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Contribution of Women to Society: Role of Women in Indian Society

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4 8.समाज में नारी का योगदानः भारतीय समाज में नारी की भूमिका (Frequently Asked Questions Related to Contribution of Women to Society: Role of Women in Indian Society) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

1.समाज में नारी का योगदानः भारतीय समाज में नारी की भूमिका (Contribution of Women to Society: Role of Women in Indian Society):

  • समाज में नारी का योगदान (Contribution of Women to Society) बढ़ता जा रहा है जो कि हमारे लिए एक शुभ संकेत है।किस तरह नारी विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही है? आइए जानते हैं इसके बारे में।

Also Available in Hindi:Modern Society:7 Spells to Understand Role of Women

2.प्राचीन काल में नारी का गौरवास्पद स्थान (The Proud Place of Women in Ancient Times):

  • नारी वह पत्थर नहीं, जिसे ठोकर मारी जाए,नारी वह मदिरा नहीं,जिसका पान किया जाए,नारी वह पुष्प नहीं,जिसको मर्दित कर फेंक दिया जाए,नारी वह पर्वत नहीं,जिसको लाँघा जाए।नारी वह दीवार नहीं,जिसको तोड़ा जाए (Women are not the walls that can be broken),नारी वह गन्ध नहीं,जिसे सूंघा जाए,अपितु नारी वह शक्ति है,जिसकी पूजा की जानी चाहिए।प्राचीनकाल में इसी बात को स्वीकार करते हुए मनु ने अपने ग्रन्थ मनुस्मृति में कहा था:
    “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवताः”
  • जहाँ नारी की पूजा होती है (Where women are worshipped),वहीं देवता निवास करते हैं।कितनी महानता है उस नारी की,जिसकी आराधना मात्र से अलौकिक सत्ताओं का वास होता है।यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें,तो अतीत नारी की दृष्टि से मुस्कराता हुआ नजर आता है।सिन्धु घाटी की सभ्यता से लेकर आज तक बदलते हुए परिवेश में नारी की सामाजिक स्थिति भी परिवर्तित होती रही है,किन्तु अधिकांशतः नारी की स्थिति संतोषजनक ही पाई जाती है।
    अतीत की सभ्यता सिन्धु घाटी का मातृप्रधान होना नारी के प्राचीन गौरव को सिद्ध करता है।उस काल की नारियाँ किंचितमात्र भी पुरुष से पीछे नहीं,अपितु पुरुष के लिए अनुकरणीय थीं।वैदिक काल की अपाला,घोषा,विश्ववारा,माण्डवी आदि को चमकता हुआ नक्षत्र कहा जाए,तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।ये नारियाँ साहित्य,व्याकरण,वेद आदि की प्रतीक समझी जाती थीं।उपनिषद् काल भी नारियों की महिमा से मण्डित (The Upanishad period was also adorned with the glory of women) ही था।गार्गी,मैत्रेयी आदि उगते हुए सूर्य की तरह शान्त,किन्तु दोपहर के सूर्य की तरह पूर्णता लिए हुए थी।रामायण और महाभारत काल में स्त्रियों की दशा में कुछ ह्रास हुआ,किन्तु फिर भी सीता,द्रौपदी जैसी नारियाँ अधर्म और पाप की समाप्ति का निमित्त बनीं,जिससे यह कहा जा सकता है कि यह काल भी नारी के गौरव से सुशोभित था।
  • मुसलमानों के काल (लगभग 11 वीं शताब्दी से 17 वीं शताब्दी तक) को नारी की दृष्टि से पतन का काल कहना कोई बुरी बात नहीं है।इस काल में नारी को भोग-विलास की सामग्री ही माना जाता था।इस काल में नारी विलासी मुस्लिम सुल्तानों या सम्राटों की बाँहों का खिलौना बनकर ही रह गई थी।समाज में उसे ऊँचा स्थान प्राप्त न था,उसे मजबूरन एक चहार-दीवारी की सीमा में परकटे कबूतर की भाँति ही विहार करना होता था,अपने घर की ड्‌योढ़ी को वह लाँघ भी नहीं सकती थी।इस काल में निश्चित रूप से नारी को आघात और प्रत्याघात सहने पड़े थे।इतना सब होते हुए भी रानी कर्णवती,नूरजहाँ,मीराबाई,चाँदबीबी,जहाँआरा,रोशनआरा,रजिया,रानी पदिमनी आदि स्त्रियाँ राजनीतिज्ञ,कूटनीतिज्ञ एवं साम्राज्ञी बनकर इस काल की पतित नारियों की स्थिति के विरोध में बहुत (In opposition to the status of fallen women) कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं।

3.आधुनिक काल में नारी का विभिन्न क्षेत्रों में योगदान (Contribution of women in various fields in modern times):

  • आधुनिक काल नारी के अनेक रूपों को ग्रहण किए हुए है।इस काल में नारियाँ जहाँ एक तरफ भोग-विलास की वस्तु,सन्तानोत्पत्ति का साधन,जनता जनार्दन के मनोरंजन का साधन,पूँजीपतियों,जमींदारों की अपनी झोली भरने का निमित्त तथा विज्ञापनों,फिल्मों आदि में अर्थ के लिए मजबूरन नंगे रूप को प्रदर्शित करती हैं,वहीं दूसरी तरफ प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ (Female Famous Politician),समाज-वादी,अर्थशास्त्री,धर्ममनीषी और समाजसेवी बनकर लोगों को दिशा-निर्देश देती हैं।यदि गुप्त जैसे लोगों के हाथों में पड़कर वह अबला मात्र रह गई,तो वहीं बहुत से कवियों के हाथों पड़कर वह श्रद्धा का प्रतीक भी बन गई।
    जहाँ गुप्तजी कहते हैं:”अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”
  • गुप्तजी की नारी पर कटाक्ष करते हुए सत्य के प्रतीक (Symbols of Truth),अहिंसा के पुजारी,मानवता के उद्धारक गाँधी का कहना है कि:”नारी को अबला कहना,उसका अपमान करना है।हाँ,यदि बल का तात्पर्य पशु बल से है,तो नारी निश्चित रूप से अबला है,क्योंकि उसमें पूर्णतया पशु बल का अभाव है।दीनहीन भाव के कारण नारी को अबला नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह इस क्षेत्र में भी पुरुष से किसी न किसी रूप में कम नहीं है.”
    बदलते हुए समाज में बदलते हुए नारी के रूप का अवलोकन करने के पश्चात् अब समाज में नारी की देन पर विचार करेंगे।देन शब्द काफी व्यापक है।यह शब्द अपने अन्तर्गत सामाजिक,राजनैतिक,आर्थिक,धार्मिक,सांस्कृतिक आदि दशाओं को समेटे हुए है।देन का अर्थ अधिकांशतः सृजनात्मक तथा महत्वपूर्ण उपलब्धियों से माना जाता है।इसी सन्दर्भ में यदि आज की नारियों पर दृष्टिपात करें,तो कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं,जहाँ उनकी ये दो बाँहें,दो चक्षु,दो पैर न पहुँचे हों।यदि उन्होंने समाज के भ्रष्टाचार (Corruption of society),कदाचार,अनाचार तथा दुराचार को अपनी सेवा के गुण से दूर किया है,तो राजनेता के रूप में देश,प्रान्त या समाज की शासिका बनकर अपनी श्रेष्ठता भी प्रदर्शित की है।
  • यदि शिक्षा में व्याप्त बुराइयों के निवारण का प्रयत्न किया है तो अर्थ के क्षेत्र में मुद्रास्फीति को नियन्त्रित करने के अनेक उपाय भी बताए हैं।आज कोई भी कोना उनके क्रियाकलापों से अछूता नहीं रहा है।प्रत्येक क्षेत्र में ऐसी-ऐसी नारियाँ हुई हैं,जिनके योगदानों को समाज कभी भुला नहीं सकता।
    राजनीति के क्षेत्र में इन्दिरा गाँधी,सुचेता कृपलानी,श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित,राजेन्द्रकुमारी बाजपेयी,मोहसिना किदवई के योगदानों को क्या कभी समाज या राष्ट्र भुला सकता है? क्या इन्दिरा गाँधी किसी पुरुष नेता से कम थीं? भारत देश को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लाने एवं बंगाली मुसलमानों पर पाकिस्तानियों के अत्याचार से स्वयं द्रवित होकर बांग्लादेश की निर्माणकर्त्री के रूप में वे सदैव याद की जाएँगी।
  • कभी राजेन्द्रकुमारी बाजपेयी और मोहसिना किदवई अपने-अपने विभाग की देख-रेख में किसी पुरुष मन्त्री से कहीं भी न्यून नहीं दिखलाई पड़तीं थीं।
    धर्म के क्षेत्र में प्रविष्ट होकर (Entering the field of religion) नारियों ने पुरुष से कहीं अधिक समाज को प्रभावित किया है,इसका साक्षात् उदाहरण तेरापंथ धर्म की साध्वियाँ हैं।सामाजिक सेवा के क्षेत्र में मदर टेरेसा (Mother Teresa in the field of social service) और अल्वामिर्डल का तो कोई जवाब ही नहीं।मदर टेरेसा को भारत रत्न,विश्व का सर्वश्रेष्ठ नोबल पुरस्कार (शान्ति का) की प्राप्ति उनकी महत्ता को स्पष्ट कर देता है।सांस्कृतिक क्षेत्र में तो नारियों के समकक्ष पहुँचना तो दूर,उनके आसपास पहुँचना भी असम्भव मालूम पड़ता है।नृत्य के क्षेत्र में यामिनीकृष्ण मूर्ति तथा झावेरी बहनों का कोई विकल्प ही नहीं था।नृत्य के प्रत्येक अंग भरतनाट्यम,कत्थक,मणिपुरी,ओडिसी आदि उनकी उपस्थिति मात्र से नृत्य नाम को सार्थक कर रहे हैं।
  • अभिनय के क्षेत्र में सुरैया,नरगिसदत्त,मधुबाला,हेमामालिनी,स्वप्नसुन्दरी,वैजयन्तीमाला,रेखा,राखी आदि ने भी ऊँचाइयाँ छूकर अपनी पहचान बनाई है।कुछ नारियों ने तो अनेक क्षेत्रों उपस्थिति मात्र से ही गौरवान्वित किया है।नरगिसदत्त जहाँ अभिनय के क्षेत्र में थीं,वहीं अल्पकाल की राजनीति में पर्याप्त प्रभावी थीं।जयललिता जहाँ (Politician Jayalalithaa) दक्षिण की अभिनेत्रियों में सर्वप्रमुख समझी जाती थी,तमिलनाडु की राजनीति का मुख्य मोहरा सिद्ध हो रही हैं और मुख्यमन्त्री बनकर इतिहास रच दिया है।

4.नारी और पुरुष एक-दूसरे के पूरक (Men and women complement each other):

  • इन क्षेत्रों के अतिरिक्त समाज का जो एक दूसरा अंग है,यानी पुरुष,उसको बनाने में भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वही जिम्मेदार है।शंकर को आचार्य तक पहुँचाने का श्रेय उनकी माँ आर्याम्बिका को था।शिवाजी को एक हिन्दू सम्राट रूप में प्रसिद्धि दिलाने में उनकी माँ जीजाबाई को था।विवेकानन्द का विवेक एक स्त्री के कारण ही जागा था।सम्प्रति तेरापंथ धर्मसंघ को विश्वव्यापी ख्याति दिलाने वाले,युगप्रधान,भारतज्योति,विश्वविभा तुलसी के विकास का मूल माँ (नारी) द्वारा प्रदत्त संस्कार ही हैं।
  • राजा राममोहनराय को कुछ कट्टर धर्मपन्थियों (Radical Religious Leaders) के हाथों से मुक्त कराने का कार्य स्त्रियों ने ही किया था अन्यथा भारतीय समाज उनके महत्त्वपूर्ण योगदान से वंचित रह जाता।महात्मा गाँधी के निर्माण का श्रेय उनकी माँ पुतलीबाई और बाद में पत्नी कस्तूरबा को ही जाता है।
    इतना सब होते हुए भी आज की नारी कुछ लोगों के हाथों में पड़कर अपने अस्तित्त्व को समाप्त कर रही है।दहेज का दानव आए दिन उसको निगलने का प्रयास कर रहा है।बाल विवाह के द्वारा बचपन में ही सामर्थ्य से अधिक अवहनीय भार प्रदान कर उसे कुण्ठित कर दिया जाता है।विधवा के रूप में समाज में उसको हेय समझा जाता है।यहाँ तक कि प्रातःकाल और यात्रा के समय लोग उसका मुख भी नहीं देखना चाहते हैं।
  • समाज की यही बुराइयाँ आज (These are the evils of society today) की नारी का ह्रास कर रही है।दहेज प्रथा को समाप्त कर,बाल-विवाह को नियन्त्रित कर समाज में विधवा को समुचित स्थान दिलाकर तथा उनको नई पहचान देकर देखा जाए तो आज की नारियाँ वैदिक नारियों से कथमपि न्यून नहीं सिद्ध होंगी और इसका परिणाम भी महान् होगा।अन्ततः नारी की महत्ता (Ultimately, the importance of women) इस बात से भी सिद्ध होती है कि उसके बिना पुरुष को यह कहने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा’ ‘न गृहं गृहमित्याहुगृहिणी गृहमुच्यते’। और कदाचित इन्हीं अनेक कारणों से वशीभूत होकर प्रकृति के सुकुमार कवियों को कहना पड़ा:नर से भारी नारी।

5.मध्यकाल में नारी को कुचला गया (Women were crushed in the medieval period):

  • वैदिक युग की बात अलग है।कालान्तर में इस दृष्टिकोण में अन्तर आ गया।स्त्रियों का समाज में स्थान पुरुषों के बराबर नहीं रहा,निम्न हो गया।उनकी शिक्षा भी उपेक्षित हो गई।गार्गी,मैत्रेयी,घोषा,लोपामुद्रा,विश्ववारा,अपाला आदि की परम्परा टूट गई और तब मूर्खतापूर्ण “सूक्तियाँ” (या कूक्तियाँ) चल पड़ी “स्त्री और शूद्र को नहीं पढ़ाना चाहिए।” (Women and Shudras should not be taught) शंकराचार्य का लिखा एक ग्रन्थ है:प्रश्नोत्तरी।उसमें शंकराचार्य ने कई स्थानों पर नारी की भरपूर निन्दा की है।नरक का एकमात्र द्वार कौनसा है? -नारी।मदिरा की भाँति कौनसी वस्तु सम्मोहित कर देती है?-स्त्री।’ प्राणियों के लिए साँकल क्या है?-स्त्री।” विश्वास के योग्य कौन नहीं है?-नारी।’ वह कौनसा विष है जो अमृत जैसा प्रतीत होता है? -नारी।’ स्त्रियों के सम्बन्ध में गौतम बुद्ध के विचार वैदिक धारणा के अनुकूल तो नहीं थे,पर कुछ बहके हुए लोगों की तुलना में कहीं अधिक सन्तुलित थे (Gautam Buddha’s thoughts about women were balanced)।उन्होंने स्त्रियों को अध्ययन का भी अधिकार दिया और सन्यास का भी।पर बौद्ध धर्म को भारतवर्ष से निष्कासित करने वाले शंकराचार्य स्त्रियों के प्रबल विरोधी थे और इसे देश के दुर्भाग्य के सिवा क्या कहें कि धार्मिक स्तर पर उन्हें सफलता मिली जो स्त्रियों के लिए अभिशाप (A curse for women) बन गई।वैदिक परम्परा का सर्वथा लोप किसी युग में नहीं हुआ,इसके भी प्रमाण मिलते हैं।
  • जनश्रुति है कि कवि कालिदास की पत्नी विद्योत्तमा विदुषी महिला थी,उसने अनेक पण्डितों को शास्त्रार्थ में हराया।बाणभट्ट ने कादम्बरी की नायिका महाश्वेता को यज्ञोपवीत धारण करने से पवित्र शरीर वाली बताया है।’ कादम्बरी की कथा भले ही कल्पित हो पर इससे इतना पता तो चलता ही है कि 7वीं शताब्दी में उत्पन्न बाणभट्ट ब्रह्मचारिणी स्त्रियों का यज्ञोपवीत धारण करना (जो विद्याध्ययन का प्रतीक है) आवश्यक मानते थे।
  • गुप्त काल (ईसा की चौथी-पाँचवीं शती) में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार थे,उन्हें सम्पत्ति में भी अधिकार थे जो कात्यायन की व्यवस्था के अनुरूप था। स्त्रियाँ न तो परदा करती थीं,न अलग उठती-बैठती थीं। अगर उस समय परदा प्रथा होती तो चीनी यात्री ह्वेनसांग इसका उल्लेख अवश्य करता।
  • आठवीं शताब्दी के आसपास विदेशी हमलों के कारण स्त्रियों की सामाजिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित (The social status of women was badly affected) हुई।विदेशी हमलों में जिस तरह बलात्कार का शिकार होने को वे अभिशप्त हुईं (Being a victim of rape),उससे उनके मन में असुरक्षा की भावना घर कर गई,वे घर की चार दीवारी में कैद हो गईं,और आत्मनिर्भर न होकर पुरुषों पर निर्भर हो गईं। इससे उनमें अशिक्षा व्याप्त हो गई और वे पुरुषों से न केवल पिछड़ गईं,बल्कि हीन भावना से भी ग्रस्त हो गईं।
  • मुसलमानों से सम्पर्क बढ़ने पर इस देश में दो कुरीतियाँ चल पड़ी:परदा-प्रथा और बाल-विवाह।फिर तो लड़कियों की शिक्षा (Girls’ Education) पर स्वतः ही परदा पड़ गया।हाँ,सुविधा-सम्पन्न समाज के उच्चवर्ग की स्त्रियों के लिए थोड़ी-बहुत औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही होती रही।
    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में शिक्षा वैसे ही उपेक्षित रही थी,जो कुछ प्रयास भी किए गए,वे लड़कों की शिक्षा के लिए किए गए।स्त्री-शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि कम्पनी को अपने शासन-प्रबन्ध के लिए शिक्षित युवक चाहिए थे,न कि युवतियाँ।
    इस प्रकार मध्यकाल में स्त्रियों,निर्बलों और निम्न वर्ग को इतना कुचला गया जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

Also Available in English:Women in India

6. समाज में नारी का योगदान का सारांश (Summary of Contribution of Women to Society):

  • (A)भारतीय समाज में नारी के योगदान के महत्त्वपूर्ण बिन्दु (Important points on women’s contributions to Indian society):
    (1.)प्राचीन काल में नारी का गौरवास्पद स्थान (The Proud Place of Women in Ancient Times)
    (2.)आधुनिक काल में नारी का विभिन्न क्षेत्रों में योगदान (Contribution of women in various fields in modern times
    (3.)नारी और पुरुष एक-दूसरे के पूरक (Men and women complement each other)
    (4.)मध्यकाल में नारी को कुचला गया (Women were crushed in the medieval period)
    (5.)नारी के योगदान का निष्कर्ष (Conclusion of Women’s Contribution)
  • (B)समाज में महिलाओं के योगदान पर छात्र-छात्राओं से कुछ मौलिक प्रश्न (Some fundamental questions from students on the contribution of women in society)
  • (1.) आपके विचार से पुत्र और पुत्री में कौन महत्त्वपूर्ण है? (Who do you think is more important between son and daughter?)
    (2.) क्या आप महिलाओं की समाज में अतुलनीय योगदान से सहमत है? (Do you agree with the incomparable contribution of women to society?)
    (3.) क्या आपके जीवन में कभी ऐसा अवसर आया है जब आपके सामने पुत्री के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हुआ हो? यदि हाँ तो आपकी क्या प्रतिक्रिया रही? पक्ष,विपक्ष या तटस्थ में। (Has there ever been an occasion in your life when your daughter has been treated as second-class in front of you? If yes, what was your reaction? In favor,opposition or neutral)
    (4.)क्या आप मानते हैं कि आज भी भारतीय समाज में महिलाओं के योगदान को नकारा जाता है? (Do you believe that even today the contribution of women in Indian society is denied?)
    (5.)क्या आज भी महिलाओं को समाज में वह दर्जा प्राप्त नहीं है जो पुरुषों को प्राप्त है या जिसकी वो हकदार हैं? (Do women still not have the status in society that men have or deserve?)
    (6)क्या आज भी पुरुष अपनी मनमानी करते हैं और महिलाओं को पैर की जूती समझते हैं? (Do men today do as they please and consider women to be footwear?)
    (7.)महिलाओं के साथ अन्याय के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते है? महिला (स्वयं) को,समाज या माता-पिता को या और किसी को।(Who do you hold responsible for the injustice done to women? The woman (self), the society or the parents or anyone else)
    (8.)आप महिलाओं के उत्थान में किस तरह का योगदान करते है या करना चाहते है? (What kind of contribution do you make or want to make for the upliftment of women?)
    (9.) क्या आप अपनी सहपाठी छात्रा के साथ सम्मानित व्यवहार करते हैं? किस प्रकार से उनका सहयोग करते हैं? यदि हाँ तो कैसे और यदि नहीं तो क्यों नहीं।(Do you treat your classmates with respect? How do you support them? If yes, how, and if not, why not)
    उपर्युक्त आर्टिकल में समाज में नारी का योगदानः भारतीय समाज में नारी की भूमिका (Contribution of Women to Society: Role of Women in Indian Society) के बारे में विस्तार और गहराई समझाया गया है।
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Also Available in Hindi:Women Reservation Bill:Exam Key Facts

7.लड़की के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार (हास्य-व्यंग्य) (Second-class treatment of a girl) (humor-satire):

  • एक बार एक शिक्षक का अभिभावक सम्पर्क के निमित्त किसी महिला (अभिभावक) के घर जाना हुआ।
  • शिक्षक (महिला से):आपके बच्चे कहाँ पढ़ते हैं? महिला : बड़ा बच्चा तो पब्लिक स्कूल में पढ़‌ता है और उसकी छोटी बहन सरकारी स्कूल में।
  • शिक्षक: बच्ची को सरकारी स्कूल में क्यों और लड़के को काॅन्वेन्ट स्कूल में क्यों?
  • महिला: लड़के से परिवार का वंश चलेगा।घर-परिवार का आर्थिक बोझ उठाएगा?
  • शिक्षक (व्यंग्यपूर्वक): आप महिला हैं और माँ हैं फिर भी एक महिला (लड़की) के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार।लड़की भी आपका यश फैला सकती हैं।लड़की ने माँ की बात चुपके से सुन ली और उसने कुछ कर गुजरने की ठानी।
  • समय पलटा और वह एक नामी (प्रसिद्ध) कॉलेज की प्रिंसीपल बन गई।और लड़‌का मजदूरी से परिवार का गुजारा चलाता और माँ से अलग हो गया।लड़की ने माँ को अपने पास रखा।
  • एक दिन अकस्मात शिक्षक की महिला से रास्ते में भेंट हो गई।
  • शिक्षक (व्यंग्यपूर्वक ):पुत्र के साथ मजे से दिन गुजार रही होगी।
  • महिला:मुझे माफ कर दीजिए,पुत्र कुपुत्र निकला और पुत्री ही मेरा देखभाल कर रही है।

8.समाज में नारी का योगदानः भारतीय समाज में नारी की भूमिका (Frequently Asked Questions Related to Contribution of Women to Society: Role of Women in Indian Society) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.हम कैसे कह सकते हैं कि संविधान में महिलाओं को समानता का अधिकार होने पर भी उन्हें समानता का दर्जा नहीं मिला है? (How can we say that women have not got equal status even though they have the right to equality in the Constitution?):

उत्तर:संविधान में समानता की गारन्टी भले ही दे दी गई हो पर हमारा जीवन संविधान से नहीं,व्यक्तियों से,परम्पराओं से,आदतों से चलता है।स्थिति तभी सन्तोषजनक हो सकेगी जब स्त्रियों के सम्बन्ध में हमारे अन्तर्मन में जमे बैठे कुसंस्कार दूर होंगे।

प्रश्न:2.आधुनिक युग में स्त्री शिक्षा का प्रथम आगाज किसने किया? (Who introduced women’s education in the modern era?):

उत्तर:स्त्री-शिक्षा की दिशा में सबसे पहला प्रयास ईसाई मिशनरियों ने किया।सन् 1820 में डेविड हेयर ने स्त्री शिक्षा का सबसे पहला विद्यालय कलकत्ता में स्थापित किया।

प्रश्न:3.आधुनिक काल में स्त्रियों की शिक्षा के लिए अथक प्रयास किस महापुरुष ने किया? (Which great man worked tirelessly for the education of women in modern times?):

उत्तर:स्त्री-शिक्षा के पक्ष में महर्षि दयानंद ने अथक प्रयास किया,उनके आन्दोलन का यह मुख्य अंग था।उनके द्वारा स्थापित संस्था आर्य-समाज के कार्यक्रम में भी स्त्री कल्याण की योजनाओं का विशेष स्थान रहा।स्त्री शिक्षा की अनेक संस्थाएं आर्य समाज ने इसी कार्यक्रम के अन्तर्गत खोली।

प्रश्न:4.स्त्रियों की स्थिति में सुधार कैसे सम्भव है?
आधुनिक काल में स्त्रियों की शिक्षा के लिए अथक प्रयास किस महापुरुष ने किया? (How is it possible to improve the condition of women?)

उत्तर:स्त्रियों,महिलाओं को निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराकर और रोजगार में निःशुल्क प्रशिक्षण देकर तथा महिलाओं को विभिन्न योजनाओं में निःशुल्क सुविधा उपलब्ध करा कर स्त्रियों की स्थिति में सुधार किया जा सकता है।वैसे भी सरकार विभिन्न योजनाओं में अनुदान देती है।नारी का परिवार,समाज और विभिन्न क्षेत्रों में योगदान को बढ़ाने के लिए उसको ज्यादा से ज्यादा सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी है।उसको सक्षम करना जरूरी है।बहुत सी महिलाएं सुविधाओं के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाती हैं और उनकी प्रतिभा दम तोड़ देती है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा समाज में नारी का योगदानः भारतीय समाज में नारी की भूमिका (Contribution of Women to Society: Role of Women in Indian Society) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

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