How to Overcome Self-Reproach and Guilt:A Complete Guide for Students
1.आत्म-ग्लानि और अपराध बोध पर कैसे काबू पाएं:छात्र-छात्राओं के लिए एक कम्प्लीट गाइड (How to Overcome Self-Reproach and Guilt:A Complete Guide for Students):
- आत्म-ग्लानि और अपराध बोध पर कैसे काबू पाएं (How to Overcome Self-Reproach and Guilt) क्योंकि यह छात्र-छात्राओं की प्रगति में बाधक है।छात्र अक्सर कम अंक आने,टालमटोल (पढ़ाई टालने) या माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने पर आत्म-ग्लानि (अपने आपको कोसने) का शिकार हो जाते हैं।
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2.आत्म-ग्लानि और अपराध बोध का अर्थ (The Meaning of Self-Reproach and Guilt):
- हमारे जीवन की यात्रा तो गर्भावस्था से ही प्रारंभ हो जाती है और जीवनपर्यंत चलती रहती है।जीवन की इस यात्रा में हमें नए-नए अनुभव होते हैं,हम बहुत कुछ नया सीखते,जानते और समझते हैं।हमारी कुछ आवश्यकताएँ,इच्छाएँ एवं कर्त्तव्य होते हैं,जिन्हें हम पूरा करना चाहते हैं।सच देखा जाए तो संपूर्ण जीवन ही एक संघर्ष होता है और जीवन के इस संघर्ष में हमसे जाने व अनजाने कुछ गलतियाँ होती ही रहती हैं।
- किसी महापुरुष ने सच ही कहा है कि जीवन के संघर्ष में भूलों की धूल तो उड़ेगी ही।हम सभी ने अपने भूतकाल में कई गलतियाँ की हैं,वर्तमान समय में भी हमसे गलतियाँ होती ही रहती हैं और भविष्य में भी ऐसा होता ही रहेगा।हमसे कुछ गलतियाँ जान के होती हैं तो कुछ अनजाने में,किंतु कोई भी सामान्य छात्र-छात्रा या मनुष्य इससे ऊपर नहीं उठा है।
- प्रायः अधिकतर छात्र-छात्रा यही चाहते हैं कि वे हमेशा बिलकुल सही काम करें और उनसे कोई गलती न हो,लेकिन जाने व अनजाने कोई गलती हो जाती है तो वे बहुत दुखी व परेशान हो जाते हैं।अपने प्रति पूरी सजगता रखना और कोई गलती न करना महत्त्वपूर्ण बात है,लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपनी गलतियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया संतुलित एवं व्यावहारिक हो।
- जब हम यह अनुभव करते हैं कि हमारे द्वारा कोई गलती हुई है,जिसके लिए हम अपने आप को दोषी व जिम्मेदार मानते हैं तो उस अवस्था में हम आत्मग्लानि अनुभव करते हैं।आत्मग्लानि एक संज्ञानात्मक व भावात्मक अवस्था है,जिसमें हम अपने आप को किसी गलती या अपराध के लिए दोषी ठहराते हैं।आत्मग्लानि हम उस समय भी अनुभव करते हैं,जब हम यह मानते हैं कि हमारे द्वारा किसी सामाजिक या नैतिक नियम अनुशासन की अवहेलना हुई है या जब हम यह अनुभव करते हैं कि हमारा वर्तमान जीवन अपने आदर्शों एवं अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है।
- प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ब्रोमेस्टर का कहना है कि आत्मग्लानि एक संवेगात्मक अवस्था है जिसमें छात्र-छात्रा अपने आप को उस व्यवहार के लिए जिम्मेदार व दोषी ठहराता है,जिसे वह नहीं करना चाहता।वास्तव में आत्मग्लानि एक द्वंद्व की अवस्था है,जिसमें क्या सही और क्या गलत है? या जो नहीं करना था और जो किया गया,के बीच सतत संघर्ष चलता रहता है।कई बार आत्मग्लानि उस समय भी अनुभव होती है जब हमारे द्वारा जाने या अनजाने किसी दूसरे छात्र-छात्रा का कोई नुकसान हो जाता है।
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3.आत्म-ग्लानि और अपराध बोध किसके प्रति होती है? (To whom is the sense of self-reproach and guilt there?):
- हमारे अंदर आत्मग्लानि की भावना (Feelings of self-reproach) किसी के भी प्रति हो सकती है।विशेष कर यह संभावनाएँ निकटतम संबंधों के साथ बढ़ जाती हैं,क्योंकि वहाँ पर बहुत सारी अपेक्षाएँ,वादे,कर्त्तव्य,प्यार व विश्वास इन रिश्तों के साथ जुड़े होते हैं।जब हम अपने आप को इनके अनुरूप नहीं पाते तो आत्मग्लानि की भावना का उदय होता है। उदाहरण के लिए जब हम किसी की मदद करने से मना कर देते हैं या किसी की अपेक्षाओं को नकारते (Defying someone’s expectations) हैं या अपना कोई कर्त्तव्य पूरा नहीं करते तो उस अवस्था में प्रायः आत्मग्लानि की भावना उत्पन्न होती है।
- कई बार हम अपनी आदतों के कारण भी आत्मग्लानि अनुभव करते हैं।समाज के बहुत सारे नियम-अनुशासन हमारी सुरक्षा व विकास को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।जिनमें से कुछ वर्तमान समय में उपयोगी नहीं होते,किंतु हम उनका बिना सोचे-समझे (Mindless adherence) पालन करते हैं और जब कभी इनका पालन नहीं कर पाते तो उस स्थिति में आत्मग्लानि अनुभव करते हैं।कभी-कभी आत्मग्लानि की भावना उस समय भी उत्पन्न हो जाती है,जब हम समाज या धर्म द्वारा स्थापित किसी उच्च सिद्धांत के अनुरूप नहीं रह पाते।
- ग्लानि की भावना दूसरों में भी उत्पन्न की जा सकती है।कुछ लोग दूसरों को नीचा दिखाने (Putting others down) के लिए आत्मग्लानि को एक उपकरण के रूप में उपयोग में लाते हैं और उनकी हर छोटी से छोटी गलती पर व्यंग्य एवं दोषारोपण करने लग जाते हैं,जिसके कारण व्यक्ति में धीरे-धीरे आत्मग्लानि की भावना उत्पन्न हो जाती है।व्यक्तिगत संबंधों में इस तरह से किसी में आत्मग्लानि की भावना को उत्पन्न करना बहुत घातक होता है।अधिकतर लोग इस तरह का व्यवहार छात्र-छात्राओं के साथ करते हैं।छात्र-छात्राओं के व्यवहार को नियंत्रित करने,उनसे मनचाहा कार्य करवाने के लिए छात्र-छात्राओं की छोटी-छोटी गलतियों (Students’ Minor Mistakes) को बढ़ा-चढ़ाकर कह देना,उन्हें दोषी कहकर सारी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना छात्र-छात्राओं के विकास के लिए बहुत घातक होता है।जो लोग छात्र-छात्राओं के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए इस तरह का व्यवहार करते हैं,वे वास्तव में इसके हानिकारक परिणामों के बारे में नहीं जानते।
- ऐसा करने से छात्र-छात्राओं में कई तरह की समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं जैसे:सामाजिक अलगाव,डरे व सहमे से रहना,आत्मकेंद्रित हो जाना (Self-centeredness),अनिद्रा,पहल न करना,चुपचाप बैठे रहना,अवसाद,आत्मसम्मान व आत्मविश्वास का अभाव होना।जब हम छात्र-छात्राओं की छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें दोषी ठहराते और भला-बुरा कह देते हैं तो धीरे-धीरे उनमें आत्मग्लानि की भावना पनपने लगती है।जो भविष्य में किसी जटिल समस्या का कारण बन सकती है।
- साइकोपैथ (Psychopath) एक ऐसी मानसिक विकृति की अवस्था है,जिसमें व्यक्ति को गलती करने पर भी कोई आत्मग्लानि नहीं होती,बल्कि वह दूसरों को नुकसान पहुँचाकर उन्हीं पर ही दोषारोपण करता है।ऐसे व्यक्तियों में नैतिकता का अभाव होता है।वे किसी के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं।
4.आत्म-ग्लानि व अपराध बोध का प्रभाव (The Negative Impact of Self-Reproach and Guilt):
- आत्मग्लानि के कारण छात्र-छात्रा मूर्खतापूर्ण व्यवहार करता है,अपनी निंदा करता (Slanderers) है और स्वयं के प्रति दुर्व्यवहार करने लग जाता है,जिसके कारण उसका जीवन तनावपूर्ण हो जाता है।कभी-कभी छात्र-छात्रा दूसरों के साथ हुई किसी दुर्घटना के लिए भी स्वयं को ही जिम्मेदार ठहराता है और अपने आप पर ही दोषारोपण करने लग जाता है।प्रायः यह भी देखा गया है कि जब छात्र-छात्रा आत्मग्लानि के लिए किसी और को नुकसान नहीं पहुँचा पाता तो ऐसी अवस्था में वह अपने आप को ही दंड देना (Punishing yourself) प्रारंभ कर देता है।अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की भी उपेक्षा कर देता है और अपने आप को समस्त सुख-सुविधाओं से वंचित कर देता है और कभी-कभी तो अपने आप को दंड देने के लिए बहुत बड़ा कठोर कदम भी उठा लेता है।आत्मग्लानि से छात्र-छात्रा के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।ऐसा छात्र-छात्रा अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है एवं उसमें प्रायः द्वंद्व की स्थिति बनी रहती है कि क्या सही है एवं क्या गलत।इसके कारण वह कोई निर्णय नहीं ले पाता (No one can make a decision) और हर छोटी-छोटी गलती के लिए अपने आप को दोषी ठहराता है एवं अपने आप को बुरा व्यक्ति मान बैठता है।यदि इनका सही समय पर निदान न हुआ तो यह स्थिति जटिल मनोरोग बन सकती है।
5.आत्म-ग्लानि का सकारात्मक प्रभाव (The Positive Impact of Self-Reproach and Guilt):
- आत्मग्लानि एक सामाजिक कारक है जिसे हम अपने सामाजिक विकास के दौरान परिवार,विद्यालय,आस-पास के परिवेश व कार्यक्षेत्र से सीखते हैं।आत्मग्लानि एक सकारात्मक अभिप्रेरक के रूप में भी कार्य करती है।वास्तव में आत्मग्लानि एक सांवेगिक चेतावनी का चिह्न होती है।जो यह बताती है कि हमारे द्वारा किसी सामाजिक या नैतिक नियम-अनुशासन (Moral Rules Discipline) की उपेक्षा या अवहेलना हुई है।प्रायः छात्र-छात्रा आत्मग्लानि की भावना के कारण ही समाज द्वारा निर्धारित नैतिक मूल्यों को याद रख पाते हैं।
- आत्मग्लानि की भावना के बिना हम न कभी अपनी किसी गलती का एहसास कर पाते हैं और न ही अपने आप को सुधार पाते हैं,क्योंकि आत्मग्लानि की अवस्था में छात्र-छात्रा अपने आप को दोषी व जिम्मेदार समझता है एवं इस घुटन की भावना से उभरने व बचने के लिए कुछ सकारात्मक प्रयास करता है।आत्मग्लानि हमें अपने किए गए व्यवहार का विश्लेषण करने की प्रेरणा देती है।यह हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण उपकरण की तरह सही व गलत के बीच का एक आदर्श मानक स्थापित करने में मदद भी करती है।
6.आत्म-ग्लानि से उबरने के उपाय (Ways to overcome Self-Reproach):
- आत्मग्लानि की भावना से उबरने के कई उपाय हैं,जिन्हें अपनाकर हम इस भावना से आसानी से मुक्त हो सकते हैं।स्वयं के द्वारा कोई गलती होने पर आत्मग्लानि की भावना से ग्रसित होकर अपने ही प्रति दुर्व्यवहार करना,दंड देना,अपना ध्यान न रखना या अपने प्रति कोई कठोर कदम उठा लेना कोई समाधान नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण है अपनी किसी भी गलती को मुक्त रूप से स्वीकारना (Accepting the Mistake Freely) और अपने आप को उदारतापूर्वक क्षमा करना।छात्र-छात्रा को स्वयं से यह अपेक्षा कभी नहीं रखनी चाहिए कि हमसे कभी कोई गलती नहीं हो सकती;क्योंकि संसार में कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं है।
गलतियाँ सभी से होती हैं और कोई भी साधारण छात्र-छात्रा इससे परे नहीं है,किंतु मात्र गलतियों को स्वीकार कर स्वयं को क्षमा कर देना ही पर्याप्त नहीं है। अपनी हर गलती को स्वीकार करने के साथ उसको दूर करने हेतु क्षतिपूर्ति के लिए शोधन कर्म (Refinement) अवश्य करें।शोधन कर्म अर्थात अपने आप को सकारात्मक दंड देने के लिए किया गया शारीरिक या मानसिक तप और साथ ही दोबारा उस गलती को न दोहराने का दृढ़ संकल्प। - अक्सर छात्र-छात्रा शोधन कर्म के नाम पर अपनी गलतियों के सुधार के लिए थोड़ा-बहुत प्रयत्न करते हैं या कुछ दिन करते हैं और थोड़े दिनों के बाद फिर से वही गलतियाँ दोहराते हैं।चूँकि उन्होंने शोधन कर्म कर लिया था,इसलिए दोबारा गलती करते समय यह सोचकर सचेत नहीं हो पाते कि इसका भी शोधन कर्म कर लेंगे,लेकिन यह तरीका गलतियों के सुधार के लिए उपयुक्त नहीं है।
- जान-बूझकर बार-बार गलतियाँ होने का अर्थ ही है कि छात्र-छात्रा अपनी आदतों के वशीभूत होकर गलतियाँ कर रहा है।अतः अपनी आदतों को सुधारने (Improving Habits) का प्रयास करना चाहिए,अन्यथा बुरी आदतें छात्र-छात्रा का साथ आसानी से नहीं छोड़ती।संकल्पपूर्वक अपनी गलतियों को न दोहराते हुए शोधन कर्म के द्वारा अपने अंदर के दुर्गुणों का निवारण करना और अपने ‘स्व’ को निर्मल,स्वच्छ करना यही सबसे उचित उपाय है।
- इसके साथ-साथ छात्र-छात्रा को स्वाध्याय भी करना (Also doing self-study) चाहिए।इससे मानसिक स्वास्थ्य का धरातल सुदृढ़ बनता है और इसमें निहित महापुरुषों के जीवन-प्रसंग छात्र-छात्रा को सतत प्रेरणा देते हैं।अतः जीवन में समय-समय पर शोधन कर्म अपनाना चाहिए और इसके साथ स्वयं को शुभ कर्मों में नियोजित करना चाहिए जैसे:दूसरों की मदद करना,सहपाठियों की अध्ययन या किसी प्रकार से सहायता करना,गरीब छात्र-छात्राओं की मदद करना,किसी को भी शारीरिक,मानसिक व भावनात्मक कष्ट न देने का संकल्प करना,दूसरों के साथ छल न करना बल्कि उनके विकास में सहयोग करना आदि।
इन शुभ कर्मों से छात्र-छात्रा का अंतकरण निर्मल बनता है।लोभ,अहंकार की जड़ें टूटती हैं और दूसरों के प्रति संवेदना विकसित होती है,जिससे छात्र-छात्रा के चित्त में गहराई से जमी हुई आत्मग्लानि की गाँठें खुलती हैं।
7.छात्र-छात्राएँ आत्म-ग्लानि से कैसे उबरें? (How do students overcome Self-Reproach?):
- आत्म-गौरव को अंकों से अलग करना (separating self wooth from Marks):विद्यार्थी को यह समझना चाहिए कि उनका आत्म-गौरव,उसकी मार्कशीट या किसी एक परीक्षा से तय नहीं होती।सीखने की प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है और इस सीखने की प्रक्रिया में कम अंक आना,अपेक्षा से कम अंक आना या अनुत्तीर्ण होने की प्रक्रिया चलती रहती है। सीखने की प्रक्रिया में विफलता भी उसका हिस्सा है।
- विलम्ब चक्र (Procrastination cycle):पढ़ाई न करने पर जो अपरोध बोध होता है,वो उन्हें और अधिक तनाव देता है।इसको तोड़ने के लिए थोड़ा पढ़ें लेकिन नियमित रूप से पढ़े।धीरे-धीरे नियमितता से आप अधिक समय तक पढ़ सकेंगे और पढ़ा हुआ भी समझ में आने लग जाएगा।
- ग्रोथ माईंडसेट बनाम फिक्स्ड माईंडसेट (Growth mindset vs Fixed mindset):मुझसे अध्ययन नहीं होगा या मैं ऐसा नहीं कर सकूँगा (self-reproach) को मैं इस बार अपनी गलती से सीखूँगा (Growth) में बदलना सीखें।हर छात्र-छात्रा में अपार क्षमता होती है इसलिए अपनी क्षमता पर ब्रेक लगाने (fixed mindset) के बजाय ग्रोथ करने की तकनीक अपनाएं।
- खुद पर दया (Self-compassion):जैसे हम अपने किसी मित्र या सहपाठी को गलती होने पर दिलासा देते हैं,वैसे ही खुद को भी एक दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए।याद रखिए विद्यार्थी का सबसे बड़ा दोस्त वो खुद होता है और सबसे बड़ा दुश्मन भी वो खुद ही होता है। यदि आप अपनी गलतियों को समझकर उन्हें दूर करते हैं तो आप अपने सबसे बड़े मित्र हैं और यदि आप अपनी गलतियाँ में सुधार नहीं करते हैं तो आप अपने आपके सबसे बड़े शत्रु हैं।
- थोड़ी गलती हमें बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है,लेकिन लगातार खुद को दोष देना और अवसाद बढ़ाना है,जिसे पढ़ाई में मन लगना बिल्कुल बन्द हो जाता है।
गलती को स्वीकारें,खुद को नहीं:अगर परीक्षा खराब हो गई तो बोले “मेरी परीक्षा खराब हुई है न कि मैं खराब हूँ।” मुझसे कुछ नहीं होगा।अपरोध बोध में समय बर्बाद करने के बजाय एक छोटा-सा एक्शन प्लान बनाएँ।अगले एक घंटे में क्या पढ़ना है,बस उस पर फोकस करे।अतीत से जो निशान पड़ चुके हैं या जो समय निकल गया है,उससे बदला नहीं जा सकता।हमेशा ‘वर्तमान’ पर फोकस होना चाहिए।
- छात्र को खुद को लगता है कि उसने सबको (माता-पिता व समाज) को निराश कर दिया है।परन्तु छात्र का काम सिर्फ ईमानदारी से मेहनत करना है,नतीजे हर बार उनके हाथ में नहीं होते।
- उपर्युक्त आर्टिकल में आत्म-ग्लानि और अपराध बोध पर कैसे काबू पाएं:छात्र-छात्राओं के लिए एक कम्प्लीट गाइड (How to Overcome Self-Reproach and Guilt:A Complete Guide for Students) के बारे में विस्तृत और गहराई से बताया गया है।
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8.माँ द्वारा प्रताड़ना (हास्य-व्यंग्य) (Harassment by the mother) (Humour-Satire):
- माँ:तुम्हारी डायरी में फिर नोट लिखा है,तुमने होमवर्क नहीं किया है।
- पुत्री:अब कर लूँगी माँ।
- माँ:तुम्हें विल्कुल भी आत्म-ग्लानि नहीं है (धमकाते हुए)।
- पुत्री:अब माँ बोल तो दिया,अब से होमवर्क पूरा करूँगी।
9.आत्म-ग्लानि और अपराध बोध पर कैसे काबू पाएं:छात्र-छात्राओं के लिए एक कम्प्लीट गाइड (Frequently Asked Questions Related to How to Overcome Self-Reproach and Guilt:A Complete Guide for Students) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः
प्रश्नः1.विद्यार्थी में आत्मग्लानि के मुख्य कारण क्या हैं? (What are the main causes of Self-Reproach in a student?):
उत्तर:अपने आप से और माता-पिता की अत्यधिक उम्मीदें।पढ़ाई में टालमटरीत करना;दूसरों के मार्क्स से खुद की तुलना करना आदि।
प्रश्न:2.विद्यार्थी आत्म-ग्लानि से कैसे उबरें? (How do students overcome Self-Reproach?):
उत्तर गलती और असफलता के अन्तर को समझें।परफेक्ट बनना छोड़ें,प्रगति पर ध्यान दें।अपने प्रति दयालु बनें।यथार्थवादी और छोटे लक्ष्य बनाएं।अपनी बीती हुई गलतियों को माफ कर देना।
प्रश्न:3.छोटे और यथार्थवादी लक्ष्य की सोच कैसे बनाएं? (How to create small and realistic goal thinking?):
उत्तर:कई बार सिलेबस इतना बड़ा होता है कि हम डर के मारे शुरुआत ही नहीं करते।पढाई टालने (टालमटोल) की वजह से फिर अपराध बोध होता है और अपराध बोध की वजह से हम और पढाई नहीं कर पाते।ये एक अंतहीन चक्र बन जाता है।
इस साइकिल को तोड़ने के लिए ‘5 मिनट का नियम’ अपनाएं:खुद से कहें,”मैं सिर्फ 5 मिनट के लिए किताब खोलूंगा और एक पेज पढ़ूंगा।”
जब आप छोटा सा स्टेप लेते हैं,तो आपका ब्रेन एक्टिव हो जाता है और अक्सर 5 मिनट कब 1 घंटे में बदल जाता हैं,आपको पता ही नहीं चलता।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा आत्म-ग्लानि और अपराध बोध पर कैसे काबू पाएं:छात्र-छात्राओं के लिए एक कम्प्लीट गाइड (How to Overcome Self-Reproach and Guilt:A Complete Guide for Students) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी दी गई है।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*










