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Why current indian education is best?

वर्तमान भारतीय शिक्षा सबसे अच्छी क्यों है? का परिचय (Introduction to Why current indian education is best?),भारतीय शिक्षा प्रणाली पुरानी हो चुकी है (Indian education system outdated):

  • वर्तमान भारतीय शिक्षा सबसे अच्छी क्यों है|? (Why current indian education is best?) के इस वीडियो में वर्तमान भारतीय शिक्षा के गुणों को दर्शाया गया है। कोई भी शिक्षा सर्वगुणसंपन्न नहीं होती है। हर शिक्षा में गुण और दोष होते हैं। इसका दूसरा पहलू यह है कि शिक्षा पद्धति कैसी भी हो उसका उपयोग करना या दुरुपयोग करना हमारे ऊपर निर्भर करता है। जैसे एटाॅमिक ऊर्जा से हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर गिराकर विध्वंस कर सकते हैं और चाहे तो एटाॅमिक ऊर्जा का सदुपयोग बिजली का निर्माण में कर सकते हैं।

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via https://youtu.be/S5ommQf5hKc

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2.वर्तमान भारतीय शिक्षा सबसे अच्छी क्यों है? (Why current indian education is best?),भारतीय शिक्षा प्रणाली पुरानी हो चुकी है (Indian education system outdated):

  • शिक्षा का अर्थ है व्यक्ति की आंतरिक प्रसुप्त जन्मजात शक्तियों का विकास करके,वातावरण के साथ सामंजस्य उत्पन्न करना।उसे जीवन तथा नागरिकता के कर्त्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करने के लिए मनुष्य/विद्यार्थियों को तैयार करना और उसके व्यवहार,विचार एवं दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन करना कि जो समाज,देश और विश्व के लिए हितकर व शुभ हो।संकुचित अर्थ हैःकिसी निश्चित स्थान,निश्चित समय तथा निश्चित योजना के तहत बालकों को निश्चित पाठ्यक्रम कराना।
    वर्तमान शिक्षा से जो लाभ हुए हैं वे निम्न हैंः
    साक्षरता में वृद्धिःभारत जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा देश है ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक भारत में सबको साक्षर करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी।परंतु उस चुनौती का सामना करके देश की एक बहुत बड़ी जनसंख्या को साक्षर किया गया है जबकि स्वतंत्र होने के पश्चात भारत के पास सीमित साधन थे।
    सबको शिक्षाःप्राचीन तथा मध्यकाल में शिक्षा एक विशेष वर्ग एलीट वर्ग ही शिक्षा प्राप्त करता था।परंतु अब अमीर-गरीब,ऊँच-नीच सबको शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध हैं तथा किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।
    स्त्री शिक्षाःस्त्रियों की शिक्षा की बहुत दयनीय स्थिति थी,बहुत कम शिक्षा दर थी।लोगों के दिमाग में एक ही विचार था कि महिलाओं को घर-गृहस्थी संभालनी है।अतः स्त्री शिक्षा का मध्यकाल में लगभग लोप हो गया था।वर्तमान भारतीय शिक्षा में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।फलस्वरुप आज हर अभिभावक अपनी लड़कियों को शिक्षा उपलब्ध कराने में संकोच नहीं करता है।परिणामस्वरूप नारियों का हर क्षेत्र में योगदान बढ़ता जा रहा है तथा नारी हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा रही है।यथा शिक्षा,खेलकूद,स्वास्थ्य,सेना,पुलिस,फिल्म तथा व्यवसाय यानी हर क्षेत्र में नारी का योगदान बढ़ रहा है।
    व्यावसायिक शिक्षाःप्राचीन तथा मध्यकाल में व्यवसाय की शिक्षा सामान्य शिक्षा के साथ ही दी जाती थी परंतु वर्तमान भारतीय शिक्षा में व्यवसायिक शिक्षा को सामान्य शिक्षा से पृथक करके व्यावसायिक शिक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है।फलस्वरूप जिन बालकों को किसी विशिष्ट क्षेत्र यथा इंजीनियर,डाॅक्टर,वैज्ञानिक या अन्य किसी व्यवसाय में जाना होता है तो उसका प्रशिक्षण प्राप्त करके विशिष्ट क्षेत्र में अपना योगदान अधिक कुशलतापूर्वक किया जा सकता है।
    सरकारी तथा निजी शिक्षाःशिक्षा पर राज्य का नियंत्रण है परंतु शिक्षा दोनों स्तर पर उपलब्ध है।जिनकी स्थापना किसी व्यक्ति,ट्रस्ट,समिति या संस्था द्वारा की जाती है वे निजी विद्यालय या महाविद्यालय कहलाते हैं तथा जिन पर राज्य सरकार व केंद्र सरकार का नियन्त्रण रहता है वे सरकारी कहलाते हैं।आज प्रत्येक अभिभावक स्वतन्त्र है कि शिक्षा निजी व सरकारी विद्यालय तथा महाविद्यालय में जहाँ चाहे प्राप्त कर सकता है।इस प्रतिस्पर्धा में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता है तथा शिक्षा पर एकाधिकार नहीं रहता है।
    धर्मनिरपेक्ष शिक्षाःवर्तमान भारत में सभी धर्मों के लोग यथा हिंदू,ईसाई,यहूदी,बौद्ध,जैन,मुस्लिम रहते हैं।अतः उनके अनुसार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप रखते हुए शिक्षा प्रदान की जाती है इससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है।
    शिक्षा के अन्य माध्यमःशिक्षा अर्जन का आज केवल विद्यालय ही एकमात्र साधन नहीं है।बल्कि जो लोग नियमित रूप से विद्यालय,महाविद्यालय में नहीं जा सकते हैं उनके लिए खुला विश्वविद्यालय,अनौपचारिक शिक्षा,सोशल मीडिया तथा इंटरनेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध है जिनके माध्यम से शिक्षा अर्जित की जा सकती है।
    शिक्षण विधिःप्राचीन काल में शिक्षण उपदेशों के द्वारा दी जाती थी परंतु वर्तमान समय में शिक्षण विधि भाषण विधि,लिखित कार्य करके ब्लैकबोर्ड,प्रोजेक्टर,टीवी,इण्टरनेट के माध्यम से बहुत से साधन उपलब्ध है अतः बालक करके सीखने के कारण ज्ञानार्जन अधिक सुलभ हो गया है।
    शिक्षा का स्थानःशिक्षा अर्जित करने के लिए आज शहर,गांव यहां तक हर मोहल्ले,ढाणियों में उपलब्ध है ऐसी स्थिति में शिक्षा केंद्र निकट ही उपलब्ध होने से हर व्यक्ति के लिए सुलभ हो गई हैं।
    अध्यापक शिक्षाःविद्यालय,महाविद्यालयों,तकनीकी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शिक्षण के लिए बहुत अधिक संख्या में शिक्षकों की जरूरत है।अतः अधिक शिक्षकों को शिक्षण में प्रशिक्षित करने के लिए B.ed.,M.ed.,NET,SLET करना होता है।इनमें छात्राध्यापक को शिक्षण के लिए प्रशिक्षित किया जाता है जिससे विद्यार्थियों को भली प्रकार शिक्षा प्राप्त हो सके।
  • समीक्षाःप्राचीन वैदिक शिक्षा में “यतोअभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि सः धर्मः” के अनुसार आध्यात्मिक तथा भौतिक जगत की शिक्षा प्रदान की जाती थी तथा उसके स्थान पर वर्तमान भारतीय शिक्षा में आध्यात्मिक शिक्षा का बिल्कुल लोप हो गया है।अब केवल भौतिक जगत की लौकिक शिक्षा प्रदान की जाती है।अतः बालक का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता है।व्यावहारिक रूप में आज भले ही शिक्षा की कितनी ही सुविधाएं उपलब्ध करा दी गई हैं परंतु गुणवत्ता के दृष्टिकोण से शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है।वर्तमान युग में धन को इतना महत्त्व दिया जा रहा है कि माता-पिता कोई न कोई व्यवसाय करते हैं जिससे बच्चों को घर पर अध्ययन का वातावरण उपलब्ध नहीं होता है।जबकि माता-पिता का सर्वोपरि कर्त्तव्य है कि अपने पुत्र-पुत्रियों को योग्य बनाएं तथा उसके लिए जो भी उचित कार्य करना हो उसे करें।धनार्जन में इतना व्यस्त होने की जरूरत नहीं है कि बच्चों को समय ही नहीं दिया जावे।फलस्वरूप घर में जो अध्ययन का वातावरण उपलब्ध नहीं होने से इसका उत्तरदायित्व विद्यालय पर डाल दिया जाता है।यानी सभी बातें यथा नैतिकता,चारित्रिक,शारीरिक,मनोरंजन तथा अवकाश के समय का सदुपयोग यहां तक कि यौन-शिक्षा देने का कार्य भी विद्यालय पर डाल दिया जाता है।अब सोचने वाली बात यह है कि एकमात्र विद्यालय द्वारा इतना कार्य कैसे किया जा सकता है।दूसरी तरफ तकनीकी विकास इतनी तेज गति से हो रहा है कि विश्व के अन्य देशों से तालमेल बिठाने के लिए उन जैसा ज्ञान भण्डार बालकों को सीखना होता है।अतः शिक्षा का भार एकमात्र विद्यालय पर डाल देने से समस्या का हल संभव नहीं है।बल्कि विद्यालय,समाज व परिवार तथा अभिभावकों को अपनी अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाने से ही बच्चों का विकास किया जा सकता है,बच्चों को शिक्षित किया जा सकता है।पाठ्यक्रम में नैतिकता,सदाचार व धार्मिक बातें न सम्मिलित करने के कारण इनका विकास सबसे प्राथमिक दायित्व माता-पिता व विद्यालय का है उसके पश्चात समाज का दायित्व है।देश में हड़तालें,उपद्रव,लड़ाई,अशांति,गुण्डागर्दी फैलने के पीछे यही कारण है कि भौतिकता की उन्नति हुई परन्तु नैतिकता व चारित्रिक पतन हुआ है।विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता पनप रही है।स्वतंत्रता का विद्यार्थी दुरुपयोग करते हैं।आत्मा व शरीर का जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध स्वतन्त्रता एवं अनुशासन का है।अनुशासन का अर्थ है अपने आपको नियंत्रण में रखना।
    राजकीय विद्यालयों की स्थितियाँ निजी स्कूलों से निम्न स्तर की है।हम राजकीय विद्यालयों की वास्तविक शिक्षा की व्यवस्था और स्तर को देखते हैं तो निराशा होती है।अध्यापकों की कमी,आए दिन स्थानांतरण,भवन और उपकरणों का अभाव,राजनीतिक हस्तक्षेप,अध्यापकों से शिक्षण के अतिरिक्त अन्य कार्य जैसे मतगणना जनगणना,पशुगणना,मतदाता सूची बनाना जैसे ढेरों कार्य लिए जाते हैं जिसके कारण उनका स्वयं का शिक्षा का कार्य ठप्प पड़ जाता है।अध्यापकों का अध्ययन कार्य के प्रति अरुचि,आए दिन स्कूलों में अवकाश ऐसी स्थिति में कितनी गंभीरता से शिक्षक पढ़ाते हैं तथा विद्यार्थी कितना पढ़ता है?
    शिक्षा गतिशील तथा परिवर्तनशील है अतः उसके उद्देश्य भी परिवर्तित होते रहते हैं यह आवश्यक भी है कि देश,काल के अनुसार उद्देश्य परिवर्तित होते रहें तभी व्यक्ति,समाज,देश को गतिशील बनाकर उन्नति की ओर ले जा सकते हैं अर्थात् शिक्षा बहुआयामी है।परंतु वर्तमान भारतीय शिक्षा को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति हुई है अपवादस्वरूप मामलों को छोड़ दिया जाए तो आज पढ़े-लिखे डिग्रीधारी युवाओं को देखकर ऐसा लगता ही नहीं है कि नहीं है कि उनमें शिक्षा के किसी उद्देश्य की पूर्ति हुई है।अतः शिक्षा को व्यापक रूप से सरकारों,शिक्षाविदों तथा हमें आत्ममंथन करके इसमें सुधार किया जाए जिससे सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक भारत के नागरिक कहला सकें।
    उपर्युक्त आर्टिकल में वर्तमान भारतीय शिक्षा सबसे अच्छी क्यों है? (Why current indian education is best?),भारतीय शिक्षा प्रणाली पुरानी हो चुकी है (Indian education system outdated) के बारे में बताया गया है।
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2 Comments
    • Satyam Mathematics June 13, 2020 / Reply

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