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What is Diagnostic work and remedial teaching in mathematics

WHAT IS DIAGNOSTIC WORK AND REMEDIAL TEACHING IN MATHEMATICS

1.गणित में निदानात्मक कार्य और उपचारात्मक शिक्षा (WHAT IS DIAGNOSTIC WORK AND REMEDIAL TEACHING IN MATHEMATICS)

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WHAT IS DIAGNOSTIC WORK AND REMEDIAL TEACHING IN MATHEMATICS
WHAT IS DIAGNOSTIC WORK AND REMEDIAL TEACHING IN MATHEMATICS
विद्यालय में विद्यार्थी भिन्न-भिन्न विषयों का अध्ययन करते हैं तथा शिक्षक विषयों को पढ़ाते हैं, विषय शिक्षण में शिक्षक के सम्मुख एक ही उद्देश्य प्रमुख रूप में होता है कि विद्यार्थी विषय को भली-भाँति समझ लें जिससे उनका साफल्य उच्चकोटि का हो, इसके साथ विद्यार्थी के सम्मुख भी यही लक्ष्य होता है कि वह उस विषय को अधिक-से-अधिक जानकारी प्राप्त करे जिससे उसका कक्षा में उच्च स्थान बन सके। वास्तव में उपर्युक्त लक्ष्य दोनों ही की दृष्टि में सबसे ऊपर होता है।

परन्तु साफल्य से अधिक महत्त्वशाली बात यह है कि विद्यार्थी प्रारम्भ से ही विषय के शिक्षण बिन्दुओं को भली प्रकार समझे तथा शिक्षक विषय पढ़ाते समय अपना ध्यान इन बिन्दुओं पर रखे। ऐसा करने से विद्यार्थी बहुत-से बारीक तथा मुख्य बिन्दुओं का ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ नहीं रहता और फिर भी वह कक्षा में उत्तीर्ण होता जाता है, परन्तु प्रश्न केवल उत्तीर्ण होने का ही नहीं है बल्कि विषय की पूर्ण जानकारी का है साफल्य परख (Achievement Test ) के आधार पर हमें विद्यार्थियों की सफलता का ज्ञान होता है तथा उनको भिन्न-भिन्न श्रेणियों A, B, C में रखा जाता है परन्तु निदानात्मक परख (Diagnostic Test) से हम विद्यार्थी विषय में किन-किन शिक्षण बिन्दुओं को नहीं समझ पाये हैं उनका ज्ञान होता है।
उदाहरण के रूप में एक व्यक्ति बुखार से पीड़ित है, डाॅक्टर उस व्यक्ति के बुखार के लक्षणों का पता लगाता है कि अमुक बुखार मलेरिया या टाइफाइड है। इस पद्धति को निदान (Diagnosis) कहते हैं। सही निदान के आधार पर बीमारी का उपचार किया जाता है और बुखार का निवारण हो जाता है। चिकित्सा विज्ञान के ज्ञान से ही निदान का कार्य शिक्षा क्षेत्र में भी लिया जाता है।
परन्तु प्रश्न यह है कि शिक्षा में किसका निदान करें । प्रत्येक विषय की अपनी प्रकृति होती है तथा उसके अपने शिक्षण-बिन्दु होते हैं जो दूसरे विषय से भिन्न होते हैं। प्रत्येक विषय के अपने पद, प्रत्यय, चिन्ह, सूत्र क्रियाएँ होती हैं जो दूसरे से भिन्न होती हैं ।इस प्रकार गणित विषय शिक्षण में शिक्षक को एक प्रकार के पद, प्रत्यय आदि को विद्यार्थियों तक पहुँचाना होता है ।यह कार्य प्रारम्भ से ही जब से विषय शिक्षण किया जाता है तभी से शिक्षण बिन्दुओं की स्पष्टता शिक्षक को होनी चाहिए ताकि वह विद्यार्थियों को गणित का सही ज्ञान दे सकता है, साथ ही विद्यार्थी को गणित का सही ज्ञान सम्भव हो सकता है ।
उदाहरण के रूप में गणित के रूप में हम +-=÷×आदि चिन्हों का प्रयोग करते हैं । यदि किसी प्रकार इनका गलत ज्ञान विद्यार्थी को हो जाय तो विद्यार्थी इस गलत ज्ञान का सदैव प्रयोग करता रहेगा और उसका विषय में साफल्य कम होता जाएगा इसलिए इसका निदान परम आवश्यक है।
निदान का कार्य प्रारम्भ से ही होना चाहिए, कहने का तात्पर्य है कि विषय शिक्षण प्रारम्भ करने से पहले विद्यार्थियों की सही स्थिति निदान द्वारा ज्ञात की जानी चाहिए। निदानात्मक कार्य प्रत्येक अध्याय के पश्चात् करना चाहिए जिससे उसका निवारण या उपचार उसी समय किया जा सके। यदि विद्यार्थी की कमी समय पर दूर नहीं की जाती है तो वह कमी बढ़ती जाती है और विद्यार्थी का विषय ज्ञान कम होता जाता है। जैसे ही कमी का आभास होता है उसी वक्त उसका उपचार किया जाना चाहिए ताकि कमी आगे न जा सके, निदान हेतु हम निदान परखों को तैयार करते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि गणित में निदान कार्य हेतु किन भिन्न-भिन्न पदों को ध्यान में रखा जाता है जिससे उनकी कमी का सही ज्ञान हो सके। निदान हेतु निम्न पदों को ध्यान में रखा जाता है।

2.गणित में निदान हेतु पद(Steps in Diagnostic Work in Mathematics)

(1.)विद्यार्थियों का गणित में किन भिन्न-भिन्न पदों (Terms), प्रत्यय(Concepts), चिन्ह (Symbols), तथ्य(Facts) आदि जिनका विद्यार्थियों को सही ज्ञान न हुआ हो उनका पता लगाना।
(2.)प्रत्येक पद, प्रत्यय, तथ्य, चिन्ह आदि कितने विद्यार्थियों को स्पष्ट नहीं है, इसमें विद्यार्थियों का प्रतिशत ज्ञात करके उच्च प्रतिशत से निम्न प्रतिशत के रूप में रखा जाता है। इसका कारण यह है कि यदि किसी गणित के प्रत्यय को अधिक विद्यार्थी नहीं समझ पाये हैं तो इसका उच्च प्रतिशत आएगा और सबसे प्रथम उसका उपचार किया जाएगा। इसके बाद उससे कम प्रतिशत वाले प्रत्यय का उपचार किया जाएगा, यह क्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक सभी प्रत्ययों का विद्यार्थियों को सही ज्ञान न हो जाए।
(3.)तीसरा सोपान यह है कि जो भी पद, प्रत्यय, तथ्य आदि विद्यार्थियों को स्पष्ट नहीं हुए हैं उनके स्पष्ट न होने के कारणों को जानना चाहिए। एक बार सही कारण का ज्ञान होने पर उसके निवारण का सही उपचार हो सकता है।

3.विद्यार्थियों को गणित सम्बन्धी पद, प्रत्यय, तथ्य आदि स्पष्ट न होने के भिन्न-भिन्न कारण(Causes as to Why Terms, Facts, Concepts etc. Of Mathematics Are Not Clear to The Pupils)-

(1.)पिछली कक्षा से चली आ रही कमी-
यदि विद्यार्थी को पिछली कक्षा में गणित के पद, प्रत्यय, तथ्य आदि भली प्रकार स्पष्ट नहीं हुए हों तो नवीन ज्ञान जिसका आधार पिछली कक्षा का ज्ञान होता है उसको समझने में रुकावट पैदा हो जाती है, इसलिए नवीन ज्ञान देने से पहले उनकी कमियों को ज्ञात कर उनका निवारण किया जाना आवश्यक है। कक्षा में इन कमियों का ज्ञान निदानात्मक परख द्वारा सम्भव है।
(2.)कक्षा में शिक्षण करने से पहले उसकी वास्तविक आवश्यकता जान लेना चाहिए। विद्यार्थियों की सफलता उनकी आवश्यकता पर निर्भर करती है इससे उनके सीखने (Learning) में सुविधा होती है।
(3.)तीसरा कारण यह हो सकता है कि विद्यार्थी को गणित विषय के अध्ययन में रुचि न हो और न आवश्यक प्रेरणा तो विद्यार्थी गणित में सफलता प्राप्त नहीं कर पाएंगे।
(4.)विद्यार्थियों को गणित के प्रत्यय (Concepts) स्पष्ट नहीं हो पाते हैं। यदि उनकी योग्यता (Ability) औसत से कम होती है तो ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों को गणित के प्रत्यय स्पष्ट नहीं हो पाते हैं ।
(5.)इनके अतिरिक्त गणित विषय सम्बन्धी पुस्तकें या सहायक सामग्री विद्यालय में उपलब्ध न हो तो शिक्षक को शिक्षण रोचक बनाने में कठिनाई होती है।
(6.)गणित के उपयुक्त पाठ्यक्रम के अभाव में भी विद्यार्थियों को विषय ज्ञान स्पष्ट नहीं हो पाता है।
(7.)यदि गणित का शिक्षक शिक्षण में भिन्न-भिन्न नवीन विधियों का प्रयोग नहीं करता है तो विषय को समझने में मुख्यतया औसत तथा औसत से नीचे के विद्यार्थियों को कठिनाई का अनुभव करना पड़ता है ।
विद्यार्थियों में गणित अध्ययन करते समय बहुत-से शिक्षण-बिन्दु स्पष्ट नहीं हो पाते हैं.

4. इन कमियों को जानने हेतु निम्न भिन्न-भिन्न विधियों का प्रयोग किया जाता है(Ways of Knowing The Weakness of Pupils in Mathematics)-

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WHAT IS DIAGNOSTIC WORK AND REMEDIAL TEACHING IN MATHEMATICS
(1.)सबसे सफल विधि यह है कि विद्यार्थियों से समय-समय पर कक्षा तथा कक्षा से बाहर गणित सम्बन्धी प्रश्न पूछे जायें, प्रश्नों के उत्तरों से यह पता चलता है कि विद्यार्थियों में क्या कमियाँ हैं, इन कमियों को लगातार नोट करते रहना चाहिए।

(2.)विद्यार्थियों को गृह-कार्य दिया जाता है जिससे कक्षा शिक्षण ठीक प्रकार समझ में आ जाए। गृह-कार्य का विश्लेषण करने पर भी उनकी कमियों का पता चलता है।
(3.)गणित में मौखिक कार्य का अपना महत्त्व है । मौखिक कार्य के द्वारा भी उनकी कमी का आभास होता है
(4.)कभी-कभी विद्यार्थियों का साक्षात्कार (Interview) के द्वारा भी विद्यार्थियों की गणित में कमियों का ज्ञान होता है।
(5.)विद्यार्थियों की कमजोरी का पता उनकी उत्तर-पुस्तिकाओं के विश्लेषण द्वारा ज्ञात होता है।
(6.)इसके अतिरिक्त अनौपचारिक परिस्थितियों जैसे – प्रयोगशाला पुस्तकालय, गणित सम्बन्धी गोष्ठियाँ, गणित मेला आदि में उनके व्यवहार का निरीक्षण करके भी विद्यार्थियों की कमजोरी का पता चलता है ।
(7.)कभी-कभी साफल्य परख( Achievement Test) के विश्लेषण से भी विद्यार्थियों की कमजोरी का पता चलता है।

Table Of Contents

    5.गणित के क्षेत्र में विद्यार्थी निम्न प्रकार की गलतियाँ या त्रुटियाँ उपर्युक्त विधियों द्वारा ज्ञात होती है(Mistakes Pupils Generally Commit in Mathematics)-

    (1.)गणित में प्रयोग होने वाले चिन्हों का गलत प्रयोग करते हैं।
    (2.)भिन्न-भिन्न गणित के तथ्यों में समानता तथा अन्तर का प्रयोग गलत करते हैं।
    (3.)भाग देने में तथा गुणा करने में हासिल का गलत प्रयोग।
    (4.)भिन्नों में हर तथा अंश का गलत प्रयोग।
    (5.)दो या अधिक प्रत्ययों में अन्तर गलत करते हैं ।
    (6.)समीकरण गलत बनाना, ज्ञात तथा अज्ञात राशियों का स्पष्ट ज्ञान न होना।
    (7.)रेखागणित के चित्रों की बनावट सही नहीं बना सकना।
    (8.)गणित के उपकरणों को गलत प्रयोग करना।
    (9.)भाषा को गणित की भिन्न-भिन्न इकाइयों में प्रदर्शित करना।
    (10.)एक इकाई से दूसरी में परिवर्तित करना।
    (11.)औसत, प्रतिशत, L. C. M., H. C. F. आदि ज्ञात करना।
    (12.)तर्क तथा भिन्नता ज्ञात करने वाले प्रश्नों के सही उत्तर देना।

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    6.नैदानिक परीक्षण के उद्देश्य (Objectives of Diagnostic Test)

    निदान हेतु प्रत्येक स्तर तथा अध्याय पर एक परीक्षण तैयार किया जाता है । नैदानिक परीक्षणों के पदों की व्याख्या करने से पहले उस परीक्षण के उद्देश्य देना आवश्यक है। नैदानिक परीक्षण के निम्न उद्देश्य हैं –
    (1.)गणित विषय के शिक्षण तथा अध्ययन में सुधार लाना यह विद्यार्थी तथा शिक्षक दोनों के लिए लाभदायक होता है। यदि विद्यार्थी किन्हीं गणित के प्रत्ययों को स्पष्ट नहीं समझते हैं तो शिक्षक को अपनी विधि में परिवर्तन लाना होता है।
    (2.)कक्षा में गणित में पिछड़े बालकों को पहचानना जिससे सुधार हेतु निदान सम्भव हो सके।
    (3.)विद्यार्थियों के विषय सम्बन्धी विकास में रुकावट आने वाले तत्वों को जानना तथा उपचारात्मक सुझाव देना।
    (4.)अध्ययन पद्धतियों का दिशा निर्देशन करना।
    (5.)गणित में कमजोरी आंकना और उसके आधार पर सामूहिक उपचारात्मक पद्धति अपनाना।
    (6.)पाठ्यक्रम तथा पाठ्य-वस्तु में कमियों के आधार पर परिवर्तन लाना जिससे वे विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो।
    (7.)विद्यार्थियों की कमियों को जानने हेतु उपयुक्त मूल्यांकन प्रक्रिया का प्रयोग करना।

    7.निदानात्मक परख के पद(Steps of Diagnostic Test ) –

    (1.)गणित के क्षेत्र में विद्यार्थियों द्वारा गलतियों का पता लगाना। यह कार्य या तो गणित के क्षेत्र में साफल्य परख द्वारा या विद्यार्थियों को उत्तर-पुस्तिकाओं के द्वारा ज्ञान होता है।
    (2.)परख का निर्माण (Construction of the Test Items) – इस पद में एक प्रकार की गलती से तीन या चार छोटे-छोटे प्रश्न तैयार किए जाते हैं।
    (3.)परख का प्रयोग(Administration of the Test) – तैयार की गई परख को विद्यार्थियों के बड़े समूह को दिया जाता है।
    (4.)गलतियों का पता लगाना(Locate the Errors)-गलतियों का पता लगाने से उपचार हेतु कार्य सम्भव होता है।
    (5.)गलतियों को एक साथ उनकी प्रकृति के अनुसार रखना(To Categorise the Errors)-इस पद में उच्च प्रतिशत से निम्न प्रतिशत के आधार पर गलतियों के प्रकारों को रखा जाता है। उपचार करने में सबसे प्रथम उच्च प्रतिशत की गलतियों का निवारण किया जाता है। फिर उससे नीचे वाले प्रतिशत की गलतियों का निवारण किया जाता है, इस क्रम में धीरे-धीरे निम्न प्रतिशत वाली गलतियों का उपचार किया जाता है।
    (6.)अन्त में पद में प्रत्येक गलती के कारण का पता लगाया जाता है जिससे भविष्य में उन कारणों पर ध्यान रखा जाय और विद्यार्थी गलती दोहरा न सकें।

    8.उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching)

    विषय के क्षेत्र में निदानात्मक कार्य (Diagnostic Work) की समाप्ति विद्यार्थियों के लिए उनकी कमजोरी दूर करने हेतु शिक्षण देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इस कार्य को उपचारात्मक शिक्षण कहा जाता है । एक बार विद्यार्थी की गणित में कमजोरी का पता चलने पर उपचारात्मक कार्य सरल हो जाता है ।
    उपचारात्मक कार्य वर्ष के अन्त में न करके प्रत्येक अभ्यास की समाप्ति पर किया जाना चाहिए। यदि अध्याय के समझने में विद्यार्थियों को किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव होती है तो उसका निवारण उसी समय करने से विद्यार्थियों की कमजोरी आगे नहीं जा पाती है तथा उनको विषय समझने में कम समय लगता है। इस प्रकार निदान तथा उपचार साथ-साथ चलने से विषय का ज्ञान ठीक प्रकार से होता है।

    9.विद्यालय में उपचार हेतु निम्न व्यवस्था करनी चाहिए(The Following Remedial Programme to be Arranged in the School) –

    (1.)विद्यार्थियों की कमजोरी को दूर करने हेतु उसी पाठ्य-वस्तु (Content) को दोहराना चाहिए। इससे उनकी कमजोरी दूर की जा सकती है।
    (2.)विद्यार्थियों की कमजोरी के आधार पर छोटे-छोटे समूह बनाकर अलग-अलग शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
    (3.)गणित के क्षेत्र में छोटे-छोटे प्रोजेक्ट तथा समस्याएँ देनी चाहिए। इनके द्वारा कक्षा शिक्षण में जो प्रत्यय स्पष्ट न हो सके हों वे स्पष्ट हो जाते हैं।
    (4.)विद्यार्थियों को अध्याय की समाप्ति पर अभ्यास तथा गृह-कार्य दिया जाना चाहिए ताकि जो कुछ कमजोरी रह गयी हो वह दूर हो जाती है।
    (5.)विद्यार्थियों को अभिक्रमिक कार्य (Programed Work) – उनकी कमजोरी को प्रकृति के अनुसार अभिक्रमिक कार्य देते रहना चाहिए। जो विद्यार्थी गणित के जिन तथ्य, पद तथा प्रत्यय को समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं, शिक्षक को चाहिए कि वह उन्हीं क्षेत्रों से अभिक्रमिक कार्य तैयार करके स्वयं विद्यार्थियों को करने को दे। इस पर कार्य करने से विद्यार्थियों की कमजोरी दूर हो जाती है।
    (6.)गणित के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से जिनमें विद्यार्थियों की अधिक कमजोरी होती है उनमें गोष्ठियों का आयोजन कराया जाय। इनके द्वारा भी विद्यार्थियों की कमजोरी दूर की जा सकती है । 
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