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7 Best Ways of Body/Mind/Heart Harmony

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1.शरीर/मन/हृदय में सामंजस्य के 7 बेहतरीन तरीके (7 Best Ways of Body/Mind/Heart Harmony),शरीर व मन तथा हृदय में सामंजस्य कैसे हो? (How Can There Be Harmony Between Body and Mind and Heart?):

  • शरीर/मन/हृदय में सामंजस्य के 7 बेहतरीन तरीके (7 Best Ways of Body/Mind/Heart Harmony) जानना इसलिए आवश्यक है कि बिना सामंजस्य और तालमेल के अभाव में हम किसी भी कार्य को श्रेष्ठ तरीके से नहीं कर सकते हैं,भले अध्ययन कार्य हो,जाॅब हो या अन्य कोई भी कार्य हो।
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2.भावनाओं से मन प्रभावित होता है (The mind is affected by emotions):

  • सजल भावनाओं का संबंध सघन होता है।भावभरा हृदय तन-मन को प्रभावित करता है।यह एक ऐसी संवेदनशील डोर है,जिससे तन-मन एक सूत्र में पिरोए रहते हैं।भावनाओं का अभाव ही अनेक प्रकार के विकार एवं विकृतियों को जन्म देता है।हृदय,मन एवं देह यह तीनों जीवन के अविच्छिन्न अंग हैं।इनका समुचित सामंजस्य शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को सबल एवं सुदृढ़ करता है।यंत्रवादी विज्ञान ने इन संबंध सूत्रों को खंडित करके देखा,जिसके परिणाम से सभी परिचित हैं।आज का आधुनिक विज्ञान पुनः इनके तारतम्य को जोड़कर देखने का प्रयास कर रहा है।विभिन्न यौगिक पद्धति का चलन इसी का परिणाम है।
  • शरीर और मन जीवन के दो पहलू है।इन्हें अलग करके देखा नहीं जा सकता है।मन दुःखता है तो शरीर को पीड़ा होती है और देह का दर्द मन को चुभता है।देह इंद्रियों से संचालित होता है और इन्द्रियाँ मन से बंधी होती है।मन को भावना प्रभावित करती है।भावना मन को पोषण देती है और मन बुद्धि भावना को सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करता है।भावभरा हृदय एवं स्वच्छ मन को सुंदर स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।हमारी शिक्षा की अतिप्राचीन परंपरा आयुर्वेद एवं योग में उनके संबंधों तथा संबंधों से उत्पन्न प्रभावों को सूक्ष्मता से उकेरा गया है।आचार्यों ने अपने अनुभव के आधार पर इसका जो निष्कर्ष दिया था,वह आज भी उतना ही प्रासंगिक एवं उपयोगी है।
  • इक्कीसवीं सदी का विज्ञान तन से मन के रिश्ते को सेहत का संतुलन बिंदु मानने लगा है।आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तन और मन को अविभाजित अंग के रूप में देखने लगा है।आज का विज्ञान यह भी मानने-स्वीकारने लगा है कि भावनाएं मनुष्य के स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करती हैं।भावनाओं और स्वास्थ्य के बीच अंतर्संबंध आशातीत कहीं अधिक गहरा है।आर० मार्क ने ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल आफ मेडिसिन’ में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा है कि भावनाएं स्वास्थ्य प्रदान करती हैं।जो प्रेम प्रदान करता है और प्रेम प्राप्त करता है,दोनों ही उससे लाभान्वित होते हैं।बी०एस० सीगल ने ‘लव मेडिसिन एंड मिरेकल’ में स्पष्ट किया है कि यदि मैं रोगियों को कहता हूं कि तुम अपने इम्यूनो ग्लोब्यूलीन या टी० सेल को बढ़ाओ तो कोई नहीं जानता है कि कैसे बढ़ाएं? परंतु मैं कहता हूं कि आपस में एकदूसरे से गहराई से प्रेम करो तो वे करते हैं और उनमें टी० सेल बढ़ता है,जो कि जीवनीशक्ति बढ़ने का परिचायक हैं।अतः यथार्थ है कि प्रेम स्वास्थ्य एवं सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है।बाइबल के अनुसार प्रेमपूरित हृदय एक दिव्य औषधि है।

3.शरीर को केवल मशीन न मानें (Don’t think of the body as just a machine):

  • आधुनिक वैज्ञानिकों की मान्यताएं बदलने लगी हैं।वे उद्विग्नता,एकाकीपन,हताशा,प्रेम,संवेदना,करुणा,उमंग एवं उत्साह को मानसिक स्थिति के बदले विशिष्ट दैनिक प्रक्रियाओं के रूप में निरूपित करने लगे हैं।वे इन गुणों को दैहिक मोटापा आदि के समान मानने लगे हैं।मन इन सबको नियंत्रित एवं नियमित करता है और मस्तिष्क इन सबके लिए सहयोग प्रदान करता है।एक ओर मस्तिष्क मन को उन्मुख करता है तो दूसरी ओर हृदय,आमाशय,रोग प्रतिरक्षा प्रणाली सहित शरीर के तमाम ऊतकों व अंगों का नियंत्रक भी है।शरीर और मन दोनों अविच्छिन्न कड़ी के रूप में जुड़े हुए हैं।इस कड़ी को मस्तिष्क जोड़ता है।ए०जी० कैप्लान ने इस संदर्भ में कहा है कि शरीर-मन-मस्तिष्क की कार्यकुशलता एवं क्षमता प्रेम और भावनाओं के साथ द्विगुणित-बहुगुणित हो जाती है,परंतु ठीक इसके विपरीत प्रेमभाव के अभाव में इनकी सामर्थ्य चुक जाती है।
  • देह और मन की अविभाजित कड़ी 17वीं शताब्दी के गणितज्ञ इसाॅक न्यूटन के यंत्रवाद सिद्धांत के प्रतिपादन के साथ टूटने-बिखरने लगी।न्यूटन ने बताया कि ब्रह्मांड एक घड़ी के समान है,जिसे भगवान् ने कभी सृजित अवश्य किया है,परंतु इसमें उसने इसे वह चाबी भरकर छोड़ दिया है।तब से सृष्टि यंत्रवत् चल रही है और यांत्रिक नियम इसे चला रहे हैं।इस सिद्धांत ने व्यापक प्रभाव डाला।बस,यहीं से ब्रह्मांड की हर वस्तु के गति विज्ञान को न्यूटन के परिप्रेक्ष्य में समझने एवं समझाए जाने की परिपाटी प्रारंभ हुई।समाज,साहित्य,संगीत,कला,दर्शन सभी इस नियम के आधार पर पुनर्परिभाषित किए जाने लगे।ऐसे में भला चिकित्सा विज्ञान कैसे अछूता रहता।न्यूटन के सिद्धांत को आधार मानकर शरीर को भी एक मशीन मान लिया गया और इसके अंगों-उपांगों को कल-पुरजा।यदि यह मशीन बिगड़ जाए या खराब हो जाए तो इसे ठोक-पीटकर दुरुस्त किया जा सकता है।
  • शरीर को मशीन मान लेने से इसका प्रेम,भावनाएं,करुणा आदि संवेदनशील चीजों से नाता टूट गया।मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने इसे आग में घी डालने का काम किया कि शरीर की अपनी जैविक आवश्यकताएँ होती हैं,जैसे-काम,क्रोध आदि।इन आवश्यकताओं की पूर्ति करना कोई गलत बात नहीं है अर्थात् शारीरिक संबंध किसी से भी बनाया जा सकता है।इस सिद्धांत ने पवित्रता,शुचिता,संयम आदि धार्मिक चीजों पर घोर कुठारागात किया।इससे भी मन और देह के बीच की खाई और चौड़ी हो गई।यद्यपि मन और शरीर के विभाजन ने शरीर के स्वतंत्र अन्वेषण में भारी मदद पहुंचाई।चिकित्सा विज्ञान की महान उपलब्धियाँ शरीर के हर कल-पुरजे को खोलकर परखे बिना मिलनी संभव नहीं थी,परंतु ये उपलब्धियां मन और देह के प्रगाढ़ संबंधों की परिणति के अभाव में अधूरी एवं एकांगी साबित हुई।न्यूटनीय समझ के द्वैत परिणामस्वरूप चिकित्सक के हिस्से यह देह आई;जबकि मस्तिष्क पर चर्च का एकाधिकार मान लिया गया।अर्थात् शरीर की बीमारी डॉक्टर के अंतर्गत तथा मन के रोग धार्मिक आकाओं के दायरे में चले गए।विभाजन की यह रेखा इतनी बढ़ गई कि शरीर और मन को भिन्न-भिन्न चीजें मान लिया गया।विभाजन के इस बिछोह ने आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों को तकनीकी समाधानों के भँवर में उलझा-फंसा दिया।

4.हृदय के भावों का गहरा प्रभाव (The Profound Impact of Heart Expressions):

  • तन और मन की खंडित प्रक्रिया ने बड़ी विडंबना पैदा की,परंतु बीसवीं सदी की वैज्ञानिक उपलब्धियों ने कई सिद्धांतों में उलटफेर किया।आइंस्टीन का E=mc^{2} (पदार्थ एवं ऊर्जा का अंतर्संबंध),हाइजीनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत और मैक्स फ्लैक का क्वांटम भौतिकी ने न्यूटनीय दृष्टि में परिवर्तन किया।यह आधुनिक दृष्टि जीवन और विभिन्न रूपों,आयामों को नए अर्थों में प्रतिपादित एवं परिभाषित करती है।इस परिभाषा के अनुसार देह,मन एवं हृदय अखंड रूप से आपस में जुड़े-गूथे हुए हैं। आधुनिक चेतना जगत के विख्यात विद्वान् केन बिल्मर ने चेतना को अखंड एवं अविभाजित माना है।इन्होंने उपनिषद के सत्य को स्वीकार किया है।इस आधार पर कहा जा सकता है कि जीवन उस चैतन्य महासागर का एक अविच्छिन्न अंश है।देह जीवन की अभिव्यक्ति का आधार है।देह मंदिर है तथा मन इसकी मूरत है।मन देह के बाहर नहीं,अंदर प्रतिष्ठित है।इसकी क्षमता एवं स्वच्छता देह को भी प्रभावित करती है।
  • चिकित्सा विज्ञान के अनुसार प्रेम-घृणा दुःख-सुख हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं मनःस्थिति से गहरा ताल्लुक रखते हैं।मैकक्लीलैण्ड ने ‘मोटिवेशन एंड इम्यून फंक्शन इन हेल्थ एंड डिजीज’ नामक शोध पत्र में उल्लेख किया है कि प्रेम एवं अपनत्व शरीर में तनावजन्य हाॅर्मोन नारएपिनेफ्रीन को घटाते हैं तथा टी०सेल को बढ़ाते हैं।यह कोशिका हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता का प्रमुख आधार है।उनका कहना है कि जिस व्यक्ति के जीवन में संवेदना एवं भावना का प्रचुर स्थान रहा है,उसके शरीर में IgA नामक एंटीबॉडी का स्राव बढ़ जाता है,इससे शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता मिल जाती है।जिस व्यक्ति की मित्रता का दायरा बड़ा होता है तथा जिसे गहरी सहानुभूति एवं आत्मीयता मिलती है वह व्यक्ति ज्यादा स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है।आत्मीयता से शारीरिक सामर्थ्य में अभिवृद्धि होती है।
  • आत्मीयता,सौहार्द्र की भावना एक दिव्य रसायन है,जो शरीर को निरोग,स्वस्थ एवं सुंदर बनाए रखता है।मैकक्लीलैण्ड का कहना है कि यह अभी नहीं पाया जा सका है कि प्रेमभाव से लिंफोसाइट्स तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति में कितनी वृद्धि होती है,परंतु इतना तो निश्चित है कि इसमें गुणात्मक परिवर्तन होता है।मन शरीर को संचालित करता है।इस तथ्य को आज के वैज्ञानिक मानने लगे हैं और ये यहां तक स्वीकारते हैं कि न्यूरोट्रांसमीटर के स्राव को मन प्रभावित करता है।मनःस्थिति के आधार पर न्यूरोट्रांसमीटर स्रावित होते हैं एवं अच्छी मनःस्थिति में शरीर को स्वस्थ रखने वाले न्यूरोट्रांसमीटर स्रावित होते हैं।हालांकि,यह क्षेत्र और भी अनुसंधान की अपेक्षा रखता है,परंतु अभी तक का निष्कर्ष यही है।कैंडल और स्वार्टज्म ने ‘साइंस’ नामक प्रसिद्ध पत्रिका में अपने एक शोधपत्र में उल्लेख किया है कि विधेयात्मक चिंतन एवं स्वस्थ मनःस्थिति में न केवल न्यूरोट्रांसमीटर का स्राव बढ़ता है,बल्कि जीन्स में भी परिवर्तन आने लगते हैं।
  • आवश्यकता सिद्धांत (नीड्स थ्योरी) के जनक मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लों का कहना है कि जीवन में प्रेम और सौंदर्य से शारीरिक स्वास्थ्य में अभिवृद्धि होती है।इससे मन प्रसन्न रहता है।वैज्ञानिक मानते हैं कि मन एवं भावना के विकारों से ही इस शरीर में कई प्रकार के रोग जड़ जमाए बैठे रहते हैं।मन की प्रसन्नता से शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाती है और रक्तसंचार तंत्र में विषाक्त तत्त्व घट जाते हैं,इससे शरीर निरोग रहता है। आशावाद रोग प्रतिरोधी क्षमता पर जबरदस्त प्रभाव डालता है।कैंसर,एड्स जैसी दुरूह बीमारियों के उपचार में इसकी पुष्टि हुई है।जीव विज्ञानी कहते हैं कि शांतचित्त अवस्था में शरीर से कुछ एंडोर्फिंस का स्राव अधिक मात्रा में होने लगता है,इससे तनाव के परिणामस्वरूप स्रावित होने वाले कॉर्टिसाल जैसे घातक हाॅर्मोन निष्क्रिय हो जाते हैं।

5.देह व मन या हृदय जीवन के अंग (Body and Mind and Heart Organs of Life):

  • इस प्रकार देह के स्वतंत्र अस्तित्व से शुरू हुई आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की यात्रा ने अब अपनी राह एवं लक्ष्य को ‘माइंड बॉडी मेडिसिन’ के साथ बदल दिया है,दशा और दिशा परिवर्तित कर ली है।शरीर के साथ मस्तिष्क को दुरुस्त रखने की प्रणालियाँ पूरक चिकित्सा की श्रेणी में आ गई है और रोग निवारण में उनकी भूमिका को स्वीकार किया जाने लगा है।पिछले कुछ दशकों में वैकल्पिक और पूरक चिकित्सा पद्धतियों की ओर चिकित्साविज्ञानियों का ध्यान गया है तथा शरीर व मन के रिश्तों की परंपरागत जानकारी की खोज हुई है।इस क्रम में आधुनिक विज्ञान ने भारत की उन प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में निहित शरीर,मन एवं भावना के नाजुक एवं संवेदनशील रिश्तों की गहरी समझ को भी स्वीकार किया है।एक अनुमान के अनुसार 20 लाख ब्रिटेनवासी,एक लाख जापानी और लाखों अमेरिकी विभिन्न योग पद्धतियों को हृदयगंम कर रहे हैं एवं नित्य इन्हें कर भी रहे हैं।
  • देह,मन और हृदय जीवन के अंग हैं।इनके सुमेल एवं सामंजस्य से ही जीवन का सर्वांगीण विकास संभव हो सकेगा।इन्हें ठीक करने के लिए आज सभी समग्र चिकित्सा प्रणाली को अपना रहे हैं और यही रोगों का समुचित समाधान प्रदान कर सकती है।पवित्र भावना,स्वच्छ मन एवं स्वस्थ शरीर के लिए हमें जप,ध्यान,प्राणायाम आदि को अपनाना चाहिए।

6.भाव और विचार का आपस में प्रभाव (The interplay of emotion and thought):

  • यदि हम धर्मभाव के साथ सदाचार नहीं करते तो फिर हमारा अध्ययन करना,विद्या ग्रहण करना,पूजा पाठ,माला जपना और कर्मकांड एक ढोंग के सिवा कुछ नहीं।सबसे मुख्य चीज भाव।यदि हमारे मन में अच्छे भाव का अभाव होगा तो सब करा धरा बेकार हो जाएगा।यदि हमारे हृदय में धर्म का भाव नहीं है,हमारे जीवन में यदि हमने धर्म को आत्मसात नहीं किया,हमारे आचरण में धर्म का समावेश नहीं होगा तो हमारा जीवन उस मंदिर के समान रहेगा जिसमें मूर्ति ना हो और बिना मूर्ति के मंदिर होता ही नहीं सिर्फ एक मकान होता है।ऐसे ही सदाचार और धर्म भाव के अभाव में हमारा मानव-जीवन मनुष्य का जीवन नहीं,पशु का जीवन हो जाएगा।
  • आचार नियंत्रित व निर्देशित होता है हमारे विचारों से और विचारों का पूरा दरोमदार रहता है हमारे भाव पर।जैसे हमारे भाव होंगे,वैसे हमारे विचार होंगे,जैसे हमारे विचार होंगे वैसे हमारे कर्म होंगे और जैसे हमारे कर्म होंगे वैसा हमारा आचरण होगा।यह सिद्धांत सही सिद्ध होता है इसमें कोई संदेह नहीं।किसी भी मनुष्य में उत्थान और विकास के लिए तीन तलों का होना जरूरी होता है:भक्ति,ज्ञान और योग।जब भक्ति का रस हो,ज्ञान का तत्त्व हो और योग का सामर्थ्य हो तब शुभ कर्म बनता है और जब इनके साथ मनुष्य धर्म को (कर्त्तव्य) को आत्मसात कर लेता है तो वह कर्मयोगी हो जाता है। भक्ति की भावना माता की तरह वात्सल्यपूर्ण पोषण करती है,ज्ञान पिता की तरह रक्षण और संरक्षण करता है और योग गुरु की तरह आत्मा को परमात्मा से मिलाता है।उतिष्ठ जाग्रत वरानिबोधत (कठ उपनिषद) अर्थात् हे मनुष्यो उठो,जागो और ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान प्राप्त करो।सद्ज्ञान का होना भी बहुत जरूरी होता है क्योंकि ‘ऋते ज्ञानान्न मुक्ति’ के अनुसार ज्ञान के बिना किसी से भी मुक्ति नहीं मिलती।अज्ञानी व्यक्ति उलझा ही रहता है,मुक्त नहीं हो पाता।तो देखा अपने मन,शरीर और हृदय में आपस में संबंध होना कितना जरूरी है,कितना सही है और किस प्रकार तालमेल और सामंजस्य बिठाया जा सकता है।श्रेष्ठ कर्म इनमें तालमेल के बिना संभव नहीं।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में शरीर/मन/हृदय में सामंजस्य के 7 बेहतरीन तरीके (7 Best Ways of Body/Mind/Heart Harmony),शरीर व मन तथा हृदय में सामंजस्य कैसे हो? (How Can There Be Harmony Between Body and Mind and Heart?) के बारे में बताया गया है।

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7.छात्रा के सिरदर्द का इलाज (हास्य-व्यंग्य) (Treatment of Student Headache) (Humour-Satire):

  • मनीषा (छात्रा):डॉक्टर साहब मेरे सिर में दर्द है,अध्ययन करते-करते दर्द हो जाता है।कोई अच्छी-सी दवा दीजिए।
  • मनोचिकित्सक:लेकिन मैं तो मनोचिकित्सक हूं,मैं तो मन का इलाज कर सकता हूं,मनोरोगी का इलाज करता हूं।
  • मनीषा:कोई बात नहीं मुझे मनोरोगी समझकर ही दवा दे दीजिए।
  • मनोचिकित्सक ने छात्रा को दवा दे दी।
  • छात्रा:मुझे इन्हें कैसे लेना है।
  • मनोचिकित्सक:जब तुम्हारे दौरे पड़े,पागलों की तरह हरकत करो जैसे मनोरोगी करते हैं,तब इसे ले लेना।

8.शरीर/मन/हृदय में सामंजस्य के 7 बेहतरीन तरीके (Frequently Asked Questions Related to 7 Best Ways of Body/Mind/Heart Harmony),शरीर व मन तथा हृदय में सामंजस्य कैसे हो? (How Can There Be Harmony Between Body and Mind and Heart?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या भाव करने पर भी कर्म बंधन बन जाता है? (Does karmic bondage become even when you have bhav?):

उत्तरःभाव करने मात्र से भी कर्म बंधन हो जाता है।भाव,कर्म से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कर्म न करते हुए भी केवल वैसा विचार करने मात्र से ही कर्म बंधन हो जाता है।

प्रश्न:2.बंधन मुक्त होने के लिए कैसे कर्म करें? (How to perform karma to be free from bondage?):

उत्तर:भाव रहित होकर कर्म किया जाए तो कर्म का बंधन नहीं होता है।अतः हमें अच्छे भाव ही मन में रखने चाहिए ताकि हमारे शुभ कर्म हों और हम अशुभ कर्म-बंधन में बंधने से बच सकें।

प्रश्न:3.कर्म के फल से कैसे बच सकते हैं? (How can one escape the result of karma?):

उत्तर:संसार में ऐसा कोई स्थान,न अंतरिक्ष में,न समुद्र के गर्भ में,न पर्वतों की गुफाओं में कि जिसमें घुसकर (छिपने से) मनुष्य फल भोगने से बच सके।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा शरीर/मन/हृदय में सामंजस्य के 7 बेहतरीन तरीके (7 Best Ways of Body/Mind/Heart Harmony),शरीर व मन तथा हृदय में सामंजस्य कैसे हो? (How Can There Be Harmony Between Body and Mind and Heart?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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