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Has Comman Man Developed in India?

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1.क्या भारत में आम आदमी का विकास हुआ है? (Has Comman Man Developed in India?),क्या भारत में आम आदमी का विकास से रिश्ता है? (Does Comman Man Have a Relationship with Development in India?):

  • क्या भारत में आम आदमी का विकास हुआ है? (Has Comman Man Developed in India?) आम आदमी के विकास को मापन के लिए यदि जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) को ही कसौटी माना जाए और जैसा कि आमतौर पर माना भी जाता है तो निःसंदेह भारत में आजादी के लगभग 75 सालों में बहुत तरक्की की है।कई क्षेत्रों में तरक्की चमत्कारिक है।1947 में जब भारत आजाद हुआ था उस समय देश की आर्थिक स्थिति कितनी जर्जर थी।इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि तब प्रतिव्यक्ति आय लगभग 61 रुपए थी।प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत लगभग 0.01 किग्रा थी और इसका उत्पादन लगभग शून्य था।देश की अर्थव्यवस्था का शुमार दुनिया की पहली 20 क्या 30 अर्थव्यवस्थाओं में भी नहीं था।वगैरह वगैरह…. ।
  • 75 सालों बाद आज यह तस्वीर बदल गई है।आज प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹100000 सालाना हो गई है।देश में सीमेंट की खपत लगभग 6 किग्रा प्रति व्यक्ति तथा इस्पात की खपत लगभग 2 किग्रा प्रतिव्यक्ति हो गई है।आज हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था का शुमार दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में होता है।आज की तारीख में लगभग 3 करोड़ टीवी सेट हैं जो की 1947 में एक भी नहीं था।आज देश में लगभग 60-70% आबादी के पास मोबाइल फोन हैं जो करोड़ों की संख्या में है जो की 1947 के मुकाबले सैकड़ों गुना ज्यादा हैं।भारत ने आजादी के बाद से इन 75 सालों में बहुत विकास किया है।इन्हीं सालों में हमारे यहाँ 30 करोड़ मध्यवर्गी समृद्ध उपभोक्ता पैदा हुआ है जिसकी खरीद शक्ति यूरोप और अमेरिका के उपभोक्ताओं जैसी है।
  • आजादी के बाद के इन्हीं 75 सालों में देश में लगभग 4 करोड़ पक्के मकान बने हैं,लगभग तीन करोड़ मोटर चालित वाहन बने हैं,7 लाख किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कों का निर्माण हुआ है,ट्रेनों की संख्या में 30 से 35 गुना वृद्धि हुई है और हवाई यात्राओं की संख्या प्रतिवर्ष लाखों में हुई है।पर्यटन क्षेत्र की एक ऐतिहासिक रिपोर्ट से पता चलता है कि आजादी के समय जहां देश में प्रतिवर्ष 50000 के आसपास लोग ही पर्यटन के लिए निकलते थे।इनमें से पर्यटक कम तीर्थयात्री ज्यादा होते थे आज वहीं देश में पर्यटकों की संख्या बढ़कर एक करोड़ 50 लाख हो गई है।3 लाख से ज्यादा भारतीय तो प्रतिवर्ष विदेशों की सैर करने भी जाते हैं।
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2.भारत में चौतरफा प्रगति (All-round Progress in India):

  • शिक्षा,स्वास्थ्य,परिवहन,रहन-सहन,उद्योग,व्यापार,संस्कृति चाहे जो क्षेत्र हो आजादी के बाद के पिछले 75 सालों में हर क्षेत्र में भारी विकास हुआ है।मगर ठहरिए।यह विकास चमत्कारिक,ये आंकड़े रोमांचक,यह इबारत प्रभावशाली तभी तक लगेगी जब तक हम इन सबको देश की जनता की बजाय जीडीपी के परिप्रेक्ष्य में देखें।यह विकास प्रभावशाली तभी तक रहता है जब तक हम इसे आम आदमी से जोड़कर देखने की बजाय प्रतिशत,औसत के नजरिए से देखें।भारत के विकास को सकारात्मक देखने के लिए शर्त है आम आदमी को जेहन से निकालना पड़ेगा।अगर आम आदमी को विकास से जोड़ दिया तो बेड़ा गर्क हो जाएगा।सारे आंकड़े मटियामेट हो जाएंगे।पचहत्तर साल के विकास की प्रभावशाली तस्वीर छिन्न-भिन्न हो जाएगी।
  • क्योंकि हिंदुस्तान के आम आदमियों का विकास के साथ वही रिश्ता नहीं है,जो आंकड़ों का है।आजादी के 75 सालों में देश की राजधानी दिल्ली में वाहनों की संख्या भले 10000 से बढ़कर 40 लाख हो गई हो।मगर व्यापक भारत की वास्तविकता यही है कि अभी भी देश में परिवहन की सुविधा बैलगाड़ी बदसूरत जारी है।ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक माल ढोने और लोगों को ढोने,दोनों ही मामलों में बैलगाड़ी अभी तक अव्वल है।
  • आजादी के बाद देश के तमाम महानगरों में ही नहीं छोटे-छोटे शहरों में यहां तक की तमाम कस्बों में भी भव्य और बहुमंजिलें इमारतें खड़ी हुई हैं,लेकिन पूरे भारत की हकीकत यही है कि अभी भी देश के 35-40% लोग माटी के मकानों में रहते हैं,घास-फूस के छप्पर डालते हैं और जैसा कि स्कूल आफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर की वार्षिक रिपोर्ट बताती है, “हर साल ऐसे लोग अपना मकान बनाते बचाते रहते हैं लेकिन फिर भी कोई न कोई प्राकृतिक आपदाएं उन्हें लगातार इस काम में लगाए रहती है।”
  • 1947 की आजादी के बाद हमने तमाम बड़े-बड़े बांध बनाए हैं।बड़े-बड़े महानगरों को इन बांधों से बिजली और पानी मुहैया कराया है।इन्हीं बांधों की बदौलत दिल्ली और मुंबई जैसे शहर रातभर चमकते हैं।लेकिन बाढ़ की समस्याएँ ज्यों-की-क्यों है।क्योंकि बाढ़ का आमतौर पर रिश्ता आम आदमी से है।डिब्रूगढ़,जोरहाट,नवगांव,बराक घाटी का सारा निचला हिस्सा उत्तर प्रदेश के एक दर्जन पूर्वी जिले और बिहार के लगभग आधे जिले 1947 में बाढ़ की चपेट में आते थे और आज भी नियमित रूप से यहां के लोगों को बाढ़ का शिकार होना पड़ता है।हर साल 2000 से ज्यादा लोग और 5000 से ज्यादा पशु बाढ़ के चलते मौत का शिकार हो जाते हैं।लाखों कच्चे मकान,करोड़ों रुपए की खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं।
  • लेकिन इन पिछले 75 सालों में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ।यह विस्मयकारी है फिर भी यह जीवन का सतत हिस्सा है।विकास के तमाम आंकड़े यहां मायूस हैं? आम आदमी प्रकृति के कोप को झेलने के लिए लगातार अभिशप्त है।इस क्षेत्र में विकास क्यों नहीं हुआ? आखिर क्यों हर साल बरसात के महीनों में उत्तर-पूर्व भारत के तमाम हिस्से शेष देश से कई-कई सप्ताहों के लिए कट जाते हैं? देश के नीति नियंताओं के पास शायद इन सवालों का कोई संतोषजनक जवाब हो।जिस देश में सैनिक और अर्धसैनिक बलों की संख्या 25 लाख से ऊपर हो।जिस देश में इंजीनियर क्षेत्र इतना संपन्न हो कि दुनिया को सबसे ज्यादा इंजीनियर देता हो।उस देश के 10 से 12 करोड लोग हर साल की आपदा झेलते हैं।यह शर्म का विषय है।ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि बाढ़ से आम आदमी का रिश्ता होता है और आम आदमी देश की विकास प्राथमिकताओं में नहीं है।

3.शुद्ध पेयजल की किल्लत (Scarcity of Pure Drinking Water):

  • एनसीईएआर (नेशनल काउंसिल आफ अप्लाइड इकोनामिक रिसर्च) के आंकड़े बताते हैं कि देश में पानी का उद्योग 20 से 30% सालाना की दर से बढ़ रहा है।पानी के व्यापार का यह सालाना कारोबार एक अरब रुपए के आसपास पहुंच गया है।इसे चाहे तो भारत की समृद्धि के एक सबूत की तरह पेश कर सकते हैं।पानी के इस कारोबार को विकास की कसौटी भी दर्शाया जा सकता है।लेकिन ऐसा करते समय हम उस समय हिल जाएंगे जब हमें इस वास्तविकता से दो-चार होना पड़ेगा कि देश के 60 फ़ीसदी से ज्यादा ग्रामीण लोगों को इन पिछले 75 सालों में शुद्ध पानी नसीब नहीं हुआ।पानी को लेकर पिछले कुछ सालों में हुए तमाम सर्वेक्षण यह बताते हैं कि आम आदमी ऐसा पानी पीने के लिए अभिशप्त है जिसे शुद्ध पानी की कोटी में नहीं रखा जा सकता।
  • देश में हर साल जितने लोग बीमार पड़ते हैं उनमें आधे से ज्यादा लोगों की बीमारी की वजह अशुद्ध पानी होता है।शोधित परिशोधित जल तो आम लोगों के लिए अनसुने और हैरान करने वाले शब्द हैं ही,इन 50 सालों में नदी-नालों के साफ पानी से भी लोग वंचित हो गए हैं।औद्योगीकरण के तमाम फायदे महज 25% लोगों के खाते में जाते हैं लेकिन जल प्रदूषण की मार देश की तीन चौथाई से ज्यादा आम जनता को अपने स्वास्थ्य की कीमत पर चुकानी पड़ती है।
  • पानी को लेकर एक और रोचक आंकड़ा देखिए।आजादी के समय देश में पूरे साल में महज कुछ हजार कोल्ड ड्रिंक की ही खपत थी।मगर आज यह खपत बढ़कर 12 करोड़ (1996) हो गई है और कोका व पेप्सी कोला के बाजार व्यवस्थापकों के अनुसार सन 2000 तक भारत में इस मीठे पानी की खपत बढ़कर 20 करोड़ लीटर सालाना हो गई है। मगर इसके साथ ही पाथ फाइंडर नामक एक एजेंसी द्वारा कुछ साल पहले किया गया वह सर्वे भी मजेदार है जिसमें कहा गया था कि देश की लगभग 60% आबादी अभी तक इस मीठे पानी के स्वाद तक से परिचित नहीं है।15% लोग ऐसे हैं जो कभी-कभार मात्र अवसरों पर ही कोल्ड ड्रिंक का पान करते हैं।इस तरह देखने वाली बात यह है कि महज 25% लोग ही ऐसे हैं जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी में कोल्ड ड्रिंक पानी की जगह लेता जा रहा है।
  • हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण प्रयोगशाला का कहना है कि देश की लगभग 50% आबादी अपने भोजन में आवश्यक कैलोरी से वंचित है।लेकिन इसी प्रयोगशाला का यह आंकड़ा इस आंकड़े से भी ज्यादा आकर्षित करता है कि देश में हर साल लगभग 50 लाख लोग अतिपोषण का शिकार हो रहे हैं।यह अतिपोषण इनके लिए तमाम बीमारियों की जड़ है।

4.विकास और आम आदमी का रिश्ता विपरीतार्थक (The Relationship Between Development and the Common Man is Inverse):

  • इस तरह देखा जाए तो विकास और आम आदमी का रिश्ता विपरीतार्थक है।आजादी के बाद के पिछले पचहत्तर सालों में विकास कितना भी हुआ हो लेकिन उस विकास का ज्यादा फायदा आम आदमी को नहीं हुआ।भले ही राजनीतिक दृष्टि से या मानसिक दृष्टि से आजादी एक बहुत बड़ी उपलब्धि हो।उसके हिस्से में तो बल्कि और ज्यादा शोषण,बदहाली और असुरक्षा आई है।आज की तारीख में हमारे देश में जितने लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं,1947 में देश की उतनी आबादी भी नहीं थी।यह अकारण नहीं है कि आम आदमी बात-बात में आजादी को कोसते हुए कहने लगते हैं कि इससे भला तो ‘गौरों’ का शासन था।
  • यह बात यूं ही जुबान से नहीं निकल जाती।इसके पीछे आजादी के बाद के साल दर साल,दशक दर दशक की टीस छिपी है।इसमें आम लोगों की पीड़ा बोलती है।अंग्रेजों के शासनकाल से आम लोग आज के दौर को बढ़कर मानते हुए कोसने लगते हैं तो इसके पीछे एक व्यापक आधार है।आजादी के पहले भी आम लोगों की कोई हालत बेहतर नहीं थी,तब भी बदहाली और लाचारी का जीवन था।लेकिन इस जीवन को जीते हुए हमेशा एक सांत्वना थी कि ऐसा गुलामी की वजह से है।तब एक आशा थी कि जब गुलामी से मुक्ति मिलेगी तब इस जीवन से भी मुक्ति मिल जाएगी।एक और बात थी तब गुलामी के दौरान समाज इतना बहुस्तरीय नहीं था।तब भी कुछ लोग सत्ता के दुलारे थे।तब भी एक अभिजात्य वर्ग था।लेकिन यह इतना छोटा था कि इस वर्ग की दुनिया लगभग अलहदा थी।बहुसंख्यक लोगों की जिंदगी लगभग एक जैसी थी।उठने-बैठते,सोते-जागते तब लोगों की गैर बराबरी की इतनी त्रासद पीड़ा नहीं भोगनी पड़ती थी जिस तरह आज झेलनी पड़ती है।आज हम गुलाम नहीं है।स्वराज है।गैर बराबर नहीं है।संविधान के मुताबिक देश के सारे नागरिक समान हैं।सब बराबर हैं।लेकिन सिर्फ कागजों पर।व्यवहार की जिंदगी में हर कदम पर गैर बराबरी है।हर कदम पर भेदभाव है।अगर आप साधन संपन्न नहीं हैं।अगर आप प्रभावशाली नौकरी में नहीं है,तो आपकी जिंदगी गुलामी के दिनों से कहीं ज्यादा अपमानजनक,गैर बराबर और कठिन है।गुलामी के दिनों में तो यह उम्मीद लगातार रहती थी कि कभी ना कभी आजादी मिलेगी ही।मगर आज इस तरह की उम्मीदें भी नहीं रहीं।आजादी ने हमें गुलामी के दिनों से भी ज्यादा हताश और स्वप्नहीन बनाया है।इसमें सबसे बड़ा योगदान विकास के लाभों के गैर बराबरी वितरण है।
  • आम आदमी को आजादी के बाद हुए विकास में उचित हिस्सेदारी नहीं मिली।मिलने के नाम पर उसे थोड़ा उच्छिष्ट ही मिला है।इसलिए आजादी के बाद हुआ यह चमत्कारिक विकास आम आदमी से निरपेक्ष है।आजादी के बाद हुए इस विकास का आम आदमी के लिए कोई अर्थ नहीं है।यह सिर्फ एक तबके का विकास है।यह दीप खंड का विकास है।यह इंडिया का विकास है जो भारत के लोगों की कीमत पर हुआ है।

5.आम आदमी का विकास न होने के कारण (Due to Lack of Development of Common Man):

  • आम आदमी का विकास से रिश्ता नहीं बन पाया इसके कई कई कारण है एक सबसे बड़ा कारण तो यही रहा है कि हमारी नीति-नियंताओं ने विकास के लिए जिस ढांचे को आजादी के बाद अपनाया वह शहर केंद्रित ढांचा था।यह पश्चिम का आयातित ढांचा था जबकि हमारा देश अपनी बुनावट और स्वभाव में ग्राम्यतंत्र था इसलिए यहां विकास के जिस ढांचे को अपनाया जाना चाहिए था उसे बहुसंख्यक भारत से संबंध रखना चाहिए था जो विकेंद्रित स्वभाव वाला होता।मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।इसलिए आजादी के बाद के पिछले सात-आठ दशकों के विकास का आम आदमी से रिश्ता नहीं बन पाया।
  • दूसरा कारण यह रहा है कि जितनी सरकारें आयी हैं उनमें अधिकांश सरकारों के मंत्री यहां तक की प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री तक भी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं।उन्होंने अपने घर के लिए अकूत धन इकट्ठा कर लिया और आम आदमी के विकास की तरफ ध्यान नहीं दिया।
  • तीसरा कारण है कि भ्रष्ट नौकरशाही जो राजनीतिज्ञों से मिलकर अथवा बिना मिले भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं।
  • चौथा कारण है शिक्षा प्रणाली।भारत को स्वतंत्रता मिलते ही शिक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करना था ताकि सदाचरण,नैतिकता,मानवीय गुणों और राष्ट्रभक्ति से युक्त नवयुवक व नेता तैयार होते तो वे आम आदमी के विकास के बारे में सोचते परंतु सार्थक शिक्षा में बदलाव आज तक नहीं हुआ है।
  • पांचवा कारण है सज्जन लोग निष्क्रिय होकर बैठे हुए हैं,सत्ता में नहीं है या हैं तो नाम मात्र के हैं तथा अधिकांश मंत्री एलीट वर्ग है जो आम आदमी के विकास के बारे में सोचता नहीं है।
  • छठवाँ कारण है अवसरवादी राजनीति,प्रभावी नेतृत्व का अभाव,गांव से जुड़े नेताओं का अभाव अथवा सत्ता के डर से मौन साधे रहना और जो हो रहा है उसे चुपचाप सहते रहना।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में क्या भारत में आम आदमी का विकास हुआ है? (Has Comman Man Developed in India?),क्या भारत में आम आदमी का विकास से रिश्ता है? (Does Comman Man Have a Relationship with Development in India?) के बारे में बताया गया है।

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6.गणित छात्र का सपना (हास्य-व्यंग्य) (Dream of a Math Student) (Humour-Satire):

  • राहुल:मैं एक बहुत बड़ा गणितज्ञ बनना चाहता हूं।लेकिन इस शक्ल की वजह से गणितज्ञ बनने का आईडिया छोड़ दिया।
  • नकुल:तो शक्ल का गणितज्ञ से क्या लेना देना?
  • राहुल:है ना,जिंदगी भर गणित शोध करने या गणित पढ़ने का क्या फायदा? मैं किसी कंपनी का ब्रांड एंबेसडर तो नहीं बन पाता।

7.क्या भारत में आम आदमी का विकास हुआ है? (Frequently Asked Questions Related to Has Comman Man Developed in India?),क्या भारत में आम आदमी का विकास से रिश्ता है? (Does Comman Man Have a Relationship with Development in India?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.विकास के लिए महत्त्वपूर्ण बात क्या है? (What is Important for Development?):

उत्तर:विकास अपने आपमें महत्त्वपूर्ण नहीं है,महत्त्वपूर्ण है विकास में भागीदारी।उसी तरह जैसे उत्पादन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उत्पादन का वितरण।-विश्वविख्यात भारत के अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन।

प्रश्न:2.भारत के विकास का विरोधाभास क्या है? (What is the Paradox of India’s Development?):

उत्तर:यद्यपि पिछले 75 वर्षों में देश ने विज्ञान व टेक्नोलॉजी के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज की है।बावजूद इसके आम आदमी को इन उपलब्धियां का कोई खास लाभ नहीं मिल सका।

प्रश्न:3.वस्तुतः विकास किसका हुआ है? (Who Has Actually Developed?)

उत्तर:उन्नति और विकास विज्ञान का हुआ है,वैभव विलास का हुआ है,भौतिक जगत का हुआ है।यदि मनुष्य के पास सुख-साधन और संपन्नता है तो वास्तव में यह विकास नहीं हुआ है।मनुष्यता,मानवीयता का तो पतन ही हुआ है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा क्या भारत में आम आदमी का विकास हुआ है? (Has Comman Man Developed in India?),क्या भारत में आम आदमी का विकास से रिश्ता है? (Does Comman Man Have a Relationship with Development in India?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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