6 Tips to Know Fundamental Evaluation
1.मौलिक मूल्यांकन को जानने की 6 टिप्स (6 Tips to Know Fundamental Evaluation),मौलिक मूल्यांकन कैसे हो? (How to Do Fundamental Evaluation?):
- मौलिक मूल्यांकन को जानने की 6 टिप्स (6 Tips to Know Fundamental Evaluation) के आधार पर हम जानेंगे कि वर्तमान में कैसा मूल्यांकन किया जाता है और छात्र-छात्राओं का मूल्यांकन वास्तविक रूप में किस प्रकार से किया जाना चाहिए?
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2.मौलिक मूल्यांकन का अर्थ (Meaning of Fundamental Evaluation):
- मौलिक मूल्यांकन तप,साधना और विद्या के अर्जन की कसौटी है।मूल्यांकन के लिए परीक्षाओं का प्रचलन हर कहीं है।प्रायः प्रत्येक विद्यालय,महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं को अनिवार्य रूप से इन परीक्षाओं में उपस्थित होना पड़ता है।इनमें लिखित परीक्षाएँ कुछ प्रश्नों के उत्तर लिखकर दी जाती हैं।मौखिक परीक्षाओं में कुछ सवालों के जवाब देने पड़ते हैं।इस प्रचलित रीति का दायरा परीक्षार्थी की स्मरण शक्ति को जाँचने-परखने और जानने तक सीमित रहता है।इन अर्थों में प्रचलित परीक्षाएं विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति का मूल्यांकन कर पाती है जो रटने पर बल देती है।इसी आधार पर उन्हें तृतीय,द्वितीय या प्रथम श्रेणी का मान लिया जाता है।इस मूल्यांकन में स्मरण-शक्ति के अलावा व्यक्तित्व के अन्य अनेक गुण ना तो प्रकाशित हो पाते हैं और न ही उन्हें जानने-जाँचने की जरूरत समझी जाती है।
- इस प्रचलन से बहुत अलग विद्यालय,महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के मूल्यांकन की रीति एकदम मौलिक होनी चाहिए जिसका उल्लेख इस लेख में किया जा रहा है।यह मूल्यांकन दस में से पांच सवालों के उत्तर जाँचने तक सीमित न रहेगा।इस मूल्यांकन के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षा को छात्र-छात्राएं थोड़े-से संभावित प्रश्नों की गाइड,सीरीज,सॉल्वड पेपर्स या मार्गदर्शिका को रटकर न पास कर सकेंगे।इसकी तैयारी के लिए उन्हें अपने समूचे व्यक्तित्व को तैयार करना पड़ेगा।उन्हें विद्यावान,चरित्रनिष्ठ एवं तपस्वी होने की साधना करनी पड़ेगी।विषयवस्तु के अध्ययन के साथ उन्हें अनेक व्रतों का अभ्यास करना पड़ेगा।मूल्यांकन की इस मौलिक रीति-नीति से उनके समग्र व्यक्तित्व का मूल्यांकन होगा।विद्यार्थीगण अपनी विषयवस्तु के ज्ञान के साथ भारतीय संस्कृति के आदर्शों को अपने जीवन में कितना उतार पाए? यह परखा जाना चाहिए।
- हमारी भारतीय मूल संस्कृति की परंपरा भी रही है।हमारे महापुरुषों,गुरुजनों और वैदिक शिक्षा पद्धति में आज जैसी परीक्षा प्रणाली न थी।प्राचीन विश्वविद्यालयों में गुरु और आचार्य प्रत्येक छात्र-छात्रा की ओर व्यक्तिगत ध्यान देते थे।उसके व्यक्तित्व के सार्थक एवं समग्र विकास के लिए हमेशा सजग रहते थे।उसकी मेधा,प्रतिभा व आत्मबल को बढ़ाने के लिए कई तरह की चारित्रिक,व्यावहारिक और आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का सहारा लेते थे।इस डगर पर सफलतापूर्वक चलने पर छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहित किया जाता था और वे आगे की शिक्षा के लिए योग्य समझे जाते थे।इस रीति का उल्लेख हमारे आर्ष साहित्य,स्मृतियों और धर्मग्रंथों में मिलता है।
- तक्षशिला,नालंदा और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालय तो इसके जीते जागते और प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जिनकी अमिट छाप आज भी जनमानस के हृदय पर अंकित है।उनकी चर्चाएं होती रहती हैं और उनकी याद से ही हमारा स्वाभिमान और गौरव जाग उठता है।आज भी वे इस तरह रचे-बसे हैं कि ये विश्वविद्यालय जीवंत लगते हैं।
3.प्राचीन काल में मूल्यांकन का तरीका (Method of evaluation in ancient times):
- शिक्षा के पूरा होने पर छात्र-छात्राओं से कहा जाता था कि वे गुरुकुल की परिषद (ऋषियों-गुरुओं की संस्था) के सामने अपने को उपस्थित करें।इस संस्था में 5 से 10 सदस्य होते थे।इसके अतिरिक्त बौधायन धर्मशास्त्र के अनुसार विद्वान स्नातकों को राज्यसभा में विशेष यज्ञों के अवसरों पर उपस्थित होने का निर्देश प्राप्त होता था।
- प्राचीन साहित्य में छात्र-छात्राओं के मौलिक मूल्यांकन का अनेक स्थानों पर उल्लेख है।यह मूल्यांकन आर्ष संस्था या विद्वत्परिषद के विशेषज्ञ करते थे।वे वर्तमान समय के विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों की परीक्षाओं से एकदम अलग थीं।इन प्राचीन परीक्षाओं में विद्यार्थियों को अपने तप,विद्या व साधना को प्रमाणित करना पड़ता था,तभी वे समाज में सम्मान व आदर के अधिकारी होते थे।वे मेधा व प्रतिभा को समूचे लोक में प्रमाणित करते थे।
- विद्या की परीक्षा के लिए राजा द्वारा भी ब्रह्म सभाओं का आयोजन किया जाता था।इनमें उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को ब्रह्मज्ञानी,आत्मज्ञानी,लोकसेवी,स्नातक,आचार्य,शास्त्री आदि की उपाधि दी जाती थी।कालिदास,भारवि,मेंठ आदि की परीक्षा हुई थी।इसी तरह पाटलिपुत्र में उपवर्ष,वर्ष,पाणिनि,व्याडि,वररूचि और पतंजलि की परीक्षा हुई थी।हमारे शास्त्रों का गहन अध्ययन करने पर परीक्षा संबंधी प्रमाणों का वर्णन मिल जाएगा।चरक संहिता में शास्त्र और आचार्य की परीक्षा का वर्णन है।इस मूल्यांकन के अनन्तर ही चिकित्सक को चिकित्सा कार्य को करने का अधिकार प्राप्त होता होता था।
4.वर्तमान में मूल्यांकन कैसा होना चाहिए? (What should the evaluation be like at present?):
- वैदिक संस्कृति के आदर्शों के अनुरूप मूल्यांकन की यही समग्र एवं मौलिक रीति-नीति विद्यालय,महाविद्यालय,विश्वविद्यालय में अपनायी जानी चाहिए।छात्र-छात्राओं की परीक्षा और मूल्यांकन बोर्ड,विश्वविद्यालय परिषद तथा उच्च संस्थाओं द्वारा गठित पैनल द्वारा की जानी चाहिए।इसके प्रभारी परीक्षण नियंत्रक होने चाहिए।इन्हीं के अधीन परीक्षा समिति सभी परीक्षाओं के आयोजन व मूल्यांकन का कार्य करें।सभी विषयों एवं सभी कक्षाओं की परीक्षा के लिए सेमेस्टर सिस्टम को लागू करना चाहिए।प्रत्येक सेमेस्टर की अवधि तीन या छह महीने होनी चाहिए।इस तरह प्रत्येक वर्ष में दो या चार सेमेस्टर होंगे।
- प्रत्येक सेमेस्टर में कक्षा व विषय के अनुरूप परीक्षाएं लिखित,मौखिक,प्रयोगात्मक,निरीक्षण,साक्षात्कार,प्रश्नावली छात्र-छात्राओं द्वारा तैयार की गई नोटबुक्स,नोट्स,अभिलेख,सत्रांक हेतु प्रोजेक्ट आदि के द्वारा की जानी चाहिए।इनमें से लिखित परीक्षा में विषय के संपूर्ण ज्ञान को परखने के लिए ऑब्जेक्टिव या वस्तुनिष्ठ शैली एवं ज्ञान की विशेषज्ञता को परखने के लिए प्रश्नों को लघुत्तरात्मक व निबन्धात्मक शैली अपनाई जानी चाहिए जो कि वर्तमान में अपनाई जा रही है।सेमेस्टर की परीक्षाओं में आचार्यों द्वारा समय-समय पर किए गए आंतरिक मूल्यांकन के भी अंक (सत्रांक) जोड़े जाने चाहिए जो कि जोड़े जा रहे हैं।आंतरिक मूल्यांकन के लिए आचार्य अपनी कक्षा के विद्यार्थियों की कभी भी उचित समय पर लिखित या मौखिक परीक्षा ले सकते हैं।यह नियम सभी शिक्षण संस्थाओं के सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
- पाठ्यपुस्तक के मूल्यांकन के अलावा इस बात का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि छात्र-छात्रा ने वैदिक संस्कृति (आर्ष संस्कृति) के आदर्शों को अपनाने के लिए पूरे शिक्षा सत्र में क्या-क्या प्रयास किए।किन-किन व्रतों का कितनी गहरी निष्ठा व श्रद्धा से पालन किया।इस क्रम में विद्यार्थियों द्वारा समय-समय पर किए गए अनुष्ठानों व विभिन्न साधनाओं का भी मूल्यांकन किया जाए।यह प्रक्रिया प्रत्येक सेमेस्टर में अपनाई जाए।कक्षा के अंतिम सेमेस्टर में सभी नियमित परीक्षाओं के साथ एक ग्रांड वाइवा का आयोजन होना चाहिए।इसमें छात्र या छात्रा से वर्तमान सेमेस्टर की पाठ्यवस्तु के साथ पिछले सभी सेमेस्टर की पाठ्यवस्तु से संबंधित सवाल पूछे जाने चाहिए।इस प्रश्नकाल में संपूर्ण कक्षा अवधि में अपनाए गए आदर्शों एवं व्रतों का भी मूल्यांकन होना चाहिए।
- प्रायोगिक परीक्षाएं पाठ्यवस्तु के अनुरूप होनी चाहिए।इसके लिए निश्चित किए किए गए प्रयोगों व परियोजनाओं को छात्र-छात्राएं पूरा करें।आंतरिक एवं बाह्य परीक्षक विद्यार्थियों का तत्संबंधी मूल्यांकन करें। प्रायोगिक परीक्षा के साथ भी मौखिक परीक्षा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे।मौखिक परीक्षा का स्वरूप प्रत्येक परीक्षा या सेमेस्टर के अनुरूप होना चाहिए।इसमें से ग्रांड वाइवा के स्वरूप में दर्शनीय आकर्षण होगा।इसका आयोजन इस ढंग से किया जाए कि छात्र का समस्त व्यक्तित्व समस्त गुण एक साथ प्रकाशित हो सकें।इसमें विद्यालय तथा विश्वविद्यालय के सभी संकाय के आचार्य भागीदार होने चाहिए।कोई भी आचार्य छात्र या छात्रा से सवाल पूछ सकते हैं।इस परीक्षा के बाद ही छात्र उपाधि पाने का अधिकारी होगा।ऐसे भली प्रकार जांचे-परखे गए छात्र-छात्राओं का व्यक्तित्व विद्या एवं सेवा का संगम होना चाहिए शिक्षण संस्थान में।सम्पूर्ण शिक्षा संस्थानों में इसकी झलक मिलनी चाहिए।
5.मौलिक मूल्यांकन लागू करने में समस्या (Problems with applying fundamental evaluation):
- हमारा चारित्रिक पतन इतना हो चुका है कि कोई भी अच्छी पद्धति लागू की जाती है तो हम उसमें से अपने मनमाफिक गली निकाल लेते हैं,उसका तोड़ ढूँढ लेते हैं।पहले बोर्ड परीक्षाओं में सत्रांक के नंबर नहीं दिए जाते थे।केवल बोर्ड द्वारा उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन के आधार पर उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण कर दिया जाता था।विभिन्न विद्वानों द्वारा इस पर हायतौबा मचाया गया फलस्वरूप सत्रांक के 20 नंबर देना (प्रोजेक्ट कार्य के आधार पर) लागू कर दिया गया।
- अब स्थिति यह है कि स्कूल के आचार्य छात्र-छात्राओं के को 20 में से 20 अंक दे देते हैं,चाहे उसने प्रोजेक्ट कार्य किया हो या नहीं किया हो,चाहे वह बिल्कुल फिसड्डी हो या मेधावी।नमूने के तौर पर,दिखाने के लिए कुछ छात्र-छात्राओं को 20 में से 18-19 अंक दे दिए जाते हैं,ताकि कोई ऊँगली न उठा सके।इसी प्रकार प्रायोगिक परीक्षाओं का हाल है।स्कूल प्रशासन अधिकांश प्राइवेट स्कूलों व महाविद्यालयों द्वारा प्रायोगिक परीक्षा की तैयारी नहीं करवाई जाती है।प्रायोगिक परीक्षा हेतु निर्धारित प्रैक्टिकल जब छात्र-छात्रा नहीं करेगा तो उसकी स्किल कैसे निखरेगी? इसमें छात्र-छात्राओं को उत्तीर्ण करने का भी स्कूल प्रशासन द्वारा जोगाड़ कर लिया जाता है।प्रायोगिक परीक्षा के लिए बाहर से आने वाले अर्थात् बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त लेक्चरर से सेटिंग की जाती है,उसकी आव-भगत की जाती है।एक्सटर्नल एग्जामिनर ग्लैड हो जाता है और मामला सेट हो जाता है।
- इस प्रकार सत्रांक के नाम पर प्रोजेक्ट कार्य तथा प्रायोगिक कार्य के लिए ली जाने वाली परीक्षा नाम मात्र की है।ये सब क्यों किया जाता है? क्योंकि हमारी कर्मठता को लकवा मार गया है।हम केवल डिग्री का सर्टिफिकेट चाहते हैं।क्यों,क्योंकि नौकरी के लिए डिग्री चाहिए।नौकरी हेतु ली जाने वाली परीक्षा में भी कैसा जोड़-तोड़ बिठाया जाता है इसकी बानगी यदा-कदा अखबारों में छपती रहती है।यह कालाधंधा बड़े स्तर पर होता है जो जनता के सामने नहीं आता है।
- यह सब क्यों होता है क्योंकि अपने चहेते को नौकरी पर लगाना है।चारों ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है अर्थात् पूरे कुएं में ही भाग मिली हुई है।प्रश्न यह है कि बड़े-बड़े उच्चाधिकारी कड़ी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के बाद चयनित होते हैं।यानी ये प्रतिभाशाली उच्चाधिकारी जिनके व्यक्तित्व परीक्षण और लिखित परीक्षा लेने के बावजूद भ्रष्टाचार में कैसे लिप्त हो जाते हैं।कारण स्पष्ट है कि इनके आका राजनीतिक नेताओं को भ्रष्टाचार पसंद हैं।
- राजनेताओं को चुनाव जीतने के लिए पैसा चाहिए।चंदे के द्वारा नाम मात्र का चंदा प्राप्त होता है।उनसे चुनाव नहीं लड़ा जा सकता है।अतः ये राजनीतिक नेता भ्रष्टाचार के द्वारा धन की उगाई करते हैं।अफसरों और राजनेताओं की मिलीभगत से अकूत धन संपत्ति अर्जित करते हैं।सत्ता के सर्वेसर्वा (राजनीतिक नेता) ही भ्रष्टाचार में डूबे हों तो शिक्षा व्यवस्था,शासन व्यवस्था कैसे सुधर सकती है।किसी भी मामले में हाथ डालो वहां ही कचरा और गाद भरी मिलेगी।अब जनता भी ऐसी ही होती जा रही है यथा राजा तथा प्रजा।लब्बोलुआब यह है कि अंदर खाने सब नंगे हैं,सब ऊपर-ऊपर से दिखावे के लिए कुछ कार्यवाही की जाती है ताकि जनता के सामने साफ छवि बनी रहे और उस छवि के आधार पर वोट हासिल किया जा सकें।
- हमारे देश को 75 से अधिक वर्ष हो गए हैं आजाद हुए।लेकिन इसका चारित्रिक पतन ही होता जा रहा है।प्रश्न उठता है कि ईमानदारी,सच्चाई,विनम्रता,सरलता,सहिष्णुता,भाईचारा,धैर्य,धार्मिकता,क्षमा,क्रोध आदि चारित्रिक गुणों की परख कैसे संभव है।क्योंकि लिखित व मौखिक परीक्षा के द्वारा इनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है।दरअसल नेकनीयत हो तो इन गुणों को पूरे सत्र में छात्र-छात्राओं के व्यवहार,निरीक्षण,साक्षात्कार आदि द्वारा इनको परखा जा सकता है और परखा जाना चाहिए।लेकिन इनकी परीक्षा भी खानापूर्ति की तरह ही की जाए तो फिर क्या किया जाए? जब तक देश के नेता लोग,शिक्षकगण और उच्चाधिकारी चरित्रनिष्ठ नहीं होंगे तब तक देश की कायापलट नहीं हो सकती है।
- एक प्रश्न और उठता है कि सभी छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा की डिग्री देकर बेरोजगार की लाइन में खड़ा क्यों किया जाता है? बेरोजगार और बिना चरित्र निर्माण के छात्र-छात्रा अपराध,नशाखोरी आदि नहीं करेगा तो क्या करेगा? आज हर नगर और शहर का सर्वे कर लिया जाए।अधिकांश नवयुवक-युवतियाँ अपराध,नशाखोरी आदि अनेक दुष्प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर है।
दसवीं परीक्षा के बाद काउंसलर का यह दायित्व होना चाहिए कि वह छात्र-छात्राओं की सही परीक्षा करें।छात्र-छात्राएं उसके सामने होंगे,पूरे सत्र के दौरान उसकी नजरों से गुजरेंगे तो उसके लिए छात्र-छात्रा की काउंसलिंग करना मुश्किल नहीं होगा।जो छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त करने के योग्य नहीं उन्हें कोई न कोई स्किल,उद्योग सीखने का परामर्श दिया जाए।उच्च शिक्षा के लिए केवल उन्हीं छात्र-छात्राओं को परामर्श दिया जाए जो मेधावी हों तथा शोध कार्य करने के इच्छुक हों।
- तात्पर्य यह है कि पूरी शिक्षा प्रणाली और शासन व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने की जरूरत है।केवल दिखावटी तौर पर कुछ एक्शन लेने से काम नहीं चलेगा और न ही बच्चों के चरित्र निर्माण के बिना देश के भविष्य निर्माण हो सकेगा।ईमानदारीपूर्वक कार्य किया जाए तो कितनी ही बिगड़ी हुई देश की दशा और दिशा में बदलाव किया जा सकता है।लेकिन हम यह चाहें कि सरदार भगत सिंह और विवेकानंद पैदा होना चाहिए परंतु अपने घर में नहीं,बल्कि दूसरे के घर में पैदा होने चाहिए।इसी प्रकार सत्तादारी दल यह चाहे कि जो सत्ता में नहीं है वे ईमानदार रहे और खुद बदमाशी,भ्रष्टाचार करते रहें तो फिर इस देश का भगवान ही मालिक है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में मौलिक मूल्यांकन को जानने की 6 टिप्स (6 Tips to Know Fundamental Evaluation),मौलिक मूल्यांकन कैसे हो? (How to Do Fundamental Evaluation?) के बारे में बताया गया है।
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6.अकेलापन कब महसूस होता है? (हास्य-व्यंग्य) (When Do You Feel Lonely?) (Humour-Satire):
- शिक्षकःकिसी ऐसी जगह का नाम बताओ जहां ऐसे लोग इकट्ठे हों जिनके बीच भी तुम अकेलापन महसूस करते हों।
- छात्रःईमानदार,चरित्रनिष्ठ,सज्जन,सरल,विनम्र और सादगी पसंद लोगों के बीच जब में पहुंच जाता हूं तो अपने आप को अकेला और अपराधी महसूस करता हूं।
7.मौलिक मूल्यांकन को जानने की 6 टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 6 Tips to Know Fundamental Evaluation),मौलिक मूल्यांकन कैसे हो? (How to Do Fundamental Evaluation?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.क्या चारित्रिक गुणों की परख आधुनिक युग में संभव है? (Is it possible to test character traits at present?):
उत्तर:काउंसलर तथा मल्टी टैलेंटेड टीचर की पूर्णकालिक नियुक्ति करके चारित्रिक गुणों का छात्र-छात्राओं में बीजारोपण किया जा सकता है।इसके परिणाम देर से मिलेंगे।अतः धैर्य रखने की आवश्यकता है।
प्रश्न:2.क्या प्राचीन काल जैसी शिक्षा व्यवस्था लागू की जा सकती है? (Can an education system like in ancient times be implemented?):
उत्तर:प्राचीन काल जैसी शिक्षा व्यवस्था लागू करना बहुत कठिन है और न ही आधुनिक युग के अनुकूल उपयोगी है।लेकिन प्राचीन शिक्षा की बहुत सी बातें आज भी प्रासंगिक हैं जिन्हें लागू किया जाना चाहिए जैसे चरित्रनिर्माण और व्यावहारिक शिक्षा देना आदि।
प्रश्न:3.मूल्यांकन क्यों आवश्यक है? (Why is evaluation necessary?):
उत्तर:छात्रों की उपलब्धियों का पता लगाने,छात्र-छात्राओं को प्रेरित करने,छात्र-छात्राओं के व्यवहार की जानकारी,छात्र-छात्राओं की कमियों में सुधार करने के लिए मूल्यांकन की आवश्यकता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा मौलिक मूल्यांकन को जानने की 6 टिप्स (6 Tips to Know Fundamental Evaluation),मौलिक मूल्यांकन कैसे हो? (How to Do Fundamental Evaluation?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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