिपक्व होती है साथ ही सहयोग की भावना का मूल्य विकसित होता है।
- (2.) निरक्षर व्यक्तियों को पढ़ने में सहयोग करना।उनको धर्मग्रंथ व सत्साहित्य पढ़कर सुनाना।उनको कथा-प्रवचन के माध्यम से रामायाण-महाभारत आदि सुनाने से आपमें धार्मिक भावना जाग्रत होती है।
- (3.)रास्ते में या विद्यालय परिसर में पड़ी हुई वस्तु मिलने पर उसे प्रधानाचार्य को देना।यदि वस्तु,बैग आदि में व्यक्ति या विद्यार्थी की पहचान उपलब्ध है तो सम्बस्थित व्यक्ति या विद्यार्थी तक उस वस्तु,बैग,पुस्तक,रुपये-पैसों को पहुँचाने से आपमें ईमानदारी का मूल्य विकसित होता है और आममें लालच की भावना समाप्त होती है।
- (4.)समाज व कमजोर वर्ग के लोगों के बच्चों व अन्य परिवार जनों की सहायता करना।यदि आप पढ़ने में प्रतिभाशाली हैं तो सवाल,प्रश्न और टाॅपिक समझाकर मदद कर सकते हैं।यदि आप धनाढ्य हैं तो रुपये-पैसों से उन बच्चों व छात्र-छात्राओं की सहायता कर सकते हैं।
- (5.)घर पर सभी के जूतों व चप्पलों को एक स्थान पर रखना।इससे घर व्यवस्थित होता है और आपमें व्यवस्था सम्बन्धी मूल्य विकसित होता है।आपकी जीवनशैली व्यवस्थित होती है।
- (6.)रोगियों (विद्यार्थी) की सहायता व सेवा करना।अपने रोगी सहपाठी या छात्र-छात्रा को आप अस्पताल में दिखा सकते हैं या मरहम पट्टी कर सकते हैं।इससे आपमें सहिष्णुता का गुण विकसित होता है।
- (7.)शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े विद्यार्थियो की सहायता करना।यदि आप धन से सहयोग कर सकते हैं तो उनकी कोचिंग फीस चुकाकर मदद कर सकते हैं।यदि आप पढ़ने में होशियार हैं तो उनकी पढ़ाई में मदद करके सहयोग कर सकते हैं।
- (8.)सामाजिक समस्याओं,जैसे:विधवा विवाह,अस्पृश्यता,आरक्षण,निहत्थे भगवान-भक्तों पर लाठीचार्ज या गोली वर्षा,दहेज,सतीप्रथा आदि पर चर्चा करने से आपमें संवेदना का मूल्य विकसित होता है।
- (9.)अन्य धर्मों व जाति के सहपाठियों के साथ भोजन करना व घूमने से आपमें अस्पृश्यता की भावना पैदा नहीं होती और आपमें धार्मिक सहिष्णुता पैदा होती है।
- (10.)इसके अलावा पौधों को पानी पिलाना,वृक्षारोपण आदि के द्वारा आपमें पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा होती है।
7.छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्व (Importance of values in Students life)का सारांश (Summary of Importance of values in Students lif): मूल्यों के विकास हेतु छात्र-छात्राओं के लिए चिन्तन बिन्दु (Points for Students to Reflect on Developing Values):
- (1.) क्या शिक्षण संस्थानों में मूल्य शिक्षण अनिवार्य होने चाहिए? (Should value teaching be compulsory in educational institutions?)
- (2.) क्या मूल्यों के पक्ष में कोई प्रेरक उदाहरण दे सकते हो? (Can you provide any inspiring examples in support of values?)
- (3.) क्या आपने मूल्यों को सीखने के बारे में अधिक चिन्तन किया है? (Have you given much thought to learning values?)
- (4.) हम आपकी मूल्यों के शिक्षण में किस तरह मदद कर सकते हैं? (How can we help you teach values?)
- (5.) क्या आप मूल्य शिक्षण के पक्ष में ठोस तर्क दे सकते हैं? (Can you provide convincing arguments in favor of value teaching?)
- (6.) क्या आप मूल्यों के इस या अन्य लेख को पढ़ने तक ही सीमित रखते हो या जीवन में अपनाने का प्रयत्न भी करते हो? यदि हाँ तो कैसे ? यदि नहीं तो क्या कठिनाई है? (Do you limit your teaching of values to reading this or other articles,or do you also try to adopt them in your life? If so,how? If not,what are the difficulties?)
छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्व के मुख्य बिंदु (Key Points on the Importance of Values in Students Life): - (1.)मूल्यों का अर्थ और महत्ता।(Meaning and Significance of Values)
- (2.)मूल्यों की सभी क्षेत्रों में अवमानना।(Defamation of Values in All Areas)
- (3.)छात्र-छात्राओं में मूल्यों का विकास कैसे करें? (How to Develop Values in Students?)
- (4.)विद्यार्थी स्वयं मूल्यों का विकास कैसे करें? (How Can Students Develop Values on Their Own?)
- (5.)विद्यार्थी में मूल्यों का विकास कैसे संभव है!(How is Value Development Possible in Students!)
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Also Available in Hindi:4 Top Tips to Adopt Human Values
- उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्वः इसे अपने जीवन में कैसे अपनाएं? (Importance of Values in Students life: How to Adopt in Your Life?) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
8.छात्रा द्वारा परीक्षा में नकल की स्टाईल (व्यंग्य) (Style of cheating in the exam by the girl student):
- एग्जामीनर (संस्कृति से):समझ में नहीं आता है आप नकल कैसे कर लेती हो? और पकड़ी नहीं जाती हो।
- संस्कृति (छात्रा):एग्जामीनर से,मैं समझाती हूँ,आप एक गिलास पानी लाइए।
- एक्जामीनर:संस्कृति को पानी से भरा जग पकड़ाता है। संस्कृति:बस मेरा यही तरीका है।मैंने एक गिलास पानी माँगा परन्तु आपने पूरा जग पकड़ा दिया।इसी प्रकार मैं केवल मस्त-सी मुस्कराहट से छात्र की तरफ देखती हूँ और वह मुझे नकल के लिए उत्तर-पुस्तिका पकड़ा देता है।
- एग्जामीनर:पर आपका नाम संस्कृति है और सांस्कृतिक मूल्यों का कहीं दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है।
- संस्कृति:मुंह में आए हुए पतासे को कोई थूकता है और वैसे भी ये सतयुग के मूल्य हैं।आज मूल्यों के मायने बदल गए हैं।श्रीमन मुझे बदलने के बजाय आप अपने आपको बदलो।
- एग्जामीनर:तुम जो कर रही हो,वह गलत है,आप देश के कर्णधार हो तो सोचो देश का भविष्य क्या होगा?
9.छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्व:इसे अपने जीवन में कैसे अपनाएं? (Frequently Asked Questions Related to Importance of Values in Students Life: How to Adopt it in Your Life?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.मूल्यों को सिखाने का बेहतर माध्यम क्या है? (What better way to teach values?):
उत्तर:शिक्षा किन्हीं मूल्यों और सद्गुणों को विकसित करने के लिए पहले पायदान का काम करती है।शिक्षा की उचित व्यवस्था व्यक्ति को बेहतर मानव बनाने के लिए की जाती है।
प्रश्न:2.वर्तमान शिक्षा की क्या स्थिति है? (What is the current state of education?):
उत्तर:हमारी शिक्षा व्यक्ति को मूल्यों को समझने,उन्हें व्यवहार में लाने हेतु इच्छुक व तत्पर बनाने तथा मूल्य-संकट की परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना करने में अधिक कारगर नहीं हो पा रही है।
प्रश्न:3.छात्रों में मूल्यों का विकास और कैसे हो सकता है? (How else can values be inculcated in students?):
उत्तर:समाजोपयोगी उत्पादक कार्य,बाल दिवस,विद्यार्थी समितियाँ,विद्यार्थी न्यायालय,अभिभावक सम्पर्क व संघ,खुला पुस्तकालय,स्वच्छता कार्यक्रम आदि द्वारा भी छात्र-छात्राओं में मूल्यों का विकास किया जा सकता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र जीवन में मूल्यों का महत्त्वः इसे अपने जीवन में कैसे अपनाएं? (Importance of Values in Students life: How to Adopt in Your Life?) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*












