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Mathematician Euclid

1.गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid),यूक्लिड (Euclid):

  • गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) के जन्म और मृत्यु का ठीक-ठीक पता नहीं है।इतना अवश्य मालूम है कि उसका समय 300 ईसा पूर्व के लगभग था।यूक्लिड की प्रारंभिक शिक्षा महान् दार्शनिक प्लेटो (अफलांतून) की अकादमी में हुई थी।यह अकादमी एथेंस नगर में स्थित थी।टोलेमी प्रथम (Ptolemy I) के राज्यकाल (306 ईस्वी पूर्व से 283 ईस्वी पूर्व) में यूक्लिड ने सिकंदरिया (अलेक्जेंड्रिया) (Alexanderia) में एक स्कूल खोला।ऐसा कहा जाता है कि एक बार इसके एक शिष्य ने ज्यामिति का प्रथम साध्य पढ़ने के बाद कहा कि इसके सीखने से क्या मिलेगा। यूक्लिड ने अपने नौकर से कहा कि इसे 6 पेनी (मुद्रा का नाम) दे दो क्योंकि यह प्रत्येक बाद में लाभ (धन) ही चाहता है।ज्यामिति एक बहुत बड़ा भवन है।ज्यामिति के अनेक प्रमेय,कृत्य तथा सिद्धांत इस भवन की ईंटें,लोहा तथा सीमेंट विभिन्न स्थानों पर विभिन्न लोगों द्वारा तैयार होकर भवन-निर्माण के स्थान पर पहुंचते हैं,उसी प्रकार ज्यामिति के विभिन्न प्रमेय तथा सिद्धांत विभिन्न देशों के विभिन्न विद्वानों ने खोज निकाले थे।
  • अब जरूरत थी ज्यामिति का एक मजबूत महल तैयार करने की।अब जरूरत थी एक ऐसे ‘दिमाग’ की जो उपलब्ध सामग्री को एकत्र करके एक महल की योजना तैयार कर सके।ज्यामिति के महल की योजना तैयार की यूक्लिड ने।
  • विज्ञान का हर विषय एक भवन है।इस भवन का निर्माण करने के पहले इसकी एक सुनियोजित योजना तैयार करनी पड़ती है।इस भवन की नींव के बारे में गंभीरता से सोचना पड़ता है।नींव जितनी ही मजबूत होगी,भवन उतना ही अधिक दिनों तक कायम रहेगा।
  • यूक्लिड की ज्यामिति की परिभाषाएं,अभिधारणाएं (पोस्टुलेट्स) तथा स्वयंतथ्य ज्यामिति की नींव हैं। इसी नींव पर यूक्लिड ने अपनी ज्यामिति के ग्रंथ की भव्य इमारत खड़ी की।
  • परिभाषाएं किसी विशेष विज्ञान के विषयों की मौलिक बातों का अर्थ स्पष्ट करती है या इसकी सीमाएं निर्धारित करती है।इसीलिए यूक्लिड ने सबसे पहले बिंदु,रेखा आदि ज्यामितीय धारणाओं की व्याख्या की है।किसी भी विज्ञान के लिए पहले परिभाषाओं की जरूरत होती है,इस बात पर अरस्तू ने जोर दिया था।उसने कहा था कि ज्यामिति के लिए बिंदु,रेखा आदि जैसी मूल धारणाओं को स्वीकार कर लेने से काम चल सकता है।तदनंतर इन मूल धारणाओं से निर्मित प्रत्येक आकृति-त्रिकोण,आयत और उनके गुणधर्म का अस्तित्व सिद्ध करना होता है।मूल धारणाओं से आकृतियों के निर्माण की अरस्तु की इस पद्धति का ही गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) ने अनुकरण किया है।इसके माने यह नहीं है कि ज्यामिति की नींव की सभी बातें अरस्तू की देन है।ऊपर जो तीन परिभाषाएं दी गई है,वे अवश्य अरस्तू की देन है।परंतु यूक्लिड ने ओर भी अनेक परिभाषाएं दी हैं और उन्हें अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।
  • परिभाषाओं के बाद गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) ने कुछ अभिधारणाएं (पोस्टुलेट्स) दी हैं।इन अभिधारणाओं को देने के पहले उन्होंने कहा है हम इसे मान लेंगे कि…..
  • अर्थात् जो भी अभिधारणाएं दी गई है वे बिना किसी सिद्धि के हमें स्वीकार कर लेनी है।ये अभिधारणाएं केवल एक विशेष विषय से संबंधित होती हैं।ये एक ही विषय से सीमित होती हैं।स्वयंतथ्यों की तरह अभिधारणाएं सार्वभौमिक कथन नहीं होती हैं।ज्यामिति की अभिधारणाएं रेखाओं,वृत्तों,कोणों आदि से संबंधित होती है।
  • यूक्लिड ने अपने ग्रंथ के आरम्भ में जो पांच अभिधारणाएं दी है,उनमें पांचवी अभिधारणा अत्यंत महत्त्व की है।
  • परिभाषाओं तथा अभिधारणाओं के बाद यूक्लिड ने कुछ स्वयंतथ्य (एक्सिओम्स) दिए हैं।यूनानी भाषा में ‘एक्सिओम’ का अर्थ होता है,’सम्मान करने योग्य’।विज्ञान में तथा ज्ञान की अन्य शाखाओं में इन ‘स्वयंतथ्यों’ को बिना किसी हिचक के स्वीकार कर लिया जाता है।ये अपने आप में परिपूर्ण होते हैं।इन्हें सिद्ध करने की जरूरत नहीं होती।कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इन्हें सुनेगा तो वह फौरन स्वीकार कर लेगा।उदाहरण के लिए इस स्वयंतथ्य को ही लो:
  • यदि समान वस्तुओं में से सामान वस्तुएं निकाल ली जाएं तो समान वस्तुएँ ही शेष रहती हैं।
  • यदि पांच-पांच किलोग्राम तौल की दो वस्तुओं से समान रूप से दो-दो किलोग्राम तोल की ही वस्तुएं निकाल ली जाएं तो दोनों समूहों में समान रूप से तीन-तीन किलोग्राम तौल की वस्तुएं शेष रहेंगी।
  • ऊपर जो स्वयंतथ्य दिया गया है,वह यूक्लिड की ज्यामिति का तीसरा स्वयंतथ्य है।अरस्तू इस स्वयंतथ्य का अक्सर इस्तेमाल करते थे।
  • बहुत संभव है कि अपनी ज्यामिति को तार्किक आधार देने की प्रेरणा यूक्लिड को अरस्तू से ही मिली हो।परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि ज्यामिति की निगमनिक (डिडक्टिव) विधि का प्रतिपादन स्वयं गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) की खोज है।
  • अरस्तू ने जीवशास्त्र के क्षेत्र में विज्ञान की बड़ी सेवा की है।उन्हें प्रारंभिक ज्यामिति की बहुत-सी बातें ज्ञात थी।अरस्तू ने गोल की परिभाषा दी है:”गोल ऐसी आकृति है जिसकी सभी त्रिज्याएं समान होती है।”परंतु यूक्लिड ने गोल की परिभाषा दी है: “अर्धवृत्त द्वारा इसके अपने व्यास पर परिक्रमण से निर्मित आकृति गोल है”।यूक्लिड की यह और अन्य अनेक परिभाषाएं अधिक सही है।
  • इस प्रकार हम देखते हैं कि यूक्लिड अरस्तू से बेहतर ज्यामितिकार थे।यूक्लिड ने अपने समय तक ज्ञात संपूर्ण ज्यामिति का संग्रह किया।संग्रह करने में यूक्लिड की विशेषता नहीं है।संग्रह तो कोई भी परिश्रमी व्यक्ति कर सकता था।यूक्लिड की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने इस ज्यामितीय ज्ञान को एक ठोस तार्किक आधारशिला पर खड़ा किया। ज्यामिति के सिद्धान्तों को एक विशिष्ट विधि का जामा पहनाया।
  • अरस्तू गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) के लगभग समकालीन ही थे।अरस्तू की मृत्यु 322 ईसवी पूर्व में हुई।इस समय यूक्लिड की उम्र लगभग 25 वर्ष की रही होगी।इसलिए यूक्लिड पर अरस्तू के तार्किक चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
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(1.) यूक्लिड का ज्यामिति का ग्रंथ (Euclid’s Book of Geometry):

  • यूक्लिड के ज्यामिति के ग्रंथ का नाम ‘ज्यामिति’ नहीं है।यूरोप की भाषाओं में यूक्लिड के ग्रंथ को ‘एलिमेंट्स (मूलतत्व)’ नाम से जाना जाता है।परंतु यूक्लिड ने अपने ग्रंथ को दूसरा ही नाम दिया था। यूक्लिड ने अपना ग्रंथ यूनानी (ग्रीक) भाषा में लिखा था।इसलिए इस ग्रंथ का नाम भी कोई यूनानी शब्द ही होना चाहिए।यूक्लिड के ग्रंथ का असली नाम था:स्टोइकेइया।स्टोइकेइया यूनानी भाषा का शब्द है।इसका अर्थ होता है: ‘किसी भी वस्तु की सबसे छोटी इकाई’।भाषाविद् इस शब्द को ‘सरलतम ध्वनि’ या ‘वर्णमाला के एक अक्षर’ के लिए इस्तेमाल करते थे।
  • गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) ने अपने ग्रंथ का नाम ‘ज्यामिति’ इसलिए नहीं रखा कि इस शब्द का अर्थ बहुत सीमित है।’ज्या’ का अर्थ होता है ‘भूमि’ और ‘मिति’ का अर्थ होता है ‘मापन’।इस प्रकार ‘ज्यामिति’ का अर्थ होगा ‘भूमि का मापन’।अंग्रेजी का ‘ज्याॅमिट्री’ शब्द यूनानी शब्द ‘जे-मेट्राइन’ से बना है और इसका भी अर्थ होता है:जे=भूमि और मेट्रोइन=मापन।
  • हमारा आजकल का ज्यामिति शब्द ज्याॅमिट्री शब्द की नकल पर बनाया गया है।पुराने जमाने में हमारे देश में जो ज्यामिति के लिए रेखागणित शब्द का इस्तेमाल होता था।
  • किंतु यूक्लिड की ज्यामिति केवल ‘भूमि का मापन’ नहीं थी।आजकल जिस विज्ञान से भूमि का मापन होता है उसे हम सर्वेक्षण (सर्वेइंग) कहते हैं।यूक्लिड की ज्यामिति सर्वेक्षण विज्ञान नहीं थी।हां,यूक्लिड के पहले प्राचीन मिस्र में ज्यामिति का प्रचलन था,उसे हम सर्वेक्षण जरूर मान सकते हैं क्योंकि मिस्र की प्राचीन ज्यामिति केवल भूमि मापन से संबंधित थी।
  • गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) की ज्यामिति को आज हम ‘ज्यामिति के मूलतत्त्व’ या ‘प्राथमिक ज्यामिति’ के नाम से जानते हैं।यह नाम इसलिए कि यूक्लिड अपनी ज्यामिति से इस विज्ञान की कुछ प्रारंभिक अथवा मूल बातों की व्याख्या करना चाहते थे।
  • यूक्लिड के ‘मूलतत्त्व’ सिद्धि अथवा साध्य के मूलतत्त्व हैं।
  • मूलतत्त्व विज्ञान के आधार स्तंभ होते हैं।मूलतत्त्व में उन सभी बातों का समावेश होना चाहिए जो उसे विज्ञान के लिए परम आवश्यक हो।साथ ही उनमें ऐसी किसी बात का समावेश नहीं होना चाहिए जो अनावश्यक हो।इसलिए अरस्तू ने कहा था कि सिद्धि के बेहतर होने के लिए जरूरी है कि अभिधारणाएं तथा परिकल्पनाएँ कम से कम हो। गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) ने ठीक यही किया।
  • यूक्लिड का संपूर्ण ग्रंथ एक सूत्र में बंधा हुआ है।ग्रंथ का आरंभ सरलतम धारणाओं की व्याख्याओं से होता है।जैसे बिंदु क्या है?रेखा क्या है?इत्यादि।यूक्लिड ने अपने ग्रंथ के आरंभ में ही 23 परिभाषाएं दी हैं।ये परिभाषाएँ हमें बताती हैं कि रेखा,आकृति आदि क्या होती है?परिभाषाओं के बाद अभिधारणाएं तथा स्वयंतथ्य हैं।
  • इसके बाद यूक्लिड प्रमेयों तथा प्रश्नों को आरंभ करते हैं।इन प्रमेयों को मूल स्वीकृत धारणाओं से सिद्ध किया जाता है।
  • अभिधारणाओं तथा स्वयंतथ्यों से ही यूक्लिड इन प्रेमियों की उपपत्ति सिद्ध करते हैं।यदि यह मान लिया जाए कि आधारवाक्य (प्रेमिसेज) सत्य हैं तो प्रमेय भी सत्य सिद्ध होंगे।जिस अनुक्रम से अभिधारणाओं तथा स्वयंतथ्यों द्वारा प्रश्न एवं प्रमेय सिद्ध किए जाते हैं,उसे निरूपण कहते हैं।यूक्लिड की ज्यामिति का ग्रंथ 13 पुस्तकों या खंडों में विभाजित है।
  • पहली पुस्तक मुख्यतः त्रिभुजों,समांतरों,समांतर चतुर्भुजों और उनके निर्माण तथा गुणधर्मों से संबंधित है।
  • दूसरी पुस्तक के विषय को हम ‘ज्यामितीय बीजगणित’ का नाम दे सकते हैं।इस पुस्तक में बताया गया है कि किसी भी आकार का रैखिक क्षेत्र किसी भी आकार के समांतर चतुर्भुज में किस प्रकार रूपांतरित किया जा सकता है।वस्तुतः आजकल इस पुस्तक का विषय बीजगणित के क्षेत्र में आता है।चूँकि भारतीयों की तरह यूनानी गणितज्ञ बीजगणित की क्रियाओं में दक्ष नहीं थे इसलिए वे बीजगणित के सूत्रों को ज्यामितीय कृत्यों की सहायता से ही व्यक्त करते थे।
  • तीसरी पुस्तक ‘वृत्त की ज्यामिति’ से संबंधित है।
  • चौथी पुस्तक में वृत्त के बाहर भीतर,परिधि को स्पर्श करती हुई,अन्य आकृतियों-किसी भी आकार के त्रिभुज तथा बहुभुज के निर्माण के बारे में कृत्य है।
  • यहाँ पर यह जान लेना चाहिए यूक्लिड की पहली, दूसरी और चौथी पुस्तक को हम ‘पाइथागोरियन ज्यामिति’ कह सकते हैं।इन पुस्तकों के विषय पाइथागोरस अथवा उसके शिष्यों को निश्चित रूप से ज्ञात थे।तीसरी पुस्तक के विषय भी यूक्लिड के पहले के यूनानी विद्वानों को ज्ञात थे। बहुत संभव है कि तीसरी पुस्तक की बातें भी पाइथेगोर अथवा उसके शिष्यों को ज्ञात हों।
  • पांचवी पुस्तक में एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन है। इस पुस्तक में व्यापक रूप से ‘अनुपात सिद्धांत (थ्योरी ऑफ प्रोपोर्शन) की व्याख्या है।यह सिद्धांत परिमेय तथा अपरिमेय दोनों ही परिणामों पर लागू होता है।इस सिद्धांत को जन्म दिया था यूदोक्सु ने। यूनानी गणित के प्रसिद्ध विद्वान सर थाॅमस हीथ का तो यहां तक कहना है कि यह सिद्धांत यूनानी गणित का मुकुट है।
  • छठी पुस्तक में इस अनुपात सिद्धांत का समतल ज्यामिति में इस्तेमाल किया गया है।
  • सातवीं,आठवीं तथा नौवीं पुस्तकों का विषय है संख्या सिद्धांत (थ्योरी ऑफ नंबर्स)।
  • दसवीं पुस्तक में अपरिमेय परिमाणों के सिद्धांत की विशद व्याख्या है।इस पुस्तक के विषय के लिए यूक्लिड थियोडोर और थिएटेतु का ऋणी है।
  • 11वीं,12वीं तथा तेरहवीं पुस्तकें ठोस ज्यामिति से संबंधित है।समठोसों:घन,पिरामिड,अष्टफलक,द्वादशफलक तथा विंशतिफलक की चर्चा के साथ तेरहवीं पुस्तक अर्थात् संपूर्ण ग्रंथ समाप्त होता है।यूक्लिड की ज्यामिति के टीकाकार प्रोक्लुस (410-485) ने लिखा है कि यूक्लिड अपनी तेरहवीं पुस्तक को अर्थात् समठोसों की ज्यामिति को ज्यामितीय ज्ञान की चरमोन्नति मानते थे।प्रोक्लुस ने यह भी लिखा है कि गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) जहां तक दार्शनिक विचारों की बात है प्लेटो के अनुयायी थे।परंतु अधिकांश विद्वान प्रोक्लुस के इस कथन को सही नहीं मानते।
  • यूक्लिड के ग्रंथ में इन 13 पुस्तकों के साथ कभी-कभी दो ओर पुस्तकों का समावेश किया जाता है।दरअसल इन पुस्तकों को यूक्लिड ने नहीं लिखा है।कालांतर में ये पुस्तकें उनके ग्रंथ के साथ जोड़ दी गई थी।चौदहवीं पुस्तक जिसका विषय ठोस ज्यामिति है,ईसा की दूसरी शताब्दी में हिप्सीकल्स नामक गणितज्ञ ने लिखी थी।इसी प्रकार पन्द्रहवीं पुस्तक छठी शताब्दी के एक गणितज्ञ ने लिखि थी।
  • हाईस्कूल की कक्षाओं में आज जो ज्यामिति पढ़ाई जाती है वह यूक्लिड की ज्यामिति का केवल एक अंश मात्र है। लगभग 300 ईसा पूर्व में यूक्लिड ने अलेक्जेंड्रिया के विश्वविद्यालय में अपने इस ग्रंथ की रचना की थी।अर्थात् आज से लगभग 2300 साल पहले यूक्लिड अपनी ज्यामिति की रचना कर चुके थे।
  • गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) मुख्यत: अपने ‘मूलतत्त्व’ के लिए ही प्रसिद्ध थे,यूनानी भाषा में यूक्लिड की ज्यामिति का नाम था स्टोइकेइया।इसलिए यह ग्रंथ इतना अधिक प्रसिद्ध था कि आर्किमिडीज के बाद के सभी यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड को स्टोइकेइओटेस के नाम से ही जानते थे।
  • स्टोइकेइओटेस का अर्थ होता है, स्टोइकेइया के रचयिता’।एक लेखक के लिए कितने बड़े सम्मान की बात है कि केवल उसकी कृति के नाम पर ही लोग उसे जानते हों।
  • 19वीं शताब्दी के अंत तक यूक्लिड की ज्यामिति यूरोप के देशों में पाठ्यपुस्तक के रूप में चलती रही;उसी प्रकार यूक्लिड के बाद के यूनानी गणितज्ञों ने भी इस ग्रंथ को पाठ्यपुस्तक के रूप में इस्तेमाल किया था।

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(2.)यूक्लिड के अन्य ग्रंथ (Euclid’s Other Texts):

  • यद्यपि गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) अपने महान ग्रंथ ‘मूलतत्त्व’ के लिए ही अधिक प्रसिद्ध है;पर उन्होंने ओर भी ग्रंथ लिखे थे।ये ग्रंथ गणित,ज्योतिष,संगीत तथा यांत्रिकी से संबंधित हैं।इनमें से कुछ ग्रंथ अप्राप्य हैं।
    यूक्लिड के उपलब्ध ग्रंथ (Euclid’s available texts):
  • (i)डेटा:यूक्लिड की एक कृति ‘मूलतत्त्व’ की प्रथम छह पुस्तकों की ज्यामिति से संबंधित है।’डेटा’ शब्द ‘डेटम’ का बहुवचन है जिसका अर्थ होता है, ‘प्रदत वस्तुएं’।इस ग्रंथ में 94 साध्य दिए गए हैं।इनका विषय है:यदि किसी आकृति के कुछ अंग-परिमाण,स्थिति या आकार दिए हों तो शेष अंग कैसे ज्ञात किए जाएं।
  • (ii)आकृतियों के विभाजन:इस कृति का प्रोक्लुस ने उल्लेख किया है।परंतु यह ग्रंथ आज यूनानी भाषा में उपलब्ध नहीं है।हाँ,अरबी भाषा में यह मिलता है।पीसा के लियोनार्दो फिबोनैकी ने इस ग्रंथ का अरबी से लैट्रिन में अनुवाद किया था।इस ग्रंथ का विषय है:यदि कोई आकृति (त्रिभुज,चतुर्भुज,वृत्त) दी हुई हो तो उसे ऐसे दो भागों में बांटा जाए जिससे दोनों भागों के क्षेत्रफल एक निर्दिष्ट अनुपात में हो।
  • (iii)फेनोमेना:इस ग्रंथ का विषय गोलीय ज्यामिति। गोलीय-ज्यामिति का उपयोग ज्योतिषशास्त्र में होता है।
  • (iv)ऑप्टिक्स:ऑप्टिक्स को आज हम प्रकाशिकी अर्थात् प्रकाश विज्ञान कहेंगे।प्राचीन काल में लोगों का विश्वास था कि प्रकाश का स्रोत आंख में है। आंख से ही प्रकाश-किरणें दिखाई देनेवाली वस्तु तक पहुंचती है।परंतु आज हम जानते हैं कि प्रकाश आँख से नहीं बल्कि दिखाई देनेवाली वस्तुओं से परावर्तित होकर हमारी आंखों तक पहुंचता है।
  • यूक्लिड ने अपने इस ग्रंथ में एक दृष्टि-सिद्धांत की स्थापना की है।’मूलतत्त्व’ की तरह इस ग्रंथ के लिए भी उन्होंने कुछ स्वयंतथ्यों की कल्पना की।पहला स्वयंतथ्य है:
  • “इसलिए यह मान लिया है कि आंखों से उत्सर्जित दृष्टि-किरणें सीधी रेखा में जाती है,दूरी चाहे कितनी भी हो”।
  • गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) के इस स्वयंतथ्य में प्रकाश के सीधी रेखा में गमन की बात तो सही है परंतु आंखें प्रकाश का स्रोत होने का अनुमान गलत है।पर इस विज्ञान से इतना लाभ हुआ कि प्रक्षेप ज्यामिति (प्रोजेक्टिव ज्याॅमिट्री) का अध्ययन आरंभ हुआ।
  • (v)संगीत के मूलतत्त्व:प्राचीन यूनान में संगीत का उतना ही अधिक महत्त्व था जितना कि गणित का। पाइथेगोर एक महान गणितज्ञ थे।उन्होंने संगीत के बारे में भी महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक बातों की खोज की थी।तब से हर यूनानी गणितज्ञ के लिए यह जरूरी हो गया कि वह संगीत का अध्ययन करें और संगीतशास्त्र पर भी ग्रंथ की रचना करें।इस ग्रंथ की रचना करके यूक्लिड ने उसी परंपरा को निभाया था।
  • गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) के अप्राप्य ग्रंथ (Euclid’s unavailable texts):
  • (i)सिउडारिया:इस ग्रंथ के खो जाने से प्रारंभिक ज्यामिति के विद्यार्थियों का बड़ा नुकसान हुआ है।
    विद्यार्थी ज्यामिति पढ़ते हैं।उन्हें प्रमेय सिद्ध करने पड़ते हैं।सवाल हल करने होते हैं,वे भी एक खास तरीके से-यूक्लिड के बनाए तरीकों से।हम जानते हैं कि कई बार दूसरे रास्ते पर पहुंचने के कारण गलतियां होती हैं।दूसरे ही परिणाम निकलते हैं।
    इसलिए यूक्लिड के इस ग्रंथ में बताया था कि ज्यामिति के प्रमेयों तथा कृत्यों को हल करते समय किस प्रकार की और कहां-कहां गलतियां होने की संभावनाएं हैं।उन्होंने इस ग्रंथ में इन भुलावों को दूर करने के उपाय भी बताए थे।
  • (ii)पोरिज्म्स:इस ग्रंथ की तीन पुस्तकें आज उपलब्ध नहीं है;परंतु अलेक्जेंड्रिया के पाप्पुस ने अपने ‘संग्रह’ में इस कृति का उल्लेख किया है।इस कृति का विषय था प्रक्षेप-ज्यामिति।
  • (iii)तल बिंदुपथ:यह ग्रंथ भी खो गया है।परंतु पाप्पुस ने इस कृति का उल्लेख किया है।अनुमान है कि यह कृति शंकु,सिलेंडर तथा गोल जैसी आकृतियों से संबंधित थी।
  • (iv)शांकव:इस अप्राप्य कृति के बारे में पाप्पुस ने लिखा है:”यूक्लिड के ग्रंथ शांकव (काॅनिक्स) की चार पुस्तकों को एपोलोनियस ने पूर्ण किया।एपोलोनियस ने चार ओर पुस्तकों की रचना की और इस प्रकार उसने हमें ‘शांकव’ की 8 पुस्तकें दी हैं।शांकव-ज्यामिति में परवलय,दीर्घवृत्त तथा अतिपरवलय वक्रों का अध्ययन होता है।
  • उपर्युक्त विवरण में महान् गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid),यूक्लिड (Euclid) के बारे में बताया गया है।

2.गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid),यूक्लिड (Euclid) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.यूक्लिड के मूलतत्त्व का सर्वप्रथम अनुवाद किसने किया? (Who first translated the Elements of Euclid?):

उत्तर:ईसा की छठी सदी में यूक्लिड के ‘मूलतत्त्व’ का सीरियाई में अनुवाद हुआ।अरबी विद्वान् अल्-हज्जाज इब्न यूसुफ ने पहली बार हारून अल रशीद (खलीफा:786-809 ईस्वी) के लिए ‘मूलतत्त्व’ का सीरियाई से अरबी में अनुवाद किया।इसी विद्वान् ने अब्बासी खलीफा अल्-मामून के लिए दूसरी बार ‘मूलतत्त्व’ का अरबी में अनुवाद किया।

प्रश्न:2.यूक्लिड के मूलतत्त्व का लैटिन में अनुवाद किसने किया? (Who first translated euclid’s Elements into English?):

उत्तर:गणित के इतिहास में एडेलार्ड का महत्त्वपूर्ण स्थान है।एडेलार्ड इंग्लैण्ड के निवासी थे परन्तु गणित की सेवा करने के लिए उन्होंने स्पेन की यात्रा की थी।यूक्लिड के ‘मूलतत्त्व’ के अलावा उन्होंने अरबी गणितज्ञ अल्-ख्वारिज्मी (लगभग 830 ईस्वी) का अनुवाद किया।अल् जब्र व अल्-मुकाबिल:बीजगणित के लिए इस्तेमाल होनेवाला यूरोप की भाषाओं का अल्-जब्रा शब्द अल्-ख्वारिज्मी के इसी ग्रंथ के नाम से बना है।अल्-ख्वारिज्मी की यह पुस्तक भारतीय बीजगणित पर आधारित थी।इस पुस्तक में भारतीय अंक पद्धति का इस्तेमाल हुआ था।एडेलार्ड ने पहली बार इस ग्रंथ का लैटिन में अनुवाद किया।इस प्रकार अल्-ख्वारिज्मी के ग्रंथ के कारण भारतीय गणित और अंक-पद्धति का यूरोप के देशों में प्रवेश हुआ।यूक्लिड की ज्यामिति तथा भारतीय अंकों का यूरोप में प्रचार करने वाले सबसे महत्त्व के व्यक्ति थे पीसा निवासी लियोनार्दो फिबोनैकी (लगभग 1170-1245 ईस्वी)।’फिबोनैकी’ ने अपने ‘लिबेर एबेकी’ ग्रंथ में अंकों का इस्तेमाल किया था।यूक्लिड के मूलतत्त्व का एक ओर अनुवाद क्रेमोना के गेरार्ड (1114-1187 ईस्वी) ने किया था।

प्रश्न:3.यूक्लिड की मूलतत्त्व का सर्वप्रथम अंग्रेजी में अनुवाद किसने किया? (Who first translated euclid’s Elements into English?):

उत्तर:पहली बार अंग्रेजी में अनुवाद हेनरी बेलिंग्सले ने किया और लंदन से 1570 में प्रकाशित हुआ।इस अनुवाद के मुखपृष्ठ पर लिखा हुआ है:लेखक:मेगेरा-निवासी, यूक्लिड
यहाँ यूक्लिड को मेगेरा-निवासी बतलाया गया है।दरअसल,मेगेरा-निवासी यूक्लिड एक अन्य व्यक्ति थे जो एक दार्शनिक थे और अलेक्जेंड्रिया-निवासी हमारे ज्यामितीकार यूक्लिड के लगभग सौ वर्ष पहले हुए थे।चूँकि मध्ययुग के अनुवादक ज्यामितीकार यूक्लिड के जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते थे इसीलिए उन्होंने भूल से ज्यामितीकार यूक्लिड को मेगेरा-निवासी यूक्लिड मान लिया था।
इंग्लैण्ड और यूरोप के अन्य देशों की भाषाओं में ‘मूलतत्त्व’ के अनुवाद होने लगे और संस्करण के बाद संस्करण छपने लगे।प्रख्यात वैज्ञानिक आइजेक न्यूटन के अध्यापक आइजेक बारो ने 1675 ईस्वी में मूलतत्त्व का लैटिन अनुवाद प्रकाशित किया।
यूरोप के सभी स्कूलों में यूक्लिड की ज्यामिति पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाने लगी।यूरोप की सभी भाषाओं में ‘मूलतत्त्व’ का अनुवाद हुआ।
बाइबल के बाद यदि किसी ग्रंथ की सबसे अधिक प्रतियाँ छपी हैं तो यूक्लिड के ‘मूलतत्त्व’ की।और यदि केवल वैज्ञानिक ग्रंथों की ही बात की जाए तो ‘मूलतत्त्व’ ही एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है जो सबसे अधिक संख्या में छपा और पढ़ा गया।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid),यूक्लिड (Euclid) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Mathematician Euclid

गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid)

Mathematician Euclid

गणितज्ञ यूक्लिड (Mathematician Euclid) के जन्म और मृत्यु का ठीक-ठीक पता नहीं है।इतना अवश्य मालूम है कि उसका समय 300 ईसा पूर्व के लगभग था।यूक्लिड की प्रारंभिक शिक्षा महान् दार्शनिक प्लेटो (अफलांतून) की अकादमी में हुई

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