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Mathematics Education and Society

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1 Mathematics Education and Society
1.2 2.शिक्षा तथा समाज का सम्बन्ध (Relation Between Education and Society) –

Mathematics Education and Society

1.गणित शिक्षा और समाज का परिचय (Introduction To Mathematics And Society) –

मनुष्य में जन्मजात  समूह में रहने की भावना आदिकाल से ही है और ज्यों-ज्यों उसने विवेक का प्रयोग किया त्यों-त्यों इसमें वृद्धि ही हुई है। उसने प्राकृतिक घटनाओं, आपदाओं व भौतिक, मनोवैज्ञानिक कारणों से अपनी सुरक्षा के लिए समाज की आवश्यकता महसूस हुई। ज्यों-ज्यों समाज का स्वरूप विकसित हुआ त्यों-त्यों समाज अपने लिए परम्पराओं, नियमों, रीति-रिवाज व प्रथाओं का विकास कर लिया। प्रत्येक समाज ने समाज के व्यक्तियों व बालकों के लिए अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं तथा आदर्शों के अनुरूप शिक्षा की व्यवस्था की। समय तथा परिस्थिति के अनुसार उसे गणना करने की आवश्यकता महसूस हुई, ज्यों-ज्यों गणित का विकास हुआ त्यों-त्यों उसकी समस्याओं का समाधान हुआ और भौतिक सुखों में वृद्धि हुई तो उसे गणित व विज्ञान का महत्त्व अनुभव हुआ। इसलिए समाज को सुदृढ, सबल व विकसित करने के लिए गणित उनके लिए प्रगतिशील व विकसित करने में योगदान अधिक से अधिक दे सके इसके लिए गणित को वैज्ञानिक व क्रमबद्ध रूप देने का प्रयास किया।

2.शिक्षा तथा समाज का सम्बन्ध (Relation Between Education and Society) –

आज गणित और समाज एक दूसरे से इस प्रकार सम्बन्धित है कि दोनों का सम्बन्ध अटूट है। गणित शिक्षा की उत्तम व्यवस्था के लिए समाज ने साधन, सुविधाएँ जुटाई हैं और अपने आदर्शों के अनुरूप गणित शिक्षा का स्वरूप निर्धारित किया है। गणित शिक्षा ने समाज के व्यक्तियों को सुसंस्कृत, सुनागरिक तथा योग्य बनाने का प्रयास किया है। गणित शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में अनुशासन, नियमितता, कठोर परिश्रम, चिन्तन, तर्क करने की क्षमता का विकास किया है। विश्व में समाज के आदर्शों के अनुरूप गणित शिक्षा में परिवर्तन हुए हैं तथा गणित शिक्षा को अधिक से अधिक व्यावहारिक, लोगों के जीवन के निर्माण हेतु उपयोगी बनाने के प्रयास हुए हैं। लोकतान्त्रिक समाज में गणित शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि प्रत्येक विद्यार्थी तथा व्यक्ति को अपनी रूचियों, योग्यताओं, क्षमताओं तथा आकांक्षाओं के अनुरूप विकसित होने का अवसर मिले।

Mathematics Education and Society

Mathematics Education and Society 

3. समाज का शिक्षा पर प्रभाव (Impact of Society on Education) –

(1.)समाज की संरचना तथा आदर्श का प्रभाव (Impact of Social Structure and Ideas) –

सामाजिक व्यवस्था, गणित शिक्षा के स्वरूप और प्रणाली को प्रभावित करती है। जैसा समाज होगा उसी के अनुरूप गणित शिक्षा होगी। इसी प्रकार समाज के आदर्श भी गणित शिक्षा को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक समाज अपने आदर्शों के अनुरूप ही गणित शिक्षा की व्यवस्था करता है। यदि समाज तानाशाही होगा तो निश्चय ही वह समाज अपनी गणित शिक्षा बिना अनुशासन तथा तर्क किए ही जो उसके मनमर्जी होगी वैसी गणित शिक्षा की व्यवस्था करेगा। यदि समाज प्रजातांत्रिक होगा तो ऐसे समाज में गणित शिक्षा में तर्क, चिन्तन, युक्ति, बौद्धिक विकास, अनुशासन पर अधिक जोर देगा। स्पष्ट है कि समाज की व्यवस्था एवं आदर्शों का गणित शिक्षा पर प्रभाव पड़ता है।

(2.)आर्थिक दशाओं का प्रभाव (Impact of Economic Conditions) –

समाज की आर्थिक दशा भी गणित शिक्षा को गहराई से प्रभावित करती है। गणित शिक्षा उचित रूप से एवं सबको उपलब्ध कराने हेतु सभी प्रकार के विद्यालयों में ऐच्छिक गणित का होना आवश्यक है। विद्यालय में गणित शिक्षा हेतु गणित पुस्तकालय तथा गणित शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने हेतु गणित प्रयोगशाला की व्यवस्था अति आवश्यक है। ये सभी साधन उपलब्ध कराना आर्थिक दशा पर निर्भर करता है। यदि समाज की आर्थिक अच्छी होगी तो वहाँ गणित शिक्षा भी अच्छी होगी। निर्धन व पिछड़ा समाज उचित विद्यालयों तथा गणित शिक्षा के लिए पर्याप्त साधन व सुविधाएँ नहीं जुटा पाता है। साथ ही शिक्षा के पाठ्यक्रम में गणित शिक्षा का उचित प्रबंध नहीं कर पाते हैं। इसलिए ऐसे समाज को अपनी आर्थिक उन्नति करने हेतु शिक्षा के पाठ्यक्रम में गणित को उचित स्थान व महत्त्व देना चाहिए।

(3.)धार्मिक दशाओं का प्रभाव (Impact of Religious Conditions) –

समाज के धार्मिक विचारों, परम्पराओं और मान्यताओं का गणित की शिक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कट्टरवादी धार्मिक विचार अपने बालकों को धर्म की शिक्षा देने पर जोर देते हैं परन्तु गणित की शिक्षा की अवहेलना करते हैं। जबकि धर्मनिरपेक्ष राज्य में सभी धर्मों की शिक्षा के साथ गणित व भौतिक विषयों की शिक्षा की व्यवस्था भी करते हैं एवम् उसे बढ़ावा देते हैं।

(4.)सामाजिक दृष्टिकोणों का प्रभाव (Impact of Social Changes) –

समाज का जिस प्रकार का दृष्टिकोण होता है वैसा ही शिक्षा व गणित पर प्रभाव पड़ता है। रूढ़िवादी विचारधारा में परम्परागत गणित शिक्षा पर जोर दिया जाता है जबकि प्रगतिशील समाज में आधुनिक गणित व गणित के नए सिद्धान्तों और नियमों पर बल दिया जाता है।

(5.)सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव (Impact of Social Changes) –

आधुनिक युग गतिशील व परिवर्तनशील है। लोकतान्त्रिक समाज और शिक्षा को आधुनिकीकरण ने इन परिवर्तनों पर अधिक बल देकर मानव समाज को उन्नत व विकसित किया है। उदाहरणार्थ पहले भारतीय समाज में अर्थात् प्राचीन काल में उच्च वर्ग ही शिक्षित था परन्तु वर्तमान लोकतान्त्रिक समाज में सभी को समानता देने के कारण सभी वर्गों को शिक्षा व गणित शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।

4.गणित का समाज पर प्रभाव (Impact of Mathematics Education on Society) –

गणित शिक्षा और समाज एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जिस प्रकार समाज का गणित शिक्षा पर प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार गणित शिक्षा भी समाज को प्रभावित करती है।निम्न प्रकार प्रभावित करती है – 

(1.)सामाजिक धरोहर का संरक्षण (Preservation of Social Haritage) –

समाज का गणित शिक्षा पर सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक धरोहर की सुरक्षा है। प्रत्येक समाज अपने रीति-रिवाज, परम्पराएँ, धर्म तथा नैतिकता जिन्हें उसने कालांतर में अर्जित किया है, को सुरक्षित रखना चाहता है। उसे अपनी संस्कृति पर इतना अधिक गर्व है कि वह उसे किसी भी कीमत पर नष्ट होने देना नहीं चाहता है। गणित शिक्षा इस कार्य में समाज की सहायता करती है।

(2.)सामाजिक भावना की जागृति (Awakening of Social Feeling) –

मनुष्य का समाज से अलग कोई अस्तित्व नहीं है, समाज में रहकर केवल उसके व्यक्तित्व का विकास ही नहीं होता है बल्कि समाज की सेवा भी करता है। इसके लिए प्रत्येक मनुष्य में सामाजिक भावना का विकास होना आवश्यक है। विद्यालय में रहकर वह कई प्रकार के सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेता है जिससे उसमें सहज ही सामाजिक भावनाएँ जाग्रत होकर विकसित होती है। यह कार्य गणित शिक्षा के द्वारा अच्छी प्रकार सम्पन्न हो जाता है।

(3.)समाज का आर्थिक विकास ( Economic Development of Society) –

गणित शिक्षा का महत्त्व सर्वविदित है, सभी सरकारी सेवाओं में गणित का परीक्षण किया जाता है तथा विभिन्न व्यवसायों में भी गणित के ज्ञान और योग्यता की आवश्यकता होती है। इस प्रकार गणित शिक्षा समाज की आर्थिक स्थिति को शक्तिशाली आधार प्रदान करने में अपनी अहम भूमिका निभाती है। 

(4.)सामाजिक नियन्त्रण (Social Control) – 

समाज व्यक्तियों का समूह होने के कारण इसमें सभी प्रकार के व्यक्ति होते हैं। साथ ही समाज में विभिन्न कुप्रथाएं एवं अन्धविश्वास भी जन्म लेते हैं। गणित शिक्षा के द्वारा कुप्रथाओं एवं अन्धविश्वासों के दोषों को उजागर कर इनके विरोध में वातावरण तैयार करती है जिससे समाज से इस तरह की बुराईयां समाप्त हो सके।

(5.)सामाजिक परिवर्तन (Social Changes) –

गणित शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में आधुनिक तथा प्रगतिशील विचारों का समावेश होता है जो सामाजिक परिवर्तनों को गति प्रदान करने में सहायक है।

(6.)बालक का समाजीकरण (Socialisation of Child) –

विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विभिन्न वर्ग, जाति, समुदाय एवं स्तर के विद्यार्थी आते हैं। गणित विषय को हल करने के लिए वे आपस में विचार-विमर्श करते हैं, साथ उठते बैठते हैं जिससे विचारों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं का आदान प्रदान होता है। दूसरे के रीति-रिवाजों, नियमों और संस्कृति को अपनाते हैं जिससे उनका समाजीकरण होता है।

5.शिक्षा के प्रति समाज के कर्त्तव्य (Duties of Society Towards Education) –

मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है और वह अपना विकास समाज में रहकर ही कर सकता है। जब समाज के प्रत्येक व्यक्ति का उचित विकास होता रहता है तो समाज स्वत: ही विकसित होता चला जाता है। अतः समाज का यह दायित्व है कि वह उचित रूप से गणित की व्यवस्था करे जिससे उसके सभी सदस्य विकास के पथ पर अग्रसर होते रहें। गणित शिक्षा की उचित व्यवस्था हेतु समाज को अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए –

(1.)विद्यालयों में गणित संकाय की स्थापना (Establishment of Mathematics Faculty in Schools) –

समाज का प्रमुख कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक बालक/बालिका की उचित व लाभदायक गणित शिक्षा की व्यवस्था के लिए प्रत्येक क्षेत्र में विभिन्न स्तर के विद्यालयों गणित संकाय की स्थापना करे। प्रत्येक विद्यालय में गणित शिक्षा हेतु सभी प्रकार की साधन सुविधाएँ उपलब्ध कराएं, योग्य और अनुभवी शिक्षकों की नियुक्ति करे, आवश्यक भवन और फर्नीचर की व्यवस्था करे। इन विद्यालयों को गणित शिक्षा हेतु आर्थिक सहायता प्रदान करे।

(2.)व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था ((Provision of Vocational Education) –

समाज का यह भी कर्त्तव्य है कि वह ऐसी संस्थाओं और संस्थानों  की स्थापना करे जहाँ प्रत्येक नागरिक गणित की व्यावसायिक तथा औद्योगिक शिक्षा प्राप्त कर इन क्षेत्रों में दक्ष बन सके। गणित शिक्षा का व्यावसायिक ज्ञान प्राप्त करने से रोजगार पाने की क्षमता बढ़ेगी। आजकल कुशल कर्मचारियों की मांग और आपूर्ति में असंतुलन है वह समाप्त होगा।

(3.)गणित पुस्तकालयों की स्थापना (Establishment of Mathematics Library) –

Mathematics Education and Society

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पुस्तकें ज्ञान का भण्डार है। समाज के प्रत्येक सदस्य के मानसिक विकास हेतु यह आवश्यक है कि समाज अधिक से अधिक गणित पुस्तकालयों की स्थापना करे जिससे जनसाधारण में गणित में होने वाले द्रुतगति से परिवर्तनों की जानकारी मिल सके। 


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