Menu

CTBT and India: Key History,Stance & Impact

Contents hide
4 4.सीटीबीटी पर भारत की आशंकाएँ (India’s Apprehensions on CTBT):

1.सीटीबीटी और भारत: प्रमुख इतिहास,रुख और प्रभाव (CTBT and India: Key History,Stance & Impact):

  • सीटीबीटी और भारत (CTBT and India) के इस लेख में हम पढ़ेंगे कि सीटीबीटी क्या है? सीटीबीटी का इतिहास क्या है और भारत का इसके बारे में क्या रुख है? भविष्य में सीटीबीटी के प्रभावी होने की क्या सम्भावनाएँ हैं?

Also Available in Hindi:UN Organisation Security Council

2.सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने के लिए विकसित देशों का दबाव (Pressure from developed countries to sign CTBT):

  • भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (सी. टी. बी. टी.) पर वर्तमान रूप में हस्ताक्षर करने से साफ मना करके अपने दृढ़ इरादे का परिचय दिया।जेनेवा के निरस्त्रीकरण सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्रीमती अरूंधती घोष ने स्पष्ट कहा कि “भारत अपनी परमाणु क्षमता पर किसी प्रकार का अंकुश स्वीकार नहीं करेगा और वह अपने विकल्प खुले रखेगा।”हम अपने राष्ट्र की सुरक्षा को ही सर्वोपरि मानते हैं और इसमें परिवर्तन की आशा किसी को नहीं करनी चाहिए।जो सन्धि भेदभावपूर्ण हो और जिसमें केवल कुछ ही देशों के घातक परमाणु हथियारों के निर्माण तथा विकास के अधिकार को वैध मानने की व्यवस्था हो उसे भला कैसे स्वीकार किया जा सकता है।
  • इस सन्धि में न तो विश्वव्यापी परमाणु निःशस्त्रीकरण का उद्देश्य दिखाई देता है और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों का संरक्षण,तो ऐसी स्थिति में भारत अपने को किसी के आधीन क्यों करना चाहेगा।हमारे पड़ोसी देश चीन व पाकिस्तान खुलेरूप में और चोरी-छिपे अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को निरन्तर संचालित कर रहे हैं।चीन तो स्पष्ट घोषणा कर चुका है,कि वह शीघ्र ही एक और परमाणु परीक्षण करेगा व पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का पर्दाफाश हो ही चुका है।अतः ऐसी स्थिति पर भारत से इस सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए आशा करना अमरीका की नादानी अथवा कूटनीतिक चाल ही है।
  • अमरीका भारत पर एक लम्बी अवधि से परमाणु अप्रसार सन्धि (एन.पी.टी.) पर अनेक दबाव डालता रहा और प्रतिबन्ध की धमकियाँ भी देता रहा है।वास्तविकता तो यह है,कि इस सन्धि की बहस में अमरीका अपने इरादे के अनुसार चुपके से प्रक्षेपास्त्र एवं परमाणु कार्यक्रमों को भी समाहित करना चाहता था।यद्यपि स्वदेश निर्मित एवं विकसित प्रक्षेपास्त्रों (मिसाइल्स) से परमाणु अप्रसार सन्धि का उल्लंघन नहीं होता,इसके बावजूद भी अमरीका ने ‘अग्नि’ व ‘पृथ्वी’ प्रक्षेपास्त्रों के परीक्षणों पर आपत्ति जाहिर की थी और इन पर अंकुश लगाने के लिए अनेक सामरिक चालें चलीं।दूसरी ओर चीन एवं फ्रांस के परमाणु परीक्षण के नाम पर चुप्पी मार कर अमरीका का बैठना दो मुँही चाल का ही एक प्रमाण है।
  • चीन के द्वारा पाकिस्तान को परमाणु बमों के प्रयोग की क्षमतायुक्त एम. 11 प्रक्षेपास्त्रों का सरेआम अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को ताक में रखकर निर्यात करना भी अमरीका ने अनदेखा किया।इसके साथ ही पाकिस्तान के परमाणु बम बनाने की पुष्टि हो जाने के बावजूद उसको आर्थिक एवं सैनिक सहायता प्रदान करना अमरीका के दोहरे मापदण्ड का ही एक स्पष्ट प्रमाण है।जब भारत ‘पृथ्वी’ प्रक्षेपास्त्र की सीमा पर तैनाती की बात करता है,तो अमरीका की नींद हराम हो जाती है और पाकिस्तान अपनी सुरक्षा को लेकर सैनिक सहायता के लिए गुहार करने लगता है।अमरीका का इरादा सभी जान गए हैं,कि वह इस सन्धि के माध्यम से परमाणु हथियार बनाने की भारत की क्षमता पर अघोषित पाबन्दी लगाना चाहता है।

3.सीटीबीटी पर हस्ताक्षर न करने के लिए भारत का स्पष्टीकरण (India’s explanation for not signing the CTBT):

  • भारत ने जेनेवा सम्मेलन में भाग लेते हुए अपनी राय देते हुए कहा,कि परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि का जो अन्तिम दस्तावेज तैयार किया गया,उसमें परमाणु परीक्षणों के व्यापक प्रतिबन्ध की कोई बात नहीं है,वह तो मात्र परमाणु हथियारों के विस्फोट के प्रतिबन्ध की सन्धि है।परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों ने निशस्त्रीकरण के गम्भीर प्रयासों को साफ नकार दिया है।ढीले-ढाले प्रतिबन्धों का प्रयोग परमाणु सम्पन्न देश अपने स्वार्थ और गैर परमाणु सम्पन्न देशों के विरोध में करते हैं।आज भी परमाणु हथियार सम्पन्न राष्ट्र अपने जखीरों को शान्ति और सुरक्षा की गारंटी मानने पर अड़े हुए हैं।
  • इस सन्धि का जो प्रारूप तैयार किया गया,वह परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की तकनीकी प्राथमिकताओं को अधिक बढ़ावा देता है।परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों को पहले यह वचन देना जरूरी है,कि अपने परमाणु हथियारों के भंडार नष्ट कर देंगे।यदि इन देशों द्वारा ऐसा सुनिश्चित किया जाता है,तो भारत इस सन्धि में शामिल होने के लिए तैयार हो सकता है।भारत उस प्रावधान को भी स्वीकार नहीं करता,जिसके तहत सन्धि के प्रभावी होने से पूर्व पाँच परमाणु सम्पन्न देश अमरीका,फ्रांस,ब्रिटेन,रूस व चीन के साथ-साथ भारत-पाकिस्तान तथा इजरायल को सन्धि का अनुमोदन करना आवश्यक है।
  • भारत का मानना है,कि परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाने के लक्ष्य से वह पूरी तरह सहमत है,किन्तु इसे परमाणु हथियारों को समाप्त करने की प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए।यह तभी हो सकता है,जबकि परमाणु सम्पन्न राष्ट्र यह स्वीकार करें,कि एक निश्चित अवधि के भीतर वे अपने परमाणु भण्डारों को नष्ट कर देंगे।अगर ऐसा नहीं हुआ तो,यह माना जाएगा,कि परमाणु शक्ति सम्पन्न देश केवल परमाणु हथियारों पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं और दूसरे देशों की भावी प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना चाहते हैं।यह बात अमरीका को हजम ही नहीं हुई,बल्कि चुभने लगी,क्योंकि वास्तविकता भी यही है।अमरीका इस बात के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है,कि वह आगामी कुछ वर्षों के भीतर ही अपने परमाणु हथियार नष्ट कर देगा।

Also Available in English:Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty

4.सीटीबीटी पर भारत की आशंकाएँ (India’s Apprehensions on CTBT):

  • अमरीकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा,कि राष्ट्र की शान्ति एवं सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार रखना अमरीका के लिए आवश्यक है।यदि अमरीका ही परमाणु हथियारों को अपनी शान्ति व सुरक्षा का प्रतीक मानता है,तो कौनसा देश परमाणु हथियारों के पीछे रहना चाहेगा।अमरीका इस बात के लिए भी तैयार नहीं है,कि परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबन्ध लगने के पश्चात् किसी प्रकार के परीक्षण नहीं होंगे।अपने परमाणु हथियारों को प्रभावशाली एवं अधिक कारगर बनाने के लिए परीक्षण करते रहना चाहता है।किन्तु यह परीक्षण तकनीकी रूप से इतने उन्नत होंगे कि जिससे परमाणु प्रदूषण नहीं फैलेगा।
  • अमरीका इस सन्धि के माध्यम से परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में पहुँचने वाले देशों को रोकना चाहता है।मामला केवल परीक्षण प्रतिबन्ध तक सीमित नहीं है। मुद्दा यह भी नहीं है,कि परमाणु हथियारों को नष्ट कर दिया जाए और विश्व को विनाशक एवं संहारक हथियारों के प्रहार से बचाया जा सके।इसके पीछे अमरीका का असली इरादा यह है,कि जिन देशों ने परमाणु हथियार बना लिए हैं और हथियारों का भण्डार तैयार कर लिया है वे अगर चाहें तो तकनीकी रूप से उन्नत श्रेणी के प्रयोग कर सकते हैं,लेकिन जिन देशों ने अभी तक परमाणु हथियार नहीं बनाए हैं और जिन राष्ट्रो में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता है,वे किसी प्रकार का भी परीक्षण न करें।इस प्रकार का समझौता किसी भी रूप में भारत को मान्य नहीं होगा,क्योंकि हमारे लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है।
  • अमरीका लगातार भारत पर समग्र परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि को मानने के लिए निरन्तर दबाव डालता रहा है,पर भारत के लिए यह सन्धि स्वीकार कर लेना अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करना जैसा होगा।पाकिस्तान ऐसा पहले ही कह चुका है,कि वह इस सन्धि को मान लेगा,अगर भारत पहले मान लेता है तो,लेकिन पाक तो चीन से पूर्णतः परीक्षण किए हुए परमाणु हथियार खरीद रहा है।ऐसे में उसको अपने यहाँ परमाणु परीक्षण की क्या आवश्यकता है?
  • जेनेवा में 61 देशों के निशस्त्रीकरण सम्मेलन में पाकिस्तान ने कहा,कि वह व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि पर भारत के रवैये को लेकर बहुत परेशान है।साथ ही उसने पाँच परमाणु सम्पन्न देशों पर आरोप लगाया,कि उन्होंने इस निशस्त्रीकरण सम्मेलन में बाकी देशों को तमाशबीन समझ रखा है।पाकिस्तान भारत की इस दलील से सहमत है,कि सन्धि में कम घातक परीक्षणों समेत सभी परीक्षणों पर पाबन्दी होनी चाहिए,
    परमाणु हथियार समयबद्ध ढंग से समाप्त करने के सैद्धान्तिक वक्तव्यों को सन्धि से जोड़ने सहित इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार होना चाहिए।

5.सीटीबीटी के विवादास्पद पहलू और नियम (Controversial Aspects and Rules of CTBT):

  • इस सन्धि के सन्दर्भ में विदेश मंत्री श्री इन्द्र कुमार गुजराल ने सभी देशों के विदेश मंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट रूप से बताया कि भारत इस सन्धि पर हस्ताक्षर नहीं करेगा,क्योंकि “यह वार्ता एक छलावा (फरेब) है,परीक्षण प्रतिबन्ध का दिखावा करने वालों की ईमानदारी सन्देहास्पद है।इसमें कुल मिलाकर परमाणु शक्तियों को अपने हथियार रखने,उन्हें परिष्कृत करने की भी छूट मिलेगी,जबकि बाकी दूसरों को उन्हें विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
  • इस सन्धि के आरम्भ में फ्रान्स एवं चीन ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि का विरोध किया,क्योंकि इन्हें आशंका थी,कि अमरीका परमाणु हथियारों की होड़ में अपनी बढ़त बरकरार रखना चाहेगा।विशेष रूप से चीन इस कारण से परेशान था,क्योंकि पाँच परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों में से सबसे कम परीक्षण उसी ने किए हैं और परमाणु हथियार तकनीकी में वह दूसरों से अभी काफी पीछे है।अतः सन्धि की परिधि में शान्तिपूर्ण परमाणु विस्फोट वाला मुद्दा निकालने पर जोर देने के अलावा चीन ने फ्रान्स की तरह सन्धि में वार्ता के दौरान परमाणु परीक्षण किया। अमरीका जून 1996 के आरम्भ में फ्रान्स से एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाकर उसे और परीक्षण करने से रोकने में अवश्य सफल हो गया है।
  • इस सन्धि का दूसरा विवादास्पद पहलू-वे नियम हैं,जिनका इस्तेमाल इस सन्देह की पुष्टि के लिए किया जाएगा,कि अमुक देश सन्धि का उल्लंघन कर रहा है।अमरीका ऐसी पुष्टि के लिए सख्त अतिक्रमणवादी तरीके पर जोर दे रहा है और इसे लागू करने के लिए सदस्यों का मामूली बहुमत चाहता है।चीन,भारत और पाकिस्तान इसका विरोध कर रहे हैं,क्योंकि दुश्मन देश उनकी मौजूदा क्षमताओं का आकलन करने के लिए इसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।वे इस बात पर जोर दे रहे हैं,कि अतिक्रमणवादी जाँच के लिए व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि परिषद् में सर्वसम्मति या दो तिहाई बहुमत की मंजूरी जरूरी बना दी जाए।
  • भारत ने निरस्त्रीकरण पर परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों के पक्षपातपूर्ण रुख के कारण व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि पर हस्ताक्षर न करने के लिए स्पष्ट कहा कि “एक और दोषपूर्ण सन्धि के जरिए हथियारों के विकास और परिष्करण करने के अधिकार को वैधता प्रदान करने दी जा रही है।ऐसी सन्धि में भारत की सहमति की उम्मीद न की जाए।इस सन्धि के प्रमुख प्रस्ताव में भारत ही मुख्य रूप से चर्चा का विषय रहा,किन्तु भेदभावपूर्ण नीति का खुलासा होने पर परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों में चीन व परमाणु शक्ति बनने की दहलीज में खड़े देश भारत के अलावा पाकिस्तान तथा इजरायल ने भी बेरुखी दिखाई।
    भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि का दो वर्ष पूर्व बड़े गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था,किन्तु परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों में विशेषकर अमरीका की सामरिक कूटनीति का अनुमान लगाते हुए भेदभाव से भरी इस सन्धि के प्रति अपना सख्त रवैया अपनाना हमारी मजबूरी बन गई।भारत ने स्पष्ट रूप से इस सन्धि में हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित है:

6.सीटीबीटी पर भारत के हस्ताक्षर न करने के कारण (Reasons for India not signing the CTBT):

  • (1.) भारत को आशंका है,कि परमाणु शक्तियाँ उसकी परमाणु हथियार क्षमता को रोकने के लिए इस सन्धि पर जोर दे रही हैं।
  • (2.) फ्रान्स तथा चीन के द्वारा परमाणु परीक्षण जारी रखने का निर्णय इस बात का प्रमाण है,कि परमाणु सम्पन्न राष्ट्र निरस्त्रीकरण के सन्दर्भ में स्वयं गम्भीर नहीं है।
  • (3.)परमाणु परीक्षण स्थगन का स्वयं पालन करने वाले भारत को इस सन्धि पर हस्ताक्षर करने का कोई लाभ नजर नहीं आता।
  • (4.) परमाणु हथियारों को समयबद्ध कार्यक्रम के अन्तर्गत पूर्ण समाप्त करने की भारत की माँग को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों ने ठुकरा दिया।
  • (5.) भारत ने इस सन्धि के साथ यह जोड़े जाने पर बल दिया,कि परमाणु आयुध सम्पन्न देश कितने वर्षों में पूरी तरह परमाणु हथियारों का परित्याग करेंगे इस पर सभी सम्पन्न राष्ट्र शान्त रहे और इसे सन्धि से असम्बद्ध सिद्ध करने की कोशिश कर अमरीका के इशारे पर सम्पूर्ण प्रावधान तैयार किए गए,जो विकासशील देशों के अनुकूल नहीं हैं।
  • भारत ने स्पष्ट कहा,कि भारत अपनी परमाणु क्षमता पर किसी प्रकार का अंकुश स्वीकार नहीं करेगा और वह अपने विकल्प खुले रखेगा।परमाणु हथियारों के विकास के लिए कई बार परीक्षण जरूरी होता है।ऐसा हथियारों को भरोसेमंद बनाने हेतु ही नहीं किया जाता है,बल्कि इससे उन्हें प्रक्षेपास्त्र जैसे परिष्कृत प्रक्षेपण उपकरण पर रखने योग्य भी बनाया जाता है।नए परमाणु देशों में भारत ने 1974 में ही केवल एक परीक्षण किया था।विशेषज्ञ भारत की परमाणु हथियार क्षमता को प्रामाणिक बनाने के लिए एक परीक्षण को  अपर्याप्त मानते हैं।
  • भारत-पाक सम्बन्धों में यह सन्धि सन्देह एवं बदले की भावना को बढ़ाने में असरदार रही,क्योंकि भारत की आड़ में पाक भी इस सन्धि से मुकर जाता है और स्वयं चीन से परमाणु बम एवं प्रक्षेपास्त्र प्राप्त करके वैसे ही इस सन्धि का मजाक बना रहा है।इसके अलावा अमरीका भी नहीं चाहता,कि उसका वर्षों पुराना पिट्दू पाकिस्तान उससे अलग हो,जिससे दक्षिण एशिया में उसकी दादागीरी न चल सके।दूसरे चीन पर प्रतिबन्ध लागू करके वह अपना मुख्य व्यापारिक केन्द्र भी नहीं खोना चाहता है।इसके साथ ही चीन एवं पाक के मध्य जो सैन्य सहयोग पनप रहा है,वह भी भारत को इस सन्धि पर हस्ताक्षर करने पर रोकने को मजबूर कर रहा है।
  • भारत का इस सन्धि के सन्दर्भ में उद्देश्य बड़ा स्पष्ट है,कि जब परमाणु हथियारों से लैस अमरीका आदि देश अपने आयुधों का अन्त करने के लिए तैयार नहीं है,तो वे किस आधार पर विकासशील देशों के शान्तिपूर्ण परमाणु कार्यक्रमों पर रोक लगाना चाहते हैं।भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हितों के साथ कोई भी प्रतिकूल समझौता न करने का संकल्प किया है।यही कारण है,कि 22 जुलाई,1996 को सम्पन्न हुई जकार्ता में परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने सम्बन्धी वार्ता व्यापक परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (सी. टी. बी. टी.) पर हस्ताक्षर करने के जापान के आग्रह को भी ठुकरा दिया है।
  • 29 जुलाई को जेनेवा में आरम्भ हुए निरस्त्रीकरण सम्मेलन (CD) में 20 अगस्त,1996 को भारत ने औपचारिक रूप से सी. टी. बी. टी. के वर्तमान प्रारूप को अस्वीकार कर दिया।इसके साथ ही सन्धि के इस प्रारूप को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितम्बर में अनुमोदन के लिए भेजे जाने को भी वीटो कर दिया।भारत द्वारा इस प्रकार सन्धि के वर्तमान प्रारूप को औपचारिक रूप से वीटो कर देने के पश्चात अगले दिन यह निरस्त्रीकरण सम्मेलन स्थगित हो गया।भारत के इस निर्णय से सन्धि के लिए 44 परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों का सर्वसम्मत समर्थन भंग हो गया जो कि सन्धि को वैधानिक स्वीकृति दिलाने के लिए आवश्यक है।
  • भारत के इस प्रकार वीटो करने का अर्थ यह नहीं है कि वह परमाणु परीक्षण प्रारम्भ कर देगा।भारत का विचार है कि वह परमाणु शक्ति का प्रयोग शान्ति कार्यों के लिए करता रहेगा तथा परमाणु हथियार बनाने का विकल्प खुला रखेगा जब तक कि पाँच मान्यता प्राप्त परमाणु हथियार सम्पन्न राष्ट्र एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत परमाणु हथियारों को समाप्त करने पर सहमत नहीं होते।अतः इस सी. टी. बी. टी. के प्रारूप में इस प्रकार का परिवर्तन किया जाना चाहिए जिससे यह पक्षपातपूर्ण न रहे।

7.सीटीबीटी और भारत: प्रमुख इतिहास,रुख और प्रभाव का सारांश (Summary of CTBT and India: Key History,Stance & Impact):

  • (A)महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts):
    परमाणु परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए भारत ने 1954 में पहल की।
  • भारत ने 1963 में खुले में परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगाने से सम्बन्धित पार्शियल टेस्ट बेन ट्रीटी (PTBT) पर हस्ताक्षर किए।
    भारत ने मई 1974 में अपना प्रथम एवं एकमात्र परमाणु परीक्षण किया और अपना परमाणु विकल्प खुला रखा।
    जनवरी 1994 में भारत तथा अमरीका की पहल पर जिनेवा में परमाणु परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए कॉन्फ्रेंस ऑन डिसआर्मामेन्ट (CD) प्रारम्भ हुई।
    मई 1995 में एन.पी.टी. (NPT) का स्थायीकरण तथा अनिश्चित काल के लिए विस्तार किया गया।भारत ने इसकी अप्रभावी भूमिका को देखते हुए समग्र विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम के साथ व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि (CTBT) पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमति व्यक्त की।
  • पाँच परमाणु हथियार शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों-अमरीका,ब्रिटेन,फ्रांस,चीन तथा रूस के अतिरिक्त भारत,पाकिस्तान तथा इजरायल परमाणु हथियार बनाने की क्षमता रखने वाले राष्ट्र (Threshold Countries) हैं।
  • जिनेवा में 61 राष्ट्रों ने.सी.टी.बी.टी. पर वैधानिक तथा राजनीतिक रूप से विचार किया।भारत के विरोधी रुख से यह वार्ता सफल नहीं हुई।
  • (B)सीटीबीटी से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से चिन्तनीय प्रश्न (Concerning Questions for Students Related to CTBT):
    (1.) क्या भारत को सीटीबीटी पर हस्तासर करने चाहिए? हाँ/नहीं तो क्यों? (Should India sign the CTBT? Yes/not, why?
    (2.) क्या सीटीबीटी नीति भेदभाव पूर्ण है ? यदि हाँ तो कैसे? (Is the CTBT policy discriminatory? If yes,how?)
    (3.)क्या सीटीबीटी नीति में सुधार करने की आवश्यकता है?यदि हाँ तो क्या? (Is the CТВТ policy needed to be improved? If yes, what?)
  • (5.)क्या सीटीबीटी पर भारत के हस्ताक्षर किए बिना सुरक्षा परिषद की सदस्यता नहीं दी जा सकती है?(Can’t membership of the Security Council be granted without India’s signature on the CTBT?)
    (6.)क्या सीटीबीटी के विपक्ष में आप तर्क दे सकते हैं? (Can you argue against CTBT?)
    (7.)सीटीबीटी की कौनसी शर्त भारत के हित में नहीं है? (Which condition of CTBT is not in the Interest of India?)
    (8.)क्या सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने से भारत को कोई बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है? हाँ/नहीं तो किस तरह? (Can signing the CTBT cause any major harm to India? Yes/if not how?)
  • (9.)भारत सीटीबीटी पर हस्ताक्षर न करने के लिए दृढ़ क्यों है? (Why is India determined not to sign the CTBT?)
  • (C)सीटीबीटी और भारत से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण क्रिटिकल बिन्दु (Important Critical Points related to CTBT and India):
    (1.) सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने के लिए विकसित देशों का दबाव (Pressure from developed countries to sign CTBT)
    (2.) सीटीबीटी पर हस्ताक्षर न करने के लिए भारत का स्पष्टीकरण (India’s explanation for not signing the CTBT)
    (3.) सीटीबीटी पर भारत की आशंकाएँ (India’s Apprehensions on CTBT)
    (4.) सीटीबीटी के विवादास्पद पहलू और नियम (Controversial Aspects and Rules of CTBT)
    (5.) सीटीबीटी पर भारत के हस्ताक्षर न करने के कारण (Reasons for India not signing the CTBT)
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सीटीबीटी और भारत: प्रमुख इतिहास,रुख और प्रभाव (CTBT and India: Key History,Stance & Impact) के बारे में विस्तार और गहराई से जानकारी दी गई है।
  • ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
    * 👥 **मित्रों के साथ शेयर करें:** ज्ञान बांटने से बढ़ता है,इसलिए इसे अपने दोस्तों के साथ ज़रूर साझा करें।
    * 🔔 **वेबसाइट को फॉलो करें:** अगर आप यहाँ पहली बार आए हैं, तो हमारे **ईमेल सब्सक्रिप्शन** को फॉलो करें।साथ ही, **Push Notification (घंटी के आइकॉन) को भी अलाउ (Allow) करें** ताकि हर नए ज़रूरी आर्टिकल और टेस्ट सीरीज़ का नोटिस आपके मोबाइल पर तुरंत मिल जाए!
    * 💬 **अपने सुझाव दें:** यदि आपकी कोई समस्या है या कोई सुझाव देना चाहते हैं,तो नीचे **कमेंट** करके हमें ज़रूर बताएं।
    **पूरा आर्टिकल पढ़ने के लिए आपका स्वागत है!** 🙏

Also Available in Hindi:Claims India to UN Security Council

8.भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता में चीन का अडंगा (हास्य-व्यंग्य) (China’s obstruction to India’s membership of the Security Council) (humor-satire):

  • सुरक्षा परिषद की बैठक चल रही थी।भारत ने सुरक्षा परिषद सदस्य बनने के लिए एप्लाई किया था।अमेरिका भी थोड़ा नानुकुर के बाद सहमत हो गया था।
  • चीनः भारत जब तक सीटीबीटी पर हस्ताक्षर नहीं करता तब तक सदस्यता पर विचार नहीं किया जा सकता।
  • रूसः भारत सीटीबीटी पर हस्ताक्षर नहीं करता तो हम क्या बिगाड लेंगे।अब भारत 1962 वाला भारत नहीं है।
  • फ्रांस (चीन से): हमें समझ में नहीं आता कि भारत का नाम आते ही आप बिदकते क्यों हो।आपके दिल में फफोले क्यों पड़ जाते हैं?मुँह बिल्कुल इस तरह सूज जाता है,जैसे किसी ने तुम्हारे गाल पर तमाचा मारा है।
  • अमेरिका (व्यंग्यपूर्वक) :चीन की तो आदत ही है।यह बड़े-से-बड़े देश यहाँ तक हमारे भी अँगुली करता रहता है।जब तक यह अँगुली नहीं करता तब इसको चैन नहीं मिलता है।
  • चीन: भारत को सदस्यता देते हो तो पाकिस्तान को भी सदस्यता दें।
  • ब्रिटेन: (व्यंग्यपूर्वक): तुम जानते भी हो,पाकिस्तान आतंकवादियों की मंडी है।बिगडैल साँड है।यदि उसे सदस्यता दे देंगे हो हमारा ही नहीं तुम्हारा जीना भी हराम कर देगा।फिर पावर आने के बाद उस बिगडैल साँड को काबू करना मुश्किल होगा।
  • रूस,फ्रांस,ब्रिटेन,अमेरिका चारों एक साथ (चीन से): तुम्हें पता है भारत बिना सदस्यता के ही सुपर पावर है।तुम्हारी नाक में नकेल वो ही डालता है और आगे भी वही डालेगा।भारत कोई न कोई रास्ता निकाल लेगा।तुम्हारी वजह से ही हमारी फजीहत होती है।पूरा विश्व हमारी तरफ देखता है।हमारे कारनामों की वजह से UNO अप्रासंगिक हो गया है।

9.सीटीबीटी और भारत: प्रमुख इतिहास,रुख और प्रभाव (Frequently Asked Questions Related to CTBT and India: Key History,Stance & Impact) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.सीटीबीटी की फुलफार्म क्या है? (What is the full form of CTBT?):

उत्तर:सीटीबीटी व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि अर्थात् (Comprehensive Nuclear Test Ban Treaty) का संक्षिप्त रूप है।

प्रश्न:2.सीटीबीटी के लागू होने की क्या सम्भावना है? (What is the possibility of CTBT being implemented?):

उत्तर:सीटीबीटी के लागू होने की बहुत कम सम्भावना है क्योंकि पाँचों विकसित परमाणु सम्पन्न देश अपनी महत्त्वाकांक्षा छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

प्रश्न:3.भारत सीटीबीटी का दबाव सहन करने में कितना सक्षम है? (How much is India able to withstand the pressure of the CTBT?):

उत्तर:जब भारत दबाव सहन करने में सक्षम नहीं था तब भी भारत नहीं झुका तो अब तो भारत हर तरह से सक्षम है अतः अब तो झुकने का सवाल ही नहीं है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सीटीबीटी और भारत: प्रमुख इतिहास,रुख और प्रभाव (CTBT and India: Key History,Stance & Impact) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *