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6 Golden Ways to Become Prudent

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1.विवेकशील बनने के 6 स्वर्णिम तरीके (6 Golden Ways to Become Prudent):

  • विवेकशील बनना क्यों जरूरी है? विवेकशील कैसे बनें? जानिए सम्पूर्ण डिटेल विवेकशील बनने के 6 स्वर्णिम तरीके (6 Golden Ways to Become Prudent)।इन 6 तरीकों पर अमल करके आप विवेकशील बन सकते हैं।

Also Available in Hindi:3 Tips to Keep Devotion for Students

2.विवेकशील बनने का परिणाम (The Result of Becoming Discerning):

  • केवल चेहरा देखकर चरित्र बताने का दावा करने वाले एक ज्योतिषी ने शिष्य-मण्डली के मध्य विराजमान यूनान के जाने-माने दार्शनिक सुकरात को लक्ष्य करके कहा था कि इस व्यक्ति में क्रोध कूट-कूट कर भरा है। इसके नथुनों की रचना से यही झलकता है;इसके माथे और सिर की रचना के हिसाब से यह निश्चित रूप से एक लालची व्यक्ति होगा;इसकी ठुड्‌डी बताती है कि यह बिल्कुल सनकी है।इसके होठ और दाँतों के आकार को देखकर लगता है कि यह हमेशा देशद्रोह के लिए लालायित रहता है
  • सुकरात ने ज्योतिषी की बातों को शांतिपूर्वक सुना और पुरस्कार देकर उसको ससम्मान विदा किया।
    शिष्यों के मनोभावों को देखते हुए सुकरात ने उनसे कहा कि ज्योतिषी ने जो कुछ कहा सब ठीक ही कहा।उसके द्वारा इंगित समस्त अवगुण मेरे भीतर मौजूद हैं,परन्तु मैं अपने विवेक द्वारा उन सभी अवगुणों पर अंकुश लगाए रहता हूँ।बस ज्योतिषी यही बताना भूल गया।सुकरात ने जो बात अपने बारे में कही थी,वह वास्तव में हम सबके,मनुष्य मात्र के विषय में लागू होती है।चंचल मन मदोन्मत्त हाथी की भाँति उदंडतापूर्वक आचरण करना चाहता है।केवल विवेक का अंकुश ही मनरूपी मस्त हाथी को नियंत्रित कर सकता है।गीता में आता है कि अर्जुन ने मन की चंचलता के प्रति अपनी अवशता की ओर इंगित करते हुए कहा था:यह मन बड़ा चंचल और प्रमथन स्वभाव वाला है तथा बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु की भाँति अति दुष्कर मानता हूँ” अर्जुन के कथन से सहमति प्रकट करते हुए कृष्णजी कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य द्वारा उसको वश में किया जा सकता है।प्रकृति ने मनुष्य मात्र को अवगुणों की और ले जाने वाला मन और उस पर अंकुश लगाने में समर्थ विवेक प्रदान किए है। महात्मा सुकरात उस अंकुश का प्रयोग करने में समर्थ थे।अतः ज्योतिषी द्वारा इंगित समस्त अवगुण उनमें विद्यमान थे तथापि विवेक के अंकुश द्वारा वे अप्रभावी बन गए थे।
  • सचमुच विवेक की शक्ति अपार है।आचार्य चाणक्य ने ठीक ही कहा है कि विवेकी मनुष्य को पाकर गुण सुन्दरता को प्राप्त होते हैं और अवगुण कुंठित होकर, जैसे-सोने से जड़ा हुआ रत्न अत्यन्त सुशोभित होता है। ज्योतिषी ने भी अपने विवेक का प्रयोग नहीं किया,अन्यथा वह पात्र का विचार करने के उपरान्त ही अपनी बात कहता।यदि उसने विवेक से काम लिया होता,तो वह सुकरात के विषय में सत्य कथन करने में समर्थ होता।उक्त ज्योतिषी की स्थिति कहानी के उस लाल बुझक्कड़ की तरह समझी जानी चाहिए जिसने “गोल-गोल और बीच में छिद्र है”:इतना पता बताने पर हाथ की मुट्टी में बंद वस्तु को अँगूठी न कहकर चक्की का पाट बता दिया था।
  • यूरोप के चिन्तक मैकियावली ने इस प्रकार के व्यक्तियों को लक्ष्य करके ठीक ही कहा है कि साधारण मनुष्य सत्य की अपेक्षा बाहरी आकार से ही अनुमान लगाते है। नेत्र सभी के होते हैं,किन्तु किसी-किसी को ही विवेक द्वारा प्रेरित अतलदर्शी सामर्थ्य का वरदान प्राप्त होता है।

3.विवेक के साथ कर्म और धर्म का तालमेल (Harmony of Karma and Dharma with Prudence):

  • कोई भी मशीन हो,सब प्रकार दुरुस्त होने पर भी उसके कुशल संचालन के लिए सक्षम चालक की अपेक्षा होती है।मानवरूपी संयंत्र के कुशल संचालन के लिए जिस सक्षम चालक की आवश्यकता होती है,उसी का नाम विवेक है।विवेक का लक्षण भले और बुरे के,शुभ और अशुभ के,शिव और अशिव के तथा सत्य और मिथ्या के मध्य अंतर स्थापित करके शिव पक्ष को ग्रहण करना है। हंस पक्षी दूध के अंश को ग्रहण कर लेता है और उसमें मिले हुए पानी के अंश को छोड देता है।उसके इस विवेकी स्वरूप को लक्ष्य करके आत्मस्वरूप को जान लेने वाले सिद्ध साधक को हंस की उपाधि द्वारा विभूषित किया जाता है।
  • विवेक सचमुच बुद्धि की पूर्णता है।अंग्रेजी विद्वान एडीसन ने एक स्थान पर लिखा है कि “मनुष्य के मन-मस्तिष्क में अनेक गुण होते हैं,परन्तु विवेक के समान कोई उपयोगी नहीं होता है।विवेक शेष गुणों को सार्थकता प्रदान करता है और प्रत्येक को सही दिशा में कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है,जिससे वे अपने स्वामी का हित साधन कर सकें।विवेक के अभाव में समस्त ज्ञान पाण्डित्य-प्रदर्शन एवं मिथ्याभिमान बनकर रह जाता है,बुद्धिमानी धृष्टता का रूप ले लेती है और सद्‌गुण दुर्बलता के द्योतक बन जाते हैं और अन्ततः विवेकहीन मनुष्य अपने पूर्वाग्रहों का दास बन जाता है। यद्यपि किसी एक व्यक्ति में समस्त गुण है,तथापि वह विवेक के अभाव में जीवन और जगत के लिए अनुपयोगी बना रहता है,परन्तु उसमें यदि यही एक गुण है,तो वह अपने जीवन में इच्छानुसार अग्रसर होता चला जाता है।
    ” सुकरात सदृश समस्त महापुरुषों की महानता का रहस्य केवल इस वाक्य में निहित समझना चाहिए कि वे सही समय पर सही निर्णय लेने में समर्थ रहे थे।इस सत्य का दूसरा पक्ष भी इतना ही यथार्थ है कि विवेक से विमुख महानतम् व्यक्तियों को असफलता का मुँह अथवा पतन का गर्त देखना पड़ा है।
  • विवेक हमारा वास्तविक बल है।राम-चरितमानस में धर्मस्थ का निरूपण करते हुए भगवान श्रीराम ने स्पष्टत इंगित किया है कि “बल विवेक दम परहित घोरे” अर्थात् मानव के शरीर रूपी रथ का वास्तविक बल विवेक है,महर्षि पतंजलि ने विवेक को उच्चतम स्तर पर मनुष्य का पथ-प्रदर्शक बताया है:”भौतिक बन्धन से मुक्त होने का उपाय है पूर्ण विवेक से काम लेना।” अंग्रेजी के प्रसिद्ध नाटककार शैक्सपीयर ने भी काव्योचित शैली में इसी बात को थोड़े से घुमाव के साथ व्यक्त किया है:”अपने विवेक को अपना शिक्षक बनाओ।शब्दों का कर्म से और धर्म का शब्दों से मेल कराओ।शैक्सपीयर के कथन को हृदयंगम करने के लिए इस फ्रांसीसी कहावत पर गम्भीरतापूर्वक मनन कीजिए “Think what you like,say what you ought.” अर्थात् तुमको क्या अच्छा लगता है,इस पर विचार करो और कहने का अवसर उपस्थित होने पर वही कहो,जो तुमको कहना चाहिए।” संकट और संशय के अवसर उपस्थित होने पर विवेक ही हमारा मार्गदर्शन करता है।
  • विवेकहीन व्यक्ति गलत निर्णय लेता है और विवेकशील मनुष्य सही निर्णय लेता है।विवेकशील व्यक्ति कीचड़ में पड़े हुए रत्न को भी ग्रहाण कर लेता है,विवेकहीन भीलनी हाथी के मस्तक में उत्पन्न मोती को त्यागकर गुंजा की माला धारण करती है।विवेक विमुख कैकेयी को श्रीराम को वनवास देकर आजन्म आत्म-ग्लानि में गलना पड़ा और अपने हिताहित का सम्यक ज्ञान न रहने के कारण त्रिलोकजयी रावण ने अपने सर्वनाश को आमंत्रित किया।
    विवेक वास्तव में जीवन को सुरक्षित भी रखता और उसको जीने योग्य भी बनाता है।”विवेक जीवन का नमक है”:यह कथन किसी ऐसे व्यक्ति ने कहा होगा जो ज्ञान वृद्ध होने के साथ अनुभव वृद्ध भी रहा होगा। सम्भवतः विवेक का पर्याय होने के कारण ही नमक को रामरस कहा जाता है।
    एक बहुत प्रसिद्ध लोकोक्ति है:”If you lose the head,you lose the battle” अर्थात् “अगर तुम सिर खो देते हो,तो युद्ध में परास्त हो जाते हो” इस कथन में सिर पर श्लेष है।यदि तुम्हारा सिर कट जाता है,तो तुम पराजित घोषित किए जाते हो।यदि तुम विवेक को छोड़ देते हो तो सफलता तुमसे कोसों दूर भाग जाती है।जीवन में विजयी होने के लिए विवेकी होना अनिवार्य है। महाकवि शेक्सपीयर का यह कथन स्मरणीय है:”पराक्रम का प्रमुख अंग विवेक है। “

4.विवेक को कैसे जागृत करें? (How to awaken the conscience?):

  • हम घर में बैठे हैं।यकायक हमारा एक सुहृदय दौड़ता हुआ आता है और हमसे शरण एवं सुरक्षा की भाँग करता है।यह कहते हुए:हथियारों से लैस गुण्डे मेरी हत्या करने की नीयत से मेरे पीछे आ रहे है।हम तत्काल उस व्यक्ति को आश्वस्त करते हैं कि हम प्राण देकर भी तुम्हारी रक्षा करेंगे और हम उसको अपने घर के एक ऐसे कोने में छिपा देते हैं।जहाँ कोई भी अजनबी आदमी आसानी से न जा सके।इतने में ही हथियारबन्द चार गुण्डे घर में घुस आते हैं और पूछते हैं कि अमुक व्यक्ति (हमारा सुहृद) क्या आपके यहाँ आया है? हम बेझिझक कह देते हैं:नहीं।गुण्डे चले जाते हैं।सुहृदय के जीवन की रक्षा हो जाती है।यह जानते हुए भी कि झूठ बोलना पाप है,सत्यं वद् जीवन का शाश्वत मूल्य है,हम झूठ बोलते हैं।आखिर क्यों? हमारा विवेक बिना संकोच के झूठ बोलने के लिए हमसे कह देता है।वह कहता है लक्ष्य के व्यापकत्व पर धर्म का महत्त्व निर्भर करता है।उक्त स्थिति में सत्य बोलकर हम हत्या सदृश पाप के भागी बन जाते।
  • जीवन में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियों भी आ जाती है जब सर्वमान्य मूल्यों एवं मान्यताओं को त्यागना श्रेयस्कर प्रतीत होता है।प्रश्न उत्पन्न होता है कि इन परिस्थितियों में ऐसा करना ही वांछनीय होगा,इसका निर्णय कौन कर सकता है,तथा यह निर्णय किस आधार पर किया जाता है? उत्तर है कि विवेक अन्तिम निर्णय करने में सक्षम है।क्योंकि वह आत्मतत्व का अंश है तथा अहंकार द्वारा आवृत्त या आछन्न नहीं होता है।
  • हम सामान्यतः कीचड़ से दूर रहते हैं।हम यह भी सहन नहीं कर सकते हैं कि कीचड़ की एक छींट भी हमारे कपड़ों पर गिरे,परन्तु कीचड़ में पड़े हुए रत्न अथवा स्वर्ण को देखकर उसको प्राप्त करने की इच्छा से तत्काल कीचड़ में हाथ डाल देते हैं।क्योंकि विवेक निर्णय देता है कि कीचड़ द्वारा गंदगी से होने वाली हानि की अपेक्षा रत्न/स्वर्ण की प्राप्ति हमारे लिए अधिक मूल्यवान है।कीचड़ की गंदगी क्षणिक है,रत्न/स्वर्ण से होने वाला लाभ कहीं अधिक स्थायी है।भले-बुरे,अस्थायी स्थायी के मध्य निर्णय करने में समर्थ बनाने वाली शक्ति अथवा आत्मतत्व का नाम ही विवेक है।इस प्रश्न का उत्तर देना शेष रह जाता है कि किसी निर्णय को हम विवेक प्रेरित किस प्रकार मानें! इसके लिए सुधीजन ने दो कसौटियाँ निर्धारित की है।प्रत्येक कसौटी के साथ तीन प्रश्न जोड़ दिए गए है,यथा:
    कसौटी नं. एक इसके साथ जुड़े हुए तीन प्रश्न है:
  • (क) प्रस्तावित कार्य को यदि वे लोग करने लगें,जिनके प्रति हमारे मन में सम्मान का भाव एवं पूज्य बुद्धि है,तो क्या हमें अच्छा लगेगा?
    (ख)प्रस्तावित कार्य/व्यवहार यदि कोई अन्य हमारे प्रति करे,तो क्या हमें अच्छा लगेगा?
    (ग)प्रस्तावित कार्य को यदि सब लोग करने लगें,तो क्या वह जनहित में होगा?
  • यदि तीनों प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ में आते हैं,तो हमें मान लेना चाहिए कि प्रस्तावित कार्य विवेक सम्मत अथवा विवेक प्रेरित है।यदि एक भी प्रश्न का उत्तर स्पष्ट ‘हाँ’ में नहीं आता है तो हमें मान लेना चाहिए कि प्रस्तावित कार्य की प्रेरक आवाज विवेक की न होकर अहंकार की है।कसौटी नं. दो इसके साथ संलग्न प्रश्न ये हैं:
    (क)प्रस्तावित कार्य क्या लोभवश किया जा रहा है?
    (ख) प्रस्तावित कार्य क्या भयवश किया जा जा रहा है?
  • (ग) प्रस्तावित कार्य क्या प्रमाद या आलस्यवश अथवा केवल किसी का साथ देने के लिए किया जा रहा है।
    तीनों प्रश्नों के उत्तर ‘नहीं’ में आने पर प्रस्तावित कार्य विवेक प्रेरित माना जाना चाहिए।एक भी प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ में आने पर कार्य को ‘अहकार’ प्रेरित मानना होगा।उक्त दोनों कसौटियों का प्रयोग आरम्भ में सायास करना होता है।अभ्यास के फलस्वरूप कालान्तर में यह परख अनायास अथवा स्वाभाविक रूप में होने लगती है।फलस्वरूप व्यक्ति में शीघ्रता से निर्णय करने की अ‌द्भुत सामर्थ्य सृजित हो जाती है।इस कोटि के व्यक्ति को नीर-क्षीर विवेकी हंस-बुद्धि कहा जाता है।हम अंहकार से जितने विमुख या दूर रहते हैं,उतने ही अधिक विवेक के निकट अथवा सम्मुख रहते हैं।लोक व्यवहार की कसौटी के अनुसार विवेकशील व्यक्ति विनम्र तथा अहकारी व्यक्ति उद्धत् होता है।

5.विवेकशील बनने के कुछ प्रमुख बिन्दु (Some Key Points for Being Discerning):

  • विवेक आत्मतत्व है।अतएव उसके घटने-बढ़ने का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता है,परन्तु उसकी प्रभावशीलता न्यूनाधिक हो सकती है।विवेक की कल्पना यदि हम लालटेन की चिमनी के पीछे जलने वाली दीपशिखा के रूप में करें,तो हम सहज भाव से कह सकते हैं कि चिमनी पर जमी हुई गंदगी के अनुसार दीपशिखा का प्रकाश न्यूनाधिक रूप में प्रकट होता रहता है।अहंकार के घटने बढ़ने के अनुसार विवेक का प्रभाव अथवा उसकी व्यावहारिक शक्ति बढ़ती घटती रहती है।जैसे सूर्य स्थायी एवं एक स्थान पर रहते हुए,हम संसारियों को उदय और अस्त होता लगता है,उसी तरह अहंकार के घटने-बढ़ने पर विवेक बढ़ता-घटता प्रतीत होता है।
    बादल सूर्य के प्रकाश को ढक नहीं पाते हैं।केवल अस्थाई रूप से उसके प्रकाश के विकिरण में बाधा उत्पन्न कर देते हैं।इसी प्रकार विवेक को अहंकार आच्छादित नहीं कर पाता है।जब अहंकार घटता है तो विवेक बढ़ा हुआ प्रतीत होता है और जब अहंकार बढ़ता है,तो विवेक घटा हुआ प्रतीत होता है।यही कारण है कि भिन्न-भिन्न लोगों के विवेक के स्तर में अन्तर पाया जाता है।
  • एक ही व्यक्ति अहंकार के बढ़ने पर विवेकशून्य कृत्य करता है तथा जब अहंकार घट जाता है,तो वही व्यक्ति विवेकपूर्ण आचरण करने लगता है।विवेकशील व्यक्ति शत्रु के प्रति भी इस प्रकार का भाव रखता है कि वह जानता नहीं है कि वह क्या करता है? विवेकशीलता महानता को जन्म देती है और अहंकार से मुक्ति प्रदान कर देती है।ध्यातव्य यह है कि विवेक केवल बुद्धि के माध्यम से ही क्रियाशील होता है।अतः अल्प बुद्धि वाले व्यक्ति का विवेक भी अल्प दिखाई देता है।
    अहंकार को कम करके विवेक का विकास किया जाए,यह विधि नकारात्मक है।सकारात्मक रूप में विवेक का विकास तब स्वतः होता रहता है,जब व्यक्ति विचारों में,वाणी में तथा कर्मों में सतत विवेक के अनुरूप ही क्रियाशील रहता है।विवेक का आदर करने में ही विवेक का विकास निहित है।कार्यान्वित न होने पर विवेक कुंठित हो जाएगा और उसकी उपस्थिति सन्देह के घेरे में आ जाएगी।जो व्यक्ति अपने को विवेकी कहे या समझे और विवेक रहित आचरण करे उसकी तुलना फारसी के शायर के शब्दों में उस व्यक्ति से की जाएगी जो व्यक्ति जानता नहीं है,परन्तु जानता है कि मैं जानता हूं,वह अज्ञान के गहन अन्धकार में आकण्ठ निमग्न है और अनन्तकाल तक उसके उद्धार की कोई सम्भावना नहीं है।
  • विवेक की व्यावहारिक उपयोगिता को लक्ष्य करके अंग्रेजी के विश्व विश्रुत नाटककार विलियम शेक्सपीयर ने लिखा है कि “अपने विवेक को अपना शिक्षक बनाओ,शब्दों का कर्म से और धर्म का शब्दों में मेल कराओ।” आगे चलकर वह यहाँ तक कह देते हैं कि पराक्रम का प्रमुख अंग विवेक है।इतिहास ऐसे व्यक्तियों की करुण गाथाओं से भरा पड़ा है,जिनके विवेकशून्य होने पर उनका पराक्रम निष्फल हो गया।नीतिकार चाणक्य ने विवेक को स्वर्णाभूषण में जड़े हुए रत्न के समान बताया है:
  • विवेकिनमनुप्राप्ता गुणा यान्ति मनोज्ञताम्।
    सुतरां रत्नमाभाति यामीकरनियोजितम्।।
  • अर्थ:विवेकी को पाकर गुण सुन्दरता प्राप्त करते हैं।जब रत्न सोने में जड़ा जाता है,तब अत्यन्त सुन्दर दिखाई पड़ता है।
    मोटर की हैडलाइट मोटर के आगे के मार्ग को बराबर प्रकाशित करती रहती है,भले ही मोटर शत सहस्त्र किलोमीटर तक चलती रहे।इसी प्रकार,जीवन के मार्ग में व्यक्ति जैसे-जैसे अपने विवेक के अनुकूल आचरण करता चला जाता है,उतना ही आगे का मार्ग विवेक प्रकाशित रखता चला जाता है।अपने विवेक के प्रकाश के आधार पर प्रत्येक मनुष्य जीवन में सब कुछ उपलब्ध कर सकता है।शर्त केवल विवेक के अनुकूल आचरण करते रहने की है।
    विवेक की शक्ति की कुंजी उसके अनुरूप आचरण में निहित है।इस आधार पर यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि हमारे लिए आचरणविहीन विवेक तथा विवेक विहीन आचरण समान अपराध हैं।

Also Available in English:Prudence

6.विवेकशील बनने के 6 स्वर्णिम तरीके का सारांश (Summary of 6 Golden Ways to Become Prudent):

  • (A)विवेकशील बनने से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ प्रमुख महत्त्वपूर्ण प्रश्न (Some of the most important questions students have to ask about being rational)
    (1.)विवेकशील बनने से तुम क्या समझते हो? (What do you mean by being discerning?)
    (3.) क्या तुमने विवेकशील बनने के लिए विचार किया है? (What do you think you need to do to become discerning?)
    (2.) विवेकशील बनने के लिए तुम्हारे विचार से क्या करना चाहिए? (Have you thought to be prudent?)
    (4.) विवेकशील बनने के क्या परिणाय हो सकते हैं? (What are the consequences of being discerning?)
    (5.) विवेक हमारी किस तरह सहायता करता है? (How does conscience help us?)
    (6) क्या सफलता के लिए विवेकशील होना पर्याप्त है? (Is prudence sufficient for success?)
    (7.) विवेक के बिना हमारी क्या दशा हो सकती है? (What can be our condition without conscience?)
    (8.) क्या तुमने विवेकशील बनने के बारे में विचार किया है? (Have you thought about becoming reasonable?)
    (9.) क्या शिक्षण संस्थानों में विवेक को जागृत करना का प्रयास करना चाहिए? (Should efforts be made to awaken conscience in educational institutions?)
    (10.) विवेकशील बनने के लिए अध्ययन सामग्री से कहाँ से जुटाना चाहिए? (Where should one gather study material to become discerning?)
  • (B)विवेकशील बनने के महत्त्वपूर्ण बिन्दु (Important Points of Being Discerning)
    (1.)विवेकशील बनने का परिणाम (The Result of Becoming Discerning)
    (2.)विवेक के साथ कर्म और धर्म का तालमेल (Harmony of Karma and Dharma with Prudence)
    (3.) विवेक को कैसे जागृत करें? (How to awaken the conscience?)
    (4.)विवेकशील बनने के कुछ प्रमुख बिन्दु (Some Key Points for Being Discerning)
    उपर्युक्त आर्टिकल में विवेकशील बनने के 6 स्वर्णिम तरीके (6 Golden Ways to Become Prudent) के बारे में विस्तार और गहराई से बताया गया है।
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Also Available in Hindi:3 Tips to Use Discretion to Solve Math

7.विवेक और वैभव में से किसे चुनें? (हास्य-व्यंग्य) (Which one to choose between prudence and splendor? (Humor-Satire):

  • एक बार दो मित्रों ने एक्सीडेंट में एक धनाढ्य व्यक्ति की जान बचायी।धनाढ्य व्यक्ति ने विजिटिंग काड देते हुए दोनो दो मित्रों को अपने ऑफिस बुलाया।दूसरे
  • दिन दोनों मित्र धनाढ्य के ऑफिस बहुँच गये।
  • धनाढ्य व्यक्ति (पहले मित्र से):तुम्हें क्या चाहिए?
  • पहला मित्रःमुझे ज्ञान चाहिए।
  • धनाढ्य व्यक्ति ने उसकी विद्या प्राप्त का प्रबन्ध कर दिया।
  • धनाढ्‌य व्यक्ति (दूसरे व्यक्ति से): तुम्हे का चाहिए?
  • दूसरा मित्र : मुझे धन चाहिए।
  • धनाढ्य व्यक्ति ने दूसरे मित्र को काफी धन देकर विदा कर दिया।
  • कुछ वर्षों बाद पहला मित्र दूसरे के घर (ज्ञान प्राप्ति के बाद) गया।उसे फटेहाल में देखकर आश्चर्य चकित हुआ।
  • पहला मित्र:तुम्हारी यह दुर्दशा क्यों हुई ?
  • दूसरा मित्र:मैं धन-दौलत पाकर बुरे व्यसनों में फँस गया।

8.विवेकशील बनने के 6 स्वर्णिम तरीके (Frequently Asked Questions Related to 6 Golden Ways to Become Prudent) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.बुद्धि का विवेक से क्या सम्बन्ध है? (What is the relation of wisdom to conscience?):

उत्तर:विवेक बुद्धि की पूर्णता है,जीवन के सभी कर्त्तव्यों में वह हमारा पथ-प्रदर्शक है।

प्रश्न:2.विवेक कैसे उत्पन्न होता है? (How is discernment generated?):

उत्तर:सत्संग,स्वाध्याय और उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है।विवेक होने में क्षणिक वस्तुओं से शोक और आनन्द ये दोनों नहीं होते।

प्रश्न:3.विवेक की मिठास क्या है? (What is the sweetness of conscience?):

उत्तर:विवेक जीवन का नमक और कल्पना उसकी मिठास है।एक उसको सुरक्षित रखता है और दूसरा उसे मधुर बनाता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विवेकशील बनने के 6 स्वर्णिम तरीके (6 Golden Ways to Become Prudent) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

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