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7 Guidelines for Students to Work

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1.छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines for Students to Work):

  • छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines for Students to Work) के द्वारा जानिए कि कर्म कैसे और किस भावना से किए जाते हैं? हमें कैसे कर्म करने चाहिए ताकि दुःख और विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़े और उनसे कैसे बच सकते हैं?

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2.कर्म करने की क्या मंशा हो सकती है? (What could be the intention behind performing karma?):

  • विद्यार्थी ही नहीं अधिकांश व्यक्ति यही समझते हैं कि कोई भी कर्म अपनी कामनाओं और इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए किए जाते हैं।कोई कर्म बिना किसी कामना के क्यों किया जाएगा? हम कोई भी कार्य तभी करते हैं जब कोई उद्देश्य,कोई लक्ष्य और कोई प्रयोजन से होता है।और जब कोई काम किसी प्रयोजन से किया जाएगा तो उसके फल की इच्छा भी की ही जाएगी।फल प्राप्ति (Results Attainment) के लिए ही तो कर्म किया जाता है।
  • उदाहरणार्थ जेईई-मेन परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी इसी इच्छा से रात-दिन एक करते हैं,जी-तोड़ मेहनत है कि उनका चयन आईआईटी के लिए हो जाए। यदि कोई सांसारिक विद्यार्थी या व्यक्ति (Worldly Students) किसी जेईई-मेन के अभ्यर्थी से पूछे कि क्यों दिन-रात काली कर रहे हो और वह कहे कि अनासक्त कर्म (Unattached Karma) कर रहा हूँ।सामान्य व्यक्ति तथा सांसारिक व्यक्ति क्या समझेगा कि ये ऐसे ही पढ़ रहा है? इसके पढ़ने का कोई प्रयोजन या उद्देश्य नहीं है।सांसारिक दृष्टिकोण से देखने वाले या तो उसे पागल समझेंगे या निकम्मा विद्यार्थी समझेंगे।
  • ऐसा विद्यार्थी जिसे कुछ पाने की इच्छा होगी,कुछ लाभ का लोभ होगा तो इच्छापूर्ति से लाभ प्राप्त होने पर सुख का और न होने पर दुःख का अनुभव करेगा।बस,सुख-दुख के इसी दुष्चक्र में हम फंसे रहते हैं।हम अगर कोशिश करें तो इस दुष्चक्र में फंसने से बच सकते हैं।
  • कर्म करने के हमारे कई हेतु हो सकते हैं।मजबूरी व दाब-दबाव से कर्म करना,कर्त्तव्य समझकर (अनासक्ति पूर्वक) कर्म करना और आज्ञापालन की दृष्टि से कर्म करना तथा फल की आकांक्षा (result aspiration) से कर्म करना।आज्ञापालन से किये गये कर्म भी दो प्रकार से हो सकते हैं।एक श्रेष्ठ व्यक्तियों,सज्जनों और भगवान की आज्ञा पालन करना।चोर,डकैत के गिरोह में सरदार की आज्ञा का पालन उसके समूह के सदस्य करते हैं।पहिले में कर्मफल त्याग की भावना रहती है जबकि दूसरे में अपनी कामना की पूर्ति के लिए आज्ञा का पालन किया जाता है।
  • हमें यदि चिन्तामुक्त (Worry-free) और सुख-दुःख से परे आनन्द की अवस्था में रहना है तो इनके फर्क को समझना होगा और जो कर्म हमारे लिए श्रेष्ठ है उसे करना होगा। विद्यार्थी काल से ही इस यथार्थ को समझकर निष्काम कर्म (कर्त्तव्य कर्म) करने की भाव दशा को उपलब्ध होना होगा ताकि हमारा पूरा जीवन सुख-दुःखों से मुक्त हो सके।अनासक्त कर्म का अर्थ यह नहीं है कि हमारे जीवन में सुख-दुःख और विपत्तियाँ नहीं आएंगी बल्कि उनके प्रति हमारी भाव दशा परिवर्तित हो जाएगी।

3.मजबूरी या दाब-दबाव से कर्म करना (Acting out of compulsion or pressure):

  • कई विद्यार्थी माता-पिता तथा शिक्षकों के दाब-दबाव से अध्ययन करते हैं।और यदि माता-पिता तथा शिक्षक अथवा अभिभावक दाब-दबाव नहीं डाले तो वे नहीं पढ़ेंगे।दाब-दबाब या मजबूरी से किसी अच्छे कार्य को किया जाए तो वह अच्छा ही होता है परन्तु वह अधिक फलदायी नहीं होता है।
    यदि विद्यार्थी मन और दिल से अध्ययन (Not studying with mind and heart) नहीं करता है तो पढ़ा हुआ स्थायी नहीं होता है।वह शार्ट टर्म मेमोरी में संचित होता है और कुछ ही समय में हम उसे भूल जाते हैं।
  • कुछ मजबूरी या दाब-दबाव में ऐसे भी काम कराये जाते है जो व्यावहारिक और नैतिक दृष्टि से गलत होते हैं। जैसे बॉस अपने मातहत कर्मचारी को दबाव डालकर रिश्वत और भ्रष्टाचार करने के लिए मजबूर करता है। कुछ दबंग छात्र सीधे-सादे और भोले विद्यार्थियों को नकल करवाने के लिए बाध्य करते हैं।यदि वह छात्र-छात्रा नकल नहीं करवाता है या किसी परीक्षा में किसी प्रश्न का उत्तर नहीं बताता है तो उसे मारने-पीटने और लड़ाई-झगड़ा करने के लिए उतारू हो जाते हैं।
    तात्पर्य यह है कि दाब-दबाब से भी यदि कोई अच्छा कार्य किया जाता है तो वो सही है।और दाब-दबाव से गलत कार्य करना सही नहीं है।

4.फल प्राप्ति या कामना की पूर्ति हेतु कर्म करना (Performing actions for the attainment of results or fulfillment of desires):

  • कामनाओं का कोई अन्त नहीं है।एक कामना की पूर्ति हो जाती है तो फिर आगे कामना उत्पन्न हो जाती है। छोटी कामना (Small Wish) की पूर्ति हो जाती है तो बड़ी कामना की इच्छा जाग्रत हो जाती है।एक-दो कामनायें पूरी हो जाती है तो फिर कामनाओं की सूची तैयार हो जाती है।कामनाओं के चक्रव्यूह में फँसने के बाद वह इनके जाल में फंसता ही चला जाता है।कामना की पूर्ति हो जाती है तो प्रसन्न होता है,कामना की पूर्ति नहीं होती है तो दुःखी होता है।कामनाएँ अनन्त हैं किस-किस कामना की पूर्ति करेंगे।
  • यह पूरी जिन्दगी ही खत्म हो जाएगी लेकिन का‌मनाओं का अन्त नहीं होगा।यह मकड़ी के जाले की तरह हमारे चारों और मानसिक जाला बुन लेती है जिसमें व्यक्ति फंसला ही चला जाता है।किसी विद्यार्थी को 60% अंक प्राप्त हो जाते हैं तो वह इसलिए दुःखी हो जाता है कि उसके 70-80% क्यों नहीं बनें।साथी मित्र को अधिक अंक पाते देखकर उसके दिल में फफोले पड़ जाते हैं।
  • कई बार तो उसके साथ अजीब स्थिति हो जाती है। कामना पूरी हो जाने पर भी दुःखी होता है।एक बार एक विद्यार्थी का गणित का पेपर खराब हो गया।उसे बहुत दुःख हुआ क्योंकि उसने पेपर में अनेक गलतियाँ की थी।परन्तु परिणाम आया तो भौंचक रह गया।उसे उत्तीर्ण होने के भी लाले पड़ रहे थे परन्तु उसने गणित के पेपर में 60% अंक प्राप्त किए।
  • आगे से उसने बहुत बढ़िया तैयारी की।प्रश्न-पत्र को उसने अच्छे से हल किया (No mistakes made)।एक-एक स्टेप लिखी और कोई भी गलती नहीं की।परन्तु जब परिणाम आया तो उसे बड़ा दुःख हुआ क्योंकि उसे 40% अंक प्राप्त हुए।उसे रहा नहीं गया।उसने गणित के शिक्षक से कहा कि सर पहले मेरे गणित का प्रश्न-पत्र खराब हुआ था,मुझे उसमें उत्तीर्ण होने की उम्मीद भी नहीं थी फिर भी उसमें 60%. अंक दिए और अब इस प्रश्न-पत्र को अच्छे से हल किया है तो 40% अंक ही आए।
  • गणित शिक्षक ने कहा पहले जो अंक प्राप्त हुए वो इस बार की मेहनत के थे और अब जो अंक प्राप्त हुए हैं वो पहले की मेहनत के प्राप्त हुए है।दरअसल पहले वाले प्रश्न-पत्र को गणित शिक्षक ने जल्दी में जाँच किया था और दूसरे प्रश्न-पत्र को गम्भीरता से और एक-एक स्टेप को जाँच किया था।ऐसी स्थिति में जो कुछ भी होता है,हमारी कामना और अपेक्षा के अनुकूल नहीं होता है। भले ही अच्छा हुआ हो (Even if it’s been good) पर होता हमारी कामना और अपेक्षा के विपरीत।

5.कामनाओं से मुक्त होने के उपाय (Ways to get rid of desires):

  • कामनाओं को कैसे निकाला जाए? अपनी इच्छाओं को व्यापक बनाओं।जैसे किसी विद्यार्थी को गणित में अच्छे अंक प्राप्त करने की इच्छा है तो उसे अपने सहपाठियों और मित्रों को भी गणित के सवाल और समस्याओं को हल करने में मदद करनी चाहिए।इस प्रकार कामना व्यापक होगी (Desire is widespread) और व्यक्तिगत कामना कम होगी।एक दूसरा उदाहरण लेते हैं।जैसे उसके परिवार में भाई-बहन है और वे भी पढ़ते होंगे।उसे स्वयं अध्ययन करने के साथ-साथ अपने भाई-बहिनों को भी अध्ययन में किसी न किसी प्रकार मदद करनी चाहिए।इस प्रकार उसका बार-बार अपने अध्ययन की उन्नति पर ध्यान नहीं रहता है।क्योंकि उसकी कामना व्यापक बनी रहती है।
  • दूसरा तरीका है कामनाओं को एकाग्र करो (Concentrate desires)।मन में एक ही कामना रखो और उसके प्रति दीवाने बन जाओ।आपके अन्दर जुनून होना चाहिए।सोचिए जीना है तो इसके लिए और मरना है तो इसी के लिए।मुझे गणित में सिरमौर होना है।इसके लिए मुझे अध्ययन करना है।सुख चाहने वाले को विद्या प्राप्ति की अभिलाषा छोड़ देनी चाहिए और विद्या प्राप्ति के अभिलाषी को सुख पाने की अभिलाषा छोड़ देनी चाहिए।
    इस प्रकार एक ही कामना के प्रति अपनी समस्त कामनाओं को समेटकर एकाग्र कर देने से अन्य समस्त कामनाएँ छूट जाती है।और इसे ही तो दृढ़ इच्छाशक्ति कहते है।दृढ़ इच्छाशक्ति (Strongwill) वह नहीं होती है कि हर कामना के पीछे भाग रहे हो बल्कि लक्ष्य केन्द्रित एक ही कामना को पूरी करने में अपनी सम्पूर्ण शक्ति को लगा देना।फिर कोई प्रलोभन भी आाए तो उसे ठुकरा देना।कोई फ्री में क्रिकेट का मैच,सिनेमा दिखाए तो यह सोचना कि उतने समय में अध्ययन करूँगा।
  • तीसरा तरीका है कि कामना को सूक्ष्म बनाओ।जैसे गणित का अध्ययन करके स्वयं का व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने का विचार हो तो यह कल्पना करो कि स्वयं के हित के साथ-साथ (सासांरिक) मैं इसके जरिए आध्यात्मिक उन्नति भी करूँगा।इससे सांसारिक वैभव,लोभ,धन-सम्पदा पाने की कामना कदाचित शिथिल पड़ जाए।लगेगा कि धन-दौलत इकट्ठी करके सांसारिक प्रपंचों में क्यों पड़ना।अपनी आत्मिक उन्नति करना ही श्रेष्ठ है।इस प्रकार धन-दौलत और सांसारिक ऐश्वर्य प्राप्त करने के पीछे पागलपन खत्म हो जाए या बहुत हद तक कम हो जाए।
  • चौथा तरीका है कि कामना को विशुद्ध बनाओ (Make the desire pure)।अर्थात् आपका जो कुछ भी उद्देश्य हो,उससे अनैतिक और गलत लाभ उठाने की कामना मत करो।गलत कामना का उदाहरण:मैं अफसर बन जाऊंगा तो भ्रष्ट तरीके अपनाकर अकूत धन-दौलत प्राप्त करूंगा।जैसे कि आजकल सार्वजनिक जीवन में अनेक व्यक्ति भ्रष्टाचार करके अपना घर भर लेते हैं।रईसों और धनाढ्यों की तरह जीवनव्यापन करते हैं।विशुद्ध कामना का उदाहरणःमैं अफसर बन जाऊँगा तो देश और समाज के हित में काम करूँगा।मैं उतने ही वेतन से अपना गुजारा करूंगा जितना कि वैधानिक रूप से तथा परिश्रम से मिलता है।इस तरह कामना को विशुद्ध बनाने से अनेक कामनाओं (दूषित) से छुटकारा मिल जाएगा।

6.आज्ञा पालन के लिए कर्म करना (Performing Karma for Obedience):

  • आज्ञा पालन से किए जाने वाले कर्म भी दो प्रकार के होते हैं।एक तो सही और अच्छे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए।जैसे माता-पिता हमें अध्ययन करने की आज्ञा देते हैं।शिक्षक और गुरुजन हमें अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते हैं और होमवर्क तथा अध्ययन करने,गणित के सवालों को हल करने की आज्ञा देते हैं।दूसरो की नकल न करने की आज्ञा देते है।परीक्षा में नकल न करने के लिए कहते हैं (To cheat in the exam)।इस प्रकार की आज्ञा हमारे लक्ष्य की प्राप्ति और श्रेष्ठ कार्यों की ओर प्रवृत्त करती है।परन्तु कोई नेता या अधिकारी अपने मातहत कर्मचारी को अनैतिक काम करने या धन उगाहने (रिश्वत लेने) (Fundraising) के लिए आज्ञा देता है।ऐसी आज्ञा का पालन करना गलत है।आंतकवादी अपने अनुयायियों को देश तोड़ने के लिए तोड़‌फोड़,उत्पात करने,बम विस्फोट करने की आज्ञा देते हैं।इस तरह की आज्ञाओं का पालन नहीं करना चाहिए।किसी विद्यार्थी को उसका सहपाठी परीक्षा में नकल करने या करवाने की आज्ञा देता‌ है।ऐसी विकृत आज्ञाओं का पालन न करे के लिए विद्यार्थी में सुदृढ़ मनोबल होना चाहिए।साहस से काम लेना चाहिये।डर कर किसी भी गलत आज्ञा का पालन करना उसको बहुत बड़े संकट में डाल सकता है।ऐसी आज्ञाओं का पालन करने के कारण जो आत्मग्लानि होती है (There is self-pity) वह जीवनभर उसे दर्द देती है।जीवन को दुःख और कष्टों से भर देती है।अतः सोच-समझकर और विवेक से काम लेकर उचित आज्ञा का पालन ही करना चाहिए।अब प्रश्न यह उठता है कि अनुचित आज्ञाओं की पहचान कैसे करें? क्योंकि जब हम मोह और लोभ (Infatuation and Greed) के जाल में फँसे हुए होते हैं तो अनुचित आज्ञा भी सही और अच्छी लगती है।इसलिए तो विद्यार्थी परीक्षा में नकल करता है और उत्तीर्ण होने के अनुचित तरीके अपनाता है।
    पहला तरीका तो है कि विवेक से काम लें।
  • दूसरा तरीका है कि सज्जनों और अच्छे विद्यार्थियों और लोगों के साथ सत्संग करना चाहिए।इससे आपमें आत्मबल पैदा होगा और आत्मबल से आप अनुचित आज्ञाओं का प्रतिरोध कर सकते हैं।
  • तीसरा तरीका है रोजाना स्वाध्याय और आत्मनिरीक्षण करें।आत्म-निरीक्षण करने से अपने दोषों का पता चलता है और हम वैसा न करने के लिये निर्णय लेते हैं। रोजाना सोते समय 5 मिनट आत्मनिरीक्षण के लिए देना चाहिए।पूरे दिन की दिनचर्या पर नजर दौड़ाकर देखना चाहिए कि क्या गलत किया और क्या सही किया।गलत किया है उसका सुधार कैसे करें और आगे वैसा न करने की क्या युक्ति अपनाएं (Tips for not doing so further)।इस प्रकार धीरे-धीरे आपमें आत्म-सुधार होता जाएगा।
  • चौथा तरीका है श्रेष्ठ लोगों से मागदर्शन लें।किसी भी कर्म में उलझन पैदा हो तो श्रेष्ठ लोगों का अनुसरण करें और मार्गदर्शन लेकर उसी अनुसार कर्म करें।इस प्रकार आप अपने कर्म को सही दिशा दे सकते हैं।

7.कर्त्तव्य समझकर कार्य करना (Acting as a duty):

  • श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि विद्यार्थी कर्म तो करे पर कर्मफल के प्रति आसक्ति न रख कर,सिर्फ कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से कर्म करें तो वह दुःख से बच सकता है।कर्म करना विद्यार्थी (मनुष्य) की मजबूरी है क्योंकि वह कर्म करने से बच नहीं सकता,हाँ,खोटे,निकृष्ट व कुकर्म करने से बच सकता है।फल के प्रति आसक्ति न रखने (Not being attached) वाला किद्यार्थी कुकर्म कर ही नहीं सकता क्योंकि सभी कुकर्म फल के प्रति आसक्ति होने से ही किए जा सकते हैं।
  • दरअसल साक्षीभाव धारण करके ही कोई विद्यार्थी आसक्तिरहित हो सकता है।साक्षीचाव में विद्यार्थी कर्ता नहीं रह जाता,मात्र दृष्टा रह जाता है और आसक्तिरहित होता है तो कुछ भी वह देखता है उससे लिप्त नहीं होता,प्रभावित नहीं होता क्योंकि उसमें आसक्तिभाव नहीं होता।ऐसे अनेक उदाहरण है जिन्होंने भावना से कर्त्तव्य को ऊंचा समझकर कर्म किया है।भगवान कृष्ण,भगवान राम,राजा हरिश्चंद्र,छत्रपति शिवाजी,गुरुगोविन्दसिंह,महाराणा प्रताप,सुभाषचन्द्र बोस और भगतसिंह आदि।इन्होंने भावना से कर्त्तव्य को ऊँचा माना और कर्त्तव्य पालन करते हुए सारे सुखों यहां तक कि अपने जीवन और प्राणों का बलिदान कर दिया।संसार के महान् गणितज्ञों,वैज्ञानिकों और महापुरुषों ने कर्त्तव्य को ही महत्त्व दिया।
  • फल की फिक्र किए बिना,कर्त्तव्य पालन करने की भावना से कर्म करना ही निष्काम कर्म है (Anything done for its own sake without concern for the result)।निष्काम कर्म करने से कार्य तो होता है पर कर्मफल का बन्धन नहीं होता।फल की इच्छा करना आसक्ति है और इच्छा पूरी न होना दुःख है।दुःख से बचना है तो आसक्ति को छोड़ना ही होगा।निष्काम कर्म यानी आसक्ति रहित कर्म करने से दुख होता ही नहीं।जब इच्छा ही न की जाए तो फिर पाने न पाने या पूरी होने न होने में कोई फर्क नहीं रह जाता।
  • यहाँ यह सवाल किया जा सकता है कि यदि इच्छा न होगी तो फिर कोई कर्म किया ही कैसे जाएगा? क्यों किया जाए‌गा? और इच्छा ही न होगी तो फिर इसके पूरी होने का सवाल ही कहाँ पैदा होगा? इसका उत्तर यह है कि इच्छा के बिना भी कर्म किया जा सकता है (Karma done with selfless feeling) और वह है कर्त्तव्य के पालन की भावना से किया गया कर्म।कर्त्तव्य का पालन निष्काम भावना से किया जा सकता है सफलतापूर्वक किया जा सकता है और ऐसा कर्म दुग्खदायक नहीं होता।
  • हमें भविश्य उज्ज्वल,उन्नत,सुखी जीवन और चिन्तारहित बनाना हो तो ह‌में अपनी इच्छाओं और आसक्तियों को त्यागकर,जीवन को उन्नत और समृद्ध करने वाले आवश्यक,उचित एवं हितकारी कर्त्तव्यों का पालन करके निष्काम कर्मयोग पर अमल करना चाहिए।
    तात्पर्य यह है कि कर्म भी करो,फल-प्राप्ति के लिए ही करो,प्रयोजन‌और उद्देश्य के साथ ही करो पर फल के प्रति आसक्ति (Attachment to result) रखे बिना करो ताकि जो भी फल मिले उसे सहज भाव से स्वीकार कर दुःखी होने से बच सको। दुःख से बचने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

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8.छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने के सूत्र (Formulas for Karma for Students):

  • स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें क्योंकि बिना लक्ष्य के कर्म करना भटकना है जो कहीं नहीं पहुंचता है और न कुछ उपलब्धि हो सकती है।समय का सदुपयोग करें क्योंकि समय किसी भी कीमत पर प्राप्त (खोया हुआ) नहीं किया जा सकता है।एकाग्र होकर कार्य करें:बिना एकाग्रता के कोई भी गुरु और शिक्षक आपकी नैया को पार नहीं लगा सकता है,निष्काम कर्म करना तो बहुत दूर की बात है।नियमित और निरन्तर प्रयास करें:नियमितता ही हमें मंजिल तक पहुँचाती है।चाहे धीरे चले लेकिन निरन्तर और नियमित रूप से अध्ययन करें।
  • निष्काम भाव से अर्थात् कर्त्तव्यपालन की दृष्टि से अध्ययन करें ताकि सुख,कष्ट और विपत्ति से बच सकें। सीखते रहे और सुधार करते रहें।निरन्तर आत्मनिरीक्षण करके त्रुटियों को पहचानें और उनमें सुधार करें।धैर्य रखें और हार न मानें:जीवन में असफलता भी हाथ लगती है।कई बार मार्ग भी नहीं दिखाई नहीं देता परन्तु धैर्य रखने और हार न मानने वाला विद्यार्थी ही सक्सेस प्राप्त कर पाता है।

9.Summary of 7 Amazing Guidelines for Students to Work

  • छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने की 7 गाइडलाइंस के अद्भुत सूत्र (7 Amazing Guidelines for Students to Work):
    (1.)कर्म करने के पीछे क्या मंशा हो सकती है? (What could be the intention behind performing karma?)
    (2.)मजबूरी या दाब-दबाव से कर्म करना (Acting out of compulsion or pressure)
    (3.)फल-प्राप्ति या कामना पूर्ति हेतु कर्म करना (Performing actions for the attainment of results or fulfillment of desires)
    (4.)कामनाओं से मुक्त होने के उपाय (Ways to get rid of desires)
    (5.)आज्ञापालन के लिए कर्म करना (Performing Karma for Obedience)
    (6.)कर्त्तव्य समझकर कर्म करना (Acting as a duty)
    (7.)छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने के सूत्र (Formulas for Karma for Students)
  • छात्र-छात्राओं के लिए कर्त्तव्य कर्म करने हेतु विचारणीय प्रश्न (Questions to Consider for Students to Do Duty):
  • (1.)क्या आप जो कर्त्तव्य कर रहे हैं,उससे सन्तुष्ट हैं? (Are you satisfied with the duty you are doing?)
    (2.)आपको कौनसे कर्म करने से सन्तुष्टि मिलती है? (Which actions do you get satisfaction from?)
    (3.)आप मन या आत्मा में से किसको सन्तुष्ट करने के लिए कर्म करते हैं? (Which of the mind or soul do you work to satisfy?)
    (4.)यदि मन और आत्मा के निर्देशों में विरोधाभास हो तो किसे प्राथमिकता देंगे? (If there is a contradiction in the instructions of the mind and spirit,which one to prefer?)
    (5.)क्या आपने विचार किया है कि आप कर्म किस हेतु (लक्ष्य) से करते हैं? (Have you considered for what purpose (aim) you do your actions?)
    (6.)कर्त्तव्य कर्म करने के लिए आप किससे मार्गदर्शन लेते हैं? स्वयं से या अन्य से और क्यों? कर्म का परिणाम अच्छा नहीं हो तो किसे दोषी मानते हैं और क्यों? (From whom do you seek guidance to perform your duties? From oneself or from others and why? If the result of karma is not good,then whom do you blame and why?)
    (7.)क्या आप दूसरों से मार्गदर्शन लेना पसन्द करते हैं? यदि हाँ तो क्यों,यदि नहीं तो क्यों? (Do you like to seek guidance from others? If yes,why,if not,why?)
    उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने की 7 गाइडलाइंस (Frequently Asked Questions Related to 7 Guidelines for Students to Work) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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10.गर्लफ्रेंड ने बॉयफ्रेंड की आंखें खोली (हास्य-व्यंग्य) (Girlfriend opens boyfriend’s eyes) (Humour-Satire):

  • गर्लफ्रेंड ब्वॉयफ्रेंड की तरफ ऊँगली से इशारा करके बुलाता है।
    ब्वॉयफ्रेंड तत्काल अध्ययन छोड़कर गर्लफ्रेंड के पास आया और बोला:माई डियर क्या बात है?
  • गर्लफ्रेंड:कुछ नहीं,बस मैं तो अपनी ऊँगली की ताकत आजमा रही थी कि इसमें कितनी ताकत है?
  • गर्लफ्रेंड:पर तुम तो मुझे लेक्चर दे रहे थे कि व्यक्ति को निष्काम कर्म (कर्त्तव्य कर्म) करना चाहिए,वो कहाँ गायब हो गया?
  • ब्वॉयफ्रेंड:ये निष्काम कर्म तो मैंने गुरुजी से सुना था।जब उनके पास जाता हूँ तो उनके विचारों से प्रभावित होकर बक देता है।परन्तु तुम्हारे पास आते ही मेरे मन में हलचल मच जाती है।
  • गर्लफ्रेंड:तुम निष्काम कर्म करोगे तो ही परीक्षा में पास होंगे,इस तरह फिसलने से नहीं।
  • ब्वॉयफ्रेंड:सो तो ठीक है।पर आप बताओ 8-10 वर्ष की कोई बच्ची हो तो उसे कामवासना,सम्भोग की भाषा समझ में आएगी क्या? उसी तरह कच्ची उम्र में निष्काम कर्म की भाषा मेरे समझ में आएगी क्या?
  • गर्लफ्रेंड:हूं,तुम्हें कर्त्तव्य कर्म समझ में नहीं आता है,उससे तो दिल में फफोले पड़ जाते हैं और कामुकवृत्ति समझ में आ जाती है।कैसे विद्यार्थी हो?

11.छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने की 7 गाइडलाइंस (Frequently Asked Questions Related to 7 Guidelines for Students to Work) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.निष्क्रियता से क्या आशय है? (What is meant by inaction?):

उत्तरःयदि कोई काम-काज न करके फालतू बैठा रहे तो इसे निष्क्रियता कहा जाएगा।निष्क्रियता शारीरिक कर्म के अभाव को कहते हैं।

प्रश्न 2.स्थितप्रज्ञ किसे कहते हैं? (What is Sthitaprajna?):

उत्तर:अनासक्त कर्म करने वाले को स्थितप्रज्ञ कहते है अर्थात् जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई हो।

प्रश्न:3.तृष्णा किसे कहते है? (What is craving?):

उत्तर:लालसा को तृष्णा भी कहते हैं।तृष्णा का अर्थ है प्यास।शरीर को जो प्यास लगती है उसे तृषा रहते हैं और मन की प्यास को तृष्णा रहते है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र-छात्राओं के लिए कर्म करने की 7 गाइडलाइंस (7 Guidelines for Students to Work) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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