Power of Praise or Benefits of Praise:Why Can Timely Compliment Change Student’s Life?
1.प्रशंसा की शक्ति या तारीफ करने के फायदे:क्यों सही समय पर की गई तारीफ बदल सकती है विद्यार्थी की जिन्दगी? (Power of Praise or Benefits of Praise:Why Can Timely Compliment Change Student’s Life?):
- प्रशंसा की शक्ति या तारीफ करने के फायदे (Power of Praise or Benefits of Praise) क्या हैं? जानिए सही समय पर कैसे तारीफ की जाए? प्रशंसा से कैसे हमारी जिन्दगी बदल सकती है? इसमें कुछ भी खर्च नहीं होता है लेकिन इसमें कितनी शक्ति है?
झूठी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए।इस प्रकार की प्रशंसा चापलूसी तथा चाटुकारिता होती है।छात्र-छात्राओं के लिए शिक्षक और माता-पिता प्रशंसा कैसे करें,को जानने के लिए “How is Praise Useful for Students?” आर्टिकल पढ़ें।
2.प्रशंसा की शक्ति या तारीफ करने के फायदे (Power of Praise or Benefits of Praise):
- प्रशंसा दिल को छूती है।प्रशंसा से मन प्रसन्न हो जाता है।यह एक ऐसा गुण है,जो सदा अपनी ओर आकर्षित करता है।बस,यह कला आनी चाहिए,फिर इसका प्रभाव देखिए।कभी-कभी तो झूठी प्रशंसा भी खूबसूरत लगती है।
- जो हम नहीं हैं,उसके बारे में भी यदि कोई दो बात कह गया तो हम फूले नहीं समाते (to be overjoyed और उसकी पूछताछ करते हैं कि हमारी और क्या विशेषता है? लोग हमारे बारे में और क्या कहते हैं? प्रशंसा होती ही है बड़ी प्यारी,पर इसका एक अलग मनोविज्ञान है।
- प्रशंसा के शब्द हमारे दिल में उतर जाते हैं और जो दिल में उतरता है,जिसे हम दिल में स्थान देते हैं,वह निश्चय ही खूबसूरत होगा।इसके मीठे बोल हमारे कानों में रस घोलते हैं।इसे बार-बार सुनने को मन करता है।इसको सुनने के बाद हमारे अंदर एक मधुर संगीत की धारा फूट पड़ती है।कुछ देर के लिए हम इसी में रम जाते हैं।इसके अलावा और कुछ भी अच्छा नहीं लगता है।ऐसा लगता है,जैसे हम इस दुनिया-जहाँ के खूबसूरत इंसान हैं और हमारे गुणों की विशेषताओं के स्वप्रकाशित ज्योतिकणों से दुनिया प्रकाशित है।
- प्रशंसा के बोल बोलने वाला हमारे लिए सबसे प्यारा होता है-ऐसे,जैसे इसके ठीक विपरीत निंदा करने वाला सबसे खराब नजर आता है।इसलिए मनोविज्ञानियों ने प्रशंसा को बेहोशी की दवा (Praise sedation medication) करार दिया है।दवा पर निर्भर करता है कि यह बेहोशी कब तक चलेगी।
3.तारीफ या चापलूसी में फर्क (Difference Between Praise and Flattery):
प्रशंसा के अनेक भेद हैं।एक ही बात हर जगह दोहराई नहीं जा सकती।एक ही बोल सबको नहीं भाते हैं।अतः यह भिन्न-भिन्न होती है।प्रशंसा को अपने स्वार्थ साधने के लिए,अपना काम निकालने के लिए,देश-काल-परिस्थिति का ज्ञान किए बगैर करना और कम को अधिक रूप में बखान करना चाटुकारिता के रूप में जाना जाता है।
चाटुकारिताप्रिय इंसान में विवेक का घोर अभाव होता है।इसलिए बिना विचारे अपनी प्रशंसा करने वाले पर वह मेहरबान हो जाता है।राजतंत्र में राजा को खुश करने एवं प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से विशेषज्ञ चाटुकारों (Expert Flatterers) की व्यवस्था की जाती थी।उनका काम ही था कि वे राजाओं के विभिन्न कार्यों,गुणों,रूप आदि की प्रशंसा करें।वे लोग बड़े विशेषज्ञ होते थे और अपने राजाओं की मनोवृत्ति से खूब परिचित होते थे।इसलिए वे वही बोल बोलते थे,जो राजा को पसंद हो,चाहे वह सत्य हो या झूठ।
वर्तमान आधुनिक समाज में नेताओं के चाटुकार होते हैं,जो ये बताते हैं कि वे उनके लिए कितने वफादार हैं तथा उनका नेता औरों से कितना श्रेष्ठ है।कार्पोरेट सेक्टर में एक बड़े ओहदे के अफसर को छोटे अफसर या क्लर्क आदि इन्हीं दवाओं से बेहोश करते हैं।आफिस के बाद भी उनके मीठे बोल ऑफिसर के घर एवं उनके परिवार के अन्य सदस्यों तक,विशेषतः उनकी पत्नी तक पीछा करते हैं प्रसन्न करने के लिए और इसकी कला का बखूबी ज्ञान हो तो यह प्रभावी भी है।ऐसे चाटुकारपसंद लोग चाटुकारों की खोज भी करते हैं।चाटुकार इस कला में निपुण एवं दक्ष होते हैं।
4.वास्तविक प्रशंसा करें (Praise real):
- इस परिप्रेक्ष्य में बीरबल अकबर के संवाद आते हैं। हालाँकि बीरबल बड़े विद्वान थे और उनकी प्रतिभा से सभी परिचित थे।उन्हें यहाँ पर चाटुकार कहा नहीं जा रहा है,उनकी प्रतिभा का उल्लेख किया जा रहा है। अकबर ने कहा-“बैंगन कितना सुंदर है!” बीरबल ने कहा- “हाँ महाराज !देखिए,यह कितना सुंदर है!इसके सिर पर मुकुट जैसा ताज है।” फिर अकबर ने कहा-“बैंगन कोई सब्जी है भला!”बीरबल ने उसी अंदाज में जवाब दिया-“महाराज!बैंगन कितना काला-कलूटा है।यह तो बेपेंदी के लोटे के समान जिधर लुढ़का दो,लुढ़क जाता है।भला इसका कोई अस्तित्व होता है!” अपने आका की हाँ में हाँ मिलाना इस प्रकार होता है। इसे चाटुकारिता कहते हैं।
- एक प्रशंसा वास्तविक होती है,जिसमें किसी की भलाई निहित होती है।एक उद्देश्य होता है कि अपनी अच्छी बातें सुनकर विद्यार्थी और अच्छा करने के लिए प्रेरित (motivate) हो सके।यदि गुणों की प्रशंसा न की जाए,अच्छाई की प्रशंसा न की जाए,साहसिक कारनामों को श्रेष्ठ न बनाया जाए तो संसार में इनका महत्त्व घट जाएगा।अतः गुणों की प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए।
- मूल्यों को अपनाने वाले श्रेष्ठ व्यक्तियों का गुणगान,यशोगान (eulogy) बुरी बात नहीं है।इस दृष्टि से की गई प्रशंसा ही सच्ची होती है।अध्यापक अपने श्रेष्ठ विद्यार्थियों की तहेदिल से प्रशंसा करते हैं और विद्यार्थीगण भी अपने आचार्यों का यशोगान करते हैं। यह श्रेष्ठ परंपरा है,जिसे उदार हृदय से करना चाहिए। समाज में इसकी आवश्यकता है।अतः गुणों का गान एवं मान दोनों ही होना चाहिए।
एक प्रशंसा वह होती है,जिससे आत्मविश्वास बढ़ाया जाता है।कमजोर बालक को उत्साहित करने के लिए उसकी अच्छी बातों की प्रशंसा की जाती है।प्रशंसा के माध्यम से उसके आत्मबल को बढ़ाया जाता है। - चिकित्सक रोगी का भी इसी प्रकार से कुछ आत्मविश्वास बढ़ाता है।छोटे-छोटे बच्चों को माता इसी प्रकार से पुचकारती-दुलारती है।यह एक तरीका है।हर तरह से हर रूप में प्रशंसा अच्छी लगती है।बस,इसकी कला आनी चाहिए।जो इस कला में पारंगत एवं प्रवीण होते हैं,वे अपना काम निकालना जानते हैं और किसी के साथ भी सामंजस्य रख सकते हैं।सामंजस्य (harmony) के लिए निंदा नहीं,प्रशंसा के दो शब्द पर्याप्त होते हैं।
5.आपकी पहचान:सही तारीफ और उसका असर (Aapki Pehchan:Sahi Tarif aur Uska Asar):
- प्रशंसा जिसकी की जाती है,उसके व्यक्तित्व के बारे में कुछ बातें अवश्य जान लेनी चाहिए कि उसकी पसंद क्या है,नापसंद क्या है? उसकी अभिरुचि,इच्छा आदि के बारे में जानकारी के बिना की गई प्रशंसा उलटा असर दिखा सकती है।जैसे यदि किसी को पढ़ना अच्छा लगता है तो स्वाध्याय के बारे में बोली गई बात उसे भाएगी। उसके पश्चात रुचि के विषय एवं उसकी उपलब्धि (achievements) के बारे में उसका ध्यान आकर्षित करने वाली बातें करनी चाहिए।
- फिर उसकी प्रशंसा करने से वह विद्यार्थी आपको अपना बनाने में परहेज नहीं करेगा।अंत में यदि कोई उसने पुरस्कार जीता है,किसी विशिष्ट प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ है आदि हो तो उसकी तारीफ करनी चाहिए।इसी प्रकार अलग-अलग ढंग से उसको लुभाने वाली तारीफ की जा सकती है।एक ही बात बार-बार कहने से बात बनेगी नहीं।इसका बड़ा गहरा मनोविज्ञान (Depth Psychology) है,पर कुछ हद तक तो इससे परिचित होना ही चाहिए।
- प्रशंसा का विश्लेषण न किया जाए तो यह निंदा से अधिक जटिल जान पड़ती है।प्रशंसा में व्यक्ति ठहर जाता है।वस्तुतः जहाँ मन एवं भाव रंजित होते हैं,उन्हें वहाँ बड़ा ही सुकून मिलता है,इसलिए वहीं संबंध एवं रिश्ते विकसित होते हैं।फिर उन रिश्तों (मित्रता) को निभाना बड़ा कठिन होता है।चूँकि प्रशंसा में हम ठहरते हैं,इससे हमारे संवेदनशील भावतंतु गहराई से जुड़ते हैं,इसलिए इससे छूटना निंदा से अधिक भारी पड़ता है।निंदा में तो ये सब टूटते-बिखरते रहते हैं।इसमें एक प्रतिकर्षण होता है।अतः वहाँ से भागना आसान होता है,परंतु प्रशंसा रूपी आकर्षण से बचना बड़ा कठिन होता है।
- प्रशंसा में रचनात्मक शक्ति भी है।वस्तुतः सामाजिक रूप से प्रशंसा का मूल्य अधिक है।हमें प्रशंसा करनी चाहिए,परंतु गुणों की,मूल्यों की,श्रेष्ठ बातों की,सचाई एवं सेवा की,त्याग एवं बलिदान की,सच्चरित्र एवं श्रेष्ठ विद्यार्थियों की।इससे एक नई परंपरा एवं स्वस्थ परिपाटी विकसित होगी।इसके विपरीत बुराई की निंदा होनी चाहिए,ताकि वह अपने पाँव न पसार सके।सचाई की प्रशंसा होने पर वह बढ़ती,विकसित होती है। इसलिए हमें उदारतापूर्वक श्रेष्ठ मूल्यों की प्रशंसा (Praise of best values) अवश्य करनी चाहिए।
6.प्रशंसा करने का दृष्टान्त (The Parable of Praise):
- गहन अंतस्तल में एक चेतन चिनगारी ऐसी है जो अपना सम्मान चाहती है,गौरवास्पद बनाने के लिए आकुल-व्याकुल रहती है।इस तड़पन की तृप्ति जहाँ से होती है,वह उसे प्रिय लगने लगती है।प्रशंसा एक प्रकार का प्रोत्साहन (Praise is a kind of encouragement) है,एक संदेश है जो विद्यार्थी को साफ-साफ बता देता है कि उसे किस रूप में पसंद किया जाता है?
- शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाते समय हाँ या शाबाश कहता है तो वह उन्हें प्रोत्साहित करके उनके पढ़ने की प्रक्रिया पर अपनी स्वीकृति वाली मुहर लगा देता है।उसका अधिकाधिक उपयोग करके विद्यार्थी दक्ष बनता है।विद्यार्थी का इससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
प्रशंसा करने का,प्रोत्साहित करने का अवसर जब भी मिले,उसे व्यक्त करने से न चूका जाए।इससे प्रशंसक की भी प्रतिष्ठा (Fan Reputation) बढ़ती है।इसके अतिरिक्त इसी के बल पर अग्रिम मार्गदर्शन एवं दोष निवारण भी बन पड़ता है। प्रोत्साहन,प्रशंसा शिक्षण प्रक्रिया का एक अति आवश्यक और व्यावहारिक अंग ठहरता है। - गणित का एक अध्यापक कक्षा में होमवर्क न करने वाले छात्रों को लंबी लताड़ सुनाया करता था।एक दिन उसने नया प्रयोग करना इस प्रकार आरंभ किया कि जिन विद्यार्थियों ने होमवर्क कर लिया था,उनकी एवं उनके कर्तृत्व की सराहना कक्षा में की जाए।इसका परिणाम यह हुआ कि न केवल होम वर्क करने वालों की संख्या द्विगुणित हो उठी,अपितु अध्यापक भी विद्यार्थियों में और प्रिय होने लगा।
7.हरेक में कुछ न कुछ गुण होते हैं (Everyone has some qualities):
- संसार में सर्वथा गुण-विहीन विद्यार्थी कोई नहीं।तलाश करने पर बुरा लगने वाले विद्यार्थी में भी कुछ न कुछ गुण मिल सकते हैं।बिना झूठ बोले भी व्यक्ति में जो प्रत्यक्ष या परोक्ष गुण दीख पड़ें,उनकी चर्चा कर देना अपनी सद्भावना का प्रकटीकरण है,जिससे व्यक्ति अनुकूल भी बनता है।नरम पड़ने पर अपनी ओर झुकने पर उन परामर्शों को भी दिया और स्वीकार कराया जा सकता है जो उसके लिए उपयोगी और आवश्यक हैं। साथ ही जिन्हें चरितार्थ होने पर अपना आदर्शवादी दृष्टिकोण भी पूरा होता है।
- इसी संबंध में एक ऐसे विद्यार्थी का दृष्टांत पत्रिका में छपा है,जिसके शिक्षक एवं प्रिंसीपल दोनों ही अफसरी मिजाज वाले थे,जो प्रायः छात्र-छात्राओं पर हुकुम (Ruling over students) चलाते रहते थे।भोले-भाले विद्यार्थी उन पर कभी भी अपनी खीझ भरी प्रतिक्रिया व्यक्त न करता,किंतु जब कभी शिक्षक सवाल बताते अथवा प्रिंसीपल उसकी खबर लेते तो ऐसे कभी-कभार अच्छे काम करते तो विद्यार्थी अपनी प्रसन्नता व्यक्त किए बिना और उन्हें सम्मान दिए बिना न रहता।इस तरह से उसने उन दोनों को अपने आदर्शों के अनुरूप मोड़ने में सफलता पाई।सभी छात्र-छात्राएं उस विद्यार्थी की प्रशंसा करने लगे।
8.सही समय पर तारीफ बदल सकती है विद्यार्थी की जिन्दगी (A student’s life can change at the right time):
- प्रशंसा प्रोत्साहन के माध्यम से आगे बढ़ाना ऊँचे उछालना जितना सरल है,उतना और किसी प्रकार नहीं। प्रशंसा के उपरांत यह परामर्श भी दिया जा सकता है कि गेहूँ में घुन की भाँति कुछ घिनौनी आदतों को वह किस प्रकार त्यागकर अधिक प्रतिभा-संपन्न सज्जन,देवतुल्य बन सकता है।यदि इन्हीं दुर्गुणों के प्रति बार-बार टोका या छिद्रान्वेषी ढंग से पेश किया जाता तो उससे चिढ़कर विद्यार्थी में दुर्भावनाएँ और गहरी जड़ें जमा पाने का अवसर पा जाती हैं।
सकारात्मक प्रोत्साहन द्वारा विद्यार्थी के वांछित आचरण में सुधार तभी आता है,जब वह करते समय में ही दी जाए।उदाहरणार्थ बच्चा जब पहाड़े,गिनती सीख रहा है,उस अवधि में उसे बीच-बीच में प्रोत्साहित करते जाना ठीक है,किंतु जब वह गिनती,पहाड़े सीख गया है,तब भी यदि उसे शाबाश (Well done!) ठीक कहा जाए तो वह पागलपन सरीखा सिद्ध होगा।सीखी गई बात को बरकरार बनाए रखने के लिए यदाकदा प्रोत्साहन दिया जा सकता है। - प्रशंसा प्रोत्साहन एक ऐसा सुधारात्मक आयुध (reformative weapon) है जिसकी वजह से विद्यार्थी ही नहीं,मनुष्य,पशु-पक्षी जैसे स्वच्छंद प्राणियों को भी सुगढ़ बनाकर उनसे काम लिया जा सकता है।
- समय से पूर्व दिया गया प्रोत्साहन कारगर नहीं होता। इसमें कभी-कभार आगे असफल होने वाले कार्यों को भी हम प्रोत्साहित करने की भूल अनजान में कर जाते हैं।प्रोत्साहन कोई भी चाहे वह सकारात्मक प्रशंसा वाला हो या निषेधात्मक पिटाई-नाराजगी वाला हो,समय से दिया जाए।कार्यावधि में या कार्य समाप्त होते-होते प्रोत्साहन दे देना चाहिए।बाद का दिया गया प्रोत्साहन निष्प्रभावी (ineffectual) ही नहीं समस्यात्मक बन जाता है।
- उदाहरणार्थ यदि किसी विद्यार्थी से कहें कि पिछला गणित का टेस्ट दिया था उसमें आपका सोल्यूशन बड़ा ही बेजोड़ था।इस प्रोत्साहन का उलटा अर्थ वह यह भी मान सकता है कि पिछला वाला उत्तम था और अब का निकृष्ट।जबकि कहने वाले का यह अभिप्राय नहीं था। वांछित परिणाम आते ही तुरंत की हलकी डाँट-फटकार बच्चों पर अंकुश का काम करती है।बाद में डाँटते रहना निष्प्रभावी होकर मात्र शोर-शराबा ही उनकी निगाहों में रह जाता है।
- प्रोत्साहन परिवर्तनशील व सृजनात्मक (creative) होने चाहिए।एक सरीखे प्रोत्साहन अपना महत्त्व गँवा बैठते हैं।यदि विद्यार्थी की हर सफलता पर रिवार्ड देकर प्रोत्साहित किया जाए तो वह यंत्रवत हो जाती है।रिवार्ड देना बंद तो सफलता का ग्राफ भी गिर जाता है।इसकी जगह प्रोत्साहन में भी परिवर्तनशील कार्यक्रम अपनाए जाने पर विद्यार्थी वांछित आचरण (desired character) करेगा।
- अंतरात्मा अपनी गरिमा भूलती नहीं।वह येन केन प्रकारेण स्नेह-सम्मान पाने के लिए हाथ-पाँव पीटती रहती है।विद्यार्थी में सौंदर्य सज्जा से लेकर ठाठ-बाट रोपने और सस्ते प्रदर्शनों से या उपहार देकर लोगों को इसके लिए उकसाती रहती है।
- कारेन फ्रायर ने जब यह देखा कि घर में बच्चों पर चीखना-चिल्लाना बेअसर हो रहा था,उन्होंने सकारात्मक प्रोत्साहन अपनाना प्रारंभ कर दिया। भोजन कर लेने के बाद ज्यों ही बच्चे बरतन माँजने,हाथ बँटाने आगे बढ़ते तो उनकी माँ उन्हें गले लगाकर,प्रशंसा के दो-चार शब्द कहकर प्रोत्साहित करने लगी।
जब उनके अच्छे काम प्रशंसित होने लगे तो उनकी पुनरावृत्ति होते रहने से घर का वातावरण शनैः शनैः सुख-शांतिमय होने लगा।निस्संदेह प्रशंसा वह सीढ़ी हैं,जिसके सहारे ऊपर उठाना,आगे बढ़ाना सरल होता है।प्रशंसा चाहे दूसरा करे या स्वयं (Self Praise) कर लिया जाए,हर दशा में उत्साहवर्द्धक सिद्ध हो सकती है। - जीवन में हम अपने आप से बड़ी-बड़ी आशाएँ रखे रहते हैं।जब वे पूरी होने को हों,तब हम उन पर अपने को प्रोत्साहित न करें,ऐसे अवसर प्रायः कम ही आया करते हैं।अस्तु,हम अपने को प्रोत्साहित करना भूल जाते हैं।
- कारेन फ्रायर के शब्दों में-“मैं समझती हूँ कि हमारी चिंता और उदासी की एक वजह प्रोत्साहन से वंचित रहना भी है।”उनकी राय में विद्यार्थी एक घंटे पढ़कर फिर पढ़ना बंद करके,दोस्तों के साथ कुछ मनोरंजन,आत्मानुमोदन से अपने आप को बड़े अच्छे ढंग से प्रोत्साहन दे सकता है।
- विद्यार्थी की प्रशंसा होनी ही चाहिए।अगर काफी दिनों तक कोई हमारी प्रशंसा न करे तो स्वयं अपने को बधाई देना चाहिए।अपनी तारीफ आप करना दूसरों के मुँह से तारीफ सुनने जैसा ही होता है।कम से कम हम इतना तो जानते ही हैं कि यह तारीफ एकदम सही है।
- अपने आप को जानने की,अपने बारे में सोचने-समझने की उपेक्षा विद्यार्थी किया करते हैं।विद्यार्थी कितना ही व्यस्त क्यों न रहे,उसे इस निमित्त समय निकालना ही पड़ेगा।निद्रा में निमग्न (sunk in sleep) होने के पहले अपने दिनभर के कार्यों का लेखा-जोखा उसे कर लेना चाहिए।जो भी स्तुत्य कृत्य,वचन या व्यवहार नेकी के जान पड़ें,उस हेतु उसे अपनी प्रशंसा-प्रोत्साहन स्वयं ही कर देनी चाहिए।दुर्व्यवहारों पर स्वयं को लानत दिया जाए और उससे बचे रहने का परामर्श भी।
उपर्युक्त आर्टिकल में प्रशंसा की शक्ति या तारीफ करने के फायदे:क्यों सही समय पर की गई तारीफ बदल सकती है विद्यार्थी की जिन्दगी? (Power of Praise or Benefits of Praise:Why Can Timely Compliment Change Student’s Life?) के बारे में बताया गया है। - ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
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9.छात्र का प्रशंसा हेतु सुझाव (हास्य-व्यंग्य) (Suggestions for student appreciation):
- छात्र:सर,कभी तो आप मेरी प्रशंसा भी कर दिया करो।
- टीचर:वाह कितने अच्छे हो,जो पूरे कालांश में मेरा दिमाग खाते रहते हो,तुम्हारे दिमाग खाने का तरीका बेजोड़ है।
- छात्र:सर,ये तारीफ नहीं है,ये तो व्यंग्य कसा जा रहा है।
10.प्रशंसा की शक्ति या तारीफ करने के फायदे:क्यों सही समय पर की गई तारीफ बदल सकती है विद्यार्थी की जिन्दगी? (Frequently Asked Questions Related to Power of Praise or Benefits of Praise:Why Can Timely Compliment Change Student’s Life?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.अयोग्य व्यक्ति की प्रशंसा किसके समान है? (What is the praise of an unworthy person similar to):
उत्तर:अयोग्य विद्यार्थी या मनुष्यों की प्रशंसा छिपे हुए व्यंग्य बाण के समान है।
प्रश्न:2.सर्वोत्तम कीर्ति क्या है? (What is the best reputation?):
उत्तर:प्रतिद्वन्द्वी द्वारा की गई प्रशंसा सर्वोत्तम कीर्ति है।
प्रश्न:3.विद्यार्थी का विकास क्या प्रशंसा से हो सकता है? (Is student development possible through appreciation?):
उत्तर:विद्यार्थी में छिपी हुई योग्यता व गुणों का विकास प्रशंसा व प्रोत्साहन द्वारा किया जा सकता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा प्रशंसा की शक्ति या तारीफ करने के फायदे:क्यों सही समय पर की गई तारीफ बदल सकती है विद्यार्थी की जिन्दगी? (Power of Praise or Benefits of Praise:Why Can Timely Compliment Change Student’s Life?) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जान सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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