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Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein

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1.क्या है प्रेम और क्या है वासना? गहराई से समझिए। (Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein):

  • क्या है प्रेम और क्या है वासना? गहराई से समझिए।
    (Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein) जिससे इनके बीच के फर्क को जाना जा सके।अक्सर हम वासना को ही प्रेम समझ लेते हैं परन्तु प्रेम और वासना में आसमान और जमीन का फर्क जितना फर्क है।

Also Available in Hindi:7 Divine Spells to Know Secret of Love

2.प्रेम में जीना आसान नहीं (prem mein jeena aasan nahin):

  • प्रेम का अर्थ तलाशना एवं प्रेम का अनुभव होना,दोनों में मौलिक अंतर है।प्रेम की व्याख्या तो कोई भी विद्वान बड़े रोचक संदर्भों के साथ कर सकता है,कोई भावुक कथाकार भावभीने शब्दों से समाँ बाँध सकता है,परंतु जिसने इसके बारे में जो कुछ कहा,उनको इसका अनुभव कितना है,यह विचारणीय तथ्य है।एक कथाकार या दर्शनशास्त्र का प्राचार्य प्रेम की ऐसी व्याख्या करते हैं कि भावुक हृदय पिघलने लगता है। औरों की भावनाओं को पिघलाने वालों का स्वयं का हृदय कितना भावों से भरा है,यह महत्त्वपूर्ण विषय है। प्रेम की व्याख्या सरल है,परंतु प्रेम में जीना आसान नहीं है।प्रेम को बताना सहज है,पर प्रेम में डूबना कठिन है।
  • प्रेम मनुष्य के जीवन की सुंदरतम एवं कोमलतम भावना है।प्रेम अतींद्रिय सुख है;अर्थात प्रेम इंद्रिय के सुखों से परे है;दैहिक स्पर्श से जुदा है;मन की कल्पनाओं से दूर है।प्रेम देशकाल (Space time) से भी परे है।यदि सही मायने में कहीं प्रेम है तो वहाँ काल का प्रभाव भी नहीं पड़ता।जिसे काल भी छू न सके,वही तो नश्वर है,याने कि कभी न नष्ट होने वाला तत्त्व,पर यहाँ प्रश्न उठता है कि नष्ट न होने वाले प्रेम का अस्तित्व नष्ट होने वाले इस संसार में कैसे समा सकता है? क्या शाश्वत प्रेम इस मरणधर्मा सृष्टि में है या फिर इसकी कोई परिकल्पना है? आखिर क्या है इसका गोपन रहस्य?
  • आप्त पुरुषों में प्रमुख भगवान बुद्ध ने घोषणा की कि इस संसार में प्रेम नहीं है।घोषणा से चारों ओर हलचल मच गई,कोहराम छा गया,म्यान से तलवारें खिंच गईं। भीड़ ने कहा:कौन है,जो कहता है कि इस संसार में प्रेम नहीं है।संसार में प्रेम तो कण-कण में व्याप्त है।इससे अनजान एवं अनभिज्ञ कौन है,जो प्रेम को नकारता है और कहता है कि संसार सर्वथा प्रेम से वंचित है।प्रेम का व्यापार करने वाले व्यापारियों ने तो जीना ही दूभर कर दिया।
    सबको सुनते-जानते देखते भगवान बुद्ध ने फिर से उसी धीर-गंभीर स्वर में दोहराया:”संसार प्रेम से रिक्त है।” पास खड़े आनंद से रहा नहीं गया।उसने पूछ ही लिया:”प्रभु ! संसार में प्रेम नहीं है।यह बात सुनकर कुछ अटपटा सा लग रहा है।” बुद्ध मौन रहे,परंतु उनके अधरों पर स्मित मुस्कराहट तैरती रही।

3.प्रेम अपने अहंकार को मिटाना है (prem apne ahnkar ko mitana hai):

  • आनंद पास बैठे थे।उन्हें लगा,जैसे उनके परम प्रिय प्रभु की अंतरवाणी कह रही है:”आनंद ! सुन,प्रेम का अर्थ है किसी अस्तित्व को इस कदर टूटकर चाहना कि उसके अस्तित्व में ही अपनी हर ख्वाहिश का रंग घुलता-मिलता हुआ महसूस हो।सुख को ध्वंस कर,मिटाकर एकदूसरे में खुद को खो देना,अपने आप को बो देना।फिर शांत भाव से बैठकर निहारना स्वयं को उगते हुए।
  • अपने अस्तित्व में उस अंकुरण का एहसास करना कि स्वयं को मिटाने का अनुभव कैसा होता है।प्रेम अस्तित्व का मर्म है,धुरी है,जिस पर अस्तित्व टिकता है,आधार पाता है।यह न तो मन में समा पाता है और न ही देह उसे धारण कर सकती है।प्रेम कारणशरीर का सर्वोच्च सौंदर्य है,जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है,बताया नहीं जा सकता है।”
  • बुद्ध की बात को उनके शिष्य आनंद समझाते हैं:”दरअसल संसार में विषय है और यह विषय है इंद्रियों का।इंद्रियाँ इस विषय को ग्रहण करती हैं,धारण करती हैं और उससे संवेदित होती हैं।विषय इंद्रियों को उद्गीप्त एवं उत्तेजित करता है।इंद्रियाँ हमारी देह में रची-बसी हैं।देह का होना इन्हीं के द्वारा संभव है।देह अपना क्रिया-व्यापार इन्हीं के माध्यम से चलाती है।इसलिए तो देह को इंद्रियों का संजाल कहा जाता है,परंतु प्रेम स्थूलशरीर (देह) का विषय ही नहीं है,यह तो सूक्ष्मशरीर से भी आगे कारणशरीर का मर्मबिंदु है।अतः प्रेम शरीर से भला कैसे संभव है,जबकि यह मन से भी परे की चीज है।
  • प्रेम दैहिक नहीं होता है।देह में जो होता है,उसे प्रेम नहीं,वासना कहा जाता है।हाँ,यह भी सच है कि वासना का रूपांतरण प्रेम में होता है.परंतु रूपांतरण के पश्चात यह शरीर मात्र का नहीं रह जाता।यह कारण शरीर में अवस्थित हो जाता है।”
  • संसार में प्रेम नहीं होने कारण यही है कि यह तत्त्व यहाँ का है ही नहीं,जैसे तपते मरुस्थल में ओस की बूँद नहीं हो सकती।ओस की शीतल बूँदें तो केवल गुलाब की कोमल पँखुड़ियों में मोती के समान चमक सकती हैं। अतः प्रेम सिर्फ अध्यात्म जगत का है और वासना संसार की।दोनों में मेल नहीं है।वासना पंक है तो प्रेम पंकज है।पंक में पंकज खिलता अवश्य है,पर पंकज का महत्त्व उस पंक के रहस्यों के विश्लेषण से नहीं मिल सकता है।उसका रहस्य पंकज के स्वर्गीय आद्य रूप में पाया जा सकता है,जो सदा उच्चस्तरीय आलोकों की आभा में प्रस्फुटित होता है।अगर इस संसार में कहीं प्रेम तत्त्व है तो वहाँ स्वयं परमात्मा का निवास होगा या फिर उसका कोई मसीहा यहाँ आ पहुँचा होगा।परमात्मा या फिर उसका मसीहा जहाँ होंगे,प्रेम तो वहाँ होगा,पर वहाँ संसार नहीं होगा।इसलिए तो कहते हैं कि ये एक संसार के होकर भी संसार के नहीं होते हैं।
  • प्रेम तो केवल वहीं संभव है,जहाँ दो व्यक्ति अपने अस्तित्व के केंद्र से एकदूसरे के साथ संपर्क करें,जिसके लिए आवश्यक है कि वे दोनों ही अपने-अपने अस्तित्व को अपने अस्तित्व के केंद्र से एहसास करें।इस केंद्रीय अनुभव के साथ ही मानवीय सत्य जुड़ा हुआ है,यहीं जीवंतता और प्रेम का मूल मर्म एवं आधार भी स्थित है। इस स्तर के प्रेम में एक निरंतर प्रवाह होता है,आंतरिक चेतना का विकास होता है,जिसमें एकदूसरे को खो देने का मर्म सँजोया जाता है।यहाँ पाना नहीं,देना ही मुख्य होता है।अपने प्रेमी पर सब कुछ लुटाकर भी कुछ और भी लुटाने को शेष रह जाता है,सब कुछ कह देने के बाद भी बहुत कुछ कहने को अधूरा रह जाता है।यहाँ पर किसी के होने का नहीं,खोने का एहसास रह जाता है। इस प्रेम का इजहार लैला-मजनूँ,शीरीं-फरहाद,हीर राँझा रूपी रूहानी प्रेम में हुआ है।जहाँ प्रेम के लिए किसी की मौजूदगी की जरूरत नहीं होती है।यह प्रेम भक्तिमार्गी एवं सूफियों का अमोल स्वर है।

4.प्रेम भावुकता नहीं है (prem bhavukta nahin hai):

  • प्रेम प्रेम होता है और कुछ भी नहीं,परंतु इस स्वर्गीय प्रेम के स्थान पर कुछ विसंगतियाँ पैदा हो जाती हैं और उसे प्रेम मान लिया जाता है,जिसमें भावना के स्थान पर भावुकता की बाढ़ रहती है।भावनात्मक विकास के अभाव में हमारा आंतरिक विकास कमजोर होता है,जिसमें भावुकता की मात्रा बढ़ी-चढ़ी होती है।भावना तो एक ऊर्जा के रूप में कार्य करती है,जैसे भगतसिंह,आजाद,सुभाष आदि के जीवन में सकारात्मक रूप में था।भावुकता में समंदर की लहरों के समान उतार-चढ़ाव होता है।इसलिए जिसे हम चाहते हैं,या तो उसे भगवान का दरजा देकर उसकी पूजा एवं स्तुति करते हैं,या फिर उसे देखना तक पसंद नहीं करते,उसे शैतान समझते हैं।सामने वाला वही होता है,हम ही अपनी भावुकता का आरोपण करके उसे भगवान या शैतान बनाते हैं।यह कोरी भावुकता का परिणाम है।
  • इस तरह के प्रेम में हम अपना सब कुछ एकदूसरे में देखने लगते हैं।हम अपने व्यक्तित्व की झलक,सामर्थ्य,शक्ति,पहचान आदि सब कुछ उसमें सघनता के साथ गिरवी कर देते हैं।उसकी हँसी में हमारी हँसी होती है।वह मुस्कराए तो हम मुस्कराते हैं,वह दुखी हो तो हम परेशान रहते हैं।उसकी सफलता एवं उपलब्धियों में हम अपना सपना सँजोते हैं।वह है तो हम हैं और उसकी तबाही में हम गुम हो जाते हैं,परंतु ऐसी घनघोर अपेक्षा जब पूरी नहीं होती है तो उपेक्षा मानकर उसमें जो असहनीयता का भाव प्रकट होता है,उससे घोर निराशा एवं हताशा का भाव पनपता है।कभी-कभी तो यह हताशा हमें स्वयं को नष्ट कर देने के लिए विवश कर देती है।नष्ट न भी हो तो जीवन का अमूल्य समय,श्रम एवं ऊर्जा का भीषण नाश तो होता ही है।
  • इस स्थिति से उबरने के बाद अपनी पूजा का थाल लिए हम किसी ओर एक नई मूरत की तलाश में जुट जाते हैं और यह अंतहीन सिलसिला जारी रहता है और आंतरिक तृप्ति नहीं मिलती है।इस तरह के प्रेम की विशेषता होती है कि प्रारंभ में इसकी अनुभूति बड़ी गहरी और तृप्तिदायक होती है,चूँकि इसमें अपेक्षा का बोझ इतना भारी रहता है,अतः यह वृत्ति धीरे-धीरे अतृप्ति में परिवर्तित होती जाती है और अंत में बड़ा ही वीभत्स रूप धरकर सब कुछ नष्ट कर देती है।फिर न देह बच पाती है और न मन।सब कुछ क्षत-विक्षत हो माधुर्य से होता है,पर अंत बड़ा ही दुःखद एवं कष्टप्रद हो जाता है।इसका प्रारंभ तो मदहोश एवं मुग्ध करने वाले होता है और इसका कारण है कोरी भावुकता,जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता।
  • ‘स्यूडो प्रेम’ का एक अन्य रूप है भावुकतावादी प्रेम।इसमें प्रेम को केवल कल्पना में ही अनुभव किया जाता है।कल्पना की प्रमुखता होने से वास्तविकता और व्यावहारिकता उपेक्षित हो जाती हैं;अर्थात हम जिसे चाहते हैं,उसकी कल्पना करने में प्रसन्नता पाते हैं।
  • कल्पनाओं में ही व्यक्ति अपने प्रेम को तृप्त करता है। फिल्मों एवं उपन्यासों में कल्पना पंख लगाकर सुदूर देशों में उड़ चलती है।फिल्म के किसी दृश्य को देखकर भावुकता अपने चरम पर पहुँच जाती है,परंतु यथार्थ में यह भयावह क्रूरता का परिचय भी दे सकती है।प्रमोद रजनी के लिए अपनी जान लुटाता था,परंतु किसी बात से अनबन होने पर उसने रजनी के शरीर को सैंकड़ों टुकड़ों में काटकर रख दिया।भावुकता के चरम में व्यक्ति अपना सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है,परंतु उपेक्षा में वह नृशंस कृत्य करने से भी बाज नहीं आता है।यह प्रेम नहीं,मनोविकार है,जो इसमें इतना उतार-चढ़ाव पैदा करता है।
    भावुकता जब स्थिर होती है और पवित्र होती है तो वह भावना बनती है।भावुकता में व्यक्तित्व बँटा-बिखरा रहता है,जबकि भावना में व्यक्तित्व सुदृढ़ एवं सशक्त हो जाता है,एक ऊर्जा का पर्याय बन जाता है।इस स्थिति में आकर भगतसिंह फाँसी के फंदे को निस्पृह भाव से चूमते हुए बलिदान हो गए थे।भावना में बलिदानी स्वर उभरते हैं और स्वयं को मिटाकर भी दूसरे में हँसी की लहर पैदा करते हैं।भावना जब परिपक्व होती है,तो करुणा में बदल जाती है।करुणा अर्थात सभी जीवमात्र के लिए स्वयं को समर्पित करने की चाहत।एक बकरे के बदले भगवान बुद्ध अपना गला कटाने के लिए तैयार हो गए थे।यह उनकी करुणा का परिचायक था।करुणा का शिखर है प्रेम।इसमें डूबना ही प्रेम है।चीनी पानी में घुलकर पानी बन जाता है,वैसे ही प्रेमी अपने प्रेमास्पद में खोकर उसी के समान हो जाता,यह है प्रेम,सच्चा प्रेम।

5.वासना क्या है? (vasna kya hai?):

  • वासना’ एक ऐसी मनोविज्ञानिक और आध्यात्मिक अवस्था है जो मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाली इच्छाओं,कामनाओं और संस्कारों से जूड़ी होती है।
    आध्यात्मिक दृष्टिकोण (आध्यात्मिक दृश्य): भारतीय दर्शन और अध्यात्म में वासना को मनुष्य के पिछले जन्म के कर्म और विचारों का संचय (संस्कार) माना गया है।ये मनुष्य को बार-बार संसार और मोह-माया की तरफ आकर्षित करती है।मोक्ष या मुक्ति प्राप्त करने के लिए विजय पाना या उनका शुद्धिकरण करना जरूरी माना गया है।
  • मनोविज्ञानिक दृष्टिकोण (मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण): आम भाषा में वासना किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को पाने की इच्छा है।ये हमारे आचरण,फैसलों और जीवन की दिशा को बड़ा प्रभावित करती है।
  • एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को देखता है तो दिखाई देता है शरीर,चमड़ी,रंग,आकार-प्रकार,पहने हुए वस्त्र आदि।किन्तु कोई भी आदमी इतना ही नहीं है,उसके भीतर भी बहुत सारी धातुएं हैं।उसके भीतर सूक्ष्मशरीर-तेजससशरीर है।उसके भीतर कर्मशरीर है,वासनाओं का भण्डार है,कर्मजनित संस्कार भरे पड़े हैं।प्रत्येक व्यक्ति का जीवन संचालित होता है उन वासनाओं के द्वारा,कर्म के संस्कारों के द्वारा।इच्छा क्यों पैदा होती है? मनुष्य किसी वस्तु को क्यों चाहता है? वह कुछ काम करना चाहता है,उसका हेतु क्या है? वह है कर्मशरीर।भीतर से उसका प्रवाह बाहर आ रहा है और मनुष्य उसके द्वारा संचालित हो रहा है।
  • परिवर्तन के लिए कर्मशरीर को समझना जरूरी है।कर्मशरीर को समझे बिना वृत्तियों में बदलाव अथवा परिवर्तन की सम्भावना नहीं की सकती।हमारी स्थूल चेतना कोई काम करती है तो उसके पीछे सूक्ष्म-चेतना है,अति सूक्ष्म चेतना है और वह काम करा रही है।भगवद्वाद की अवधारणा है:सबको भगवान संचालित कर रहा है।भगवान की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।जो भगवद्वाद को नहीं मानते हैं और जो भगवद्वाद को मानते हैं,उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से यह स्वीकार करना होता है कि हमारी सारी प्रवृत्तियाँ शरीर में विद्यमान मन के द्वारा संचालित हो रही हैं।
    मन का निग्रह
  • प्रश्न हो सकता है कि जब शरीर को समझना है,वासना पर नियंत्रण पाना है तो सबसे पहले किसको पकड़ें? आंख को पकड़ें अथवा मन को? कान को पकड़ें अथवा मन? बाह्य जगत के साथ सम्पर्क स्थापित करने में दो इन्द्रियाँ प्रधान हैं:आंख और कान।इसलिए अध्यात्म के आचार्यों ने इस प्रश्न पर चिन्तन किया,समाधान की भाषा में कहा:सबसे पहले मन पर ध्यान दो,मन को पकड़ों,मन का निग्रह करो।
  • उदाहरणार्थ मछुआरा मछलियों को पकड़ता है तो सबसे पहले कुमीन को पकड़ता है।कुमीन वह मछली है,जो जाल को भी काट देती है।यह कहा जाता है:इन्द्रियों का संयम करो,आंख और कान का संयम करो,जीभ का संयम करो।इन्द्रियों का संयम आवश्यक है,किन्तु उससे भी पहले जरूरी है मन का संयम।इन्द्रियों को कौन संचालित करता है? इन्द्रियों का स्वामी कौन है? इन्द्रियों का स्वामी है मन।
  • गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा है:जैसे वायु को नहीं पकड़ा जा सकता,वैसे ही मन को भी नहीं पकड़ा जा सकता है।हवा चल रही है।इसे सब जानते हैं,किन्तु कहा जाए :हवा को पकड़ के दिखाएं।क्या आप ऐसा कर पाएंगे? वृक्ष के पत्ते हिल रहे हैं,हवा के कारण हिल रहे हैं।यह दिखाई दे रहा है।किन्तु हवा को नहीं पकड़ा जा सकता है।क्या यही स्थिति मन की नहीं है?
  • अर्जुन के प्रश्न को समाहित करते हुए श्रीकृष्ण ने कहा,मन को पकड़ा जा सकता है।अभ्यास (अच्छी आदतों को करते रहने) और वैराग्य (बुरी आदतों में रस न लेने,विरक्ति) के द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।

Also Available in English:Love

6.क्या है प्रेम और क्या है वासना? गहराई से समझिए का सारांश (Summary of Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein):

  • (A)वासना बनाम प्रेम से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ तुलनात्मक प्रश्न (Vasna banaam prem se sambandhit chhatra-chhatrao se kuch tulnatmak prashn)
    (1.)वासना बनाम प्रेम से आप क्या समझते हो? (vasna banaam prem se aap kya matlab hai?)
    (2.) वासना के जाल में कैसे फँसते हैं? (Vasna ke jaal mein kaise phashnte te han?)
    (3.) प्रेममय कैस हो सकते हैं? (premmayi kais ho sakte han?)
    (4.) वासना से कैसे मुक्त हो सकते हैं? (Vasna se kaise mukt ho sakte han?)
    (5.) प्रेम और वासना में क्या अन्तर है? (prem aur romance mein kya antar hai?)
    (6.)क्या वासना से मुक्त होना ही प्रेममय होना है? (kya vasna se mukt hona hi premmay hona hai?)
    (7.)वासना का कोई उदाहरण दो। (vasna ka koi udaharan do)
    (8)क्या वासना और प्रेम एक दूसरे से विपरीत है? (kya vasna aur prem ek dusre se vipreet hai?):
    (9.) विद्यार्थी को वासना से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए? (chhatron ko Vasna se mukt hone ke liye kya karna chahiye?)
    (10.) विद्यार्थी को प्रेममय होने के लिए क्या करना चाहिए? (Vidyarthi ko prem sambandh banane ke liye kya karna chahiye?)
Important Points of Love and Lust

Important Points of Love and Lust

  • (B)वासना बनाम प्रेम से सम्बन्धित विचारणीय बिन्दु
    (1.)प्रेम में जीना आसान नहीं (prem mein jeena aasan nahin)
    (2.)प्रेम अपने अहंकार को मिटाना है (prem apne ahnkar ko mitana hai)
    (3.)प्रेम भावुकता नहीं है (prem bhavukta nahin hai)
    (4.)वासना क्या है? (vasna kya hai?)
    उपर्युक्त आर्टिकल में क्या है प्रेम और क्या है वासना? गहराई से समझिए। (Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein) के बारे में विस्तार और गहराई से बताया गया है।
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Also Available in Hindi:Introduction to Jo Boaler Wants Everyone to Love

7.कपल के प्रेम करने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (How to make love to a couple) (Humour-Satire):

  • बुजुर्ग (कपल से): इस तरह क्यों चिपक रहे हो?,यह पब्लिक प्लेस है।
  • कपल : तो क्या हुआ,प्रेम कर रहे हैं?
  • बुजुर्ग: परन्तु यह को पढ़ने की उम्र है।पढ़ना चाहिए।
  • कपल : अह आजकल पढ़ने कल्चर है।मौजमस्ती करो।
  • बुजुर्ग : ऐसी बेहूदा हरकतों को आज कल्चर कह रहे हो।
  • बुजुर्ग: पढ़ाई करना तप और साधना होती है,वासना नहीं।
  • कपल: आप भी क्या पुराने जमाने की दकियानूसी बात लेकर बैठ गये।
  • बुजुर्ग: पढ़ाई के बाद आटे-दाल का भाव मालूम पड़ेगा,बच्चू तब तुम्हें ये दिन आएंगे।

8.क्या है प्रेम और क्या है वासना? गहराई से समझिए। (Frequently Asked Questions Related to Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.वासना और प्रेम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। (Who is the blow of lust?):

उत्तर:वासना दैहिक होती है जबकि प्रेम आत्मिक होता है।वासना में कुछ पाने की इच्छा होती है और प्रेम बेशर्त होता है तथा समर्पण होता है।वासना कामनाओं की पूर्ति होती है जबकि प्रेम में कामनाओं का त्याग होता है।

प्रश्न:2.वासना का वार किस पर होता है? (Write a brief note on lust and love):

उत्तर:वासना का वार निर्मम,आशाहीन,आधारहीन प्राणियों पर ही होता है।चोर की अँधेरे में ही चलती है,उजाले में नहीं।

प्रश्न:3.वासना किसके समान है? (What is lust similar to?):

उत्तर:वासना खोटे सोने के चमकती तो बहुत है,परन्तु परीक्षा की आग में पड़ कर वह चमक स्थिर नहीं रहती।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा क्या है प्रेम और क्या है वासना? गहराई से समझिए। (Kya Hai Prem Aur Kya Hai Vasana? Gehrai Se Samjhein) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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