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How to develop creativity in hindi

1.सृजनात्मकता कैसे विकसित करें? का परिचय ( Introduction to How to develop creativity in hindi)रचनात्मकता के प्रकार क्या हैं? (What are types of creativity?):

  • सृजनात्मकता कैसे विकसित करें? (How to develop creativity in hindi):सृजनात्मकता से तात्पर्य है कि कुछ नवीन चीज की खोज,अनुसंधान करना।बालकों की सुप्त प्रतिभा को पहचानते हुए उसे विकसित करने पर आगे जाकर वे सृजनशील बनते हैं।इसलिए बाल्यकाल से बालकों पर माता-पिता,अभिभावक और शिक्षकों को पैनी नजर रखनी चाहिए।
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2.सृजनात्मकता कैसे विकसित करें? (How to develop creativity in hindi),रचनात्मकता के प्रकार क्या हैं? (What are types of creativity?):

  • हर बालक में कुछ न कुछ प्रतिभा होती है यदि उस प्रतिभा को तराशा,निखारा,उभारा जाए तो उनमें सृजनात्मकता का विकास होता है।सृजनात्मकता का अर्थ केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान,चिन्तन-मनन करने और उसको साकार रूप प्रदान करने भी है।यह आवश्यक नहीं है कि बालकों में अध्ययन के क्षेत्र में ही सृजनात्मकता का विकास हो सकता है बल्कि अध्ययन के अलावा भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें उनकी सृजनात्मकता प्रतिभा होती है।जैसे:खेल,भजन,संगीत,चित्रकारिता,मूर्तिकला इत्यादि में भी उनकी सृजनात्मकता विकसित हो सकती है।
  • सृजनात्मकता और चिन्तन-मनन में आपस में सम्बन्ध होता है।जो छात्र-छात्राएं सृजनशील होते हैं उनमें चिन्तन-मनन करने की क्षमता का भी विकास होता है।इसका दूसरा पहलू भी है कि यदि बालक-बालिकाओं में चिन्तन-मनन करने की क्षमता होती है वे सृजनशील होते हैं।दरअसल किसी भी नई चीज की खोज करने के बौद्धिक शक्ति अर्थात् चिन्तन-मनन करने की क्षमता का विकास होता है तभी वे ऐसा कर सकते हैं।
  • वस्तुतः बालक-बालिकाओं की तरफ माता-पिता, अभिभावक तथा शिक्षक व्यक्तिगत रूप से ध्यान नहीं देते हैं अतः उनकी सृजनात्मकता क्षमता का विकास नहीं हो पाता है।
  • आधुनिक युग में माता-पिता,अभिभावक धनार्जन करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे बालकों की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाते हैं।धनार्जन करके वे अपने तथा बालकों के लिए अधिक से अधिक भौतिक सुविधाओं को जुटाने में लगे रहते हैं।अपनी आवश्यकताओं (Requirements),सुविधाओं (facilities) की पूर्ति करने तक तो ठीक है परन्तु भोग-विलास (luxury) के साधन जुटाने का कोई अन्त नहीं है।माता-पिता को इतना धन तो जुटाने का प्रयास करना ही चाहिए कि वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन सकें।ओर इसके लिए झूठ-पाखण्ड,बेईमानी करने की आवश्यकता नहीं है और न ही बहुत अधिक व्यस्त रहने की आवश्यकता है कि वे अपने बच्चों की तरफ ध्यान देने के लिए समय ही नहीं निकाल सकें।भोग-विलास की वस्तुएं जुटाने का कोई अन्त नहीं है।वैसे भी बालक-बालिकाओं की प्रतिभा कष्टों,विपत्तियों,अभावों में निखरती है।विद्यार्थीकाल तप और परिश्रम करने का समय होता है,साधना करने का समय होता है।इसलिए उन्हें भोग-विलास की वस्तुओं का आदी बनाना उचित नहीं है।
  • माता-पिता,अभिभावक का सबसे प्रमुख कर्त्तव्य है अपने बालक-बालिकाओं को योग्य बनाना और उनमें संस्कारों का निर्माण करना,उनको शिक्षित करना,उनकी सृजनात्मक क्षमता का पता लगाकर उसको निखारना,तराशना और उभारना।यदि वे उनकी सृजनात्मक क्षमता का विकास नहीं भी कर सकें तो किसी योग्य गुरु अथवा संस्थान का पता लगाकर वहाँ उनको प्रवेश दिलाना,प्रशिक्षण दिलाना।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सृजनात्मकता कैसे विकसित करें? (How to develop creativity in hindi), रचनात्मकता के प्रकार क्या हैं? (What are types of creativity?) के बारे में बताया गया है।
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