7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism
1.हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism):
- हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism) के द्वारा जानिए कि हिन्दू धर्म की ऐसी कौनसी मौलिक विशेषताएँ हैं जो हमें गौरव प्रदान करती हैं और कौनसी ऐसी अनोखी विशेषताएँ हैं जिन्हें हमें जीवन में अपनाना चाहिए।
Also Available in Hindi:Righteousness as Spiritual Hunger:A Student’s Guide to Inner Peace and Purpose
2.धर्म की भूमिका (Introduction to Religions):
- आदि मानव का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त संघर्षमय था।उसकी सम्पूर्ण शक्तियाँ और समय,जीवन-रक्षा अर्थात् उदर-पोषण तथा जंगली जीव-जन्तुओं से सुरक्षा-व्यवस्था तक ही सीमित थे,क्रमशः विकास करता हुआ मानव भोजन उत्पादक अवस्था में पहुँचा,खेती-बाड़ी एवं पशुपालन के कारण वह एक निश्चित स्थान पर निवास करने लगा और इस प्रकार सामुदायिक जीवन का प्रारम्भ हुआ।जीवन-रक्षा के संघर्षमय जीवन से जब मनुष्य को कुछ राहत मिली तब उसने अपने चारों ओर प्रकृति की असाधारण सामर्थ्य एवं प्रबल शक्तियों को चकित होकर देखा।
- बिजली की चमक,बादलों का गर्जन और तूफान जैसी प्राकृतिक लीलाओं से वह भयभीत भी हुआ।साथ ही साथ उसने यह अनुभव किया कि उसका जीवन और विकास प्रकृति पर ही आश्रित है।अतः श्रद्धा,भय एवं कृतज्ञता के भाव से वह उसके समक्ष नतमस्तक हो गया।
- प्रकृति की कृपालुता और क्रूरता दोनों ने मानव को धर्म और अलौकिक शक्ति के रूप में सोचने को बाध्य किया। यही से प्रकृति-पूजा और प्राकृतिक शक्तियों का दैवीयकरण (Deification of natural forces) प्रारम्भ हुआ।प्रकृति के तत्वों की उपासना करना उसी के परिणाम-स्वरूप प्रारम्भ हुआ।क्रमशः ज्ञात से अज्ञात और जड़ से चेतन की ओर अग्रसर होते हुए मानव ने प्रकृति की रचना और नियंत्रण के मूल में एक अदृश्य एवं सर्वव्यापी महाशक्ति का अनुभव किया।कालान्तर में मानव ने एक सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापी भगवान के अस्तित्व (The Existence of the Omnipresent God) को स्वीकार किया और पूर्ण श्रद्धा के साथ आत्मसमर्पण किया और यहीं से अन्ततः धर्म की उत्पत्ति हुई
- भारत मूलतः एक धर्म-प्रधान देश है जहाँ की सुदीर्घ धार्मिक परम्परा है।सुविधा की दृष्टि से भारत में प्रचलित धर्मों को दो बृहत् श्रेणियों (Categories) में विभाजित किया जा सकता है:
(क)भारतीय उत्पत्ति के धर्म:हिन्दू,जैन,बौद्ध एवं सिख धर्म
(ख) गैर-भारतीय उत्पत्ति के धर्म:इस्लाम,ईसाई और जरथुस्त धर्म
3.भारतीय उत्पत्ति के धर्म (Religions of Indian Origin):
- 1.हिन्दू धर्म (Hinduism):
हिन्दू धर्म निश्चित रूप से विश्व के सभी धर्मों में प्राचीनतम है।यह विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है,जिसे एक व्यक्ति ने नहीं चलाया।सदियों पुराना यह धर्म वास्तव में असंख्य ऋषियों,मुनियों एवं तत्वदर्शियों के ज्ञान एवं अनुभूतियों (Knowledge & Experiences) का संचित कोष है।इसीलिए हिन्दू धर्म को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म’ के नाम से भी अभिहित किया जाता है। - हिन्दू धर्म की पाँच मूल अवधारणाएं हैं जिनके आधार पर इसे समझा जा सकता है:
(क)पहली अवधारणा ब्रह्म की है जो न केवल अपरिवर्तनीय है वरन् पूरे ब्रह्माण्ड के आधार में विद्यमान एकमात्र वास्तविकता है,यह परिवर्तनशील संसार इसी अपरिवर्तनीय ब्रह्म से उद्भूत हैं।उपनिषदों में इस सर्वशक्तिमान,सर्वव्यापी और सर्वज्ञ की नाना प्रकार से चर्चा की गई है। - (ख) जिस प्रकार पूरी सृष्टि को ब्रह्म धारण किए हुए है उसी प्रकार मनुष्य को आत्मा (आत्मन्) धारण किए हुए है।”अनाज की भाँति मनुष्य पकता है और अनाज की ही भाँति उसका पुनर्जन्म होता है” (कठोपनिषद 1.1.6.)।मानव शरीर नश्वर है,मात्र आत्मा ही अनश्वर है।यह अखण्ड ज्योति है।
- (ग) ‘ब्रह्म’ और ‘आत्मन’ मूलतः एक हैं।छान्दोग्योपनिषद में श्वेतकेतु की प्रसिद्ध कथा है जिसमें उसका पिता ब्रह्म की व्याख्या करने के उपरान्त कहता है,’तत् त्वम असि’ अर्थात् वह (तत्) ‘तुम’ (त्वम्) हो अर्थात् ‘आत्मा’ और ‘ब्रह्म’ एक ही हैं।ब्रह्म और आत्मा में ठीक-ठीक क्या सम्बन्ध है,यही वेदान्त की विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिपाद्य विषय (Subject matter) है।शंकराचार्य (788 ई-820 ई.) का मानना है कि ये दोनों एक-दूसरे में पूर्णतया समाहित हैं (अद्वैत वेदान्त),जबकि रामानुजाचार्य (1027 ई-1137 ई.) जैसे वेदांतियों की दृष्टि में ये दोनों एक हैं और दो रूप ग्रहण करते हैं।(विशिष्टद्वैत) माधवाचार्य (1199 ई-1278 ई.) का मानना है कि वे एक जैसे हैं और एक-दूसरे से हमेशा पृथक रहते हैं (द्वैतवाद)।
- (घ) मानव का अन्तिम लक्ष्य आध्यात्मिक जीवन (Spiritual life) की प्राप्ति है।ज्ञातव्य हो कि इसी को प्राचीन यूनानी चिन्तकों ने सद्गुणी जीवन (Good life) की संज्ञा दी।आध्यात्मिक जीवन की प्राप्ति व्यक्ति को तब होती है जब वह अपने में विद्यमान ‘आत्मन् के तत्व के प्रति सचेष्ट हो जाता है।’आत्मन् के प्रति सचेत होने की प्रक्रिया व्यक्ति के सामने जीवन का एकदम नया चित्र प्रदर्शित करती है और इस प्रकार से सचेत आत्मा दुःख,बीमारी,वृद्धावस्था और मृत्यु के बंधन से अर्थात् दृश्यगत जगत् (Visible world) के परिवर्तन और नाश के चक्र से मुक्त हो जाती है।
- (ङ) हिन्दू धर्म की पाँचवीं आधारभूत अवधारणा ‘कर्म’ की है जिसमें कार्य (Action),कारणता (Causality) और नियति (Destiny) की अवधारणाएं सम्मिलित हैं।कुछ करने के लिए व्यक्ति बाध्य है,उसके परिणाम निकलेंगे ही:अच्छे कार्यों का अच्छा फल निकलेगा,बुरे कार्यों का बुरा फल…. प्राकृतिक विज्ञान में कार्य (Action) और प्रतिक्रिया या परिणाम (Reaction) का जो सम्बन्ध होता है लगभग वही सम्बन्ध नैतिक विज्ञान में कार्य और उसके परिणाम के मध्य होता है।
- यह सत्य है कि आज हम जो हैं वह हमारे पिछले कर्मों का ही परिणाम है,ठीक इसी प्रकार यह भी सत्य है कि हम आज के अपने कार्यों द्वारा अपने भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।इस प्रकार कर्म की पारम्परिक अवधारणा मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता घोषित करती है।कर्मफल की इच्छा से मुक्त होकर व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन में नहीं बँधता और उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
4.हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन के चार लक्ष्य (According to Hinduism, the four goals of life):
- हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन के चार लक्ष्य या अभीष्ट (Goals) हैं:धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष।धर्म शब्द विस्तृत अर्थों में प्रयुक्त है।इस रूप में इसमें न्याय (Justice),सद्गुण (Virtue),नैतिकता (Morality),न्यायसंगति (Righteousness),विधि और कर्त्तव्यपालन जैसी अवधारणाएं समाहित हैं।यह चार लक्ष्यों में सर्वप्रमुख है,क्योंकि यह सर्वाधिक विस्तृत और जीवन-पर्यन्त मनुष्य को धारण किए रहता है।
- ‘अर्थ’ दूसरा लक्ष्य है।इस प्रकार यह कहना कि हिन्दू धर्म भौतिक सुख-सुविधाओं का पूर्ण निषेध करता है,सही नहीं है,परन्तु अर्थ की प्राप्ति और उसका उपभोग धर्म के अनुकूल ही होना चाहिए।
- मानव जीवन का तीसरा लक्ष्य ‘काम’ या ‘इन्दिय सुख है। हिन्दू धर्म सबको तपस्वी या योगी बनाने का पक्षधर नहीं है और यह मानव जीवन में ‘इन्द्रिय सुख’ को समुचित महत्त्व देता है।’इन्द्रिय सुख’ की प्राप्ति में भी धर्म ही आधार होना चाहिए।
- ‘मोक्ष’, हिन्दू धर्म के अनुसार हर प्राणी के जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।मोक्ष का आशय है,दुःख,पीड़ा,बुढ़ापे और अन्ततः मृत्यु से मुक्ति।मोक्ष का आशय मृत्यु के बाद के सद्जीवन से नहीं है वरन् इसका आशय है,जीवन-मृत्यु के चक्र या यों कहें इस मायावी संसार से मुक्त होकर ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाना।उपर्युक्त को ही चार पुरुषार्थ भी कहा जाता है।
5.हिन्दू धर्म का स्वरूप (The Nature of Hinduism):
- हिन्दू धर्म की निम्नलिखित विशेषताएं इंगित की जा सकती हैं:
- (1) यह भगवान की सत्ता पर पूर्ण आस्था रखता है तथा भगवान को सर्वशक्तिमान,सर्वव्यापी और सर्वज्ञ मानता है।
- (2) हिन्दू धर्म मूलतः एकेश्वरवाद के सिद्धान्त पर विश्वास करता है,परन्तु इसके साथ अलग-अलग देवताओं की उपासना भी प्रचलित है।आधारभूत मान्यता यह है कि उसी परमब्रहम की उपस्थिति प्रकृति में है और देवताओं में भी यह सभी देवता मनुष्य की विविध इच्छाओं की पूर्ति में सहायक मात्र हैं,किन्तु सभी ब्रहम के अधीन हैं।
- (3) हिन्दू धर्म देवयत्री के सिद्धान्त (Doctrine of Hinduism Devayitri) पर आधारित है।सृजन,पोषण और विनाश ये तीनों सृष्टि के शाश्वत् नियम है।ब्रह्मा सृष्टि की रचना करने वाले,विष्णु उसका पालन करने वाले तथा महेश (शिव) उसका विनाश (विकृतियाँ व्याप्त होने पर) करने वाले हैं।यहाँ परमब्रह्म के विविध रूप है।वस्तुतः तीनों एक ही हैं।
- (4) शक्ति-पूजा हिन्दू धर्म की महत्वपूर्ण विशेषता है।सैन्धव संस्कृति (लगभग 3000 ई.पू.) में मातृदेवी की पूजा होती थी जो आज तक प्रचलित है।कल्याणकारी शक्ति के रूप में:उमा,भवानी,लक्ष्मी,अन्नपूर्णा आदि और पापनाशिनी शक्ति के रूप में दुर्गा,काली,चामुण्डा,चंडी आदि शक्तियों की पूजा होती है।
- (5) पुरुषार्थ चार हैं (There are four purusharthas):धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष।धर्म,अर्थ और काम के सन्तुलित आचरण से ही मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है।
- (6) हिन्दू धर्म कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर विश्वास करता है।व्यक्ति जैसा कर्म करता है,उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।कर्म के अनुसार ही वह जन्म लेता है,जीता है और मरता है।श्रीमद्भागवद्गीता कर्म एवं पुरुषार्थ को ही प्रधान मानती है।
- (7) हिन्दू धर्म अवतारवाद में विश्वास रखता है।जब-जब इस संसार में अधर्म बढ़ जाता है और समाज,अन्याय और अत्याचार से विकृत हो जाता है तब-तब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेकर धर्म और मर्यादा की रक्षा करता है।
- (8) मूर्ति-पूजा (idolatry) हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग है यद्यपि निराकार उपासना की पद्धति भी हिन्दू धर्म के कुछ अनुयायी अनुसरित करते हैं,परन्तु सरल एवं सुगम होने के कारण साकार उपासना अधिक प्रचलित है।निराकार रूप की उपासना ज्ञानियों के लिए है,सामान्य जन उस मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ रहता है।अतः सगुण उपासना सामान्य जन के लिए है।
- (9) हिन्दू धर्म जीवन में नैतिक मूल्यों पर अत्यधिक बल देता है।इसीलिए मनु ने धर्म को ‘आचार लक्षणो धर्मः’ कहा है।मनु के अनुसार धर्म के दस लक्षण है:धैर्य,क्षमा,दमन,अस्तेय,पवित्रता,बुद्धि,विद्या,सत्य,अक्रोध एवं इन्दिय निग्रह।इनका पालन करना ही सच्चा धर्म है।
- (10) सहिष्णुता और विश्व-बंधुत्य की भावना हिन्दू धर्म की एक और विशेषता है
“सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभाग भवेत्।।” - (11) भगवान सत्य रूप है और उसकी प्राप्ति के उपाय भी भिन्न होते हैं।अतः इसमें विरोध नहीं है।सभी उपाय एक-दूसरे के पूरक हैं।
6.हिन्दू धर्म के मुख्य सम्प्रदाय (The main sects of Hinduism):
- हिन्दू धर्म के तीन मुख्य सम्प्रदाय है:वैष्णव,शैव और शाक्त नीचे इनकी चर्चा की जा रही है:
(क) वैष्णव सम्प्रदाय (Vaishnava sect): - यह सम्प्रदाय मुक्ति के साधन के रूप में कर्मयोग और ज्ञानयोग से भिन्न भक्ति या भक्तिपूर्ण उपासना की पद्धति को मान्यता देता है।यह सम्प्रदाय भगवान विष्णु में आस्था रखता है।ऋग्वैदिक काल में विष्णु आर्यों के एक देव थे।उत्तर-वैदिक काल में वे आर्यों के एक प्रमुख देवता बन गए।बाद में राम और कृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया।
- (ख) शैव सम्प्रदाय (Shaiva Sampradaya):
शिव की उपासना के संकेत सैन्धव सभ्यता से ही मिलते हैं।इसीलिए भारतीय धर्म और संस्कृति के अध्येताओं ने शिव को आदिदेव माना है।ऋग्वैदिककाल में इन्हें ‘रुद्र’,उत्तरवैदिककाल में ‘महेश्वर,उपनिषदकाल में ‘महादेव’ और बाद में ‘पशुपति’,’शंकर’ और ‘शिव’ नाम से जाना गया।शैव सम्प्रदाय के सबसे बड़े दार्शनिक और प्रचारक आदि शंकराचार्य हुए हैं।उन्होंने चार मठों:ज्योतिष्पीठ (बद्रीनाथ के समीप),गोवर्धनपीठ (जगन्नाथपुरी),शारदापीठ (द्वारका में) तथा श्रृंगेरीपीठ (दक्षिण में) की स्थापना की। - (ग)शाक्त सम्प्रदाय:’शक्ति’ की उपासना करने वाला सम्प्रदाय शाक्त सम्प्रदाय कहलाता है।यह सम्प्रदाय आदि देवी की ही उपासना विभिन्न शक्तियों के रूप में करता है।भारत के पूर्वी प्रदेशों में इस सम्प्रदाय का अधिक प्रचलन है।
7.सर्वधर्म समभाव की अनोखी विशेषता वाला जैन धर्म (Jainism with the unique characteristic of equality of all religions):
- जैन धर्म का संस्थापक महावीर स्वामी (599-527 ई.पू.) को माना जाता है जिन्होंने पूर्वकालीन जैन तीर्थंकरों:ऋषभ,अजितनाथ तथा अरिष्टनेमि के सिद्धान्तों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया।ऋषभदेव इसके आदि तीर्थंकर थे।
जैन धर्म वेदों की सत्ता को स्वीकार नहीं करता।इसके केन्द्र में जीव का यथार्थवादी वर्गीकरण (Realistic Classification of Being),ज्ञान का सिद्धान्त,स्याद्वाद और सप्तभंगी के सिद्धान्त हैं।
ज्ञान के पाँच प्रकार-जैनियों के अनुसार ज्ञान पाँच प्रकार का होता है: - (1.)मति या सामान्य बुद्धि (Intelligence or common sense) जिसमें स्मृति,पहचान और निष्कर्ष निकालने की क्षमता सम्मिलित होती है।
- (2.)श्रुति अथवा चिन्हों,प्रतीकों (शब्दों) के माध्यम से प्राप्त ज्ञान।
- (3.)अवधि या समय तथा स्थान की दृष्टि से दूरी पर विद्यमान वस्तुओं का प्रत्यक्ष ज्ञान।
- (4.)मनःपर्याय या दूसरे के विचारों का प्रत्यक्ष ज्ञान।
- (5.)कैवल्य या पूर्ण ज्ञान।
- उपर्युक्त में से पहले तीन में गलती हो सकती है,परन्तु अन्तिम दो के विषय में ऐसी कोई सम्भावना नहीं होती।
अनेकान्तवाद या स्याद्वाद-जैन धर्म के अनुसार दुनिया के अनेक रूप,पक्ष और गुण हैं (अनन्त धर्म के वस्तु) और मनुष्य उसके किसी एक रूप,गुण या पक्ष को ग्रहण कर सकता है।अतः उसका दृष्टिकोण (नय) आंशिक और एकपक्षीय होता है (एक देश विशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मठः) (सिद्धसेन दिवाकर,न्यायावतार श्लोक 29) जैन धर्म के अनुसार सामान्यतया सात प्रकार के दृष्टिकोण होते हैं।इनमें से किसी भी दृष्टिकोण को अपनाते हुए सात प्रकार से ‘शायद’ (स्यात) शब्द का व्यवहार करना उचित है यानि कि यह चीज शायद है,शायद है और नहीं है;शायद इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता; शायद यह है परन्तु इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता,शायद यह नहीं है या इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता तथा शायद यह है और नहीं भी है परन्तु इसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता (कुन्दुकुन्द,प्रवचनसार,2.23) यह धर्म-दर्शन व्यवहारवाद (Pragmatism) और सापेक्षवाद (Theory of Relativity) के निकट पहुँच जाता है,लेकिन यह संशयवाद (Scepticism) या अज्ञेयवाद (Agnosticism) से कोसों दूर है,क्योंकि यह वस्तु के अस्तित्व को संदिग्ध या अज्ञेय नहीं बताता वरन् उसके विषय में मनुष्य के ज्ञान को सीमित और सापेक्ष सिद्ध करता है। - पाँच महाव्रत:जैन धर्म पाँच महाव्रतों के पालन का उपदेश देता है:
- (क)अहिंसा:मन,वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना।
- (ख)सत्य:मन,वचन और कर्म द्वारा सत्य का आचरण करना।
- (ग)अस्तेय:किसी भी प्रकार की चोरी न करना।
- (घ)अपरिग्रह:आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करना
- (ङ) ब्रह्मचर्य:सभी प्रकार की वासनाओं को त्यागकर संयमित जीवन व्यतीत करना।
त्रिरत्न:सम्यक ज्ञान,सम्यक् दर्शन और सम्यक् चरित्र जैन धर्म के त्रिरत्न हैं,इन्हीं के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
सात शीलव्रत:पाँच महाव्रतों के साथ-साथ सात शीलव्रतों का पालन भी आवश्यक है।जैन धर्म इन शीलव्रतों को दो भागों में वर्गीकृत करता है:गुणव्रत और शिक्षाव्रत।
- गुणव्रत तीन हैं:दिग्व्रत (विशिष्ट दिशाओं में अपनी क्रिया सीमित करना),देशव्रत (कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में अपना कार्य सीमित करना) तथा अनर्थदण्डव्रत (बिना कारण अपराध न करना)।शिक्षाव्रत चार हैं:सामयिक (समय का कुछ भाग अपने ऊपर विचार करने के लिए निश्चित करना),प्रोषधोपवास (महीने में चार दिन उपवास करना),उपभोगप्रतिभोगपरिमाण (वस्तुओं और पदार्थों के दैनिक उपभोग को नियमित करना) और अतिथि-संविभाग (अतिथियों या साधुओं तथा उपासकों को भोजन कराने के बाद भोजन करना)।
- सामाजिक दृष्टि से जैन विचारकों ने मानवता को एक माना है।इसके द्वारा वर्ग एवं वर्ण के भेद का खण्डन किया गया।जिनसेन ने ‘आदिपुराण’ (38.45.46) में लिखा है कि वर्णों और जातियों की व्यवस्था कर्म और व्यवसाय पर निर्भर है।रविषेण ने ‘पद्मपुराण’ में लिखा है कि मनुष्य का वर्ण जन्म से नहीं वरन् कर्म से बनता है।
- भारत की सांस्कृतिक विरासत में जैन धर्म का सबसे विशिष्ट योगदान यह है कि सबसे पहले इसी के द्वारा वर्णव्यवस्था और वैदिक कर्मकाण्ड की बुराइयों को रोकने के लिए गम्भीर प्रयास किया गया।इन्होंने ब्राह्मणों द्वारा सम्पोषित संस्कृत भाषा का परित्याग किया और धर्मोपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्राकृत भाषा को अपनाया।प्राकृत भाषा से आगे चलकर कई क्षेत्रीय भाषाएं विकसित हुई।
8.अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला सर्वप्रथम बौद्ध धर्म (Buddhism was the first to teach the lesson of non-violence):
- बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध (563-483 ई.पू.) महावीर स्वामी के समकालीन थे।बुद्ध एक व्यावहारिक सुधारक थे।उन्होंने अपने समय की वास्तविकताओं का प्रत्यक्ष निदर्शन किया।वे उन निरर्थक वाद-विवादों में नहीं उलझे जो उनके समय में आत्मा (जीव) और परमात्मा (ब्रह्म) के बारे में जोरों से चल रहे थे।वे व्यावहारिक समस्याओं से रूबरू हुए।
- चार आर्य सत्य:बुद्ध ने चार आर्य-सत्यों का उपदेश दिया:
- (क) इस संसार में दु.ख है।(There is suffering in this world)
- (ख) इस दुःख का कारण है।(The cause of this grief is)
- (ग) इस दुःख का कारण है,मनुष्य की तृष्णा (सांसारिक सुख प्राप्ति की तीव्र इच्छा)
- (घ)तृष्णा को नष्ट करके दुःख को दूर किया जा सकता है।
- अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path):बुद्ध की यह दृढ़ धारणा है कि तृष्णा को काबू में किया जा सकता है।उनका मानना है कि दुःख निरोध पर इसके लिए काम-वासनाओं में लिप्त होना और काया को क्लेश देना-इन दोनों के बीच का रास्ता मध्यम है-सम्यक दृष्टि (ठीक से देखना),सम्यक संकल्प (ठीक से संकल्प करना),सम्यक वचन (ठीक से बोलना),सम्यक कर्म (ठीक कार्य करना),सम्यक जीविका (ठीक तरह से रोटी कमाना),सम्यक व्यायाम (ठीक प्रकार का धंधा करना),सम्यक् स्मृति (ठीक विचार रखना) तथा सम्यक समाधि (ठीक प्रकार से मन को समन्वित रखना),इस अष्टांगिक मार्ग पर चलने से मन की जो स्थिति होती है,वही जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य है। (धम्मचक्कण्पवत्तनसुत्त,संयुत्त निकाय,55.2) इसी का नाम ‘निर्वाण’ है।
पंचशील:प्रज्ञा मनुष्य की विवेक शक्ति है।समाधि मन का सन्तुलन है,जबकि शील व्यावहारिक आचार है।शील पाँच है:हिंसा से बचना (प्राणातिपातविरति),चोरी से बचना (अदत्तदानविरति),काम और मिथ्याचार से बचना (काममिथ्याचारविरति),झूठ से बचना (मृषावादविरति) तथा नशीली वस्तुओं एवं सुस्ती से बचना (सुरामैरेयप्रमादस्थानविरति)।भिक्षुओं के लिए इसमें पाँच आचार और जुड़ जाते हैं:कुसमय भोजन से बचना (अकाल भोजनविरति),नाचने-गाने-बजाने से बचना (नृत्यगीतवादित्रविरति),गंध-लेप श्रृंगार से बचना (माल्यगंधविलेपनविरति),ऊँचे पलंग आदि पर सोने से बचना (उच्चासनशयनविरित) तथा सोने-चाँदी और धन सम्पत्ति के संग्रह से बचना। - जैन धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म कहीं अधिक प्रचारित और प्रसारित हुआ।इसके निम्नलिखित कारण थे:
- (क) यह एक जनवादी धर्म था।(Democratic Religion)
“बौद्ध धर्म शुरू से ही दार्शनिक वाद-विवादों के जंजाल में नहीं फँसा इसलिए यह सामान्य लोगों को भाया।यह विशेष रूप से निम्न वर्गों का समर्थन पा सका,क्योंकि इसमें वर्ण-व्यवस्था की निन्दा की गई”।पुनः संघ में प्रवेश का द्वार स्त्रियों के लिए भी खुला था।इस प्रकार ब्राहमण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और लोकतांत्रिक था। - (ख)लोकभाषा (पाली) का प्रयोग इसकी लोकप्रियता का एक और कारण था।लोक कथाओं और लोकोक्तियों की रोचक शैली ने इसकी लोकप्रियता को और बढ़ा दिया।
- (ग)संघ के तत्वावधान में सुगठित प्रचार-व्यवस्था से भी इसे लोकप्रिय होने में मदद मिली।
Also Available in Hindi:Hinduism
9.स्वयं की रक्षा के लिए शक्ति का उपासक सिख धर्म (Sikhism worshippers of power to protect oneself):
- गुरुनानक को आदिगुरु मानकर उनकी सीखों और उपदेशों का पालन करने वाले ही सिख कहलाए।इस गुरु-श्रृंखला में 10 गुरु हुए है।इनके नाम है:गुरुनानक,गुरु अंगद,गुरु अमरदास,गुरु रामदास,गुरु अर्जुन,गुरु हरगोविन्द,गुरु हरराय,गुरु तेगबहादुर,गुरु हरकिशन तथा गुरु गोविन्द सिंह।इनमें आदिगुरु नानक और अन्तिम गुरु गोविन्द सिंह थे।सिख धर्म इन्हीं 10 गुरुओं के उपदेशों और शिक्षाओं का संकलित रूप है।
- गुरुनानक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “भगवान एक है जो अनादि,अनन्त और सर्वशक्तिमान है।उसका नाम है:सत्य।वह सष्टा है।वह भय और घृणा से रहित है।वह पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।वह न तो जन्मा है और न ही पुनः जन्म लेने के लिए उसकी मृत्यु ही होती है।वह: स्वयंभू (Self-created) है।गुरु की कृपा से तुम हमेशा उसकी उपासना करोगे।”गुरुनानक का यह कथन सिख धर्म का मूलमंत्र है।
- ‘ग्रन्थ साहब’ सिखों का सर्वप्रमुख धर्म-ग्रन्थ है।’ग्रन्थ साहब’ में छः गुरुओं पहले पाँच और नौवें के भजन (Hymns) समाहित हैं।इसके अतिरिक्त इसमें नानक के पहले की शताब्दियों के हिन्दू और मुस्लिम संतों के कथन और गीत भी सम्मिलित हैं।इस प्रकार यह ग्रन्थ भारत की समन्वयात्मक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय नमूना है।गुरुओं की शिक्षाएँ मूलतः उपनिषदों,भागवतगीता तथा इस्लाम के एकेश्वरवाद (Mono-theism) से प्रभावित हैं।भक्ति इसका प्राणतत्व है।
- ‘ग्रन्थ साहब’ में कुल 5,894 भजन हैं जिनमें से लगभग एक-तिहाई गुरु अर्जुन की कृति हैं इस ग्रन्थ की रचना के उपरान्त अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में स्थापित किया।गुरुनानक के समकालीन बाबा बुद्ध को इसकी रक्षा का भार सौंपा गया और पहला ग्रंथी बनाया गया।
‘ग्रन्थ साहब’ में जिन संतों और धार्मिक नेताओं के भजन सम्मिलित हैं,वे हैं:जयदेव,नामदेव,त्रिलोचन,रामनन्द,बानी,धन्ना,पीपा,रविदास,रामानुज,सूरदास,संत कबीर,करीद,भीकन,रोहीदास,वल्लभ तथा तुलसीदास। - मूलतः सिख धर्म अहिंसा पर आधारित है।इसे व्याख्यायित करते हुए गुरुनानक ने लिखा है:
- (1.)किसी के बुरे की कामना मत करो यह वैचारिक अहिंसा है।
- (2.)किसी से कठोर मत बोलो यह वाणी की अहिंसा है।
- (3.)किसी के कार्य में बाधा मत पैदा करो।यह कृत्य की अहिंसा है।
- (4.)अपने विरुद्ध बोलने वाले को भी क्षमा कर दो।
- (5.)भौतिक,मानसिक और आध्यात्मिक सहनशीलता का परिचय दो।
- (6.)पीड़ित व्यक्ति की अपने जीवन के मूल्य पर भी सहायता करो।
गुरुनानक ने हिन्दुओं और मुस्लिमों को समन्वित करने का प्रयास किया।उनके जीवन और शिक्षाओं ने दोनों समुदायों के मध्य समन्वय स्थापन का श्लाघनीय कार्य किया।एक लोकप्रिय रचना में उन्हें ‘हिन्दुओं का गुरु’ और ‘मुस्लिमों का पीर’ कहा गया है:
“गुरुनानक शाह फकीर - हिन्दू का गुरु,मुसलमान का पीर।” (Guru of Hindus and Pir of Muslims)
अहिंसापरक सिख धर्म का सैनिक पंथ के रूप में परावर्तन छठे गुरु हरगोविन्द और अन्तिम गुरु गोविन्द सिंह के समय में हुआ।दसवें गुरु गोविन्द सिंह के पिता गुरु तेग बहादुर और मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा अपने दरबार में बुलाया गया और उनके समक्ष इस्लाम धर्म ग्रहण करने अथवा मृत्यु का प्रस्ताव रखा गया तो गुरु तेगबहादुर का यही कहना था कि: - “सिर दिया पर सिरर (आस्था) न दिया।”
- गुरु तेग बहादुर के चार पुत्रों ने भी अपने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
गुरु गोविन्द सिंह ने अपने पाँच प्रमुख अनुयायियों (पंज प्यारा) (Five major followers) के एक नए समूह का निर्माण किया जिसे ‘खालसा’ (खालिस या शुद्ध) का नाम दिया गया।इनमें से एक ब्राह्मण,एक क्षत्रिय तथा शेष तीन निम्नतर जातियों के थे।इस प्रकार से गुरु गोविन्द सिंह ने सामाजिक समानता पर बल दिया।इन पाँच अनुयायियों ने अपने बालों एवं दाढी को कटवाने (केश),बालों में कंघा लगाने (कंधा),दाहिने हाथ में कड़ा पहनने (कर),कच्छा पहनने (कच्छा) और तलवार लेकर चलने की शपथ ली।यही नहीं इन्होंने व्यवहार के पाँच नियमों (राहत) के अनुपालन (कृपाण) का भी वचन दिया:बालों को न कटवाना,ध्रूमपान और मद्यपान न करना,माँस न खाना तथा व्याभिचार से दूर रहना। - गुरु गोविन्द सिंह ने गुरु प्रथा का अन्त कर दिया और भविष्य में ‘ग्रन्थ साहब’ और ‘खालसा’ को ही गुरु मानने को कहा,क्योंकि उन्होंने अपनी आत्मा को ग्रन्थ साहब व खालसा में प्रविष्ट कर दिया है।
- सिख धर्म के मुख्य सिद्धान्त या मान्यताएं गुरुनानक के द्वारा रेखांकित की गई जो निम्नवत् है:
- (1.)भगवान एक है।सभी धर्म उसी एक परमपिता परमेश्वर को अलग-अलग नामों से सम्बोधित करते हैं।
- (2.)बहुदेववाद निराधार एवं निरर्थक है।इससे धार्मिक असहिष्णुता एवं पारस्परिक वैमनस्य बढ़ता है।
- (3.)गुरु के माध्यम से ही भगवत् की प्राप्ति हो सकती है।
- (4.) जाति-प्रथा एवं छुआछूत सामाजिक कलंक है।सभी समान हैं एवं एक ही भगवान की सन्तान हैं।
- (5.)धूम्रपान एवं मद्यपान अमंगलकारी है।
- (6.)अंधविश्वास एवं कर्मकाण्ड निरर्थक है।जो व्यक्ति मन से धर्मात्मा है और अच्छे विचार रखता है,वही धार्मिक व्यक्ति है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism) के बारे में गहराई और विस्तार से बताया गया है।
10.हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस का सारांश (Summary of 7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism):
- (A)हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाओं के दिव्य बिन्दु (Divine Points of Fundamental Concepts of Hinduism)
- (1.)भारतीय उत्पत्ति के धर्म (Religions of Indian origin)
- (2.)हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन के चार लक्ष्य (According to Hinduism,the four goals of life)
- (3.)हिन्दू धर्म का स्वरूप (The Nature of Hinduism)
- (4.)हिन्दू धर्म के मुख्य सम्प्रदाय (The main sects of Hinduism)
- (5.)सर्वधर्म समभाव की अनोखी विशेषता वाला जैन धर्म (Jainism with the unique characteristic of equality of all religions)
- (6.)अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाला सर्वप्रथम बौद्ध धर्म (Buddhism was the first to teach the lesson of non-violence)
- (7.) स्वयं की रक्षा के लिए शक्ति का उपासक सिख धर्म (Sikhism worshippers of power to protect oneself):
- (1.)हिन्दू धर्म की पाँच मूल अवधारणाएं
हिन्दू धर्म विश्व में एकमात्र ऐसा धर्म है।जिसका कोई व्यक्ति विशेष प्रवर्तक नहीं है।इसमें अनेक धाराएं समय-समय पर मिलती रहीं और इसमें परिवर्तन होते रहे मूल भाव एक रहे,बाह्य रूप समयानुसार परिवर्तित होता रहा।इसे वैदिक अथवा सनातन धर्म भी कहते हैं इसकी मूल अवधारणाएं निम्नलिखित हैं: - (1.)पूरे ब्रह्माण्ड के आधार में विद्यमान एकमात्र वास्तविकता ब्रह्म है।यह परिवर्तनीय संसार अपरिवर्तनीय ब्रह्म से उद्भूत है।
- (2.)पूरी सृष्टि को ब्रह्म धारण किए हुए है।मनुष्य को आत्मा (आत्मन) उसी प्रकार धारण किए है।
- (3.)ब्रह्म एवं आत्मन के सम्बन्ध के आधार पर वेदान्त की भिन्न-भिन्त्र विचारधाराओं का प्रवाह हुआ।ब्रह्म एवं आत्मन एक है इसका प्रतिपादन शंकराचार्य ने किया:अद्वैतवाद,रामानुजाचार्य के अनुसार ब्रह्म एवं आत्मन एक हैं,किन्तु दो रूप ग्रहण करते हैं (विशिष्ट द्वैतवाद) तथा माधवाचार्य की मान्यता है कि ब्रह्म एवं आत्मा सदैव एक-दूसरे से पृथक रहते हैं (द्वैतवाद)
- (4.)मानव का अन्तिम लक्ष्य आध्यात्मिक जीवन की प्राप्ति है।
- (5.)’कर्म’ की अवधारणा के साथ कार्य,कारणता और नियति की अवधारणाएं हैं।कर्म से कर्मफल की अनिवार्यता है।अतः कर्म द्वारा मनुष्य अपने को भाग्य का निर्माता घोषित करता है।
जीवन के चार लक्ष्य - हिन्दू जीवन में चार लक्ष्य अभीष्ट हैं।धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष
धर्म का विस्तृत अर्थ है:न्याय,सद्गुण,नैतिकता,न्यायसंगतता,कर्त्तव्यपालन आदि धर्म के पर्याय हैं।यह उचित है कि व्यक्ति जीवनपर्यन्त इसको धारण करता रहे।
अर्थ-अर्थ की प्राप्ति और उसका उपभोग धर्म की मर्यादानुसार किया जाए।
काम-काम या इन्द्रिय सुख को भी विशेष महत्त्व है,किन्तु यह धर्मानुसार हो।
मोक्ष-जीवन चक्र से मुक्ति मोक्ष है।इन अभीष्ट लक्ष्यों को पुरुषार्थ भी कहते हैं।
हिन्दू धर्म की प्रमुख विशेषताएँ - (1.)भगवान की सत्ता पर पूर्ण आस्था
- (2.)एकेश्वरवाद।
- (3.)देवत्रयी-ब्रह्मा,विष्णु एवं महेश-क्रमशः रचनाकार,पालक एवं नाशक के सिद्धान्त पर आधारित हैं,किन्तु यह तीनों शक्तियाँ परमब्रह्म के ही तीन रूप हैं।
- (4.)शक्ति पूजा-कल्याणकारी रूप में उमा भवानी,लक्ष्मी,अन्नपूर्णा आदि तथा पापनाशिनी शक्ति के रूप में दुर्गा,काली,चामुण्डा,चंडी आदि के रूप में।
- (5.)चार पुरुषार्थ अर्थात् जीवन के चार लक्ष्य हैं
- (6.)कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्तों में विश्वास
- (7.)अवतारवाद में विश्वास।
- (8.)मूर्ति पूजा।
- (9.) नैतिक मूल्यों पर बल
- (10.)सहिष्णुता और विश्वबन्धुत्व की भावना
- (11.)भगवान की प्राप्ति के अनेक उपाय हैं कोई किसी मार्ग का चयन करे निराकार और साकार दोनों ही रूपों को मान्यता
जैन धर्म - जैन धर्म के केन्द्र में जीव का यथार्थवादी वर्गीकरण,ज्ञान का सिद्धान्त,स्यादवाद और सप्तंगी सिद्धान्त हैं।
ज्ञान पाँच प्रकार के मति,श्रुति-चिन्हों या प्रतीकों से प्राप्त ज्ञान,अवधि,मनःपर्याय एवं कैवल्य
जैन धर्म के पाँच महाव्रत:अहिंसा,सत्य,अस्तेय,अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य,
त्रिरत्न:सम्यक ज्ञान,सम्यक दर्शन एवं सम्यक चरित्र - शीलव्रत:दो प्रकार के गुणव्रत एवं शिक्षाव्रत हैं।गुणव्रत तीन-दिग्व्रत,देशव्रत तथा अनर्थदण्डवत् हैं।शिक्षाव्रत चार-सामयिक,प्रोषधोयवात,उपभोग-प्रतिभोग परिणाम और अतिथि-संविभाग है।इस प्रकार शीलव्रत सात हैं।
बौद्ध धर्म - चार आर्य सत्यः
- दुःख, दुःख का कारण,मनुष्य की तृष्णा ही दुःख का कारण है तथा तृष्णा को नष्ट करके दुःख से मुक्ति सम्भव है।
अष्टांगिक मार्ग ही तृष्णा से मुक्ति का साधन है।अष्टांगिक मार्ग-सम्यक दृष्टि,सम्यक संकल्प,सम्यक वचन,सम्यक कर्म,सम्यक जीविका,सम्यक व्यायाम,सम्यक स्मृति तथा सम्यक समाधि यही जीवन का श्रेष्ठ लक्ष्य एवं निर्वाण का साधन है।
पंचशील-हिंसा,चोरी,काम और मिथ्याचार,झूठ तथा नशीली वस्तुओं एवं सुस्ती से बचना
भिक्षुओं के लिए अतिरिक्त शील-कुसमय भोजन,नाचने गाने,गंध लेप श्रृंगार,ऊँचे पलंग आदि पर सोना तथा सोने-चाँदी और धन सम्पत्ति से बचना
सिख धर्म - एकेश्वरवादी है।भगवान अनादि,अनन्त एवं सर्वशक्तिमान है सत्य ही भगवान है।ग्रन्थ साहब भारत की समन्वयात्मक,आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय नमूना है।गुरुओं की शिक्षाएं मुख्यतः उपनिषदों,भगवतगीता और इस्लाम के एकेश्वरवाद से प्रभावित है।भक्ति इसका प्राण है।
सिख धर्म में अहिंसा पर बल दिया गया है वैचारिक अहिंसा,वाणी की अहिंसा,कृत्य की अहिंसा,अपने विरोधी को क्षमा,नैतिक,मानसिक और आध्यात्मिक सहनशीलता,पीड़ित व्यक्ति की हरसम्भव सहायता ही अहिंसा है
खालसा पंथ में केश,कंघा,कड़ा,कच्छा और कृपाण आवश्यक है।
सिख धर्म की विशेषताएं - (1.) भगवान एक है।
- (2.)बहुदेववाद निराधार और निरर्थक है।
- (3.)गुरु के माध्यम से भगवान की प्राप्ति
- (4.) जाति प्रथा अमान्य अतः छुआछूत का प्रश्न नहीं है
- (5.)धूम्रपान एवं मद्यपान का निषेध
- (6.)अंधविश्वास एवं कर्मकाण्ड का विरोध
- (B)हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाओं से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से तीखे प्रश्न (Sharp questions from students related to basic concepts of Hinduism):
- (1.) आप रोजाना अपना अध्ययन किस तरह करते हो? (How do you conduct your study on a daily basis?)
- (2.) क्या हमें हमारे आराध्य देवताओं और महापुरुषों के बारे जानना चाहिए ? यदि हाँ,तो क्यों? (Should we know about our deities and great men? If yes,why?)
- (3.) क्या हमारा उद्देश्य केवल रोटी कमाने (जॉब) की कला सीखना ही होना है? (Is our aim only to learn the art of a job?)
- (4.)क्या हमें हमारे हिन्दू धर्म के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी नहीं होनी चाहिए? (Shouldn’t we know a little about our Hindu religion?)
- (5.)क्या हमें हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाओं और हमारे महापुरुओं भगवान राम,कृष्ण आदि की जानकारी होनी चाहिए? (Should we be aware of the basic concepts of Hinduism and our great priests Lord Rama,Krishna etc.?)
- (6.)हम हिन्दू धर्म और महापुरुषों के बारे में जानकारी देने में आपकी किस प्रकार सहायता कर सकते हैं? (How can we help you to give information about Hinduism and great men?)
- (7.)रोटी शरीर की खुराक है तो क्या हमें आत्मा और मन की खुराक का इन्तजाम नहीं करना चाहिए? (If bread is the sustenance of the body,should we not provide for the nourishment of the soul and the mind?)
- (8.)हमारे मन और आत्मा की खुराक क्या है? (What is the nourishment of our mind and spirit?):
- (9)क्या तुम्हारी हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा है? यदि हाँ तो किस तरह जानकारी प्राप्त करोगे? जिज्ञासा को शान्त करोगे? (Do you have a curiosity to know about Hinduism? If yes, how will you get information? Will you satisfy your curiosity?)
- उपर्युक्त विवरण में हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism) का सारांश बताया गया है।
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Also Available in Hindi:Review of Secularism in Indian Context
11.अध्यापक को आदिवासी छात्र का करारा जवाब (हास्य-व्यंग्य) (Adivasi student’s Befitting Reply to Teacher (Humor-Satire):
- एक बार शहरी अध्यापक की ड्यूटी आदिवासी क्षेत्र में लग गयी।
- टीचर (आदिवासी छात्र से):आपके पिताजी क्या करते हैं?
- आदिवासी छात्र:जंगल से लकडी काटकर पास के कस्बे में बेचते हैं।
- टीचर: क्या तुम राम,कृष्ण को जानते हो? ये कौन थे? आदिवासी छात्र:हमारे यहाँ तो कोई राम,कृष्ण नहीं है।चीमा,खीमा,नन्दा आदि छात्र और गुल्ली,मुन्नी आदि छात्राएँ हैं।
- टीचर:मेरा मतलब हमारे भगवान राम,भगवान कृष्ण से मतलब है।क्या इन्हें तुम जानते हो।
- छात्र:न तो इनके बारे में मुझे माता-पिता ने,न किसी टीचर ने बताया।
- टीचर:क्या तुम हिन्दू धर्म को जानते हो?
- छात्र:नहीं तो।
- टीचर (व्यंग्यपूर्वक):तुम कैसे छात्र हो,जो अपने महापुरुषों,भगवान राम,कृष्ण यहाँ तक कि हिन्दूधर्म को भी नहीं जानते।तुम इंसान नहीं हो।
- छात्र :माता-पिता को रोटी भगवान से ही फुर्सत नहीं मिलती है,हमें घर के भगवान (काम) और पढ़ाई से ही फुर्सत नहीं है तो हिन्दू धर्म,भगवान राम,कृष्ण को कैसे जानेंगे? रही बात इंसान होने की,तो क्या इंसान होने न होने का सर्टिफिकेट देने का ठेका आपने ले रखा है क्या?
- छात्र (व्यंग्यपूर्वक):आप तो हमें पढ़ाई ब्रह्म को ठीक से पढ़ा दो,उसी में भगवान के दर्शन हो जाएंगे।
टीचर को आत्म-बोध हुआ।
12.हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस (Frequently Asked Questions Related to 7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
उत्तरःमानव का अन्तिम लक्ष्य आध्यात्मिक जीवन की प्राप्ति है।मोक्ष की प्राप्ति के लिए मन के ऊपर छाए हुए विकारों (अज्ञान) से मुक्त होना जरूरी है।
प्रश्न:2.हिन्दू धर्म के अनुसार मोक्ष का क्या अर्थ है? (What does Moksha mean according to Hinduism?):
उत्तर:मोक्ष का अर्थ है:आत्मा (जीव) का जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना और ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाना।
प्रश्न:3.जीवन के चार लक्ष्य कौनसे हैं? (What are the four goals of life?):
उत्तरःधर्म,अर्थ,काम और मोक्ष।
प्रश्न:4.मोक्ष प्राप्ति का क्या उपाय है? (What is the way to attain salvation?):
उत्तर:मोक्ष प्राप्ति के अनेय उपाय हैं परन्तु प्रमुखतःदो मार्ग है:निराकार और साकार।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा हिन्दू धर्म की मूलभूत अवधारणाएं जानने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines to Know Basic Concepts of Hinduism) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*












