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How Students Can Beautify Their Inner Self?

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1.छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुन्दर कैसे बनाएँ? (How Students Can Beautify Their Inner Self?):

  • छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुन्दर कैसे बनाएँ? (How Students Can Beautify Their Inner Self?) जानिए अपने अन्दर का घोंसला क्या है और उसे कैसे सुन्दर बनाया जा सकता है? सम्पूर्ण डिटेल जिससे आप अपने मन को मन्दिर बना सकें।

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2.भीतर का घरौंदा क्या है और यह छात्र-छात्राओं के लिए क्यों जरूरी है? (What is the inner house and why is it important for students?):

  • हर इनसान अपना एक घरौंदा बनाता है।इसे अपनी मनचाही चीजों से जोड़ता,सजाता एवं सँवारता है।थके-हारे पल में पलभर के लिए इसमें पनाह पाता है। ठीक इसी प्रकार एक घरौंदा और होता है,जो हमारे मानसिक जगत में आकार पाता है।उसे भी स्थूल वस्तुओं के समान अपनी इच्छाएँ,कामनाएँ और कल्पनाएँ (Wishes and fantasies) बुनती हैं।यह बनावट जितनी अच्छी एवं आकर्षक होगी,विद्यार्थी अंदर से उतना ही संतुलित,स्थिर एवं शांत होगा।मन अपनी बनाई इस अनोखी सृष्टि में दो पल ठहरना चाहता है।ईंट,गारा,चूना,सीमेंट से बने घर की सुव्यवस्था के अनुरूप मानसिक जगत की बनावट में भी पवित्रता,शुचिता एवं सौंदर्य का समुचित स्थान होने पर वहाँ मन को बड़ा ही सुकून एवं शांति मिलती है।
  • स्थूलशरीर के निर्वाह के लिए जितना अधिक एवं व्यापक रूप से हम अपने मौलिक जगत में सुंदर एवं शानदार घरौंदा (Spectacular Houses) बनाने का सपना बुनते हैं,क्या उसी ढंग से मानसिक जगत को सजाने-सँवारने में हम सजग,सतर्क एवं सक्रिय होते हैं? जितना श्रम,साधन,समय एवं ऊर्जा का व्यय अपने इस संसार को साकार करने के लिए करते हैं,क्या हम अपने वैचारिक और भावनाओं के तल को सँवारने के लिए तत्पर होते हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ में होता है तो समझा जाना चाहिए कि वह विद्यार्थी इस सृष्टि के सौभाग्यशाली विद्यार्थियों में शुमार होगा,क्योंकि उसकी आंतरिक और बाह्य जगत (Inner and Outer Worlds) दोनों की संरचना सौंदर्य से मंडित होगी।होना ऐसे ही चाहिए।सपना भी ऐसे ही बुनने चाहिए,पर ऐसा होता नहीं है।
  • हम अपने भौतिक जगत में इंद्रिय सुखों को प्राथमिकता देकर इतना अधिक मशगूल हो जाते हैं कि वैचारिक एवं भावनाओं के तल अनछुए,अछूते रह जाते हैं तथा उपेक्षित पड़े रहते हैं।फिर बाह्य ऐश्वर्य और साधनों के सघन अंबार में भी इतनी ही अशांति,असंतोष एवं अशक्ति का अभाव-बोध बना रहता है।जीवन के कई सूत्र हैं,जिन्हें सही ढंग से सुलझाना चाहिए।जीवन के कई पड़ाव एवं पहलू हैं,सभी पर यथोचित एवं समुचित ध्यान देना आवश्यक है।जीवन की गाड़ी दो पहियों से चलती है।एक पहिया यदि कमजोर एवं दुर्बल होगा तो दूसरा कितना भी मजबूत एवं सुदृढ़ क्यों न हो,गाड़ी चलेगी नहीं (The car won’t run),क्योंकि इसे चलने के लिए दोनों पहियों का समरूप होना जरूरी है।हम अपने दैहिक सुखों के विस्तार के लिए आकर्षक संसार तो गढ़ते हैं,इसकी सुख-सुविधा के लिए जीवन की समस्त अनमोल ऊर्जा को खपा भी देते हैं,पर इसमें प्राणों का रंग भरने वाले मानसिक जगत को उतना ही उपेक्षित भी करते हैं।परिणामस्वरूप जीवन का एक पहलू सघन हो जाता है,शेष तो उजड़े वीरान खंडहर के समान पड़ा रह जाता है।

3.मन की शान्ति और सकारात्मक सोच का महत्त्व (Importance of Peace of Mind and Positive Thinking):

  • घर बनाने में वास्तुकला के अनुरूप सभी चीजों की सुव्यवस्था पर ध्यान दिया जाता है,जो जहाँ का है,वह वहीं स्थान पाता है।डायनिंग,किचन,बाथरूम,गार्डन आदि सभी अपने-अपने स्थान पर होते हैं और इन जगहों की वस्तुएँ भी अपने-अपने स्थान पर आकर्षण का केंद्र बनती हैं।वास्तु का आधुनिक स्वरूप अद्भुत एवं अनोखा है।इसका सौंदर्य देखते ही बनता है।यह सच वास्तुकला का है,जो अपनी सुव्यवस्था,सुरम्यता एवं सौंदर्य की अभिव्यक्ति करती है।
  • यहाँ पर थका-हारा शरीर विश्राम पाता है और सुख अनुभव करता है।ठीक इसी प्रकार का वास्तु-व्यापार क्या हम अपने विचार और भावनाओं के घरौंदों को सजाने-सँवारने (Decorating the house) में करते हैं? विचारों,कल्पनाओं,कामनाओं की काट-छाँट एवं भावनाओं के बेमेल रंगों को हटाकर सुमेल करने की सुव्यवस्था में जुटते हैं? इसके जवाब में एक कड़वा सच उभरता है और कहता है:नहीं!
  • हमारे वैचारिक जगत एवं संवेदित संसार बिखरे,विभाजित एवं खंडित पड़े रहते हैं।इनकी सुव्यवस्था,सजावट एवं सुरम्यता की बात तो दूर,इनकी ओर ताकने-झाँकने का तनिक भी समय नहीं निकल पाता।दिन निकलता है,दैनिक क्रिया-व्यापार के साथ शुरू होकर अध्ययन एवं जाॅब के लिए स्किल तराशने में दिन खप जाता है।इसी ऊहापोह में दिन ढलता है,शाम होती है और श्रम से थका शरीर रात्रि में नींद के आगोश में पनाह पाता है,पर ऐसा भी तो नहीं है।
  • इंद्रिय सुखों की अधिक तलाश में,स्वार्थों की आँधी (Storm of Selfishness) चलती है और इसके लिए किसी भी तरह से धन प्राप्ति का उपाय खोजा जाता है।इस अंतहीन यात्रा में अतृप्ति की ज्वाला देह एवं मन को क्लांत कर देती है और सामान्य नींद के लिए भी जाने कितने जतन किए जाते हैं।इस राह में मिलता कुछ नहीं है,बल्कि रहा-सहा भी बिखर-बँट जाता है।घरौंदा उजड़ जाता है।
  • ऐसी ही अव्यवस्था हमारे मानसिक जगत की है।जो सोचना है,सोचा नहीं जाता।वृथा कल्पनाओं से हम डरे-सहमे रहते हैं।कामनाओं-वासनाओं का अंधड़ मन को सूखे पत्ते के समान उड़ाता रहता है।बेतरतीब,बेढंगे एवं नकारात्मक विचार हमें रह-रहकर काँटों के समान चुभते रहते हैं।इन कँटीले विचारों से लहू-लुहान मन भावनाओं के तल पर पनाह माँगता है,पर वहाँ तो और भी बुरा हाल है।कोरी भावुकता (Blank sentimentality) से ऊर्जा का स्रोत सूख सिमटकर भावनाओं की हरियाली को असमय वीरान बना देता हैं।शुष्क,पथरीली संवेदना पिशाच के समान डोलती रहती है और स्वयं व औरों को डराती रहती है। सूखी-बंजर भावनाओं से सारे संबंध एवं रिश्ते रेत के समान बिखरे रहते हैं।ऐसे में मन को कैसे और कहाँ ठिकाना मिले ? भावनाओं को कहाँ गति मिले?
  • कल्पनाओं की ऊँची उड़ानों से कभी उपनिषद् सृजित हुए थे।विचारों की अनोखी ऊर्जा से कभी विविध दर्शनों की सृष्टि हुई थी।भावनाओं की उदात्त किरणों में कभी काव्य-महाकाव्य निखर उठे थे,पर आज वह आंतरिक वास्तुकला (Interior Architecture) कहाँ खो-सिमट गई है,इसका एक अंशमात्र भी विरासत में मिला नहीं।देने वालों की असमर्थता रही या पाने वालों की असभ्यता।चाहे जो भी हो,आंतरिक जीवन की विभीषिका बड़ी ही विपन्न एवं वेदनामयी है। आंतरिक जगत को बाह्य जगत के घरौंदों के समान यदि सँभाला सुव्यवस्थित नहीं किया गया तो वहाँ खंडहरों में उलटा लटकने वाले चमगादड़ों की भयानक चीख-पुकार ही सुनाई देंगी।बाहरी ऐश्वर्य एवं विलास की कितनी भी साधन-सुविधा जुटें,आंतरिक कंगाली को छिपाया नहीं जा सकता।
  • How Students Can Beautify Their Inner Self? यह प्रश्न हर छात्र को मथता है।आइए जानते हैं इसका उत्तर।

4.छात्रों के जीवन को उत्कृष्ट बनाने के तरीके (Ways to Make Inner Life Excellent for Students),छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुन्दर कैसे बनाएँ के तरीके (Way on How Students Can Beautify Their Inner Self?):

  • आवश्यकता है ऐसी ही आधुनिक वास्तुकला की,जो घरों को ही नहीं,हमारे विचारों,कल्पनाओं,इच्छाओं,भावनाओं,संवेदनाओं को तराशे,निखारे,सजाए एवं सँवारे,ताकि विचारों में फिर वही ताकत,कल्पनाओं में उड़ान भरने की ऊर्जा तथा भावनाओं में पुलकन छलक उठे।देह को आकर्षक घर मिले,विचारों को सुंदर मन एवं मन को संवेदनाओं की शीतल छाँह मिले।इसके लिए ऐसे कुशल मार्गदर्शक की आवश्यकता है,जो व्यावहारिक जगत की शालीनता,विनम्रता एवं शिष्टाचार के संग आंतरिक जगत में विचार करना,कल्पनाओं में रंग भरना तथा भावनाओं को नई गति देना सिखा व समझा सके।इसी से आंतरिक जीवन का घरौंदा सुंदर एवं आकर्षक बन सकता है। बाहरी जीवन की वास्तुकला के समान आंतरिक जीवन की वास्तुकला (जीवन जीने की कला) की महत्ता एवं भूमिका उतनी ही व्यापक एवं अपेक्षित है।इसी में जीवन के सभी आयामों का समुचित विकास सन्निहित है।

(1.) अच्छी आदतों और नैतिक मूल्यों का विकास (Developing Good Habits and Moral Values):

  • एक निद्यार्थी के लिए अच्छी आदते हैं:समय पर सोना,समय पर उठना,समय से अध्ययन करना,नियमित रूप से अध्ययन करना।नियमित रूप से ध्यान,योगासन और प्राणायाम करें।इससे आपमें स्व-अनुशासन पैदा होगा।अच्छी आदतों को उचित विधि से करने से आत्मानुशासन कायम होता है परन्तु अच्छी आदतों को गलत तरीके से करने पर वे ही हमारे अनुशासन को बिगाड़ती हैं।
  • जैसे एक विद्यार्थी के लिए सबसे जरूरी है अध्ययन करना।परन्तु आप रात-रातभर जागकर अध्ययन करेंगे या कभी सुबह अध्ययन कर लिया,कभी शाम को और कभी रात को अध्ययन कर लिया तो इससे आप बीमार पड़ जाएगे (रातभर पढ़ने से) या आपमें अध्ययन की सही आदत विकसित नहीं होगी।अध्ययन की सही आदत विकसित होती है सही अभ्यास से।अभ्यास तो चोर-लुटेरे भी करते हैं लेकिन वो गलत अभ्यास करते हैं।रात-रातभर जागकर पड़ने वाले सही अभ्यास नहीं करते हैं।शरीर को पूर्ण विश्वाम भी जरूरी है।अपवादस्वरूप मामलों में पढ़ना अलग बात है।

(2.) नकारात्मक विचारों से दूरी बनायें (Keep distance from negative thoughts):

  • नकारात्मक विचार हमारी ऊर्जा को खण्डित करते हैं जबकि विद्यार्थी काल में एकजुट ऊर्जा (एकाग्रता) (concentration) की अधिक जरूरत होती है।नकारात्मक विचारों से मुक्त होने के लिए कुछ उपाय है,जिन्हें करने से आपकी ऊर्जा बिखरेगी नहीं।प्रातःकाल नित्यकर्मों से निवृत्त होकर 10-15 मिनट ध्यान करें जिससे मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। हमेशा अच्छे विद्यार्थियों के साथ संगत करें।
  • आपके मनोबल को तोड़ने (Breaking morale) वाले विद्यार्थियों से दूरी बनाकर रखें।अच्छे सत्साहित्य का अध्ययन करें।और रोज 5 मिनट का समय निकालकर अथवा सोते समय अपने आपका आत्म-विश्लेषण करें और जो भी त्रुटियाँ,दोष दिखाई दें उन्हें दूसरे दिन न करने का संकल्प लें।इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास करने से आप नरारात्मक चिंतन करने से बच सकते हैं।ध्यान रखें:थोड़ा-सा नकारात्मक चिंतन जो आपको अध्ययन करने के लिए प्रेरित करता है,ठीक है वरना नकारात्मक चिंतन हमारे शरीर को जर्जर और खोखला कर देता है।
  • सकारात्मक सोच की आदत डालें,हर परिस्थिति में कुछ न कुछ अच्छा होता है परन्तु आप उस अच्छाई को सही दृष्टिकोण से ही देख पाएंगे।आशावादी रहें।सकारात्मक सोच और आशावादी रहने (Stay optimistic) से आपकी अध्ययन के प्रति रुचि बनी रहेगी।नकारात्मक और सकारात्मक सोच का उदाहरण : आज तो गणित की एक्सरसाइज के केवल दो ही सवाल हल कर पाया (नकारात्मक सोच),एक्सरसाइज कुछ कठिन थी फिर भी दो सवाल तो हल कर ही लिए (सकारात्मक सोच)।

(3)सत्साहित्य और पुस्तकों से मित्रता (Friendship with Good Literature and Books):

  • आज चाहे ऑनलाइन माध्यम हो गए हैं,सीखने के अनेक टूल विकसित हो गए।परन्तु पुस्तकों से अध्ययन करने में जो एकाग्रता सधती है वह बेजोड़ है (The concentration she maintains is unmatched)।पुस्तकें हमें बिना दण्डित किए ज्ञान का भण्डार उपलब्ध करा देती हैं।जबकि अच्छे लोगों और इंटरनेट के जरिए ज्ञान प्राप्त करने से आपको क्रिया-प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।हालांकि सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति तो क्रिया-प्रतिक्रिया से भी सीख लेता है।
  • अतः ज्ञान जहाँ से भी मिले,निरन्तर सीखते व लेते रहना चाहिए।लेकिन केवल पढ़‌ते ही पढ़‌ते न रहें।हम आपको पढ़ाकू बनने के लिए नहीं कह रहे हैं।पढ़े हुए पर चिन्तन-मनन करें और उसे आचरण में उतारें।बिना आचरण में उतारे आपके अन्दर का इंसान का व्याक्तित्व नहीं बनेगा।आचरण से ही व्यक्तित्व ठोस और मजबूत आकार लेता है।

(4.)लक्ष्य को सही दिशा दें (Orient the goal):

  • लक्ष्य को सही दिशा तभी दे सकेंगे जब आप सही लक्ष्य का चुनाव करेंगे (Will choose the target)।बिना लक्ष्य के अँधेरे में तीर चलाने के समान चलना है,जो सही निशाने पर नहीं लगता है।बिना लक्ष्य के चलना केवल भटकना है और भटकने वाले की कोई मंजिल नहीं होती है।जब मंजिल नहीं है तो उसे पाना भी नामुमकिन हैं।सही और स्पष्ट लक्ष्य के लिए प्रयास भी करना पड़ता। है।मार्ग में कई अड़चने और बाधाएँ भी आती है।परन्तु विवेक,साहस और धैर्य से उन सब बाधाओं को आप पार करते चले जाते हैं।
  • इस शेर को याद रखें:मुश्किले दिल के इरादे आजमाती है।स्वप्न के परदे निगाहों से हटाती है।हौसला मत हार गिरकर,ओ मुसाफिर ठोकरे इंसान को चलना सीखाती हैं।
  • लक्ष्य को पाने में जिस-जिस स्किल की जरूरत हो उसे सीखें,यदि नहीं सीख सकते हैं तो सहयोग लें।यदि सहयोग नहीं ले सकते हैं तो स्किल वाले व्यक्ति को हायर करें (Hire the person)।स्किल सीख लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अपने आपको अपडेट भी करते रहे।आज का युग तकनीकी का युग है और इस तकनीकी के युग में यदि आप अपने आपको अपडेट और अपग्रेड नहीं करेंगे तो पिछड़ते चले जाएंगे।इस दुनिया में चमत्कार (प्रतिभा) को ही नमस्कार किया जाता है।

(5.)बडों का आदर करें (Respect elders):

  • अपने माता-पिता,बुजुर्गों और बड़ों का आदर करें क्योंकि माता-पिता की वजह से हम इस संसार में हैं और बड़ों के आशीर्वाद से हम आगे बढ़ते हैं।वे हमें गलात राह से भटकने से बचाते हैं।वे हमारे लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं।
  • बड़ों के प्रति आदरभाव से हम प्रेम और सद्‌भाव और विनम्रता का गुण विकसित करते हैं।अच्छे सम्बन्ध,अच्छे रिश्ते और प्रेमपूर्ण व्यवहार के साथ प्राप्त की गई सफलता ही हमें सच्ची आत्मसंतुष्टि देती है।
  • आप देखेंगे की सुन्दर आंतरिक जीवन का हमारे करियर और छात्र जीवन पर अलौकिक प्रभाव पड़ता है।वरना इन गुणों के बिना जीना एक तरह से सराय में जीवन बिताने के समान हैं,वह हमारा घरौंदा नहीं हो सकता है।घरौंदा वही हो सकता है जिसमें आत्मीयता हो,जिम्मेदारी वहन करना जानता हो,विनम्रता हो,मधुरभाषी हो और सबके प्रति समभाव रखता हो तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हो।
  • How Students Can Beautify Their Inner Self?

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छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुंदर कैसे बनाएं की मुख्य बातें (HIGHLIGHTS of How Students Can Beautify Their Inner Self?):

  • (1.) भीतर का घरौंदा क्या है और यह छात्र-छात्राओं के लिए क्यों जरूरी है? (What is the inner house and why is it important for students?)
    (2.) मन की शान्ति और सकारात्मक सोच का महत्त्व
    (Importance of Peace of Mind and Positive Thinking)
    (3.)छात्रों के लिए आंतरिक जीवन को उत्कृष्ट बनाने के तरीके (Ways to Make Inner Life Excellent for Students)
    (4.) अच्छी आदतों और नैतिक मूल्यों का विकास
    (Developing Good Habits and Moral Values)
    (5.) नकारात्मक विचारों से दूरी बनाएं (Keep distance from negative thoughts)
    (6.) सत्साहित्य और पुस्तकों से मित्रता (Friendship with Good Literature and Books)
    (7.) लक्ष्य को सही दिशा दें (Orient the goal)
    (8.) बड़ों का आदर करें (Respect elders)
  • छात्र के आंतरिक जीवन को मधुर बनाने वाले कड़वे प्रश्न
  • (1.) क्या आप अपने ओतरिक गुणों का निरीक्षण करते हैं?
    (2.) क्या आपको यह अहसास होता है कि आन्तरिक गुणों का विकास करने की जिम्मेदारी आपकी स्वयं की है?
    (3.) क्या आपके किसी भी तरह से सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति आपको आंतरिक गुणों को विकसित करने का सुझाव देते हैं?
    (4.)आप‌के आंतरिक गुणों का विकास न होने पर किसे जिम्मेदार मानते हैं? स्वयं को,माता-पिता या शिक्षक को या किसी और को? क्यों?
    (5.) क्या आप वास्तव में अब तक नहीं किया है तो अब पालन करोगे ‌या केबल बातचीत ही करोगे?
    (6.) क्या आप आन्तरिक मुंगों को विकसित करना जरूरी मानते हो? हां या नही।यहि हाँ तो कब से,यदि नहीं क्यों नहीं?
    (7.) क्या आप यह मानते है कि आंतरिक गुण अपने आप विकसित हो जाएंगे और जाॅब ( डिग्री) के लिए प्रयास करना होगा (15-20 वर्ष)? आखिर ऐसा क्यों?
    उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुन्दर कैसे बनाएँ? (How Students Can Beautify Their Inner Self?) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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5.छात्र के आन्तरिक गुणों का अजब विकास (हास्य-व्यंग्य) (The strange development of the student’s inner qualities) (Humour-Satire):

  • छात्र के आन्तरिक गुणों का अजब विकास (व्यंग्य) (The strange development of the student’s inner qualities) (Humour-Satire):
  • मित्र (शुभम से):इस तरह मुँह लटकाएं देवदास ( उदास) की तरह कैसे बैठे हो?
  • शुभम (मित्र से):क्या करुं यार जॉब नहीं मिल रहा है;डिग्री को तो कोई पूछता ही नहीं है।
  • मित्र:क्या पूछते हैं?
  • शुभम:तुम्हारे पास स्किल है और तुम्हारे अन्दर क्या-क्या गुण हैं?
  • मित्रःतुमने तो कम्प्यूटर कोर्स किया हुआ है न?
  • शुभम:पेपर घोटाले हुए हैं तब से स्किल के साथ-साथ ईमानदारी,सच्चाई आदि गुणों को भी पूछा जाने लगा है।
  • मित्र (व्यंग्यपूर्वक):ईमानदारी,सच्चाई आदि का भी कोर्स कर लो।
  • शुभम:एक कोचिंग में गया था।वहाँ मुझे मोबाइल पर निबन्ध लिखने के लिए कहा और कहा कि इससे सचाई का गुण विकसित होगा।मैंने मोबाइल मांगा उस पर लिखने के लिए।मुझे यह कह कर भगा दिया बुद्धू-कहीं के,भाग जाओ।
  • मित्र:अरे आन्तरिक गुणों का भी कोई कोर्स होता है? और कर भी लो तो तुम्हारे खुद के एफर्ट्स पर निर्भर करेगा।

6.छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुन्दर कैसे बनाएँ? (Frequently Asked Questions Related to How Students Can Beautify Their Inner Self?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्नः1.दयालु और सेवा आदि को छात्र के लिए वर्जित किया है,स्पष्ट करें। (Kindness and service etc. are forbidden to the student,clarify):

उत्तर:छात्र के लिए अतिसेवा वर्जित की गई है क्योंकि अत्यधिक सेवा से उसका समय नष्ट होगा।परन्तु कुछ न कुछ सेवा,परोपकर,दूसरों की मदद अवश्य करनी चाहिए।वरना बड़े होने पर ये गुण विकसित होना मुश्किल है।

प्रश्न:2.छात्र को कौनसे कर्म नहीं करने चाहिए? (What deeds should a student not do?):

उत्तरःआलस्य,लापरवाही,काम,क्रोध,लोभ आदि बुरी आदतों पर नियंत्रण रखना चाहिए।गीता में काम,क्रोध और लोभ को नरक का द्वार कहा है।अतः सावधान रहें।

प्रश्न:3.छात्र का जीवन पवित्र कैसे बनें? (How to make a student’s life sacred?), :

उत्तर:संयम,सच्चाई,ईमानदारी,नैतिकता और सदाचार आदि का पालन करने से छात्र जीवन ही नही पूरा जीवन पवित्र,निर्मल,ओजस्वी और तेजस्वी बनता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र अपने भीतर का घरौंदा सुन्दर कैसे बनाएँ? (How Students Can Beautify Their Inner Self?) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • How Students Can Beautify Their Inner Self? का उत्तर मिल गया न? *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

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