Keval Sakshar Na Banein-Swadhyayi Banein:Swadhyaya Kaise aur Kyon Karein
1.केवल साक्षर न बने-स्वाध्यायी बनें:स्वाध्याय कैसे और क्यों करें? (Keval Sakshar Na Banein-Swadhyayi Banein:Swadhyaya Kaise aur Kyon Karein):
- केवल साक्षर न बने-स्वाध्यायी बनें:स्वाध्याय कैसे और क्यों करें? (Keval Sakshar Na Banein-Swadhyayi Banein:Swadhyaya Kaise aur Kyon Karein) इस शीर्षक को पढ़कर चौंकिए मत।क्या आपको लगता है कि स्कूल की डिग्री आपको रोजगार दिला देगी? सोचिए फिर से!
- आज के युग में साक्षर (literate) होना तो एक शुरुआत है,लेकिन व्यक्तित्व का असली विकास स्वाध्याय से ही संभव है।साक्षरता हमें अक्षर पहचानना और पढ़ना सीखाती है,परंतु स्वाध्याय (Self-Study) हमें उस ज्ञान का सही उपयोग और चिंतन करना सिखाता है।
- अक्सर लोग सोचते हैं कि स्कूल या कॉलेज की डिग्री मिलने के बाद शिक्षा खत्म हो गई,लेकिन असली शिक्षा तो वहां से शुरू होती है जहां हम खुद से सीखना शुरू करते हैं।हमने अपने 23 साल के शिक्षण अनुभव (teaching experience) में देखा है कि जो विद्यार्थी केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहता और स्वाध्याय की आदत डालते हैं,वहीं जीवन में बड़ी सफलता हासिल करते हैं।
- हमने पहले भी आपको आर्टिकल “3 Tips for Self-study with Mathematics” और “Make Effort Along with Self-Study” में स्वाध्याय के बारे में बताया है कि स्वाध्याय कैसे करें? स्वाध्याय के साथ प्रयास करें क्योंकि बिना प्रयास और सही दिशा के स्वाध्याय अधूरा है।इसका लिंक दिया गया है,उन्हें भी पढ़ें।
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2.स्वाध्याय क्यों जरूरी है? (Swadhyyaya Kyon Zaroori hai? (The Importance)):
- साक्षर होना आपको एक डिग्री दिला सकता है,लेकिन स्वाध्याय (Swadyaya) आपको विद्वान बनाता है।इसकी जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है।
- आज के डिजिटल दौर (Digital Daur) में हम जानकारी (information) से तो घिर गए हैं,लेकिन ज्ञान (Wisdom) से दूर होते जा रहे हैं।हमारे अनुभव में यह आया है कि जो विद्यार्थी केवल कोचिंग,स्कूल,कॉलेज या शिक्षक (teacher) के भरोसे रहता है,वो केवल रटना (memorizing) सीखते हैं। लेकिन जो स्वाध्याय करते हैं,उनमें क्रिटिकल थिंकिंग (critical thinking) पैदा होती है।
आत्म-निर्भरता (Self-reliance): - यह आपको किसी और के समझाने का इंतजार करने के बजाय खुद रास्ता निकालना सिखाता है।
गहरी समझ (Deep Work): - जब आप खुद से किसी संकल्पना (concept) को समझते हैं,तो वो आपके दिमाग में हमेशा के लिए छप जाती है।जैसे कि हमने अपने पहले आर्टिकल “3 Tips for Self-Study with Mathematics” में समझाया था कि गणित के सूत्र तभी समझे जाते हैं जब आप उनके साथ अकेले समय बिताते हैं।
चरित्र निर्माण (Charitra Nirman): - स्वाध्याय केवल दिमाग की कसरत नहीं,बल्कि आत्मा का शुद्धिकरण,अपने आप का रूपांतरण है।जैसे कि हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि,खुद को जानना ही सबसे बड़ी शिक्षा है।
- गणित के विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से हमने स्वाध्याय पर लेख लिखा था,क्योंकि गणित के विद्यार्थी शिक्षक के समझाने के बाद भी सवालों और समस्याओं को हल नहीं कर पाते हैं।गणित जैसे विषय को पढ़ने के लिए स्वाध्यायी होना जरूरी है,स्वाध्याय से हम अपनी आन्तरिक शक्तियों से परिचित होते हैं।जब शक्तियों को पहचान लेते हैं तो प्रयास (efforts) के द्वारा उनको जगाते हैं और वे आंतरिक शक्तियाँ ही हमें जटिल सवालों और समस्याओं के हल सूझाती हैं।
मानसिक अनुशासन (Mental Discipline): - स्वाध्याय से दिमाग मजबूत,संतुलित और पहले से तेज होता है और हम गणित के सवालों को ही नहीं बल्कि जीवन की किसी भी समस्या को सही तरीके से हल कर पाने में सक्षम हो जाते हैं।
समस्या समाधान (Problem Solving): - जिसको स्वयं को पढ़ना आ गया,जो स्वयं का विश्लेषण कर सकता है वो जीवन की कठिन से कठिन मुश्किलों से नहीं डरता और उसमें से कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता है।जो बच्चे केवल कोचिंग करते हैं,केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए पढ़ते हैं,केवल स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हैं वो जिंदगी की दौड़ में पिछड़ जाते हैं।परंतु सत्यम कोचिंग सेंटर में पढ़ते हैं और ब्लॉग पर दिए गए आर्टिकल रोज पढ़ते हैं तथा स्वाध्याय करते हैं,स्वाध्याय पर ध्यान देते हैं,वे आगे निकल जाते हैं और असली सफलता स्वाध्यायी होने से ही मिलती है।
3.स्वाध्याय कैसे करें? (Swadhyaya Kaise Karein?):
- स्वाध्याय करने की ठोस विधि (The Solid Method):
- स्वाध्याय का मतलब केवल किताब खोलकर बैठना नहीं है।इसकी एक वैज्ञानिक विधि (Scientific method) है,जैसे हम इन तीन-चार बिंदुओं में समझते हैं:
(1.)चयन और चिंतन (Selection and Reflection):
- सबसे पहले यह तय करें कि मुझे आज क्या पढ़ना है।पढ़ते समय 30 मिनट के बाद 2 मिनट के लिए आंखें बंद करके चिंतन (मनन) करें कि मैंने आज क्या पढ़ा है और इसका मेरे चरित्र से स्तर कितना ऊंचा है और चरित्र को कैसे ऊंचा उठाएं? इसे आत्म-विश्लेषण (Self-Analysis) कहते हैं।अध्ययन की गई बातों को रिकॉल (Recall) करके उस पर अमल करने के तरीकों पर विचार करेंगे तो आप अपने व्यक्तित्व (personality) में बदलाव महसूस करेंगे।
- केवल पढ़ने तक चाहे वो कोर्स की पुस्तक हो,सत्साहित्य हो या व्यावहारिक अथवा आध्यात्मिक पुस्तकें हों,साक्षर होना ही है।जब आप उस पर मनन करते हैं और उस पर अमल करते हैं तभी आप स्वाध्यायी कहलाएंगे।
(2.)सही समय का चयन (Sahi Samay ka Chayan):
- सुबह का शांत समय (अमृतवेला) स्वाध्याय के लिए सबसे उत्तम है।अब विद्यार्थियों पर परीक्षा का दबाव और पढ़ने का तनाव नहीं है।छुट्टियां हैं,ऐसे वक्त में जिन विद्यार्थियों की सुबह जल्दी उठने की आदत नहीं है वे जल्दी उठकर अपना शेड्यूल पढ़ने का कर सकते हैं।दो-तीन महीने में आपकी आदत जल्दी उठकर पढ़ने की हो जाएगी।सुबह शोर-शराबा नहीं रहता है,वातावरण में प्रदूषण नहीं होता है अतः पढ़ने में एकाग्रता आसानी से सधती है।
(3.)लेखन का महत्त्व (The Power of Writing): Swadhyyaya Kyon Zaroori hai? (The Importance)):
- स्वाध्याय करना तभी लाभप्रद और मजबूत (solid) होता है जब आपका दिल और दिमाग एक साथ चले,आपकी शारीरिक गतिविधि भी साथ में हों।तीनों चीजें तभी साथ होती हैं जब हम पढ़ें हुए को एकाग्र होकर लिखने का प्रयास करते हैं।इसलिए केवल पढ़ें ही नहीं बल्कि अध्ययन की गई बातों को लिखें और उस पर मनन-चिंतन करें।पढ़े हुए को हूबहू नहीं लिखना है बल्कि अपनी पर्सनल टच (personal touch) और अनुभव का इस्तेमाल करते हुए कुछ नई बात उसमें जोड़ते हैं।इससे आपके व्यक्तित्व की झलक दिखाई देती है।ये लिखे हुए नोट्स ही आपकी असली पूंजी हैं।
(4.)डिजिटल अनुशासन (Digital Discipline):
- आजकल साक्षर लोग यूट्यूब पर भटक जाते हैं।स्वाध्याय का सही तरीका है कि आप इंटरनेट (internet) का उपयोग केवल ‘डाउट्स’ (Doubts) स्पष्ट करने के लिए करें,ना कि पूरी पढ़ाई करने के लिए।दिल और दिमाग ही आपके असली साथी हैं।पुस्तकों,इंटरनेट और अन्य चीजें तो आपकी सहायक हैं।
- पढ़ते समय मोबाइल या डिजिटल उपकरणों को दूर रखें,इसे डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) कहते हैं। क्योंकि पढ़ते समय इनका उपयोग करने से व्यवधान पैदा होता है।और किसी भी तरह का डिस्ट्रक्शन (Distraction) स्वाध्याय में बाधा पैदा करता है।
4.सत्यम कोचिंग सेंटर का अनुभव (Experience of Satyam Coaching Centre):
- रोजाना कम से कम 30 मिनट का समय निश्चित करें।24 घंटे में 30 मिनट का समय निकालना कोई बड़ी बात नहीं है,जबकि स्वाध्याय हमारे जीवन का निर्माण कर रहा हो।
- पढ़ते समय एक नोटबुक अपने पास अवश्य रखें ताकि आपके दिमाग में कोई भी नई बात आए तो उसे लिख सकें,साथ ही आपने जो भी पढ़ा है,उसका निष्कर्ष लिखें और उसका जीवन में कैसे अमल करना है उसके बारे में भी लिखें।
हम साक्षर होने के लिए तो जी तोड़ मेहनत करते हैं क्योंकि आज की शिक्षा केवल साक्षर होने का प्रमाण-पत्र (Degree) ही तो देती है,जो बिना स्वाध्याय और कौशल के न ओढ़ने के काम आती है न बिछाने के। - महान् गणितज्ञ महावीराचार्य और ब्रह्मगुप्त स्वाध्यायी ही थे,तभी इतने उच्च कोटि की गणित लिख सके थे,उस समय आज की तुलना में कोई साधन-सुविधाएँ नहीं थीं।केवल स्वाध्याय,सत्संग और मनन-चिंतन ही उनके हथियार थे।
- जब तक पढ़े हुए के बारे में मनन-चिंतन और प्रयास (लेखन) नहीं करते हैं तब तक स्वाध्याय के बारे में सही बात बनती नहीं है।वस्तुतः साक्षर होने के बाद या साथ-साथ में स्वाध्याय की यात्रा चालू हो जाती है।साक्षर होने की यात्रा तो डिग्री लेने के बाद समाप्त हो जाती है परंतु स्वाध्याय की यात्रा जिंदगी भर चलती रहती है।यदि हम डिग्री लेकर ही खुश हो जाएं और पढ़ाई को समाप्त मान लें तो समझा जाना चाहिए कि उसने स्वाध्याय का पहला पाठ भी नहीं पढ़ा है।
- जो विद्यार्थी स्वाध्याय नहीं करता है उसकी स्थिति एक बंद पुस्तक की तरह होती है जो कभी नहीं खुलती है।आपको एक विद्यार्थी की कहानी सुनाता हूं जिससे उसकी जिंदगी बदल गई।उस विद्यार्थी ने कोचिंग में काम्पीटिशन की तैयारी के लिए कहा।हमने उसे समय और फीस बता दी।
- वह विद्यार्थी कुछ दिन पढ़ा लेकिन उसे बोरियत होने लगी।उसने मुझे अपनी समस्या बताई।हमने उसे अपनी लाइब्रेरी में पुस्तक पढ़ने और स्वाध्याय करने के लिए कहा।उसने मुझसे पूछा कि स्वाध्याय क्या होता है? हमने उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए स्वाध्याय के बारे में विस्तार से बताया।
- उस विद्यार्थी ने कहा कि मैं पहले भी आपसे पढ़ता था परंतु आपने इतनी बढ़िया बात नहीं बताई।हमने कहा कि उस समय आप लोगों के दिमाग में डिग्री का भूत सवार रहता था,इसलिए आप कोर्स की पुस्तकें पढ़ने में ही ध्यान देते थे वरना यह लाइब्रेरी और पुस्तकें पहले भी थी।
- उसने दत्तचित्त होकर स्वाध्याय करना चालू कर दिया।थोड़े समय में ही उसके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ।वह जो भी पढ़ता उस पर हमारे साथ चर्चा (Discuss) करता।इस प्रकार उसका व्यक्तित्व निखरता गया।उसमें सद्गुण विकसित होते गए और वह चिंतन,मनन करने लगा तथा एक दिन वह एक कामयाब इंसान बन गया।
5.स्वाध्याय के मुख्य बिंदु (Key Points of Swadhyaya):
- (1.)स्वाध्याय को यदि मानसिक भूख मिटाने के लिए उतना ही आवश्यक समझा गया होता,जैसे कि पेट भरने की अनिवार्य आवश्यकता समझी जाती है,तो उसके लिए हर किसी के द्वारा सतत प्रयत्न किया जाता।
- (2.)जिस प्रकार शरीर की पुष्टि और वृद्धि का क्रम चलता रहता है,उसी प्रकार मानसिक विकास का लाभ भी हर किसी को मिल गया होता,पर उपेक्षा का क्या किया और क्या कहा जाए? जिसके कारण अति महत्त्वपूर्ण (स्वाध्याय) को भी उपेक्षा के गर्त में डाल रखा गया है।
- (3.)साक्षरता की परिधि पूरी कर लेने पर यह नहीं समझ लेना चाहिए कि जीवन के अनुरूप लगभग सभी प्रसंगों में जो भारी परिवर्तन लाया जाना है,उसकी पृष्ठभूमि तैयार हो गई है।
- (4.)अभी ऐसा बहुत कुछ है,जिसे नए सिरे से समझने-समझाने,विचारने,बदलने और विवेकसम्मत दृष्टिकोण अपनाने के उपरांत ही अभीष्ट परिवर्तन की भूमिका बन पड़ने की आशा की जा सकती है।
- (5.)विद्यार्थी जीवन को उज्ज्वल और आगे के जीवन को विकसित करने के लिए सद्ग्रंथों का अध्ययन करना जरूरी है।आपके व्यक्तित्व का निर्माण होने पर अपनी समस्याओं को आप खुद सुलझा सकते हैं और भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
- (6.)सोये मनुष्य को खाने-पीने की कुछ भी आवश्यकता नहीं पड़ती है,पर वह जगता है तो न केवल शरीर के लिए भोजन,वरन मानसिक परिश्रम (अध्ययन-मनन),कोर्स की पुस्तकें पढ़ने,गृह कार्य,अन्य व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्मेलन जैसे अनेक कार्य करने पड़ते हैं और उन्हें पूरा किए बिना काम नहीं चलता है।
- (7.)ठीक इसी तरह विद्यार्थियों को जगाने के लिए स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता पड़ती है। माता-पिता व शिक्षकों को विद्यार्थियों को जगाने का पूरा प्रयास करना चाहिए।
- (8.)सत्साहित्य उपलब्ध नहीं हो अर्थात् खरीद न सकते हों तो लाइब्रेरी में अध्ययन किया जा सकता है।इससे आर्थिक भार भी वहन नहीं करना पड़ेगा।
- (9.)अक्षर ज्ञान को ही (डिग्री को) सब कुछ मान लेता है वह केवल बीज बोता है और उसके लिए आवश्यक खाद-पानी,रखवाली,खरपतवार आदि से सर्वथा मुंह मोड़ लेना द्वितीय चरण स्वाध्याय को पूरा नहीं करना है।बीज बोने से ही पेड़-पौधे बड़े नहीं होते हैं।
- (10.)स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य ही एकमात्र जरिया नहीं है सत्संग,इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञानवर्धक सामग्री का अध्ययन,लेखन,ज्ञान आदि अनेक साधन हैं।
- (11.)सत्संग,अध्ययन,ज्ञान चर्चा,कथा,प्रवचन आदि सुनना स्वाध्याय का पहला पाठ है।स्वाध्याय जीवन का अंग बन कर रहे इसके लिए पढ़ने-सुनने से ही ज्ञान गले नहीं उतरता जैसे पानी-पानी का जाप करने से प्यास नहीं बुझती,बल्कि प्रयास करके पानी पीना पड़ता है तब प्याज बुझती है।इसी प्रकार पढ़ने-सुनने के साथ अनुभव या अभ्यास नहीं किया जाएगा तब तक स्वाध्याय जीवन का अंग नहीं बनेगा।स्वाध्याय का यह दूसरा कदम है जो अनुभव और अभ्यास से जुड़ता है।इसकी पूर्ति योग्य गुरु के मार्गदर्शन के प्रशिक्षण से हो सकती है।
- (12.)व्यावहारिक अनुभव और प्रशिक्षण के लिए ऐसे काउंसलर के मार्गदर्शन की आवश्यकता है जिसमें बहुमुखी प्रतिभा और आध्यात्मिक ज्ञान हो तभी हर विधा के विद्यार्थी को बौद्धिक और भावना क्षेत्र में पारंगत और विवेक संपन्न बनाया जा सकता है।
- (13.)हर विद्यालय में ऐसे काउंसलर की नियुक्ति की आवश्यकता है जो बहुमुखी प्रतिभा और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न हो।
- (14.)इस ढांचे में ढालने के लिए समस्त शिक्षण संस्थाओं,विद्यालयों और कॉलेजों का कायाकल्प करने की आवश्यकता है।
- (15.)जिस ज्ञान के द्वारा विद्यार्थी की सब प्रकार की उन्नति होती है और सुख-संतोष प्राप्त होता है वह ज्ञान स्वाध्याय,सत्संग,अध्ययन और मनन-चिंतन के द्वारा प्राप्त होता है।
- (16.)विद्यार्थी और व्यक्ति की जिज्ञासाओं का समाधान स्वाध्याय से होता है।संवेदना और विचारों को प्रेरणा देने का मुख्य आधार स्वाध्याय ही है,जिससे प्रेरित होकर विद्यार्थी के विचार और कार्य सही मार्ग की दिशा में विकसित होते हैं।
- (17.)शरीर,वस्त्र,मकान आदि की सफाई नित्य करनी पड़ती है,क्योंकि नित्य ही उन पर मैल और कुप्रभाव निरंतर पड़ता है।इसी प्रकार बुरे विचारों एवं मानसिक वृत्तियों की सफाई के लिए सत्संग और स्वाध्याय की बुहारी लगाने की नित्य की आवश्यकता होती है।इसलिए शास्त्रकारों ने भोजन,स्नान,शयन आदि की भांति स्वाध्याय को भी नित्य कर्म माना है।
- (18.)पानी को फैलाते ही वह तेजी से नीचे की ओर गिरता है।उसी प्रकार मन का स्वभाव भी बुरे कार्यों की ओर आकर्षित होना है।यदि उसे न रोका जाए,तो वह पतन की ओर चलता रहता है जिसका कोई अंत नहीं।पानी को ऊपर ले जाने के लिए रस्सी,बाल्टी,पंप आदि का उपयोग करना पड़ता है,तब कहीं वह ऊपर की ओर बढ़ाया जा सकता है।इसी प्रकार स्वाध्याय मन को पतन के मार्ग से रोककर उच्च मार्ग की ओर ले जाता है।
- (19.)निष्कर्ष (Conckusion):अंत में यह समझना जरूरी है की साक्षरता हमें दुनिया से जोड़ती है,लेकिन स्वाध्याय हमें खुद से जोड़ता है।एक साक्षर व्यक्ति केवल अक्षर पढ़ता है,पर स्वाध्यायी व्यक्ति जीवन को पढ़ता है।स्वाध्याय केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं,बल्कि एक बेहतर इंसान बनने के लिए करें।हमें खुद का ज्ञान,ज्ञान की गहराई से होता है।एक शिक्षक होने के नाते हमने अनुभव किया है कि जो व्यक्ति रोजाना नया सीखने की जिज्ञासा रखता है,उसका मानसिक विकास नहीं रुकता और आत्म-नियंत्रण हो जाता है।
- याद रखें,ज्ञान वही है जो हमें मुक्त करें अर्थात् सांसारिक झंझटों से मुक्त करता है और यह मुक्ति निरन्तर स्वाध्याय से सम्भव है।तो आज ही संकल्प लें कि आप रोजाना कम से कम एक पृष्ठ सत्साहित्य (अच्छी पुस्तक) पढ़ेंगे और उसे पढ़ेंगे ही नहीं मनन-चिंतन करके अपने आचरण में उतारेंगे।
- उपर्युक्त आर्टिकल में केवल साक्षर न बने-स्वाध्यायी बनें:स्वाध्याय कैसे और क्यों करें? (Keval Sakshar Na Banein-Swadhyayi Banein:Swadhyaya Kaise aur Kyon Karein) के बारे में बताया गया है।
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6.छात्र द्वारा स्वाध्याय (हास्य-व्यंग्य) (Self-study by the student) (Humour-Satire):
- टीचर ने क्लास में सबसे पीछे बैठे एक छात्र को खड़ा किया और पूछा:आज तुमने स्वाध्याय में क्या नया सीखा?
छात्र:सर,मुझे नहीं पता। - टीचर:अच्छा में तुम्हें एक हिंट देता हूं।बताओ इस सवाल का हल तुम्हें कैसे सूझता है।
- छात्र ने हिचकिचाते हुए कुछ कहना चाहा,लेकिन चुप हो गया।
- टीचर:हां,हाँ बोलो मुझे पता है,तुम बता दोगे।
- छात्र:पड़ोस वाले छात्र की नोटबुक से।
7.केवल साक्षर न बने-स्वाध्यायी बनें:स्वाध्याय कैसे और क्यों करें? (Frequently Asked Questions Related to Keval Sakshar Na Banein-Swadhyayi Banein:Swadhyaya Kaise aur Kyon Karein) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.क्या एआई के आने से स्वाध्याय खत्म हो जाएगा? (Kya AI ke aane se swadhyaya khatm ho jayega?):
उत्तर:नहीं,AI केवल एक टूल (tool) है,दिमाग को प्रशिक्षित तो स्वाध्याय ही करेगा।
प्रश्न:2.साक्षरता का अब क्या मतलब है? (Saksharata ka ab kya matlab hai?):
उत्तर:साक्षरता का मतलब अब केवल पढ़ना नहीं है,बल्कि डिजिटल टूल्स (digital tools) को सही से चलाना भी है।
प्रश्न:3.साक्षरता और स्वाध्याय में क्या अंतर है? (Saksharata aur swadhyaya mein kya anter hai?):
उत्तर:साक्षरता एक सीढ़ी है और स्वाध्याय सीढ़ी से चढ़कर मंजिल तक जाना है।साक्षरता से जॉब मिलता है परंतु स्वाध्याय से व्यक्तित्व निखरता है।साक्षर होना एक सुविधा है जबकि स्वाध्यायी होना एक तपस्या है।
- **Mera Students Se Ek Sawal**
Aapne aaj swadhyaya mein kya naya seekha? kya aapne aaj Ke din mein kam se kam 15 minute kisi aisi kitab ya vichar ko diye hain jo aapke charitra ko behtar banaye? comment mein zaroor batayein.
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Satyam
Lekhak Ke Baare Mein (About the Author) **Satyam Narain Kumawat** **Website Name:Satyam Mathematics** *Owner:satyamcoachingcentre.in* *Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)* **Teaching Mathematics aur Anya Anubhav** ***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan ***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav ***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan* ****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.











