The Hidden Ill Effects of Corporate Culture on Personal Life & Relationships
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1.कॉर्पोरेट कल्चर के निजी जीवन और रिश्तों पर छिपे हुए दुष्प्रभाव (The Hidden Ill Effects of Corporate Culture on Personal Life & Relationships):
- कॉर्पोरेट कल्चर के निजी जीवन और रिश्तों पर छिपे हुए दुष्प्रभाव (The Hidden Ill Effects of Corporate Culture on Personal Life & Relationships) कैसे बढ़ता जा रहा है? चाहे वह विद्यार्थी हो,व्यवसायी हो,गृहस्थी हो या अन्य कोई व्यक्ति,अपने हर कार्य में कारपोरेट कल्चर का मुखौटा कैसे लगाया जा रहा है? जानिए कम्प्लीट डिटेल।
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2.कारपोरेट कल्चर का अर्थ और घुसपैठ (The Meaning and Infiltration of Corporate Culture):
- कारपोरेट कल्चर का तात्पर्य यह है कि हमारे सभी सम्बन्ध,हमारे हर कार्य के पीछे केवल और केवल व्यावसायिकता की घुसपैठ हो गई।आज सम्बन्धों का निर्वाह भी व्यावसायिक तौर तरीकों में बदल गया है। हँसते-हँसाते भी हैं तो उसके पीछे अपना व्यावसायिक हित साधना होता है।यदि किसी व्यक्ति की इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वह आज के कारपोरेट कल्चर के तौर-तरीकों से सम्बन्धों का निर्वाह कर सके तो उससे मिलने के लिए सब कतराते है।सगे-सम्बन्धी भी अजनबी की तरह व्यवहार करते हैं।
- स्कूल-कॉलेज और कोचिंग सेक्टर कहने को विद्या के केन्द्र हैं परन्तु उसके पीछे खेल कारपोरेट कल्चर का ही चलता है।सब दुहाई यही देते हैं कि आज का कल्चर है। यदि जमाने के अनुसार नहीं चलोगे तो जमाने के लोग तुम्हें दरकिनार कर देंगे।फिर अकेले तप-साधना और योग विद्या का राग अलापते रहना,कोई भी पासंग में भी फटकने वाला नहीं है।
- छात्र-छावाएँ भी इस रंग में रंगते जा रहे है।पाश्चात्य संस्कृति का यह तो अभी ट्रेलर है,आगे देखिए क्या-क्या होता है? नया मुल्ला अल्ला-अल्ला करता है।अभी तो पाश्चात्य संस्कृति का प्रवेश ही हुआ है लेकिन इसके दुष्प्रभाव नजर आएंगे तब समझ आएगा।हर चीज की मार्केटिंग की जा रही है।किसी से रिश्ता निभाना है तो किस तरह के कपड़े पहनने है,कितनी देर रुकना है,क्या-क्या कहना है आदि की स्क्रिप्ट तैयार कर ली जाती है।ऊपर-ऊपर से मिठास और सद्व्यवहार दिखाया जाता है परन्तु अन्दर से कुछ और ही नजर आता है।
- शादी विवाह के आयोजन में सम्मिलित होना है तो मीठी-सी (फीकी सी) मुस्कान के साथ लिफाफा पकड़ाया और प्रीतिभोज किया और चलते बने।बस एक बार मुख्य व्यक्तियों वर-वधु के माता-पिता को दिखाई दिए और रवाना।आत्मीयता के अलावा सबकुछ नजर आता है।विद्यार्थी विद्या ग्रहण करने के लिए विद्यालय नहीं जाता है।वह विद्यालय इसलिए जाता है कि इससे उसको क्या फायदा है और क्या नुकसान है? पढ़ाई करने से आज के कारपोरेट कल्चर के अनुसार जॉब मिलेगा या नहीं।वेतन कितना मिलेगा इसका पहले ही गुणा भाग कर लिया जाता है।विद्या का क्या करना है?
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3.जीवन बन गया कारपोरेट कल्चर (Life has become corporate culture):
- भारत देश ने कभी किसी युग में विश्व परिवार का,मानवीय संबंधों के सुखद संसार का सपना देखा था।यहाँ के मनीषियों ने वसुधैव कुटुम्बकम् के सूत्र का प्रवर्तन किया था,लेकिन यह बात बीते युग की है।आज के युग का सच तो कॉरपोरेट कल्चर का है,जिसने विश्व परिवार के सपने को विश्व बाजार की हकीकत में बदल दिया है।
- यहाँ इनसानी रिश्ते हैं तो सही,पर उनका रूप बदला हुआ है।दिखावा है,लुभावनी बातें हैं,पर साथ में फायदे-नुकसान का गणित भी है।मिठास तो बहुत है,पर कंटकों की चुभन में लिपटी हुई।ऐसा लगता है कि इनसानी रिश्तों का संसार दुकानदार और खरीददार (Shoppers and buyers) के तिजारती गलियारे तक सिमट कर रह गया है।
- यह नहीं है कि कॉरपोरेट संस्कृति की शुरुआत से पहले जरूरी चीजों की खरीद-फरोख्त नहीं होती थी।आवश्यक वस्तुओं का विनिमय विपणन प्रत्येक युग का सच रहा है।इसके बिना तो मानवीय जीवन (Human life) कभी संभव ही नहीं हो सकता,परंतु हमेशा,हर युग में यह केवल जीवन का एक हिस्सा रहा है;भले ही इसमें महत्त्वपूर्ण और अनिवार्यता के कितने ही विशेषण क्यों न जोड़े गए हों,लेकिन कॉरपोरेट संस्कृति के चलन से सर्वथा एक नया ही परिदृश्य उभर कर सामने आया है।इसमें जीवन का एक हिस्सा नहीं,बल्कि संपूर्ण जीवन ही बाजार और व्यापार नजर आने लगा है।बड़े शहरों में बनी बहुमंजिली इमारतों में बने भव्य शोरूमों से लेकर गाँवों के गलियारों तक इसके पाँव पसरते जा रहे हैं।
- पहले कभी थोक और फुटकर के हिसाब से बड़े और छोटे व्यापारियों की क्षमताओं का आकलन होता था,पर अब यह गणित गड़बड़ा गया है।अब तो अंतरराष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर देशी दिग्गज (Native Giants),सभी एक जैसी रस्साकशी कर रहे हैं।
- अब तो मार्क्स एंड स्पेंसर,शॉपराइट,कॉस्टाकाफी आदि विदेशी रिटेलरों के रिटेलिंग डेस्टीनेशन (Retailing Destinations) देश के कोने-कोने में नजर आ रहे हैं।इनमें से कई नाम ऐसे भी हैं,जो इस क्षेत्र में प्रवेश का प्रयास कर रहे हैं।इनमें वॉलमार्ट,टेस्को,कैडियो,एच एंड एम,डेबेन हेम्स की गिनती की जा सकती है।
जीवन को बाजार बनाने वालों में अपने देशी दिग्गज भी पीछे नहीं हैं।यदि ध्यान से सुनें तो इनमें (1) बिगबाजार (पेंटालून रिटेल); (2) स्पेंसर (आर०पी०जी० रिटेल); (3) रिलायन्स रिटेल; (4) आदित्य विक्रम बिड़ला रिटेल (त्रिनेत्रा); (5) भारती वालमार्ट; (6) चौपाल; (7) विशाल मेगामार्ट और (8) शुभेच्छा की आवाजें सुनी जा सकती हैं।यही नहीं,इन जैसे और भी हैं,जो इस होड़ में हैं कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को व्यापार और बाजार में कैसे तबदील किया जाए।गाँव-चौबारे,खेत-खलिहान,होली-दीवाली,ईद-क्रिसमस,लोहड़ी-पोंगल,कहीं भी,किसी भी क्षेत्र को,किसी भी अवसर को बाजार और व्यापार (Trade & Markets) में बदल देने की तकनीक इन्हें बखूबी आती है।
- कहानी है तो पुरानी,पर प्रासंगिक है।कथा डाकू खड़ग सिंह और भोले संत बाबा की है।कथा कहती है कि साधु स्वभाव के बाबा के पास एक अच्छी नसल का बेशकीमती घोड़ा था।जिसे उनसे छीनने के लिए डाकू खड़ग सिंह ने हर जतन किए छल-बल की युक्ति और कुटिलता,सभी का सहारा लिया,परंतु सचेत सावधान बाबा ने उसकी हर चाल नाकामयाब कर दी।
- फिर अंत में उसने बाबा की भावनाओं को छलने के लिए व्यूह रचा।एक दिन शाम को जब बाबा अपने घोड़े की पीठ पर बैठे सैर पर जा रहे थे,उन्होंने एक लँगड़े की दरद भरी पुकार सुनी:”अरे मुझसे चला नहीं जाता,मुझ लँगड़े की मदद करो बाबा!” बाबा इस दरद भरी पुकार पर अपने को रोक न सके और उन्होंने घोड़े पर खड़ग सिंह को बिठा दिया।कथा कहती है कि डाकू खड़ग सिंह अपनी सफलता पर हँसा।तब बाबा ने दरद भरे स्वर में कहा:”अपनी यह चालबाजी किसी को मत कहना खड़ग सिंह !अन्यथा कोई किसी लँगड़े की मदद नहीं करेगा।
- कॉरपोरेट संस्कृति ने मानवीय संबंधों पर अपनी जो दूषित छाया डाली है,उसका सच भी यही है।पता नहीं,डाकू खड़ग सिंह ने अपनी सफलता की कथा किसी को सुनाई थी या नहीं,परंतु कॉरपोरेट जगत अपने प्रत्येक उत्पाद से जुड़े विज्ञापन (Product ads) में संबंधों की संवेदना का हरण कर रहा है।आज के दौर में रिश्तों की भी ब्रांड वैल्यू हो गई है।वह प्यार,प्यार ही क्या,जिसमें किसी विशेष ब्रांड का उपहार शामिल न हो।पति-पत्नी,भाई-बहन,पिता-पुत्र,माता-पुत्री के बीच संबंध अनायास ही किसी न किसी विशेष ब्रांड,विशेष कंपनी अथवा किसी खास उत्पाद से जुड़ गए हैं।
- केवल वस्तुएँ ही नहीं,बल्कि शब्दों में गुँथे विचार और भाव भी इस दायरे में हैं।अब प्रायः प्रत्येक अवस्था के लिए और प्रत्येक संबंध के लिए ग्रीटिंग कार्ड (Greeting Cards) है।किसी से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है,सब कुछ स्वभावतः ही लिखा और छपा है।टी०वी० के अनगिनत चैनल,एफ० एम० रेडियो, इंटरनेट की अलग-अलग वेबसाइटें,मोबाइल कंपनियाँ आज इसका आसान जरिया बन चुकी हैं।मानवीय संबंधों में न तो पवित्र प्यार की गहराई बची है और न संवेदना की मिठास बस,केवल आकर्षक उपहारों एवं बनावटी बातों का दिखावा रह गया है।
- जो संबंधों के संवेदना-शिल्प को समझते हैं,उन्हें इसके प्रत्येक चरण का ज्ञान भी है।इस प्यार का खुलासा करें तो इसे पाँच बिंदुओं में कहा जा सकता है-(1) आकर्षण; (2) परिचय; (3) अनुबंध; (4) संबंध एवं (5) संस्कार।प्रत्येक संबंध की शुरुआत किसी न किसी पारस्परिक विशेषता के आकर्षण से होती है।यही आकर्षण (That’s the charm) बाद में परिचय और गहरी जान-पहचान में बदलता है।यदि यह अवस्था बनी रही तो परस्पर के अनुबंध उभर कर आते हैं इनमें परिचय की प्रगाढ़ता तो होती है,लेकिन कुछ शर्तें भी होती हैं और ये शर्ते कतिपय दूरियाँ एवं मर्यादाओं को बनाए रखती हैं।
5.कारपोरेट कल्चर ने बड़ा उल्ट-फेर कर दिया (Corporate culture has made a big upset):
- बाद में संवेदना की सघनता में ये शर्तें विलीन हो जाती हैं और संबंधों की संवेदना व्यावहारिक परिचय,वैचारिक मिलन (Ideological meeting) के दायरे से ऊपर उठकर भावनात्मक परिपक्वता का रूप ले लेती है।यहीं पर सार्थक संबंधों का सृजन होता है।इस अवस्था में पहुँचने पर संबंध-संस्कार बनते हैं,जिनकी अवधि वर्तमान तक सीमित न रहकर जन्म-जन्मांतर की सीमा तक फैली होती है।भारत की संस्कृति एवं परंपरा का सच यही रहा है।
- लेकिन कॉरपोरेट संस्कृति ने इसमें बड़ा उलट-फेर कर दिया है।अब स्थिति यह है कि जो संबंध स्वभावतः ही किसी न किसी संस्कारवश अस्तित्व में आए हैं,वे भी दम तोड़ रहे हैं।पिता-पुत्र,माता-पुत्री अथवा फिर ऐसे ही अन्य प्रगाढ़ भावनात्मक रिश्ते कॉरपोरेट कल्चर के ब्रांडों के अनुबंधों में सिमटकर रह गए हैं।
- आज जो भी रिश्ते हैं अथवा हो रहे हैं,उनमें आकर्षण का प्राथमिक चरण,परिचय का द्वितीय चरण और अनुबंध का तृतीय चरण भर है।इन तीनों ही अवस्थाओं में संबंधों की मिठास (The sweetness of relationships) का कितना ही दावा क्यों न किया जाए,परंतु यथार्थ सच तो अनुभवी ही जानते हैं।यदि मनपसंद कंपनी के उपहार एवं मनचाही शर्तें मंजूर हैं तो ‘आई लव यू’ और यदि इनमें तनिक सी चूक हुई तो ‘आई हेट यू’ कहने में देर नहीं लगती।इनसानी रिश्तों में हो चुके इस भारी उलट-फेर को अनुभव करके ही तो एक मशहूर शायर ने कहा है:”अब यह तिजारत का मामला है- रूह के लिए नहीं,बाजार के लिए शेर लिखे जाते हैं।”
- उपर्युक्त आर्टिकल में कॉर्पोरेट कल्चर के निजी जीवन और रिश्तों पर छिपे हुए दुष्प्रभाव (The Hidden Ill Effects of Corporate Culture on Personal Life & Relationships) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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6.विद्यार्थी पर कारपोरेट कल्चर का प्रभाव (हास्य-व्यंग्य) (The Impact of Corporate Culture on Students) (Humour-Satire):
- टीचर:ये उत्तर पुस्तिका में प्रश्नों के उत्तर क्यों सजा रही हो।
- छात्रा:सर,ये प्रोफेशनल लगेगा और टीचर देखते ही नम्बर दे देगा।
- टीचर:पर उत्तर सही होगा,प्रश्न के मुताबिक होगा तभी तो अंक मिलेंगे।
- छात्रा:सर,आप आज के कारपोरेट कल्चर को नहीं समझ पा रहे हैं।अन्दर कुछ भी हो पर सजावट अच्छी होनी चाहिए।
7.कॉर्पोरेट कल्चर के निजी जीवन और रिश्तों पर छिपे हुए दुष्प्रभाव (Frequently Asked Questions Related to The Hidden Ill Effects of Corporate Culture on Personal Life & Relationships) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.कारपोरेट का क्या अर्थ है? (What is the meaning of corporate?):
उत्तर:कॉर्पोरेट’ (Corporate) शब्द का संबंध व्यापार, कंपनियों और निगमों (Corporations) से होता है। यह एक ऐसी व्यावसायिक संस्था को दर्शाता है जो कानून द्वारा पंजीकृत होती है और अपने मालिकों से एक अलग स्वतंत्र कानूनी पहचान रखती है।
प्रश्न:2.कारपोरेट संस्कृति से क्या आशय है? (What do you mean by corporate culture?):
उत्तर:कॉर्पोरेट संस्कृति (Corporate Culture): यह किसी कंपनी के काम करने के तौर-तरीकों,नियमों, पहनावे और माहौल को संदर्भित करता है।
प्रश्न:3.कॉर्पोरेट नाम” का हिंदी में क्या अर्थ होता है? (What does “corporate name” mean in Hindi?):
उत्तर:Corporate name का हिंदी में अर्थ “कंपनी का नाम” या “निगमित नाम” होता है।यह किसी व्यवसाय या निगम का वह आधिकारिक और कानूनी नाम है जिसे सरकारी अधिकारियों (जैसे रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़) के पास पंजीकृत किया जाता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा कॉर्पोरेट कल्चर के निजी जीवन और रिश्तों पर छिपे हुए दुष्प्रभाव (The Hidden Ill Effects of Corporate Culture on Personal Life & Relationships) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*










