Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects
1.भारत में हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तनःअधिकार और कानूनी पहलू (Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects):
- धर्म परिवर्तन क्यों किया जाता है और हमारे महापुरुषों के धर्म परिवर्तन के पक्ष या विपक्ष में क्या राय है? जानिए सम्पूर्ण जानकारी हमारे इस लेख भारत में हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तनःअधिकार और कानूनी पहलू (Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects) में।
Also Available in Hindi:Review of Secularism in India
2.धर्म परिवर्तन के बारे में महात्मा गाँधी और भीमराव अम्बेडकर के विचार (Mahatma Gandhi and Bhimrao Ambedkar’s views on religious conversion):
- धर्मांतरण एक ऐसा मामला है जिससे भारतीय समाज कई सदियों से रूबरू है।बीसवीं शताब्दी में भारतीय इतिहास के दो प्रमुख चितकों:जिनमें से एक थे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्विवाद नेता महात्मा गांधी और दूसरे महापुरुष थे डा० भीमराव अंबेडकर ने इस पर बहुत गहराई से विचार किया था।हालांकि दोनों विचारकों की राय एक दूसरे से भिन्न थी लेकिन दोनों ही इस मुद्दे पर बेहद स्पष्ट थे।
- महात्मा गांधी 26 मई 1924 को ‘यंग इंडिया’ में लिखते हैं:मेरी हिंदू वृत्ति (My Hindu attitude) मुझे सिखाती है कि थोड़े या बहुत अंशों में दुनिया के सभी धर्म सच्चे हैं अतः हम सब अपने धर्मो में रहते हुए ही पूर्णता को प्राप्त करें,धर्मांतरण जहां तक मैं समझता हूं वह एक बाड़े में से निकलकर दूसरे बाड़े में जाना है।इससे कोई नैतिक उत्थान (Moral upliftment from religion conversion)नहीं होता।और जिस परिवर्तन से कोई नैतिक उत्थान न हो भला ऐसे किसी परिवर्तन से क्या फायदा? दुनियावी बातों के बनिस्बत धार्मिक मामलों में यह बात ज्यादा शिद्दत से लागू होती है कि “वैद्य जी पहले अपने मर्ज का इलाज करिये।”
- लेकिन गांधीजी की तरह डा० अंबेडकर नहीं सोचते थे। वे नहीं मानते थे कि हिंदू धर्म वृत्ति उनके लिए उतनी ही सकारात्मक है जितनी कि महात्मा गांधी के लिए यह थी।डा० अंबेडकर कहते थे “हिंदू धर्म में महज पैदा होने की वजह से मुझे और मेरे समाज को बेहद अमानवीय अत्याचार सहने पड़े हैं,हिंदू धर्म में रहते हुए न तो मेरा दीन-हीन समाज सुरक्षित है (The poor society is safe) और न ही मैं।क्योंकि हिंदू धर्म मुझे और मेरे समाज के लिए न तो आत्मसम्मान देता है और न ही समानता।इन दोनों चीजों का अभाव हमें कभी भी अपने आप पर आत्मविश्वास नहीं पैदा होने देगा और बिना व्यक्तिगत आत्मविश्वास के प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के विचार मन में आ ही नहीं सकते। इसलिए मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूं कि मेरा जन्म भले एक अस्पृश्य हिंदू के रूप में हुआ हो मगर मैं एक हिंदू की भांति नहीं मरूंगा।” (अक्तूबर 1935 में येवला (नासिक) में बौद्ध संप्रदाय में दीक्षित होने की घोषणा करते हुए)
- जहां गांधीजी का मानना था कि धर्म परिवर्तन का मतलब एक बाड़े से निकलकर दूसरे बाड़े में जाना है (Religion Conversion from one enclosure to another) वहीं डा० अंबेडकर कहते थे,”धर्मातरण भौतिक लोभ नहीं नैतिक साहस का परिचायक होता है” (द अनटचेबल्स हू आर दे? एंड ह्वाई दे आर अनटचेबल्स में) महात्मा गांधी 23 अप्रैल,1931 को यंग इंडिया’ में लिखते हैं,”मेरी राय में दया की आड़ में धर्म परिवर्तन कराना अहितकर है।धर्म एक नितांत व्यक्तिगत मामला है,अगर कोई डाक्टर मुझे किसी बीमारी से अच्छा कर दे,तो इसकी एवज में मैं अपना धर्म क्यों बदल लूं? मेरे लिए यह समझ पाना बहुत कठिन है कि आखिर कोई डाक्टर मुझसे इस तरह की अपेक्षा ही क्यों रखे? क्या डाक्टरी सेवा अपने आप में एक पारितोषिक प्रदायक वृत्ति (Reward Provider Scholarship) नहीं हैं?
- अगर मैं किसी ईसाई शिक्षण संस्थान में शिक्षा ग्रहण कर रहा होऊं,तो मुझ पर ईसाइयत क्यों थोपी जाये? अगर धर्म परिवर्तन हो ही तो यह इस ढंग से हो कि सीजर की पत्नी की तरह किसी को कोई शक न हो सके।धर्म की शिक्षा लौकिक विषयों की तरह नहीं दी जाती,यह हृदय की भाषा में दी जाती है।मैं धर्म परिवर्तन के विरुद्ध नहीं हूं लेकिन व्यापारिक तरीके से किये गये धर्म परिवर्तन के विरुद्ध हूं।मैंने पिछले दिनों ईसाई धर्म प्रचारकों की एक रिपोर्ट पढ़ी जिसमें बताया गया था कि प्रत्येक व्यक्ति के धर्म परिवर्तन में कितना पैसा खर्च हुआ और उससे आगे ‘अगली फसल’ (Next harvest) के लिए बजट पेश किया गया था।”
- डा० अंबेडकर इस मसले पर गांधी जी से भिन्न सोचते थे।अपनी एक लेखमाला में जो कि ‘बट कांग्रेस एंड गांधी हैव इन टू द अनटचेबल्स’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है,इसमे वे लिखते हैं,”गांधी और कांग्रेस के कुछ दूसरे बड़े नेता मुझसे कहते हैं कि मैं धर्मांतरण क्यों कर रहा हूं,मैं गांधी से पूछता हूं कि तुम्हारी छुआछूत निवारण की मंशा क्या तुमसे एक हाथ आगे बढ़ सकी है?”यही नहीं,उन्होंने धर्मांतरण को अपने आपको डूबने से बचाने का एक प्रयास बताया है।
- दरअसल,धर्मांतरण को लेकर अगर गांधीजी और डा० अंबेडकर के विचारों में इतनी भिन्नता थी तो शायद इसलिए क्योंकि गांधीजी धर्मातरण के उस एहसास को महसूस नहीं कर पा रहे थे जिस एहसास को अंबेडकर व्यक्तिगत रूप से महसूस करते थे।स्व० हिमांशु राय अपनी किताब युग पुरुष बाबा साहब अंबेडकर के पृष्ठ सं० 102 पर डा० अंबेडकर को उद्धृत करते हुए लिखते हैं “मसूरकर जी महाराज मुझसे धर्मांतरण पर पुनर्विचार करने का आग्रह करने आये थे,मैंने उनसे कहा कि मैं इस पर पांच से दस बरस तक पुनर्विचार करने की कोशिश करूंगा।लेकिन क्या जैसा कि आप कहते हैं,सवर्ण हिंदू सचमुच अस्पृश्यता छोड़ने को तैयार हैं? अगर ऐसा है,तो दलित नेता श्री केके सकट को एक साल के लिए शंकराचार्य क्यों नहीं बना देते,श्री सकट तो ‘केसरी’ के मुताबिक एक अनुकरणीय हिंदू हैं।”
- हालांकि,अंबेडकर ने हिंदू धर्म त्याग कर इस्लाम या ईसाइयत को नहीं अपनाया।उन्होंने सन 1936 में मुंबई के एक विशप बैडले को व्यक्तिगत पत्र में कहा,”कोई व्यक्ति मात्र कुछ सुविधाओं और वस्तुओं के लालच में अपने धर्म का परित्याग नहीं करता।आदमी जिस धर्म में पैदा होता है।उसे बड़ी पीड़ा के साथ ही छोड़ने का फैसला करता है।मैंने हिंदू धर्म को अपने और अपने समाज के प्रति हृदयहीन बर्ताव के कारण त्यागने और बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला ‘किया है।”
- इस तरह देखा जाए तो धर्मांतरण पर दो प्रबुद्ध भारतीयों गांधी और अंबेडकर ने व्यापक परिप्रेक्ष्य में सोचा है।दोनों की प्रतिक्रियाओं में ही दोनों के संदेश हैं,अगर देश इनकी टिप्पणियों पर गंभीरता से ध्यान दे तो धर्मांतरण से संबंधित हर समस्या और सवाल का हल इनमें ढूंढ़ा जा सकता है।
3.हिन्दुओं का बलात या लोभ-लालच के द्वारा धर्म परिवर्तन (Religion Conversion of Hindus by force or greed):
- धर्मांतरण भारत के लिए कोई नयी समस्या
(Religion Conversion is not a new problem for India) नहीं है और न ही देश के लिए यह बात नयी है कि इस पर व्यापक रूप से विचार-विमर्श हो।सचाई तो यह है कि भारत में धर्मांतरण की समस्या जितनी पुरानी है उतनी ही पुरानी इसको लेकर विचार-विमर्श की है।हमारे यहाँ धर्मान्तरण पहली शताब्दी से ही शुरू हो गए थे।पहली बार में एक सीरियन पादरी सर धामस केरल की धरती पर पहुंचा। - चूंकि धर्म स्वातंत्र्य और सहिष्णुता हिंदू धर्म (Religious Freedom and Tolerance) की एक खास विशेषता थी इसलिए सर थामस का किसी ने विरोध नहीं किया।भारतीय लोगों ने न केवल सर थामस को अपनी पूजा पद्धति का प्रचार करने दिया बल्कि इन लोगों ने उनका विरोध तब भी नहीं किया जब थामस ने स्थानीय लोगों को अपने मजहब में दीक्षित करने की शुरुआत की।उल्टे भारतीयों ने सर थामस को गिरजाघर बनाने में मदद की।ईसाई धर्म प्रचार का दूसरा दौर तब शुरु हुआ जब सन 1448 में वास्कोडिगामा पुर्तगाल से चलकर यहां पहुंचा।वास्कोडिगामा के जरिये धर्मांतरण का जो दूसरा दौर शुरू हुआ उसका कार्यक्षेत्र गोवा रहा।
- चूंकि गोवा पुर्तगीजों के अधीन हो गया था।इसलिए पुर्तगीज शासकों ने गोवा को अपना स्थाई उपनिवेश बनाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की हर नीति अपनाकर यहां का ईसाईकरण जारी रखा।सन 1542 में यहां फ्रांसिस जेवियर नामक पादरी आया।उसने सात लाख हिंदुओं को ईसाई बनाया।जस्टिस नोरोचजी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिंदू एंड पुर्तगीज रिपब्लिक’ में धर्मांतरण को लेकर जो ब्यौरा दिया गया है वह इस प्रकार है, “इतने समय तक भारत की यह भूमि शैतानों के अधीन थी,अब वह आकाश के पिता की रोशनी में आ गयी है,इसलिए हे ईसाइयों अब तुम हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ो और मूर्तियों को अपवित्र करो।”इस किताब के मुताबिक उन पुर्तगीज शासकों ने ईसाई बनने के लिए लोगों को निम्नलिखित प्रलोभन दिये:
- (1.)जो लोग ईसाई मजहब स्वीकार कर लेते थे उन पर वह विशेष कर नहीं लगता था जो कि हिंदुओं पर लगता था :
(2.)अगर किसी व्यक्ति का एक बेटा ईसाई बन जाता था तो उसे अपने पिता की सारी संपत्ति मिल जाती थी:
(3.)सन 1574 में हिंदुओं पर किसी भी तरह की सवारी के इस्तेमाल का प्रतिबंध लगा दिया गया।वह न तो हाथी,घोड़े पर बैठ सकते थे और न ही पालकी में बैठ सकते थे।
- (4.)ईसाइयों की तरह ही विदेशी मुस्लिम हमलावरों ने भी देश में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया है और उनके (Mass Religion Conversion) बाद आगे अंग्रेजों ने भी इसे जारी रखा।इस तरह देखा जाये,तो धर्मांतरण देश की सदियों पुरानी समस्या है।इसलिए जब भारत आजाद हुआ तो इसे एक महत्वपूर्ण विषय मानते हुए एक संविधान समिति का गठन हुआ जिसका काम यह पता लगाना था कि आजाद भारत में धर्मांतरण (Religion Conversion in Independent India) को लेकर किस प्रकार की व्यवस्था हो-समिति के सामने कई तरह के सवाल थे मसलन:
- (1.)क्या देश में धर्मांतरण पर पाबंदी लगा दी जाये? (Should religious conversions be banned in the country?)
(2.)क्या धर्मांतरण पर पूरी तरह से छूट दी जाये? (Should conversions be completely exempt?)
(4.)क्या धर्मांतरण को धर्मनिरपेक्ष राज्य के अनुकूल माना जाये (Should religion conversion be considered compatible with a secular state?): - (5.)क्या देश में व्यापक रूप से धर्मांतरण का खतरा है?
संविधान की इस समिति में के संथानम और के एम मुंशी जैसे लोग शामिल थे।एक लंबे विचार-विमर्श के बाद यह संविधान समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची कि देश में व्यापक रूप से धर्मांतरण का कोई खतरा नहीं है इसलिए धर्मांतरण पर पाबंदी जैसी किसी व्यवस्था की कोई जरूरत नहीं है।संविधान सभा के इस निष्कर्ष के कारण ही संविधान में अनुच्छेद 25 (क) की व्यवस्था की गयी जोकि हर धर्मावलंबी को अपने धर्म पर यकीन करने और उसके प्रचार की आजादी देता है।
4.धर्मान्तरण पर भारतीय नेताओं के अजीब तर्क (Strange arguments of Indian leaders on Religion Conversion):
- पूर्व प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर कहा कि इस मुद्दे पर एक बार फिर से राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए तो उनकी इस माँग का काँग्रेस तथा वामपंथियों ने विरोध किया था। कांग्रेसी,वामपंथी और देश के कुछ दूसरे प्रबुद्ध लोगों का कहना था कि:इस मुद्दे पर पहले काफी ज्यादा बहस हो चुकी है इसलिए अब इस मुद्दे पर आगे कोई बहस नहीं होनी चाहिए।
- ईसाई मिशनरियाँ देश के आम लोगों के तमाम तरह के विकास मूलक कार्य करती हैं इसलिए इनके खिलाफ इस मोर्चेबंदी को रोका जाए।
धर्मांतरण पर किसी तरह की पाबंदी की जरूरत नहीं है (There is no need for any restriction on religious conversions) क्योंकि संविधान में जोर जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन के रोके जाने की व्यवस्था है। - अगर संविधान के अनुच्छेद 25 में बदलाव किया गया तो संविधान की मूल आत्मा पर आघात होगा।
अगर ऐसा हुआ तो देश के धर्म निरपेक्ष स्वरूप पर आँच आयेगी।
अब आइए इन तमाम आरोपों को तर्क की कसौटी पर रखकर देखें। - अजीब तर्क (Strange arguments):कांग्रेसी,वामपंथी और देश के कुछ प्रबुद्ध लोग कह रहे हैं कि चूँकि इस मुद्दे पर पहले काफी बहस हो चुकी है इसलिए अब इस मुद्दे पर आगे कोई बहस नहीं होनी चाहिए।यह लगभग उसी तरह की बात है जैसे कोई कहे कि यांत्रिक भौतिकी पर न्यूटन ने खूब सोच लिया था इसलिए अब इसमें और कुछ सोचने की जरूरत नहीं है या कि कहा जाए कि चेखव ने कहानियों के हर तरह के शिल्प पर खूब प्रयोग किया था इसलिए अब कोई नया प्रयोग करने की जरूरत नहीं है।यह बहुत अजीब तर्क है बहस की जरूरत को खारिज करने का।
- मजे की बात तो यह है कि न तो हमारे संबिधान निर्माताओं ने कहीं ऐसा लिखा है कि किसी मुद्दे पर एक बार से ज्यादा बहस करने की इजाजत नहीं है और न ही इस तरह की कोई परंपरा है।कांग्रेसी,वामपंथी और वे तमाम लोग जो कहते हैं कि इस पर बहुत बहस हो चुकी है इसलिए अब किसी नई बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे तमाम लोग उन तमाम मुद्दों के बारे में क्या कहेंगे जिन पर पिछले पचास सालों में दर्जनों बार बहस हो चुकी है और अब भी इन पर बहस की जरूरत समझी जाती है।
- उदाहरण के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 को लें। इस पर अब तक 40 से ज्यादा बार संसद में बहस (More than 40 debates in Parliament) हो चुकी है इसकी पड़ताल के लिए कई बार अंतर्राज्यीय समितियां गठित की जा चुकी हैं,सरकारी आयोग बैठाया जा चुका है जिसने इस अनुच्छेद के जरिये राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के 75 मामलों विचार किया है,यही नहीं इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट भी अपना निर्णय सुना चुका है तथा राष्ट्रपति को भी समय-समय पर इस पर कार्यवाही करनी पड़ी है।इस सबके बावजूद अनुच्छेद 356 पर अभी भी बहस की गुंजाइश खत्म नहीं हुई है।
- इस पर बहस के लिए आये दिन माँग करते रहते हैं यह कैसा विरोधाभास है।356 पर तो बहस होनी चाहिए पर धर्मांतरण पर कोई बहस की जरूरत नहीं है।
इसी तरह का एक कुतर्क यह है कि अगर संविधान के अनुच्छेद 25 (क) में किसी तरह का फेरबदल किया गया या कि धर्मांतरण पर कानूनी पाबंदी लगायी गयी,तो संविधान की मूल आत्मा पर आघात लगेगा।अब तक संविधान में 100 से अधिक बदलाव हो चुके हैं।ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि क्या इन तमाम बदलावों से संविधान की मूल आत्मा को ठेस पहुंची है? अगर इतने बदलावों के बाद भी संविधान (Even after the changes, the Constitution) की मूल आत्मा पर कोई फर्क नहीं पड़ा तो तभी क्यों मूल आत्मा आहत हो जायेगी यदि अनुच्छेद 25 में कोई परिवर्तन हुआ? अगर संविधान के किसी बदलाव से उसकी मूल आत्मा को ठेस पहुंचती है,तो क्या तब भी यह ठेस पहुंचेगी जब महिलाओं को राज्य विधानसभाओं और संसद में 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए कानून बनेगा। क्योंकि संविधान में इस तरह की व्यवस्था भी पहले से नहीं है।’मूल आत्मा’ दरअसल एक मजेदार शब्द है,शरीर विज्ञानियों से पूछा जाना चाहिए कि क्या मूल आत्मा के अलावा कुछ सहायक आत्माएं भी होती हैं।संविधान निर्माण समिति के संचिव डा० भीमराव अंबेडकर ने कहीं नहीं कहा कि संविधान में किसी संशोधन से उसकी मूल आत्मा नष्ट हो जायेगी और तब हमारा संविधान अपनी सहायक आत्माओं से काम चलायेगा।अगर उन्हें लगता है कि किसी तरह के संशोधन से संविधान की मूल आत्मा को कोई खतरा है तो वे इसकी व्यवस्था ही न देते। - इसी तरह का एक मूर्खतापूर्ण तर्क है कि अगर संविधान में किसी तरह का बदलाव किया गया,तो उसकी धर्म निरपेक्ष छवि पर असर पड़ेगा।इस पर तो यही कहा जा सकता है कि अगर धर्मांतरण की पाबंदी को कानून बना देने (Ban on religious conversion should be made law) से देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा प्रभावित होगा तब ऐसी कोई चीज नहीं है जिससे देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा प्रभावित होगा।जो लोग कह रहे हैं कि संविधान में धर्मांतरण को रोकने की पर्याप्त क्षमता है,उन्हें इस बात का जवाब देना चाहिए कि अगर यह क्षमता है, तो फिर 1947 में 350 ईसाइयों वाले डांग जिले में आज की तारीख में 55,000 ईसाई कैसे हो गये? अगर माना जाये कि 350 ही का विस्तार 55,000 हुआ है,तो फिर विकास की इस नयी दर के लिए जीव विज्ञान के मानकों को खोजना पड़ेगा।
- यह अपने आप में एक अलग बहस का मसला है कि जो लोग धर्मांतरण पर बहस (Debate on religion conversion) कराना चाहते हैं उनकी असली मंशा क्या है? क्या वास्तव में पूर्व प्रधानमंत्री बहस के इच्छुक थे या फिर यह बहस की रट सिर्फ कथित धर्मांतरण (Alleged conversion) में लिप्त विदेशी पादरियों के हमलावरों को बचाने की साजिश है।निःसंदेह इन तमाम छिपी मंशाओं को भी उजागर किया जाना चाहिए लेकिन यह सब कुतर्क गढ़कर नहीं किया जा सकता।मगर फिलहाल तो दोनों पक्ष धर्मांतरण को लेकर अपने फायदे की राजनीत में ही उलझे थे।बहस को इस निरर्थक विवाद में डालने की कोई तुक नहीं है।
5.भारत में हिन्दुओं द्वारा धर्मान्तरण के अधिकार और कानूनी पहलू (Rights and Legal Aspects of Religion Conversion by Hindus in India):
- संविधान के अनुच्छेद 25 (क) के तहत हिन्दू ही नहीं कोई भी व्यक्ति धर्मान्तरण कर सकता है और करता है।अनुच्छेद 25 (क) की चर्चा प्रसंगवश ऊपर की जा चुकी है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 (Article 25) सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने,आचरण करने और प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है।
मुख्य बातें (अनुच्छेद 25.1)अंतःकरण की स्वतंत्रता: हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा या विवेक के अनुसार किसी भी धर्म को चुनने और उसमें आस्था रखने की पूरी छूट है। - धर्म को मानने और आचरण का अधिकार:व्यक्ति अपने धर्म के अनुसार रीति-रिवाजों, पूजा-पाठ और परंपराओं का पालन कर सकता है।
प्रचार करने की स्वतंत्रता: व्यक्ति अपने धर्म की शिक्षाओं का शांतिपूर्ण प्रचार-प्रसार कर सकता है, लेकिन इसमें किसी को जबरन या प्रलोभन देकर धर्म बदलने का अधिकार शामिल नहीं है। - जरूरी सीमाएं और प्रतिबंध यह अधिकार पूर्ण नहीं है। सरकार निम्नलिखित आधारों पर इस पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है:सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order)सदाचार/नैतिकता (Morality),स्वास्थ्य (Health)संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) के अन्य उपबंध।
Also Available in English:Religious conversion
6.इस्लाम में धर्मान्तरण एक बौद्धिक विकल्प (Religion Conversion to Islam is an intellectual choice):
- धर्मातरण के संबंध में इस्लाम में एक बेसिक सिद्धांत यह है जिसे कहते हैं ‘लकुम दि नकुम बलियादिन’।इसका मतलब होता है कि ‘आल यू’ योर रिलिजन,फार मी माइन’ अर्थात तुम्हारे लिए,तुम्हारा दीन,मेरे लिए मेरा दीन।इस तरह इस्लाम में स्पष्ट कहा गया है दीन का ताल्लुक व्यक्ति की पसंदगी से है।तुम्हें जो पसंद हो तुम उस दीन को पकड़ो,मुझे जो पसंद होगा उसे मैं पकडूंगा।इस तरह इस्लाम में धर्म को अपनाने (मानने) के बारे में 100 प्रतिशत बौद्धिक विकल्प’ (इंटेलेक्चुअल ऑप्शन) बात कही गयी है।आपकी अपनी पसंद है।
- इस्लाम में एक प्रतिशत भी दबाव की बात नहीं की गयी। क्योंकि सच्चाई आप किसी पर थोप नहीं सकते।सच्चाई तो वही है,जिसको आपने खुद से ‘डिस्कवर’ (खोज) किया हो।अगर इसे आपने खुद नहीं खोजा,तो यह आपके दिमाग में बैठेगी ही नहीं।आपके अंतर को,आपके भीतर को हिलायेगी ही नहीं।सच्चाई तो वह है जो आपके अंतर को,आपके भीतर को हिला कर रख दे।कुरान में यह है कि एक आदमी जब किसी और रास्ते से दूसरे रास्ते में आता है यानी,धर्मांतरण होता है,तो कहा जाता है कि वह अंधेरे से उजाले की तरफ आ गया।ऐसे में कोई व्यक्ति अंधेरे से उजाले की तरफ तभी जा सकता है जब उसने यह धर्मांतरण अपनी मर्जी,अपने बौद्धिक फैसले के तहत किया हो।अगर ऐसा नहीं हुआ होगा तो वह व्यक्ति अंधेरे से उजाले में कैसे आयेगा?
- इस तरह धर्मांतरण को लेकर इस्लाम का जो दृष्टिकोण है,वह यह है कि धर्मांतरण पूरी तरह से किसी व्यक्ति का अपना बौद्धिक फैसला है।आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम में ऐसी व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति इस्लाम से निकले यानी वह इस्लाम छोड़कर बाहर जाये तो उसे मार डालो कोई व्यक्ति इस्लाम छोड़कर कोई दूसरा धर्म पकड़े,तो ‘इस्तुता बुअबदन बदायुत’ अर्थात उसे समझाया-बुझाया जायेगा।इस्लाम में यह व्यवस्था है।मारने या पकड़ने जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।परन्तु यह तो सैद्धान्तिक बात हुई।इसीलिए अगर आपको याद हो सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन के पक्ष में इस्लाम की व्यवस्था का पालन नहीं कर रहे हैं (कट्टरपंथी मुस्लिम)।आदमी कोई बात कहे और आपको लगे कि वह इस्लाम मजहब के खिलाफ है,तो आप कहें कि मारो इसको,कत्ल करो इसका ये क्या बात हुई।
7.क्या धर्म बदलते ही राष्ट्रीयता बदल जाती है? (Does nationality change as soon as religion changes?):
- धर्मान्तरण देश में अलगाववाद को जन्म दे रहा है।अगर बलात,लोभ-लालच से धर्मान्तरण न रुका तो एक दिन हिंदुस्तान का एक और विभाजन हो जायेगा।पूर्व की तमाम आतंकवादी घटनाओं के लिए इन इलाकों का धर्मान्तरण ही जिम्मेदार माना जा सकता है।नागालैंड, मिजोरम आदि इलाकों में धर्मान्तरण के चलते देश की एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो गया है।हमारा मानना है कि धर्मांतरण महज एक सामाजिक परिघटना भर नहीं है बल्कि यह व्यक्ति को मानसिक और मूल्यात्मक स्तर तक प्रभावित करती है।धर्मान्तरण के साथ ही व्यक्ति की राष्ट्रीयता,उसकी आस्थाएँ बदल जाती हैं (यदि लोभ-लालच से किया है)।
8.भारत में हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तनःअधिकार और कानूनी पहलू का सारांश (Summary of Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects):
- (A)धर्मान्तरण से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से सामयिक प्रश्न (Topical Questions from Students Related to Conversion):
- (1.) क्या धर्मान्तरण से व्यक्ति का भौतिक स्तर ऊँचा उठता है? (Does conversion raise the physical level of a person?)
- (2.) क्या धर्मान्तरण से व्यक्ति का नैतिक और आध्यात्मिक परिवर्तन होता है? (Does conversion lead to moral and spiritual transformation of a person?)
- (3.) लोग धर्मान्तरण क्यों करते हैं? (Why do people convert?)
- (4.) क्या धर्मान्तरण करना आपकी दृष्टि में किसी भी दृष्टि से जायज है? (Is conversion permissible in any way in your view?)
- (5) क्या धर्मान्तरण से व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन होता है? (Does conversion change a person’s behavior?)
- (6.) क्या धर्मान्तरण के बिना व्यक्ति के व्यवहार,भौतिक स्तर, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर में परिवर्तन नहीं हो सकता है? (Can there be no change in a person’s behavior, physical level, moral and spiritual level without conversion?)
- (7.)आप कैसे पता लगाते हो कि धर्मान्तरण करना उचित है या अनुचित है? (How do you determine whether it is appropriate or inappropriate to convert?)
- (8.) किसी व्यक्ति के धर्मान्तरण करने पर आपकी क्या भूमिका रहती है? (What is your role when a person converts?)
- (9.) क्या धर्म परिवर्तन एक ढकोसला है? यदि हाँ तो कैसे? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? (Is conversion a sham? If so, how? If not, why not?)
- (B)भारत में हिन्दुओं द्वारा धर्मान्तरण के मुख्य पहलू (Main Aspects of Religion Conversion by Hindus in India):
- (1.)धर्म परिवर्तन के बारे में महात्मा गाँधी और भीमराव अम्बेडकर के विचार (Mahatma Gandhi and Bhimrao Ambedkar’s views on religious conversion)
- (2.)हिन्दुओं का बलात या लोभ-लालच के द्वारा धर्म परिवर्तन (Religion Conversion of Hindus by force or greed)
- (3.)धर्मान्तरण पर भारतीय नेताओं के अजीब तर्क (Strange arguments of Indian leaders on Religion Conversion)
- (4.) भारत में हिन्दुओं द्वारा धर्मान्तरण के अधिकार और कानूनी पहलू (Rights and Legal Aspects of Religion Conversion by Hindus in India)
- (5.)इस्लाम में धर्मान्तरण एक बौद्धिक विकल्प (Religion Conversion to Islam is an intellectual choice)
- (6.) क्या धर्म बदलते ही राष्ट्रीयता बदल जाती है? (Does nationality change as soon as religion changes?)
- (7.)हिन्दुओं द्वारा धर्मान्तरण का निष्कर्ष (Conclusion of Religion Conversion by Hindus)
- उपर्युक्त आर्टिकल में भारत में हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तनःअधिकार और कानूनी पहलू (Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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Also Available in Hindi:Review of Secularism in Indian Context
9.आदिवासी ने धर्म परिवर्तन पर दो टूक जवाब दिया (हास्य-व्यंग्य) (The tribal gave a blunt reply to the conversion) (humor-sarcasm):
- अन्य धर्मावलंबी (आदिवासी से): तुम्हारे हित की बात कहनी है।
आदिवासी : ऐसी क्या बात है? - अन्य धर्मावलम्बी ( व्यंग्यपूर्वक):तुम्हारा धर्म पुराना हो गया,इसमें सड़ी-गली मान्यताएँ भरी पड़ी है,पुराना आयटम है।उसको उतार फेंकने में तुम्हारा भला हो सकता है।
- आदिवासी ( व्यंग्यपूर्वक) :क्या मेरा भौतिक स्तर ऊँचा उठ जाएगा? क्या हमें बिना परिश्रम किए भोजन,कपड़े और सुख-सुविधाएँ मिल जाएँगी ? क्या मेरा नैतिक और शैक्षिक स्तर ऊँचा उठ जाएगा।
- अन्य धर्मावलम्बी ( बात का जवाब न देकर,घुमाकर बोला):देखो हमारा धर्म नया है,ताजा है,आधुनिक है,उसमें कोई बंदिशे नहीं है।तुम्हारे धर्म हिन्दू में बातें तो बड़ी-बड़ी है पर आपके साथ आज भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है।
- आदिवासी : आप बातें तो बड़ी-बड़ी और आकर्षक कर रहे हो और अपने आकर्षक शब्दजाल में मुझे फंसाले की चेष्टा कर रहे हो।रही बात हिन्दू धर्म में विकृतियों की तो हर धर्म में विकृतियाँ है।उनसे खुद को ही जूझना पड़ता है।एक धर्म की खोल उतारकर दूसरे धर्म की खोल (चादर) ओढ़ने से किसी का उद्धार नहीं होगा।
- आदिवासी (पुनः): मुझे आपकी सड़ी हुई बातें काम की नहीं लग रही हैं।इन बातों को सहेज कर पेटी (बाक्स) में रख लो कभी वक्त जरूरत आपके काम आएगी।अपने धर्म तो स्वर्ग का स्थान तथा दूसरा धर्म नरक का स्थान कैसे?
- अन्य धर्मावलम्बी (धर्मान्थ) व्यक्ति की सिटीपिठी गुम हो गई। उससे कोई जवाब ही नहीं बना।
10.भारत में हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तनःअधिकार और कानूनी पहलू (Frequently Asked Questions Related to Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.घरवापसी क्या है? (What is Homecoming?):
उत्तर:जो लोग बहकावे में आकर,लालच में आकर या जोर-जबरदस्ती के चलते अपना घर छोड़ गये थे उनको हिन्दू धर्म में वापस लेने की प्रक्रिया घरवापसी हैं। गांधीजी भी इस काम को सही मानते थे,उनसे एक बार उनके एक मित्र ने शिकायत की कि कुछ लोग जो: क्रिश्चियनों को पुनः हिंदू बना रहे हैं,धर्मान्तरण कर रहे हैं,गांधीजी ने उस मित्र महोदय से कहा ये लोग तो उनकी घरवापसी करा रहे हैं,इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
प्रश्न:2.मिशनरियां धर्मांतरण कराने का क्या तर्क देती हैं? (What do missionaries argue for religion conversion?):
उत्तर:मिशनरियां सेवा कार्य करती हैं इसलिए वे लोग (हिन्दू) जिनके लिए मिशनरियाँ काम करती हैं,वे लोग चाहते हैं कि हम (यानी मिशनरियां) जिस यीशू के प्रभाव से गरीब लोगों की सेवा करने के लिए उन्मुख हुए हैं,हम भी क्यों न उस परमेश्वर के अनुयायी बन जायें।इसीलिए ये लोग खुद ईसाई धर्म की दीक्षा के लिए आग्रह करते हैं।
प्रश्न:3.क्या ईसाई शिक्षण संस्थानों में हिन्दुओं के त्यौहार मनाए जाते हैं? (Are Hindu festivals celebrated in Christian educational institutions?):
उत्तर:ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में जहाँ अधिकांश हिन्दू पढ़ते हैं वहाँ अधिकांश स्कूलों में न तो हिन्दू त्यौहार मनाये जाते हैं,न वहाँ हिन्दू महापुरुषों के चित्र होते हैं।वहाँ क्रिसमस अवश्य मनाया जाता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भारत में हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तनःअधिकार और कानूनी पहलू (Religion Conversion by Hindus in India: Rights and Legal Aspects) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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Satyam
Lekhak Ke Baare Mein (About the Author) **Satyam Narain Kumawat** **Website Name:Satyam Mathematics** *Owner:satyamcoachingcentre.in* *Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)* **Teaching Mathematics aur Anya Anubhav** ***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan ***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav ***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan* ****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science. Updated on 18.06.2026












