Pesonality Development Using Present:Safalta ke Liye Vartman Ka Sadupyog Kaise Karen?
1.वर्तमान का उपयोग करके व्यक्तित्व का विकास (Pesonality Development Using Present):
- वर्तमान का उपयोग करके व्यक्तित्व का विकास (Pesonality Development Using Present) कर सकते हैं।क्या आप जानते हैं कि वर्तमान का सही उपयोग करके व्यक्तित्व का विकास और सफलता प्राप्त कर सकते हैं? इस लेख में समझाया गया है कि वर्तमान का उपयोग कैसे करें और क्यों करें?
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2.वर्तमान का उपयोग और व्यक्तित्व पर प्रभाव (Vartman ka upyog aur vyaktitva par prabhav):
- वर्तमान में जीना ही वास्तविकता में जीवन जीना है।वर्तमान के क्षणों का उपयोग ही समय का सार्थक उपयोग है।वर्तमान हमारी अनमोल,परंतु गतिशील संपत्ति है।यह कभी भी स्थिर नहीं रहता,निरंतर चलायमान है और इसे हासिल करने,संभालने का एक ही तरीका है कि इसके साथ ही गतिशील रहा जाए,निरंतर इसका उपयोग किया जाए।जितना हम इसका उपयोग करेंगे,उतनी मात्रा में यह हमारा है,अन्यथा हमारे पास होकर भी हमारे किसी काम का नहीं।यह बात जरूर है कि इस संपत्ति की एक सीमा है।सीमा अर्थात् जब तक जीवन है,केवल तब तक ही वर्तमान की संपत्ति हमारे पास है,इसके बाद नहीं।फिर क्यों नहीं,हम इस संपत्ति की कीमत समझते हैं?
- वर्तमान ही हमारे व्यक्तित्व को तराशता है,वर्तमान ही हमें जीवन के बहुमूल्य अवसर देता है।वर्तमान से बड़ा उपहार जीवन के लिए अन्य कुछ भी नहीं है,फिर भी इसकी कीमत से हर कोई अनजान है,फिर लोग इसे यूं ही गँवा देते हैं और इससे कुछ भी हासिल नहीं कर पाते।समझदार वही है,जो वर्तमान के महत्त्व को न केवल समझते हैं,बल्कि इस अमूल्य संपदा का उपयोग करना भी जानते हैं।जो इस वर्तमान पर सही अर्थों में अपना अधिकार जता पाते हैं,वही इसके मालिक होते हैं और इसका उपयोग कर पाते हैं।
- वर्तमान वह समय है,जो हर पल हमारे साथ है और वर्तमान हर वह क्षण है,जो हर पल गुजरता जा रहा है। वर्तमान उस बहती नदी के समान है,जिसमें हम खड़े हैं,लेकिन बहने वाली इस नदी का प्रत्येक जल-कण जो हमसे होकर गुजरता है,दोबारा इसमें वापस नहीं आता।इस वर्तमानरूपी नदी का हर जल-कण नवीन होता है और बस,गुजरता जाता है।यदि हमें इसका उपयोग करना है तो हमें भी इसके साथ गतिशील होना होगा।हमारा वर्तमान बहते पानी के समान निरंतर गतिशील है। हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम इसमें से कितना ग्रहण कर पाते हैं।यह हमारे सामर्थ्य पर निर्भर करता है कि हम इसका कितना उपयोग कर पाते हैं और यह हमारे कितने काम आता है।जिन्होंने वर्तमान को समझा है;इसके महत्त्व को जाना है;इसकी कीमत को पहचाना है,वे इसके साथ निरंतर जुटे रहते हैं।इसे व्यर्थ नहीं गँवाते।इसके हर पल का सार्थक उपयोग करते हैं।
- जो बीत गया,वो अतीत है और जो आने वाला है,वो भविष्य है,परंतु ये दोनों ही हमारे हाथों में नहीं होते,हमारी कल्पनाओं में होते हैं।अतीत और भविष्य,दोनों ही हमारे चिंतन में होते हैं,लेकिन हम इनमें प्रवेश करके इसमें जी नहीं सकते।अतीत की यादें हमें परेशान व आह्लादित कर सकती हैं,भविष्य की चिंता हमें प्रेरित कर सकती है,लेकिन केवल वर्तमान ही एकमात्र ऐसा है,जिसमें हम अपना कार्य कर सकते हैं।केवल वर्तमान ही ऐसा है,जिसे हम मनचाहे आकार में ढालने का कार्य व प्रयत्न कर सकते हैं।अतीत तो वह आकार है,जो ढल चुका है और भविष्य आकार है,जो अभी बना नहीं है,लेकिन वर्तमान वह आकार है,जो अभी हमारे समक्ष उपलब्ध है और इसे मनचाहा स्वरूप दे पाना संभव है।
3.वर्तमान और उसका सदुपयोग (Vartman aur uska sadupyog):
(1.)वर्तमान क्या है? (Vartman kya hai? (Ek sunahra avsar)):
- वर्तमान हमें मिला हुआ एक सुनहरा मौका है,जिसके माध्यम से हम अपने भविष्य को मनचाहे आकार में ढाल सकते हैं।इसे सुरक्षित और श्रेष्ठ बना सकते हैं।स्थिर होना और फिर उतना ही गतिशील होना,विरोधाभास जैसे प्रतीत होते हैं,लेकिन हैं नहीं।स्थिर वस्तु भी गतिशील हो सकती है।जैसे सूर्य-चंद्रमा स्थिर दीखते हैं,लेकिन निरंतर गतिशील है,पृथ्वी जिस पर हम सभी निवास करते हैं,स्थिर दीखती है,लेकिन निरंतर सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रही है और अपनी धुरी पर भी निरंतर तेजी के साथ घूम रही है।चलती हुई ट्रेन दूर से तो गतिशील दीखती है,लेकिन उसमे बैठे हुए यात्री स्वयं को स्थिर ही पाते हैं और जो चाहे उस गतिशील ट्रेन में स्थिर होकर कर सकते हैं।ठीक यही बात वर्तमान के साथ भी है।यदि हमें इसका उपयोग करना है,तो अपने मन को स्थिर करके इसकी गति के साथ आगे बढ़ना होगा अन्यथा वर्तमान आगे निकल जाएगा और हम पीछे रह जाएंगे।
- वर्तमान निरंतर गतिशील है,यदि हम इसके साथ नहीं चलते तो यह हमें बहुत पीछे छोड़ देता है।यदि हम इसके साथ चलते हैं तो यह हमारे साथ चलता है और यदि हम इसे आगे निकल जाते हैं तो यह हमारे हाथ में,नियंत्रण में आ जाता है,फिर हमें इसके पीछे भागना नहीं पड़ता,बल्कि वर्तमान का इंतजार करना पड़ता है;क्योंकि वर्तमान ही वह धरातल है,जिस पर जीते हैं।इस धरातल पर किसी भी प्रकार के कार्य का महत्त्व तभी है,जब वह वर्तमान की निर्धारित समय-सीमा पर पूरा हो जाए।
- यदि निर्धारित समय पर कार्य पूरा नहीं होता,तो वह कार्य अधूरा कहा जाता है और यदि समय-सीमा के अंदर पूरा हो जाता है तो शेष समय बच जाता है।कार्य की खूबसूरती तभी है,जब निर्धारित समय के पूरे सदुपयोग से सफल व पूर्ण हो जाए और यह तभी संभव है,जब वर्तमान का सही तरीके से उपयोग करना सीख जाते हैं।इसलिए वर्तमान की इस अमूल्य संपदा का सभी को उपयोग करना चाहिए।
(2.)वर्तमान का सदुपयोग क्यों नहीं करते? (Vartman ka sadupyog kyon nahin kar pate?):
- जिस पल में हम जीते हैं,उसे बेहतरीन ढंग से जी लेना जीवन की कुशलता,परन्तु यही तो हम नहीं कर पाते।हम वर्तमान में रहते हुए भी उस पल,क्षण में ठहर नहीं पाते हैं;क्योंकि या तो हम अतीत के पन्नों को पलटते रहते हैं और उन पन्नों की मर्मांतक वेदना से गहराई से चिपके रहते हैं,जो बीत चुका,उसे दिल से चिपकाए रहते हैं या फिर आने वाला कल,जो अभी कोसों दूर है,उसकी कपोल-कल्पनाओं में खोए रहते हैं।यदि अतीत से सीख लेते हैं और भविष्य के प्रति दूरदृष्टि योजना बनाते तो शायद बात बन जाती,पर हम तो विगत की पीड़ा में एवं आगत की कल्पना में आज को खो देते हैं।
- वर्तमान सच है,इस सच्चाई को हम क्यों नहीं जान पाते,अनुभव नहीं कर पाते।हमारे पास कुछ हो या ना हो,यह तो है कि हम सभी छोटे हों या बड़े-बूढ़े,इसी वर्तमान पल में जीते हैं।अतीत तो खो चुका,बीत चुका,वह अनगिनत प्रयासों के बावजूद लौटेगा नहीं और भविष्य अभी दूर है,जिसके लिए कितना भी पुरुषार्थ क्यों नहीं करें,वह खिसककर पास नहीं आ सकता।यह अनवरत काल है,एक सीधी रेखा के समान शाश्वत चलता हुआ।इसका विभाजन तो हमने किया है भूत वर्तमान और भविष्य के रूप में।जीवन जीने के लिए हमी ने अपने अनुरूप खंडित किया है,परंतु खंडित हुआ नहीं।वह तो अखंड है।हम चले तो क्या,ठहरे तो क्या,इसे तो चलना है एवं निरंतर बढ़ना है।
- ठहरता हमारा मन है,हमारी भावनाएँ हैं,पर काल कहाँ ठहरता है।हम इसे थामना चाहते हैं और यह खिसक जाता है,हम इसे बांधना चाहते हैं और यह फिसल जाता है,हताश मन कभी नहीं समझ पाता और हम नासमझ सा बने वर्तमान को स्वयं से फिसलते देखते रह जाते हैं।जो वर्तमान को ठीक-ठाक जी लेना जान लेता है,उसका आने वाला कल भी सुधर जाता है।अतीत भी समृद्ध हो जाता है;क्योंकि जिस पल को हमने जी भर कर जी लिया है,उससे संतुष्टि मिलती है।पल तो खिसक जाता है,परंतु संतुष्टि की छवि बनी रहती है।जब भी हम पीछे मुड़ते हैं तो वे पल याद आते हैं और फिर से मन पुलकित हो उठता है।
यदि वर्तमान को ठीक से जी न सके या इस पल में कुछ ऐसा कर्म हो जाता है,जिससे मन अपराध बोध से घिर जाता है तो इसकी पीड़ा की कसक भी अपनी छाप छोड़ जाती है और यह हमें सतत सालती रहती है।पल-महीने-वर्ष बनकर बीतते जाते हैं,पर उस पीड़ा से हम पीछा छुड़ा नहीं पाते और वह पीड़ा हमारे वर्तमान के श्वेत-शुभ्र जीवन के नए पन्नों को दागदार बना देती है;क्योंकि हम हमेशा उस अपराध बोध की पीड़ा से चिपके जो रहते हैं।यह पीड़ा और गहरी होकर न हमें इस पल में ठहरने देती है और ना आने वाले दिनों के लिए कुछ कसर छोड़ देती है।हमारा हर पल कुहासे से घिर जाता है और वर्तमान और भविष्य दोनों ही अंधकार एवं अवसाद से घिर जाते हैं।
- ऐसे में हमारे जीवन की असीम संभावनाएं विनष्ट हो जाती हैं।यदि कभी अंतर्मन जाग उठता है तो कहता है काश! हमने वर्तमान को जीना सीखा होता।जीवन इसी ऊहापोह में बीत जाता है और कब जवानी बुढ़ापे में बदल जाती है तथा बुढ़ापे से कब बुलावा आ जाए,समझ नहीं पाते हैं।आम जिंदगी का यही सच है,परंतु खास जिंदगी का सच कुछ और है और यह है कि वर्तमान को खूब जिया,जी भर कर जिया और सतत श्रेष्ठ कर्म के साथ बिताया।कालखंड को अखंड रूप से देखने वाले दृष्टा ऋषि कहलाते हैं।ऋषि कहते हैं कि जो वर्तमान को जीना जान लेता है,वह जीवन के मर्म एवं रहस्य को खूब समझ लेता है;क्योंकि जीवन वर्तमान का पर्याय है।जब जीवन को हम जिएंगे तो उस पल में हम वर्तमान में ही तो रहेंगे।यही पल गुजर जाने पर अतीत बनता है और दूर रहने पर भविष्य के रूप में जाना जाता है।
4.बेहतर पर्सनेलिटी डवलपमेंट के लिए व्यावहारिक टिप्स (Behtar Personality Development ke Liye Practical Tips):
- पल को तो गुजरना ही है,कोई इसे बाँध नहीं सकता,कोई रोक नहीं सकता।हाथ में बंधी मुट्ठी से जिस प्रकार रेत गिर जाती है और हमें गिरने का एहसास नहीं होता,ठीक उसी प्रकार हमारे अनगिनत बहुमूल्य पल भी खिसक जाते हैं।कौन जाने इस गुजरे वक्त का कौन-सा क्षण हमारी जिंदगी को खुशियों से सरोबार कर देता,जो यों ही बीत गया,पर इसकी कीमत को ना आँक कर हम तो पूरे जंगल को जलाकर उसका कोयला बनाते रहे।बस,अन्तिम पेड़ हमें चंदन का एहसास दे गया,पर अंत में बचा तो कुछ भी नहीं।ऐसे ही हमने वासनाओं,कामनाओं एवं अंहता की अंधी आँधी के थपेड़ों से बेशकीमती जवानी को तार-तार कर दिया,अब बचे-बिखरे रुग्ण बुढ़ापे से क्या आशा करें!
- कहते हैं,जिनका बचपन सुधरा तो जवानी सुधर जाती है,जवानी सुधरने पर बुढ़ापा सुधर जाता है और बुढ़ापे को सँवार लेने पर अगला जन्म ठीक हो जाता है,परंतु यह तो सच है कि जिसे वर्तमान को जीना आ गया,वह अतीत और भविष्य,दोनों को सुधार लेता है और पूरी जिंदगी को जी लेता है।जीवन क्या है? पल,क्षण,दिन,महीने,वर्षों का समुच्चय ही तो है,जिसे हमारी जीवात्मा वर्तमान देह और मन से जीती है।जब हम इसकी छोटी इकाई वर्तमान के पल,क्षण का सदुपयोग करना सीख जाएंगे तो जिंदगी तो सँवर ही जाएगी।
- जिंदगी को जीने के लिए बल्कि बेहतरीन ढंग से जीने के लिए हमें हमारे वर्तमान क्षण का श्रेष्ठतम सदुपयोग करना आना चाहिए।इसके लिए हमें जीवन में लक्ष्य तो बड़ा चुनना चाहिए,पर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर यह देखना चाहिए कि उपलब्ध समय में हम इसे कितना पूरा कर सकते हैं।जब कुछ घंटों,दिन या महीने में उसके एक अंश को सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं तो विश्वास सुदृढ़ होता है कि हम आगे इससे बड़ा कार्य इसी नियत समय में पूर्ण कर सकते हैं।इस प्रकार शनैः शनैः छोटे से बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ते चले जाते हैं और हमारे समय का इसी में सदुपयोग होता है।ऐसे में हम पीछे मुड़ते हैं तो ग्लानि नहीं,अपार सन्तोष होता है;क्योंकि बड़े लक्ष्य का एक छोटा भाग जो पूरा हो चुका होता है।आगे देखते हैं तो भी विश्वास जगता है कि जो किया है,अब उससे बड़ा कर सकते हैं।
- अतः समय को खाली न रहने दें।समय हमेशा वर्तमान के रूप में रहता है और सभी के पास इतना ही होता है-न अधिक,न कम! यह तो उस रबर के समान होता है,जिसे खींचने पर ही फैलता है।समय के महत्त्व को समझने वाले इसी समय में जिंदगी ऐसे जीकर चले जाते हैं जो औरों के लिए प्रेरणास्पद बन जाता है।इसी पल-क्षण में आदमी अपनी जिंदगी यों गुजार देता है,परंतु महापुरुष,महामानव अपने सारे कर्मों के जाल को काटकर धरती से ही नहीं,प्रकृति के पार चले जाते हैं।अतः हमे भी उनसे सीख लेकर अपने वर्तमान पल का श्रेष्ठतम उपयोग करना चाहिए।यही जीवन का मर्म है और इसी मर्म का अर्थ सन्निहित है।यही जीवन की कुशलता है,जिसे हमें सीखना चाहिए।
5.वर्तमान के उपयोग से व्यक्तित्व विकास का निष्कर्ष (Conclusion of Personality Development Using Present):
- तो विद्यार्थियों देखा आपने अपने वर्तमान का उपयोग करके हम कहाँ से कहाँ पहुँच जाते हैं।हम वर्तमान का जैसा उपयोग करेंगे वैसी ही छाप हमारे व्यक्तित्व पर पड़ेगी।वर्तमान का दुरुपयोग करेंगे तो व्यक्तित्व खण्ड-खण्ड हो जाएगा,अस्त-व्यस्त हो जाएगा।वर्तमान में जिएंगे,वर्तमान का सही उपयोग करेंगे तो उसकी छाप व्यक्तित्व का निर्माण करने पर पड़ेगी।व्यक्तित्त्व आकर्षक,प्रभावी और दिव्य बनता चला जाएगा।अतः विद्यार्थी काल से ही हमें वर्तमान का सदुपयोग करने की कला सीख लेनी चाहिए।जो विद्यार्थी इस कला को सीख लेता है वही होशपूर्वक जीता है और होशपूर्वक जीवन जीने वाला ही सच्चा कर्मयोगी होता है।
- पर अक्सर होता यह है कि हम वर्तमान में भी भूतकाल और भविष्य काल में खोए रहते हैं।इसका अर्थ यह नहीं है कि भूतकाल के बारे में या भविष्य काल के बारे में नहीं सोचना चाहिए।अवश्य सोचना चाहिए परन्तु इतना ही सोचना चाहिए कि जो गलतियाँ हो गई हैं उनकी पुनरावृत्ति न हों,बार-बार वे ही गलतियाँ न दोहराएँ और भविष्य काल का महत्त्व इस बात में है कि हमारे लक्ष्य को कैसे,किस तरह,किन उपायों से लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं इसकी योजना बनाएँ।तभी आपका व्यक्तित्व विकसित हो सकेगा।
- उपर्युक्त आर्टिकल में वर्तमान का उपयोग करके व्यक्तित्व का विकास (Pesonality Development Using Present) के बारे में बताया गया है।
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6.छात्र द्वारा वर्तमान का उपयोग (हास्य-व्यंग्य) (Student Utilizes Present) (Humour-Satire):
- छात्र के सहपाठी (छात्र से):क्या कर रहे हो?
- छात्र:देख नहीं रहे हो,दौड़ लगा रहा हूँ,खेल रहा हूँ।
- सहपाठी:परन्तु तुम तो परीक्षा की तैयारी कर रहे थे फिर सुबह-शाम,जब देखो तब ही दौड़ना या खेलना उचित है क्या?
- छात्र:मैं अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बना रहा हूँ,वर्तमान का सही उपयोग कर रहा हूँ।
- सहपाठी:अपने लक्ष्य से भटककर कोई भी काम करने से वर्तमान का सदुपयोग है क्या?
7.वर्तमान का उपयोग करके व्यक्तित्व का विकास (Pesonality Development Using Present) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.वर्तमान की उपेक्षा करने वाले का क्या हाल होता है? (What happens to those who ignore the present?):
उत्तर:जो वर्तमान की उपेक्षा करता है,वर्तमान को बर्बाद करता है वह सब कुछ खो देता है।
प्रश्न:2.भविष्य को सुन्दर कैसे बनाएँ? (How to make the future beautiful?):
उत्तर:वर्तमान का सदुपयोग करके भविष्य को सुन्दर व सुखद बना सकते हैं।
प्रश्न:3.क्या भविष्य हमारे हाथ में है? (Is the future in our hands?):
उत्तर:कर्त्तव्य और वर्तमान हमारे हाथ में है।हम चाहे जैसे कर्म करें और वर्तमान का उपयोग करें परन्तु फल और भविष्य भगवान के हाथ में,उसके विधि-विधान में निहित है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा वर्तमान का उपयोग करके व्यक्तित्व का विकास (Pesonality Development Using Present) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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