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How to Develop Character with Success?

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1.सफलता के साथ चरित्र का विकास कैसे करें? (How to Develop Character with Success?),सफलता के साथ चरित्र का निर्माण करने के मन्त्र (Mantras to Build Character with Success):

  • सफलता के साथ चरित्र का विकास कैसे करें? (How to Develop Character with Success?) के लेख में बताया गया है कि पद,प्रतिष्ठा और पैसा प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है जब तक आप में चारित्रिक बल ना हो,जब तक आप अपने चरित्र बल का विकास न करते हों।
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2.चरित्र का क्या अर्थ है (What does character mean?):

  • बहुत पुरानी सूक्ति है:
    If wealth is lost,nothing is lost,
    If health is lost,something is lost,
    If character is lost,everything is lost,
  • यदि आपकी धन-संपत्ति का क्षय हो जाता है,तो एक प्रकार से आपका कुछ नहीं खोया है,यदि आपका स्वास्थ्य नष्ट हो गया है,तो आपकी थोड़ी सी हानि हुई है और यदि आपका आचरण,आपका साथ छोड़ जाता है,तो आपका सर्वस्व चला जाता है।
    आचरण का अर्थ सामान्यतः यौन संबंधों,स्त्री-पुरुष विषयक संबंधों से लगाया जाता है,परंतु आचरण का यह बहुत ही सीमित अर्थ है।आचरण वस्तुतः समस्त व्यक्तित्व को,व्यक्ति के समग्र शील-स्वभाव को समाहित करता है।चरित्र के अंतर्गत व्यक्ति के मन,वचन एवं वाणी से संबंधित समस्त प्रक्रिया एवं कार्यकलाप आ जाते हैं।इतना ही नहीं,व्यक्ति का चेतना-विकास भी उसके चरित्र का अंग बनता है,क्योंकि चेतना-विकास के अनुरूप व्यक्ति की इच्छा शक्ति का स्वरूप निर्धारित होता है।इच्छा अथवा वासना विचार उत्पन्न करती है।विचार वासना को कार्यान्वित करने की योजना-निर्धारित करता है और हमारी कार्यशक्ति उस योजना को कार्यान्वित करती है।इच्छा,ज्ञान,क्रिया अथवा वासना,विचार एवं क्रिया-कलाप का चक्र अबाध गति से चलता रहता है,क्योंकि ये तीनों अन्योन्याश्रित हैं।इस समस्त प्रक्रिया के नवनीत रूप चरित्र नामक तत्त्व का निर्माण होता है जो हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप बनता है।आत्म-तत्त्व होने के कारण चरित्र हमारी स्थायी संपत्ति है।इसी को लक्ष्य करके कहा जाता है कि कर्म को बोओ और आदत (फसल) को काटो,आदत को बोओ और चरित्र (फसल) को काटो तथा चरित्र को बोओ और भाग्य (फसल) को काटो।
  • हम जब किसी व्यक्ति के चरित्र की चर्चा करते हैं,तब मानो हम उसके भूत,वर्तमान और भविष्य,पिछले जन्म,इस जन्म तथा अगले जन्म पर विचार प्रकट करते हैं।चरित्र को कलंकित करके मानो हम अपने समग्र  व्यक्तित्व के सम्मुख प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं।दि ग्रीन नामक विद्वान ने ठीक ही कहा है कि चरित्र का सुधारना मानव का परम लक्ष्य होना चाहिए।भारत के क्रांतिकारियों को राष्ट्रीय आंदोलन में सफलता के पीछे चरित्र बल था क्योंकि उनकी यह दृढ़ मान्यता थी कि चरित्र की शुद्धि जीवन का ध्येय होना चाहिए।
  • जैसाकि प्लूटार्क ने कहा है-चरित्र हमारा स्थायी स्वभाव है,हमें अपनी इस संपत्ति की रक्षा हर प्रकार,हर कीमत पर करनी चाहिए।चरित्र की रक्षा करने का अर्थ होता है कि व्यक्ति अपनी स्वाभाविक प्रेरणाओं के अनुसार कार्य करे,वह जिस काम को ठीक समझता हो,उसे करे।इसको दूसरी भाषा में आत्मा की आवाज के अनुसार अथवा स्वधर्मानुसार कार्य करना कहते हैं।गीता के अनुसार भी स्वधर्म का पालन करते हुए मृत्यु को प्राप्त करना श्रेयस्कर बताया है।इस प्रकार उपर्युक्त वाक्यों द्वारा चारित्रिक दृढ़ता का प्रतिपादन सिद्ध होता है।जो व्यक्ति अपने स्वभावानुसार कार्य करता है,वह भीड़ की तरह अथवा भेड़ों की तरह व्यवहार नहीं करता है।

3.ओढ़ी हुई चरित्र वाले से सावधान रहें (Beware of the character with the draped character):

  • आजकल सर्वत्र आंदोलन की धूम है,क्योंकि व्यक्ति व्यक्ति ना रह कर भीड़ बन गए हैं।भीड़ में शामिल आप किसी व्यक्ति से पूछ कर देखिए-तुम इस जुलूस के साथ क्यों जा रहे हो? उत्तर होगा-और बहुत से लोग जा रहे हैं,इसलिए इसी भेड़चाल का नाम चारित्रिक ह्रास अथवा व्यक्तित्व का अवमूल्यन है।हम लोग अधिकांशतः बात पीछे,छोटे-छोटे स्वार्थ के पीछे समझौता कर लेते हैं।हम भूल जाते हैं कि हमारी और हमारे समाज की अस्मिता समझौता करने वाले जयचंदों,मानसिंहों,मीरजाफरों आदि के कारण सुरक्षित नहीं है।इसके मूल हैं-महाराणा प्रताप,गुरुगोविंद सिंह,महारानी लक्ष्मीबाई,अशफ़ाक उल्ला खाँ प्रभृति व्यक्तियों की चारित्रिक दृढ़ता जिसने बड़े से बड़े प्रलोभनों के साथ उन्हें समझौता नहीं करने दिया।चारित्रिक दृढ़ता वाला व्यक्ति अपनी मान्यता के सम्मुख सब कुछ हेय समझता है।वह टूट सकता है,परंतु झुकता नहीं है।जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज के अनुसार कार्य करता है,वह चरित्रवान अथवा दृढ़ निश्चय वाला व्यक्ति कहा जाता है और समाज उसको सम्मान प्रदान करता है।
    चरित्र का संबंध धन-संपत्ति सदृश लौकिक उन्नति के साथ बहुत कम होता है,उसका संबंध जीवन के मूल्यों के साथ रहता है।हम सब सहमत हैं कि जीवन-मूल्य मानव-जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धरोहर एवं उपलब्धि है।अमेरिका के प्रसिद्ध विचारक इमर्सन ने एक स्थान पर लिखा है कि उत्तम चरित्र ही सबसे बड़ा धन है तथा चेस्टरफील्ड के शब्दों में चरित्र को उज्ज्वल और पवित्र रखना चाहिए।वह मानव की अस्मिता भी है और उसका प्राप्तव्य भी है।
  • चरित्रवान व्यक्तियों को हम आदर्श व्यक्ति कहते हैं।आदर्श व्यक्तियों का जीवन प्रायः संकट-संकुल रहता है,क्योंकि वे जिस काम को अपनी आत्मा की आवाज समझते हैं,उसको करने के लिए दृढ़ संकल्प कर लेते हैं।महाराजा हरिश्चंद्र को हम सत्यवादी चरित्र कहते हैं,क्योंकि अपने वचन की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं अपने तक को चाण्डाल के हाथों बेच दिया था।सुकरात को हम महात्मा कहते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी मान्यता की रक्षा के लिए जहर का प्याला सहर्ष पी लिया था।महात्मा ईसा और मंसूर अपने सिद्धांतों की रक्षार्थ सूली पर चढ़ गए थे।आधुनिक काल में भारत माता को स्वतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए ना मालूम कितने नौनिहालों ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा था।इन नौनिहालों के बलिदानों के साक्षी उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने कहा है कि चरित्र का जो मूल्य है,वह और किसी वस्तु का नहीं।
  • आप किसी भी महान अथवा जीवन में सफल व्यक्ति के जीवन-चरित्र का अवलोकन करके देख लें।आप देखेंगे कि वे पूरी दृढ़ता के साथ अपनी चारित्रिक विशेषताओं की रक्षा करते हैं,ऐसा करते हुए भले ही उनको कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ जाए।
  • कठिनाइयों को जीतने,वासनाओं को दमन करने और दुःखों को सहन करने से चरित्र उसी प्रकार उच्च,सुदृढ़ और निर्मल होता है जिस प्रकार अग्नि में तपने से सुवर्ण की निकाई निखरती है।चरित्र कोई ऐसी वस्तु नहीं जो शून्य अथवा एकांत में विकसित होता हो और सफलता कोई ऐसा फल नहीं जो पेड़ पर लटकता हो अथवा मदारी के आम की तरह हाथ पर उगता हो।
    जर्मन दार्शनिक गेटे के शब्दों में-चरित्र का निर्माण संसार के संघर्ष के मध्य होता है।सफलता एवं प्रतिष्ठा चरित्र रूपी वृक्ष की छाया हैं।फ्रेडरिक सण्डर्स के शब्दों में,चरित्र जीवन में शासन करने वाला तत्त्व है।शासक जितना दृढ़ निश्चयी एवं अपने निर्णयों को जितनी दृढ़ता से पालन करने वाला होगा,वह उसी अनुपात में स्वनाम धन्य होता चला जाएगा।
    चरित्र मनुष्य के अंदर रहता है।सफलता उसकी प्रतिच्छाया के रूप में बाहर दिखाई देती है।चरित्र मानव को देवत्व प्रदान करने वाली संजीवनी है।इसको दृढ़ता प्रदान कीजिए।

4.चरित्र बल का ह्रास (Loss of character strength):

  • वर्तमान समय में चारित्रिक बल,आचरण का ह्रास दिखाई देता है।इसका मूल कारण है चारों ओर भौतिकता का,आर्थिकता का वातावरण का होना।हर व्यक्ति अर्थ कमाकर साधन-सुविधाओं को जुटाता जा रहा है।यहाँ तक कि साधु-संत भी अकूत धन अर्जित करके उसका भोग कर रहे हैं।यहाँ यह तात्पर्य नहीं कि कमाना नहीं चाहिए,साधन-सुविधाओं का भोग नहीं करना चाहिए।यहाँ उस तरफ इशारा किया जा रहा है कि धन कमाने के तरीके अनैतिक,बेईमानी,घूसखोरी,अपहरण,चोरी-चकोरी,ठगी आदि हो गए हैं।छोटे-मार्ग से मालामाल होने में न तो समय लगता है और ना कठिन परिश्रम करना पड़ता है।दूसरी तरफ साधन-सुविधाओं का चस्का ऐसा लग जाता है कि उसका अधिक से अधिक भोग करने की कोशिश की जाती है।
  • कुछ लोग अनैतिक,ओछे हथकण्डे,अपनाकर ही सफल होना और ऐश्वर्य का भोग करने को जायज मानते हैं।शिक्षण-संस्थानों में जॉब करने की कला तो सिखाई जाती है परंतु कैरेक्टर बिल्ड करने की तकनीक बिल्कुल भी नहीं सिखाई जाती है।छात्र-छात्राओं से पूछा जाए तो उनका जवाब होता है कि कैरेक्टर बिल्ड (caracter build) करने का समय कहां है।कोर्स की पुस्तकें पढ़ने से ही फुर्सत नहीं है और फिर चरित्र की जरूरत कहां पड़ गई है।कुछ समझदार छात्र-छात्राएँ चरित्र निर्माण की आवश्यकता तो महसूस करते हैं परंतु चरित्र निर्माण कैसे किया जाए इसकी तकनीक नहीं मालूम है।
  • शिक्षण संस्थानों के संचालकों और शिक्षकों का मानना है कि पाठ्यक्रम में नैतिक व चारित्रिक शिक्षा का प्रावधान ही नहीं है तो बच्चों को उसकी शिक्षा देना कैसे संभव है? कुछ आदर्शनिष्ठ शिक्षकों का मानना है कि आजकल के बच्चे आदर्श,नैतिक और चारित्रिक बातें सुनना ही पसंद नहीं करते हैं तो चाहते हुए भी उनके चरित्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है।
    दरअसल हमारे आदर्श,आइकॉन फिल्मी सितारे,नायक,नायिकाएँ या भ्रष्ट नेता हो गए हैं तो उनको चरित्र निर्माण करना आवश्यक ही नहीं लगता है।कोई यूट्यूबर,इनफ्लुएंसर या इंस्टाग्राम पर पॉपुलर व्यक्ति अपने उत्तेजक नवीन कंटेंट और रील तथा वीडियो के कारण जल्दी हीरो बन जाते हैं।उनके लाखों फॉलोअर्स बन जाते हैं परंतु उनमें से अधिकांश अपने चरित्र गठन की तरफ ध्यान नहीं देते हैं।इसलिए जितनी जल्दी ऊपर चढ़ते हैं धड़ाम से नीचे गिर भी जाते हैं।होना तो चाहिए कि ऊपर चढ़ने वाले को बहुत सावधान,सतर्क और सजग होकर चलना चाहिए क्योंकि ऊपर से गिरने पर व्यक्ति की हड्डी-पसलियाँ टूट जाती है और वह किसी काम के लायक नहीं रहता।अर्थात् जैसा ऊपर कहा जा चुका है कि जिसका चरित्र का पतन हो जाता है उसका सर्वस्व लुट जाता है,सर्वस्व खत्म हो जाता है।
  • भारत में ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं जो आर्थिक अपराध करके विदेशों की शरण लिए हुए हैं।ऐसे व्यक्ति यह मानते ही नहीं कि उन्होंने कोई गलत काम किया है।वे अपने बचने के रास्ते निकाल लेते हैं।ऐसे व्यक्तियों के लिए चरित्र का कोई महत्त्व नहीं है।नेता लोग लाखों करोड़ों का घोटाला कर देते हैं और आराम और ऐश्वर्य के साथ अपनी जिंदगी गुजारते हैं।चारों तरफ अनैतिक वातावरण है,घर-परिवार में चरित्र का निर्माण करने की शिक्षा नहीं मिलती,शिक्षा संस्थानों में चरित्र का दिवाला निकला हुआ है,तो देश के युवकों का चरित्र निर्माण कैसे होगा?

5.चरित्र निर्माण कैसे हो? (How to build character?):

  • चरित्र निर्माण करने की बड़ी विकट समस्या है।परंतु इसके बिना इंसान नहीं बन सकते हैं।फुटकर रूप से तो चरित्र निर्माण के लिए अनेक संगठन,आध्यात्मिक संगठन कार्य कर रहे हैं परंतु इसके लिए बड़े प्रयास करने की जरूरत है,जनता में अलख जगाने की जरूरत है।
  • पैसा,पद,प्रतिष्ठा तो भ्रष्टाचारी भी प्राप्त कर लेता है और करता ही है तथा जनता जनार्दन उनके दरबार में धोक भी लगाती है।अनुशासन भी डंडे और शक्ति के बल पर कायम किया जा सकता है,परंतु जब तक छात्र-छात्राओं के चरित्र का निर्माण नहीं किया जाएगा,उस पर गंभीरता पूर्वक विचार नहीं किया जाएगा,जब तक चरित्र निर्माण की आवश्यकता महसूस नहीं की जाएगी तब तक समाज में अस्थायी शांति कायम की जा सकती है।
  • चारित्रिक बल की महत्ता को समझना होगा।चरित्र बल के सामने बड़े से बड़ा व्यक्ति भी झुक जाता है।पूरा समाज,शासन तक भी नैतिक व चरित्र बल वाले व्यक्ति के सामने नतमस्तक हो जाते हैं।जिस व्यक्ति में चरित्र बल होता है उसके संपर्क वाले व्यक्तियों की नसों में भी सोए हुए रक्त में उबाल आ जाता है।अन्ना हजारे के पास कौन सी शक्ति है,चरित्र बल ही तो है जिसने पूरी सत्ता को झुकने के लिए मजबूर कर दिया है।
  • गणितज्ञा हाईपेटिया को जिंदा जला दिया गया परंतु उसका चरित्र बल ही तो है जिसके कारण आज भी वह याद की जाती है।आर्किमिडीज को गणित की अठखेलियाँ करते हुए सेनापति मार्सोलस के सैनिक ने  गर्दन उड़ा दी।परंतु आज भी श्रद्धा के साथ उनको याद किया जाता है।वे अमर हो गए हैं।ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं कि चरित्र बल का कितना महत्त्व है।परंतु आज के शासक और छात्र-छात्राएं इसके महत्त्व को नहीं समझ पा रहे हैं।कहीं भीड़ आक्रोशित होकर बसों में आग लगा दे,थाने पर हमला कर दे,पुलिस एकजुट होकर आतंकवादियों की समाप्ति कर दे,विदेशी आक्रमण को शक्ति की बल पर विफल कर दें,इन सभी में चारित्रिक बल की आवश्यकता है।शक्ति के द्वारा अस्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।हाँ यह अवश्य है कि कुछ लोगों के शांति-पाठ,चारित्रिक बातों का असर नहीं पड़ता है,उनके शक्ति की भाषा ही समझ में आती है।परंतु शक्ति पूर्वक दमन करने के बाद भी उनको मुख्य धारा में लाने के लिए चरित्र का निर्माण करना जरूरी है।
  • शिक्षकों को प्रसंगवश चारित्रिक और नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए।ऐसा वे तभी कर सकते हैं जबकि वे स्वयं आदर्शों का पालन करते हों,चरित्रनिष्ठ हों।विभिन्न समाचार माध्यमों और जागरूक लोगों को चरित्र निर्माण करने का प्रयास करना चाहिए।काउंसलर के माध्यम से भी छात्र-छात्राओं में चरित्र का निर्माण किया जा सकता है।सरकार को भी सोचना चाहिए कि अपराधों,आतंक व उपद्रव को रोकने के लिए इतना धन खर्च करती है वहीं शिक्षा में एक छोटा सा बदलाव करके ट्रायल के तौर पर देखना तो चाहिए।नवोदय विद्यालय,केंद्रीय विद्यालय की तर्ज पर ऐसे विद्यालय खोलकर देखना तो चाहिए की चारित्रिक शिक्षा दी जा सकती है या नहीं।यदि दी जा सकती है तो किस प्रकार दी जाए,किस युक्ति से बच्चों को नैतिक व चारित्रिक शिक्षा दी जाए इस पर गंभीरता पूर्व विचार करके उसे लागू करना चाहिए।
  • माता-पिता को भी सोचना चाहिए कि बच्चों को सरकार ने पैदा नहीं किया है अतः उनके चरित्र निर्माण की तरफ भी ध्यान दें।हालांकि इस घोर भौतिकता के युग में चरित्र निर्माण करना कठिन ही नहीं बहुत दुष्कर कार्य है,परंतु इसका कोई विकल्प भी नहीं है।देश,समाज,परिवार और व्यक्ति का गठन,निर्माण का केवल और केवल एक ही तरीका है चरित्र का निर्माण करना।जो छात्र-छात्राएं परिपक्व हैं उन्हें भी समय निकालकर सत्साहित्य,व्यावहारिक पुस्तकों का अध्ययन,मनन,चिंतन करना चाहिए।स्वाध्याय करना चाहिए।चरित्र बल के साथ ही कोई भी सफलता अच्छी लगती है और ऐसी सफलता ही टिकाऊ और दीर्घजीवी है।केवल दूसरों पर दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सफलता के साथ चरित्र का विकास कैसे करें? (How to Develop Character with Success?),सफलता के साथ चरित्र का निर्माण करने के मन्त्र (Mantras to Build Character with Success) के बारे में बताया गया है।

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6.चरित्र बल (हास्य-व्यंग्य) (Character Strength) (Humour-Satire):

  • उपदेशक (छात्र से):बताओ तुम्हें जाॅब या चरित्र बल में से कौन-सा विकल्प चाहिए।मेरा मतलब है आपको जाॅब दिया जाए या आपका चरित्र निर्माण किया जाए।
  • छात्रःमुझे जॉब चाहिए।जॉब के बिना मेरी कोई कद्र नहीं और न ही मुझसे कोई शादी करने के लिए तैयार है।
  • उपदेशक:परंतु चरित्र बल से तुम कठिन से कठिन समय को आसानी से पार कर सकते हो।सुख-शांति से रह सकते हो।
  • छात्रःजी नहीं,मुझे केवल जॉब चाहिए।चरित्र बल पुराने जमाने की बात हो गई है।

7.सफलता के साथ चरित्र का विकास कैसे करें? (Frequently Asked Questions Related to How to Develop Character with Success?),सफलता के साथ चरित्र का निर्माण करने के मन्त्र (Mantras to Build Character with Success) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.सफल किसे कहेंगे? (Who would be called successful?):

उत्तर:जिसका सर्वांगीण विकास हुआ है अर्थात् चारित्रिक,नैतिक और आर्थिक विकास होने पर ही सफल कहा जाएगा।परंतु आज तो आर्थिक रूप से सम्पन्न को ही सफल कहा जाता है।

प्रश्न:2.क्या साधनों और सुविधाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए? (Shouldn’t the resources be used?):

उत्तर:सुख-सुविधाओं का उपयोग त्याग की भावना के साथ करना चाहिए अर्थात् आसक्ति रखकर न किया जाए।दूसरा ध्यान यह रखा जाए कि इनका भोग करने में अति ना करें।

प्रश्न:3.शिक्षा का ध्येय क्या होना चाहिए? (What should be the goal of education?):

उत्तर:चरित्र का निर्माण ही शिक्षा का ध्येय होना चाहिए।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सफलता के साथ चरित्र का विकास कैसे करें? (How to Develop Character with Success?),सफलता के साथ चरित्र का निर्माण करने के मन्त्र (Mantras to Build Character with Success) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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