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Some Strange Numbers in Mathematics

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1.गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics),गणित में अजीब संख्याएँ (Strange Numbers in Mathematics):

  • गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics) ऐसी हैं जिन्हें आधुनिक गणित का मूलाधार माना जाता है लेकिन किसी को भी यह सुनिश्चित रूप से नहीं मालूम कि उनका वास्तविक स्वरूप क्या है।जैसे पाई,e,काल्पनिक संख्या,शून्य (0) तथा अनंत (∞) ऐसी ही संख्याएँ है।ये संख्याएँ गणित का आधार स्तंभ है परंतु इनका उपयोग हमें आश्चर्यचकित कर देता है।
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(1.)पाई (π)[Pie]:

  • गणित में विचित्र संख्याओं में सर्वाधिक परिचित संख्या है यूनानी भाषा का अक्षर π (पाई)। सामान्यतया हम इसके मान को
  • \frac{22}{7} लेते हैं।लेकिन यह पाई का वास्तविक मान नहीं है।दरअसल किसी को भी इसके विशुद्ध मान का पता नहीं है।इतना पता है कि इसका मान 3 और 4 के बीच होता है जो एक बहुत ही स्थूल अनुमान है।थोड़े ओर बेहतर अनुमान के तहत इस मान को 3.1 और 3.2 के बीच माना जा सकता है।आकलित मान की शुद्धता बढ़ती चली जाती है जैसे-जैसे हम अधिकाधिक दशमलव स्थानों को लेते जाते हैं।कंप्यूटरों को पाई के आधुनिक मान को दस लाख से भी अधिक दशमलव स्थानों तक गणना करने में सफलता मिली है।
  • संख्या π किसी वृत्त की परिधि और उसके व्यास के बीच के अनुपात को व्यक्त करती है।इतिहास के पूरे दौर में लोगों ने π के लिए अनेक सन्निकटनों का सहारा लिया है।प्राचीन हिब्रूवासियों जिन्होंने सोलोमन के मंदिर का निर्माण किया था उनके लिए 3 एक अच्छी संख्या ही थी क्योंकि राजाओं की प्रथम बाईबल के मंदिर के बाहर के जवाहरात से सुसज्जित तालाब के वर्णन में यह कहा गया है,”उसने एक गलित सागर (मोन्टन सी) का निर्माण किया जिसका किनारे से किनारे तक माप 10 क्यूबिट था ……तथा 30 क्यूबिट माप की एक रेखा भी इसे चारों तरफ से घेरे थी”।
  • बेबीलोनवासियों ने π के मान को जबकि मिस्रवासियों ने लिया 3\frac{12}{81} लिया।प्राचीन हिंदुओ ने 3.1416 के मान का प्रयोग एक वर्गाकार आकृति को खींचने के लिए किया जिसका क्षेत्रफल एक वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर था।चीनियों ने π के मान को 3.16 लिया था हालांकि शु चुंग ची ने 3.1415926 तथा 3.1415927 के बीच दशमलव के सात स्थानों तक शुद्धमान को गणना द्वारा ज्ञात किया था।हालांकि प्राचीन काल में एक अनुपात के रूप में संख्या π का प्रयोग किया जाता था तथापि एक विशिष्ट संख्या का स्थान इसे नहीं मिला एवं इसके मानों को परोक्ष रूप से ही ज्ञात किया जाता था।सबसे पहले आर्किमिडीज ने ही संख्या पाई (π) को एक विशिष्ट दर्जा देकर इसके मान को किसी वृत्त की परिधि और उसके व्यास के अनुपात को लेकर निकाला था।यह सोचकर कि इसका मान 3\frac{10}{71}
  • और 3\frac{1}{7} के बीच होना चाहिए।उसने इसके सन्निकट मान को 3\frac{1}{7} यानि \frac{22}{7} लिया।मगर उसे व्यक्त करने के लिए उसने किसी अक्षर संकेत आदि का सहारा नहीं लिया।
  • विलियम जोंस ने ही 1706 में सर्वप्रथम इस अनुपात को दर्शाने के लिए अक्षर संकेत का प्रयोग किया।पाई का एक रोचक मान,पाई टेलीविजन:\frac{1964}{635} के लिए काम करने वाले एक इंजीनियर के हाथ 1964 में संयोगवश ही आग लगा था।वर्ष 1949 से ही शौकिया तौर पर गणितज्ञों ने दशमलव के अधिकाधिक स्थानों तक पाई के मान की गणना के लिए कंप्यूटरों पर अपने प्रोग्राम चलाए और 1984 में जापान के कंप्यूटर में 20 लाख दशमलव स्थानों तक इसके मान को निकाला।यह स्पष्ट है कि संख्याओं का कई व्यावहारिक कारणों से महत्त्व है पर उनकी अपनी एक आकर्षण शक्ति भी है एवं गणित की वह शाखा जिसे संख्या सिद्धांत या उच्च गणित की संज्ञा दी जाती है,संख्याओं एवं उनके गुणधर्मों से ही नाता रखता है।
  • वृत्तीय (या त्रिकोणमितीय) फलनों का आधार मानी जाती है π की संख्या।कोणों को मापी जाने वाली इकाई को रेडियन कहते हैं।2π रेडियन 360 अंश के बराबर होता है।अतः समस्त त्रिकोणमितीय फलनों को π के रूप में व्यक्त किया जाता है।किसी वृत्त के व्यास की गणना के लिए इसकी जरूरत पड़ती है और तभी आधुनिक प्रौद्योगिकी का इसे आधार माना जाता है।विद्युत अभियांत्रिकी हर तरह के तरंग संचरण,खगोलिकी से जुड़ी गणनाएँ आदि सभी त्रिकोणमितीय फलनों पर ही आधारित हैं।अतः आधुनिक विज्ञान में π एक अहम् संख्या है।

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(2.)अजीब संख्या e (Strange Number e):

  • पाई जैसी एक ओर अजीबोगरीब संख्या है e।यह संख्या भी π की तरह ही आधुनिक गणित का आधार है।विभिन्न फलन जैसे कि त्रिकोणमितीय फलन,अतिपरवलय फलन,चरघातांकीय फलन आदि e पर ही आधारित हैं।
    संख्या e को निम्नलिखित अनंत श्रेणी के योग से निकाला जाता है:
  • 1+\frac{1}{1}+\frac{1}{2!}+\frac{1}{3!}+\frac{1}{4!}+.......
    यह एक अन्तहीन श्रेणी है।लेकिन इसका योग हमेशा 3 से कम रहता है।π और e दोनों ही अपरिमेय संख्याएं हैं।e का मान हमेशा 2 और 3 के मध्य होता है।e का मान ज्ञात करना (To find Value of e):
  • e=1+\frac{1}{1}+\frac{1}{2!}+\frac{1}{3!}+\frac{1}{4!}+.......
    प्रथम पद का मान=1
    दूसरे पद का मान=1
    तीसरे पद का मान=\frac{1}{2!}
    चौथे पद का मान=\frac{1}{3!}=\frac{0.5}{3}=0.166666
    पांचवें पद का मान=\frac{1}{4!}=\frac{0.166666}{4}=0.041666
    छठें पद का मान=\frac{1}{5!}=\frac{0.041666}{5}=0.008333
    सातवें पद का मान=\frac{1}{6!}=\frac{0.008333}{6}=0.001388
    आठवें पद का मान=\frac{1}{7!}=\frac{0.001388}{7}=0.000198
    नवें पद का मान=\frac{1}{8!}=\frac{0.000198}{8}=0.000024
    दसवें पद का मान=\frac{1}{9!}=\frac{0.000024}{9}=0.000002
  • उपयुक्त पदों का योग करने पर=e=2.718281828 यदि लघुगणक का आधार ‘e’ हो तो इन्हें प्राकृत लघुगणक (Natural Logarithms) अथवा नेपेरियन लघुगणक (Naperian Logarithms) कहते हैं। यदि आधार 10 हो तो इन्हें साधारण लघुगणक (Ordinary Logarithms) कहते हैं।प्राकृत या नैपियर लघुगणक पद्धति का उपयोग उच्च गणितीय अध्ययन में होता है।

(3.)काल्पनिक संख्या i (Nmaginary Number i):

  • यह भी एक विचित्र संख्या है।इसे काल्पनिक संख्या की संज्ञा दी जाती है क्यों इसका असल में कोई अस्तित्त्व नहीं है क्योंकि ऋण संख्या (-1) का वर्गमूल √(-1) लेने पर यह प्राप्त होती है।सभी संख्याओं का एक सार्विक गुण होता है कि धन या ऋण किसी भी संख्या का वर्ग हमेशा धनात्मक होता है।अतः वास्तविक संख्या निकाय (रियल नम्बर सिस्टम) में ऐसी संख्या को ढूंढ पाना जिसका वर्ग ऋण संख्या हो,असंभव है।मगर संख्याओं के वर्गमूल निकालने की क्रिया में ऐसी संख्याओं से वास्ता प्राचीन काल से गणितज्ञों को पड़ता रहता था।ऐसी संख्याओं को ‘काल्पनिक’ संख्या का नाम दस्कातिस द्वारा दिया गया।ऐसी किसी भी संख्या को जो a+b√(-1) यानि a+bi स्वरूप की हो,सम्मिश्र संख्या कहते हैं।आधुनिक गणित में सम्मिश्र संख्याओं का व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है तथा गणित और विज्ञान में प्रयुक्त होने वाले कई फलनों का यह आधार सिद्ध होते हैं।गणितज्ञ आयलर ने √(-1) को ग्रीक अक्षर i (iota) से निरूपित किया था।अर्थात् i=√(-1) इस प्रकार उस प्रत्येक संख्या को जिसका वर्ग ऋणात्मक संख्या हो अधिकल्पित या काल्पनिक संख्या कहते हैं। सर्वप्रथम आर्गेंड (Argand) ने समतल से सम्मिश्र संख्याओं का ज्यामितीय निरूपण किया था इसलिए वह समतल जिसमें सम्मिश्र संख्याओं के संगत बिंदु स्थित हैं आर्गेंड समतल (Argand Plane) कहलाता है तथा इस प्रकार के चित्र को आर्गेंड चित्र (Argand Diagram) कहलाते हैं।

(4.)शून्य संख्या (Zero Number):

  • शून्य संख्या भी विचित्र संख्या हैं।अकेले में इसका कुछ भी अर्थ नहीं होता है परंतु अन्य अंकों के साथ प्रयोग करने पर उनका मूल्य कई गुना बढ़ा या घटा देता है।शून्य का आविष्कार भारतीय गणितज्ञों द्वारा किया गया था जो बाद में पूरे विश्व में फैल गया।
  • शून्य का आविष्कार आर्यभट (जन्म 476ईस्वी) से पूर्व ही हो चुका था।अर्थात् ईसा की पहली शताब्दी से पूर्व हो चुका था।ब्रह्मगुप्त (628 ईस्वी) ने शून्य के गणित की अच्छी चर्चा की है।ब्रह्मगुप्त ने शून्य संबंधी गणित के बारे में भी लिखा है।आज से 2000 साल पहले हमारे देश (भारत) में शून्य तथा इस पर आधारित स्थानमान अंक पद्धति का आविष्कार हो चुका था।पर गणित और दैनिक व्यवहार में इसका प्रयोग होने में कुछ समय लगा। ब्रह्मगुप्त के समय के शिलालेखों में पहले-पहल शून्य का प्रयोग देखने को मिलता है।शून्य के बारे में विस्तृत आर्टिकल “शून्य की अवधारणा (Concept of Zero)” के नाम से लिखा है।अधिक जानने के लिए उस आर्टिकल को देखें।

(5.)अनंत का चमत्कार (The Miracle of Infinity):

  • वह राशि जो अपरिमित हो।इसका सांकेतिक चिन्ह ∞ है।
    रेखा,समतल अथवा आकाश का वह प्रदेश जो किसी नियत बिंदु से अनंत दूरी पर हो जैसे अनंत पर की रेखा,समतल अथवा आकाश।
  • अनंत संबंधी अवधारणा यह हो सकती है कि जिसमें सबकुछ शामिल हो अर्थात् जो पूर्ण हो।शून्य का अर्थ कुछ नहीं है।इस प्रकार शून्य नकारात्मक तरीका है और अनंत (पूर्ण) सकारात्मक तरीका है। अनन्त भी हमें यही संकेत करता है जो सीमा रहित हो।अनंत का अध्ययन उच्च गणित में किया जाता है।शून्य तथा अनन्त से संबंधित आर्टिकल हम पूर्व में पोस्ट कर चुके हैं।ज्यादा जानने के लिए उस आर्टिकल को पढ़ें।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics) के बारे में बताया गया है।

2.गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.गणित में अजीब संख्या का वर्णन करो? (Describe Strange Numbers in Mathematics?):

उत्तर:प्रथम कुछ अजीब संख्याएँ (weird numbers) 70, 836, 4030, 5830, 7192, 7912, 9272, 10430, …हैं। (OEIS A006037)।अजीब संख्याओं की एक अनंत संख्या मौजूद है और अजीब संख्या के अनुक्रम सकारात्मक Schnirelmann घनत्व (Schnirelmann density) है।(Sloane)।

प्रश्न:2.अजीब संख्या उदाहरण क्या है? (What is strange number example?):

उत्तर:उदाहरण:सबसे छोटी अजीब संख्या 70 है। इसके उचित भाजक 1,2,5,7,10,14 और 35 हैं; जिनका योग 74,लेकिन इन योगों का कोई 70 का सबसेट नहीं है।उदाहरण के लिए संख्या 12,प्रचुर मात्रा में है (is abundant),लेकिन अजीब नहीं है,क्योंकि 12 के उचित divisors 1, 2, 3, 4 और 6 जिनका योग 16 है;लेकिन 2 + 4 + 6=12।

प्रश्न:3.आप एक अजीब नंबर कैसे प्राप्त करते है? (How do you get a strange number?):

उत्तर:हम निम्नलिखित तरीके से “अजीब” संख्याओं को परिभाषित करते हैं:
सभी अजीब संख्या अभाज्य हैं ।
हर एक अंक प्राइम नंबर अजीब है ।
दो या अधिक अंकों के साथ एक नंबर अजीब है अगर और केवल अगर,दो नंबर इसे से प्राप्त किये गए हों या तो अपने पहले या अपने अंतिम अंक को हटाने के द्वारा,भी अजीब हैं ।

प्रश्न:4.संख्या 70 अजीब क्यों है? (Why is the number 70 Weird?):

उत्तर:अजीब संख्या प्राकृतिक संख्या है कि प्रचुर मात्रा में हैं,लेकिन अर्धपरफेक्ट नहीं हैं (abundant but not semiperfect)। उदाहरण के लिए, 70 सबसे कम अजीब संख्या है, क्योंकि इसका डिवाइजर्स का उचित सेट {1,2,5,7,10,14,35} योग 74 तक है,लेकिन 70 की संख्या के लिए उचित डिवाइजर्स राशि के अपने सेट का कोई सबसेट नहीं है (but no subset of its set of proper divisors sum to the number 70) और 70 ऐसी स्थितियों को पूरा करने के लिए सबसे छोटी संख्या है।

प्रश्न:5.क्यों 6174 सबसे रहस्यमय संख्या है? (Why 6174 is the most mysterious number?):

उत्तर:6174 को भारतीय गणितज्ञ डी आर कापरेकर (Indian mathematician D. R. Kaprekar) के लिए कापरेकर अचर के रूप में जाना जाता है।यह संख्या निम्नलिखित नियम के लिए उल्लेखनीय है: … अवरोही में अंकों की व्यवस्था और फिर आरोही क्रम में दो चार अंकों की संख्या प्राप्त करने के लिए,यदि आवश्यक हो तो अग्रणी शून्य जोड़ने।

प्रश्न:6.एक दुखद संख्या क्या है? (What is a sad number?):

उत्तर:जिन नंबरों के लिए यह प्रक्रिया 1 में समाप्त होती है,वे खुश संख्याएं (happy numbers) हैं जबकि जो 1 में समाप्त नहीं होते हैं वे दुखी संख्याएं (या दुखद संख्या) हैं।

प्रश्न:7.28 परफेक्ट संख्या क्यों है? (Why is 28 the perfect number?):

उत्तर:एक संख्या परफेक्ट है अगर इसके सभी गुणनखण्ड (factor),जिनमें 1 शामिल हैं, लेकिन खुद को छोड़कर, पूरी तरह से आपके द्वारा शुरू की गई संख्या को जोड़ते हैं। 6,उदाहरण के लिए, एकदम परफेक्ट (perfect) है,क्योंकि इसके गुणनखण्ड (factor) -3,2 और 1 -सभी 6 तक योग करते हैं।28 भी परफेक्ट है:14,7,4,2 और 1 28 तक जोड़ें।

प्रश्न:8.अजीब अजीब संख्या का वर्णन करें। (Describe Odd weird number):

उत्तर:संख्या सिद्धांत में,एक अजीब संख्या एक प्राकृतिक संख्या है जो प्रचुर मात्रा में है लेकिन अर्धपरफेक्ट (abundant but not semiperfect) नहीं है।दूसरे शब्दों में, संख्या के उचित divisors का योग संख्या से अधिक है,लेकिन उन divisors का कोई सबसेट संख्या उस संख्या के योग तक नहीं है (sum of the proper divisors of the number is greater than the number, but no subset of those divisors sums to the number itself)।

प्रश्न:9.अजीब संख्या क्या है? (What is Weird number?):

उत्तर:पद “अजीब संख्या” भी दो पूरक अंकगणित में एक घटना को संदर्भित करता है (also refers to a phenomenon in two’s complement arithmetic)।
संख्या सिद्धांत में, एक अजीब संख्या एक प्राकृतिक संख्या है।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics),गणित में अजीब संख्याएँ (Strange Numbers in Mathematics) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Some Strange Numbers in Mathematics

गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics)

Some Strange Numbers in Mathematics

गणित में कुछ विचित्र संख्याएं (Some Strange Numbers in Mathematics) ऐसी हैं जिन्हें आधुनिक गणित का मूलाधार माना जाता है लेकिन किसी को भी यह सुनिश्चित रूप से नहीं मालूम कि उनका वास्तविक स्वरूप क्या है।

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