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How Do Students Become Their Friends?

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1.छात्र-छात्राएं अपने मित्र कैसे बनें? (How Do Students Become Their Friends?),गणित के छात्र-छात्राएं अपने शत्रु न बनें बल्कि मित्र बनें (Mathematics Students Should Not Become Their Enemies But Become Friends):

  • छात्र-छात्राएं अपने मित्र कैसे बनें? (How Do Students Become Their Friends?) आप यह पढ़कर आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि हम अपने शत्रु भी हो सकते हैं और मित्र भी हो सकते हैं।परंतु इस बात को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं होंगे कि हम अपने शत्रु कैसे हो सकते हैं क्योंकि हम सबसे ज्यादा अपने आपको चाहते हैं,अपने आपसे प्रेम करते हैं फिर शत्रु कैसे हो सकते हैं? वस्तुतः गहराई से विचार करेंगे तो स्वयं के अथवा दूसरों के मित्र होना बहुत मुश्किल है और शत्रु होना बहुत आसान है।मित्रता एक कठोर तप (पुरुषार्थ) और साधना है जबकि शत्रुता करना बहुत आसान काम है।
  • हमारा विचार ऐसा हो सकता है या कि होता है कि यह तो एक बड़ी गलतफहमी है कि हम अपने शत्रु हैं,मित्र नहीं।हम सबसे ज्यादा स्वयं को चाहते हैं,स्वयं की देखभाल करते हैं,स्वयं को बेहद प्रेम करते हैं और यजुर्वेद के इस वेद के मंत्र का पालन करते हैं:
  • “दृते दृँह मा।मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षान्ताम्।मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।”
  • अर्थात् हे अज्ञान को दूर करने वाले भगवन्।मुझे दृढ़ (अडिग) कीजिए।सारे प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें।मैं सभी जीवो को मित्र की दृष्टि से देखूँ।हम सब (एक दूसरे को) मित्र की दृष्टि से देखें।
  • यदि हम अपने आपको चाहते न होते,अपने आपकी देखभाल न करते होते,अपने आपसे प्रेम न करते होते,अपने आपको न चाहते तो अपनी सुरक्षा न करते होते तो हम अभी तक जीवित नहीं रह सकते थे।परंतु यदि गहराई से विचार करेंगे तो असलियत सामने आ जाएगी।यदि आप अपने आपको इतना चाहते होते तो गणित में कमजोर न होने देते,अध्ययन में अपने आपको कमजोर न होने देते,अपने अंदर बुराइयां काम,क्रोध,लोभ,मोह,तृष्णा,वासना,कामुकता को न पनपने देते।कई छात्र-छात्राएं तो नशीली दवाइयों,शराब,मादक द्रव्यों इत्यादि का सेवन करते हैं यदि आप अपने आपके मित्र होते तो ऐसा कदापि न करते।
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2.अपने आपका मित्र होने का यथार्थ (The Reality of Being Your Friend):

  • वस्तुतः हम अपने आपके साथ मित्रता नहीं बल्कि शत्रुता का व्यवहार करते हैं।शत्रुता का अर्थ है कि अपना या किसी दूसरे का बुरा होना।हम हमारे अंदर आलस्य,लापरवाही,अकर्मण्यता को पनपने देते हैं तो अपने साथ शत्रुता करना ही हुआ।हम विद्या ग्रहण करने के लिए तप (पुरुषार्थ) और साधना नहीं करते हैं बल्कि ऐशोआराम,सुख-सुविधापूर्ण जीवन,विलासिता पूर्ण जीवन जीते हैं और विद्या ग्रहण करने से वंचित रह जाते हैं।
  • गलत आचार-विचार,रहन सहन,मद्य-मांस जैसे अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करना इत्यादि का आचरण करके फिर भी यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि हम अपने आपके सबसे अच्छे मित्र हैं।हमारा आचार-विचार,रहन-सहन,अध्ययन करने का रंग-ढंग,हमारी जीवन शैली,हमारे व्यवहार करने के तौर-तरीके से ही सिद्ध हो जाता है कि हम अपने आपके सबसे बड़े शत्रु हैं।
  • हमें मौज-मस्ती,टीवी देखने,मनोरंजन करने,सैर-सपाटा करने,गपशप करने,शादी-विवाह एवं पार्टियों को अटेंड करने इत्यादि के लिए समय मिल जाता है परंतु अध्ययन करने,गणित के सवालों को हल करने,परीक्षा की गंभीरता पूर्वक तैयारी करने,कोर्स का रिवीजन करने,गृहकार्य करने,प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने इत्यादि के लिए समय नहीं है।मानसिक रूप से संतुलित रहने के लिए ध्यान व योग करने,स्वस्थ रहने के लिए योगासन-प्राणायाम करने,नियत समय पर सोने व जल्दी उठने,अपने अंदर विद्यमान बुराइयों को दूर करने इत्यादि के लिए आपके पास समय नहीं है।यह सब अपने साथ शत्रुता करना नहीं है तो और क्या है? अपनी बुराइयों को पाले रखना व दूर करने में आनाकानी बहानेबाजी नहीं है तो क्या है?
  • कई छात्र-छात्राएं समय पर सोते हैं,सुबह जल्दी उठते हैं,नियमित रूप से अध्ययन करते हैं,गणित का अभ्यास करते हैं,परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते हैं।अपने अंदर की बुराइयों को ढूंढ-ढूंढकर दूर करते हैं।योगासन-प्राणायाम,ध्यान व योग करते हैं और मानसिक रूप से संतुलित रहते हैं ऐसे विद्यार्थी अपने आपके मित्र हैं।जब अपने साथी विद्यार्थी अच्छे आचार-विचार और अच्छे आचरण को अपना सकते हैं तो उनसे प्रेरणा लेकर हम खुद वैसा क्यों नहीं कर सकते हैं? यदि नहीं करते हैं तो इससे यही सिद्ध होता है कि हम अपने आपके सबसे बड़े शत्रु हैं।
  • यदि आप जॉब करते हैं और जाॅब को पूर्ण निष्ठा के साथ नहीं करते हैं बल्कि बेगार समझकर करते हैं।देर-सबेर आपकी असलियत अधिकारी को पता लग जाती है।आपकी काम के प्रति लापरवाही,उपेक्षा,आज के काम को कल पर टालना,काम को बेहतरीन तरीके से न करना आपकी तरक्की में बाधक बन जाता है।
  • जॉब में सीखने की ललक न होना,काम को एक ही ढर्रे से करना,काम में नवीनता न लाना,ग्राहकों के साथ सद्व्यवहार न करना,ग्राहकों को संतुष्ट न करना,ग्राहकों के काम में दिलचस्पी न लेना इत्यादि से भले ही अपने आपको चालाक समझें परंतु ऐसा करके आप अपने साथ शत्रुता ही करते हैं,आप अपने आपके मित्र नहीं है।इन सब मुद्दों पर गंभीरता पूर्वक विचार करें और अपने साथ शत्रुता का व्यवहार करना छोड़ दें।

3.अपने आपके मित्र बनने के तरीके (Ways to Be Your Friend):

  • उपर्युक्त विवरण से यह तो स्पष्ट हो ही गया होगा कि हम अपने आपके साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं अर्थात् छिपे हुए रूप में हम स्वयं के शत्रु हैं।अब यह भी ख्याल में ले लें कि जब तक आप अपने आपके मित्र नहीं बनते हैं तब तक दूसरे के मित्र भी नहीं बन सकते हैं।जो खुद आलसी,निकम्मा,लापरवाह है वह दूसरों का क्या काम करेगा? क्या काम आएगा अर्थात कुछ भी नहीं।
  • अपने आपके मित्र बनने के लिए सबसे पहले तटस्थ (निष्पक्ष) भाव के साथ अपने अंदर नजर डालनी होगी और यह पता लगाना होगा कि हमारे अंदर कौन-कौनसी कमजोरियां हैं उनकी सूची बना लें साथ ही अपनी खूबियों की अलग सूची बनाएं।इसके पश्चात एक-एक कमजोरी,बुराई को दूर करते जाएं क्योंकि सभी कमजोरियां व बुराई एक साथ दूर नहीं हो सकती हैं।यदि आप एक साथ कमजोरियों व बुराईयों को दूर करने का संकल्प लेते हैं और कुछ दिन निभाते हैं फिर उसका पालन नहीं करते हैं तो आपकी संकल्पशक्ति कमजोर होती जाएगी।
  • आप सोचेंगे कि इन कमजोरियों और बुराइयों को दूर करना बहुत कठिन है।परंतु एक-एक कमजोरी व बुराई को दूर करना आसान भी होता है और संकल्पशक्ति भी मजबूत होती है।ज्योंही एक-एक बुराई दूर हो जाए तो दूसरी बुराई को दूर करें इस प्रकार सभी बुराईयों व कमजोरियों को जड़ से उखाड़ फेकें।
  • उदाहरणार्थ सुबह जल्दी उठने की आदत नहीं है तो आप सुबह जल्दी उठने का प्रयास करें।यदि आप 8:00 बजे उठते हैं तो 7:00 बजे उठने का अभ्यास करें।सप्ताह या 10 दिन बाद 6:00 बजे उठने का प्रयास करें।15 दिन बाद 5:00 बजे उठने का प्रयास करें और एक माह बाद 4:00 बजे उठने का अभ्यास करें।शुरू में ही स्वतः (अन्तः प्रेरणा) नहीं उठा जाता है तो अलार्म के द्वारा उठें।धीरे-धीरे स्वसंकेत (ऑटो सजेशन) से उठने का अभ्यास करें।
  • रात को निर्धारित समय पर सोते समय अपने मन को निर्देश दें कि मुझे 6:00 बजे उठना है तो हमारे शरीर में स्थित बायोलॉजिकल क्लॉक स्वतः ही हमें ठीक समय पर उठा देती है।सुबह उठकर भगवान का नाम लेकर पृथ्वी पर पैर रखकर और पृथ्वी से क्षमा मांगे।फिर मुंह में पानी भरकर एक लोटे से छपके मारें।जिससे नींद दूर हो जाए।इसके पश्चात शौचादि व नित्य कर्मों से निवृत्त होकर अध्ययन करने बैठ जाएं।
  • शुरु-शुरु में परेशानी होती है,हमने पहले ही कहा है कि अपने आपका मित्र बनना तप (पुरुषार्थ) व साधना है और शत्रु बनना आसान है।जैसे उपर्युक्त उदाहरण को ही लें तो सात-आठ बजे उठना आसान है परंतु रोजाना चार से चार-साढ़े चार बजे उठना साधना है।
  • मित्रता का अर्थ है श्रेष्ठ स्थिति,आदर्श स्थिति प्राप्त करना।तीसरा काम यह करना है कि आपको यदि किसी बुराई को दूर करने में सफलता प्राप्त होती है तो अपने आपको उत्साहित करें,अपने आपकी प्रशंसा करें इससे आपको अन्य कमजोरियां और बुराइयों को दूर करने में मदद मिलेगी।आपकी कार्यकुशलता में वृद्धि होगी,आपकी उत्पादकता बढ़ेगी।
  • चौथा उपाय करें कि अपने आपको समझें और उतनी कमजोरी व बुराई को दूर करने का निश्चय करें,कदम बढ़ाए जितनी आपकी क्षमता है।जैसे कोई व्यक्ति 8:00 बजे उठता है तो एकदम से चार बजे उठना चालू कर सकता है परन्तु ऐसे संकल्पवान छात्र-छात्राएं और व्यक्ति बहुत कम होते हैं,दुर्लभ होते हैं।अतः अपनी क्षमता को पहचानकर कमजोरियों को स्टेप बाई स्टेप दूर करें।अपने आपको समझकर ही आप अपने आपसे बेहतर तरीके से काम ले सकते हैं।
  • पांचवा उपाय है कि अच्छे मित्रों की संगति करें जो आपको प्रेरित करते हो और आपको अपनी कमजोरियों के प्रति सचेत करते हों।हालांकि ऐसा सच्चा मित्र मिलना आज के जमाने में दुर्लभ है।अतः यदि सच्चा मित्र नहीं है तो सद्ग्रन्थों,सत्साहित्य का अध्ययन-मनन व चिन्तन करके मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।
  • छठवाँ नियम है कि अपना ज्ञान बढ़ाते रहें तथा अज्ञान को दूर करते रहें।आपको कोई हतोत्साहित करता हो तो ऐसे मित्रों व लोगों से दूर रहना चाहिए।अपने आपसे मित्रता करने का पालन करने के बाद ही दूसरों से मित्रता करनी चाहिए क्योंकि मित्रता करना आसान है निभाना बहुत कठिन है।

4.मित्रता के स्वर्णिम टिप्स (Golden Tips for Friendship):

  • (1.)अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले मित्र नहीं होते हैं बल्कि मतलबी होते हैं।संपत्ति होने पर बहुत से मित्र बन जाते हैं परंतु उनकी परीक्षा प्रतिकूल समय में ही होती है।प्रतिकूल समय में झूठे मित्र साथ छोड़ देते हैं।
  • (2.)किसी लोभ,लालच,आकर्षण,स्वार्थ,उद्देश्य से जो मित्र बनते हैं वे अपना मतलब पूरा होते ही अपनी असलियत दिखा देते हैं और हमें छोड़ देते हैं।
  • (3.)जिसके पास सच्चा मित्र है,वह मनुष्य कठिन कार्यों को भी सिद्ध कर सकता है इसलिए अपने गुण,कर्म,स्वभाव व योग्यता वाले को मित्र बनाना चाहिए।
  • (4.)पापों से बचाता है,कल्याण में लगाता है,छिपाने योग्य बातों को छिपाता है,गुणों को प्रकट करता है,आपत्ति में साथ नहीं छोड़ता,समय पर सहायता देता है ये सच्चे मित्र के लक्षण हैं।
  • (5.)पीछे तो कार्य की हानि करते हैं और सामने मधुर वचन बोलते रहते हैं।इस प्रकार के विष भरे हुए के समान मित्रों जिनके सिर्फ मुख पर ही दूध लगा है,छोड़ देना चाहिए अर्थात् चापलूस को मित्र न बनाएं।
  • (6.)मित्र की अनुपस्थिति में न तो घर जाना उचित है और न मित्र की पत्नी से मेलजोल बढ़ाना उचित है।
  • (7.)मित्र पर अत्यधिक विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि आज का मित्र कल शत्रु भी हो सकता है और अपने भेद प्रकट कर सकता है।
  • (8.)जो शत्रु से मेलजोल रखता है उसे मित्र न समझें क्योंकि शत्रु का मित्र कभी भी शत्रु हो सकता है।साथ ही जिससे एक बार मित्रता टूट जाए उसे मित्रता करना उचित नहीं है क्योंकि उससे धोखा हो सकता है।
  • (9.)वस्तुतः आज के जमाने में उपर्युक्त बातों का पालन करने वाला और सच्चा मित्र मिलना दुर्लभ है अतः अच्छा यही है कि न तो किसी से दुश्मनी अच्छी है और न मित्रता अच्छी है।
  • (10.)यदि आपत्ति में कोई मित्र आपकी सहायता करने में आनाकानी करता है या बहाना बनाता है तो वह सच्चा मित्र नहीं है।

5.मित्रता का दृष्टांत (The Example of Friendship):

  • एक सज्जन और सरल प्रकृति का गणित का विद्यार्थी था।उसने बहुत से छात्रों से मित्रता की और यह आशा रखी कि किसी दिन कठिन वक्त में काम आएंगे।एक बार अचानक परीक्षा की तिथि घोषित कर दी गई।हिंदी,सामाजिक ज्ञान इत्यादि विषयों की तैयारी के लिए तो उसे चिंता नहीं हुई परंतु गणित,विज्ञान जैसे विषयों की तैयारी ठीक से नहीं हुई थी।अतः वह दौड़कर एक मित्र के पास गया और कहा कि आप मेरे मित्र हैं,कृपा करके मुझे गणित के इन कठिन सवालों को समझा दो।वह मित्र बोला घर पर मुझे अपने छोटे भाई-बहनों को भी पढ़ाना है वे इंतजार कर रहे होंगे।अब मैं ठहर नहीं सकता हूँ।
  • वह विद्यार्थी अपने दूसरे मित्र के पास गया और कहा कि मित्र इस परीक्षा में मुझे कैसे भी उत्तीर्ण करवा दो और मुझे गणित के कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल समझा दो।दूसरा मित्र बोला मैं तो गणित के सवालों को भूल गया,मुझे तो कुछ भी याद नहीं आ रहा है।
  • तब वह विद्यार्थी अपने तीसरे मित्र के पास गया और कहा कि मित्र मैं इस समय बहुत बड़ी मुसीबत में फँस गया हूं,तुम गणित में बहुत होशियार हो,चुटकियों में ही सवालों को हल कर देते हो।मुझे भी कुछ सवाल बता दो।तीसरे मित्र ने कहा कि मुझे कमरे पर जाकर रोटियां पकानी है,मैं तो किराए के मकान में रहता हूं।रोटी व साफ-सफाई का काम मुझे ही करना पड़ता है।अब तो मैं कमरे पर जा रहा हूं।यह काम किसी फुर्सत के समय करा लेना।
  • तब वह चौथे मित्र के पास पहुंचा और उससे निवेदन किया।चौथे मित्र ने कहा कि तुम्हारी तरह मेरी भी तो परीक्षा है।मुझे भी तो परीक्षा की तैयारी करनी है।मैं तुम्हें गणित के सवाल समझाऊँगा तो स्वयं मुसीबत में फंस जाऊंगा।
  • अंत में वह पाँचवें मित्र के पास गया तो पाँचवें मित्र ने कहा कि मैं तो स्वयं तुमसे पूछने वाला था।ऐसा करता हूं,पहले मैं गणित के सवालों को हल करता हूं और अभ्यास करने के बाद,तैयारी करने के बाद तुम्हें बता दूंगा।
  • तब उस विद्यार्थी के समझ में आया कि दूसरों का सहारा लेने वाला आगे नहीं बढ़ सकता है।खुद अपने बलबूते पर ही आगे बढ़ा जा सकता है।उसने तत्काल कमर कस ली और गणित के सवालों को हल करने में जुट गया।पहले प्रश्नावली की थ्योरी व सूत्रों को ठीक से समझा फिर उदाहरणों को समझकर हल किए तब उसने प्रश्नावली को हल किया।परीक्षा के दबाव से उसकी चेतना जागृत हो गई और मन को एकाग्र करके सवालों को हल करता गया हालांकि कुछ सवाल हल नहीं हुए परंतु गणित की इतनी तैयारी हो गई कि न केवल वह परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ बल्कि अच्छे अंक अर्जित किए।अक्सर झूठे मित्र विपत्ति के समय पीठ दिखा देते हैं।परन्तु यह भी सही है कि विपत्ति में ही सच्चे व झूठे मित्रों का पता चलता है।वस्तुतः दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता छात्र-छात्राओं व व्यक्ति को पंगु बना देती है जबकि अपने बलबूते समस्याओं को हल करने वाला विद्यार्थी न केवल समस्याओं को हल कर लेता है बल्कि उसकी प्रतिभा का विकास भी होता है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र-छात्राएं अपने मित्र कैसे बनें? (How Do Students Become Their Friends?),गणित के छात्र-छात्राएं अपने शत्रु न बनें बल्कि मित्र बनें (Mathematics Students Should Not Become Their Enemies But Become Friends) के बारे में बताया गया है।

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6.गणित की कविता की बजाए पीड़ा अच्छी (हास्य-व्यंग्य) (Pain is Good Rather Than Math Poetry) (Humour-Satire):

  • आधी रात को बच्चे के रोने की आवाज सुनकर चिंटू ने पूछा:बच्चा क्यों रो रहा है?
  • कमली:सो नहीं रहा है बस रोए जा रहा है।
  • चिंटू:गणित की कविता सुनाकर सुला दो।
  • कमली:गणित की पोइट्री ही तो सुना रही थी।लेकिन घर में अन्य सभी लोगों ने कहा कि इस पोइट्री से तो बच्चे का पीड़ा से रोना अच्छा है।

7.छात्र-छात्राएं अपने मित्र कैसे बनें? (Frequently Asked Questions Related to How Do Students Become Their Friends?),गणित के छात्र-छात्राएं अपने शत्रु न बनें बल्कि मित्र बनें (Mathematics Students Should Not Become Their Enemies But Become Friends) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.अपने मित्र बनने की कुछ अतिरिक्त टिप्स क्या है? (What are Some Additional Tips for Becoming Your Friend?):

उत्तर:(1.) अपने आपकी झूठी प्रशंसा न करें बल्कि बढ़िया तो यह है कि अपने आपकी किसी के सामने प्रशंसा न करें।
(2.)अपने आप पर पैनी नजर रखें,आपका मन कहाँ-कहाँ दौड़ लगाता है,क्या-क्या सोचता है,पतन की ओर जाने के लिए उकसाता है या उत्थान और विकास की ओर उकसाता है।मन की उम्मीदों,इरादों को गहराई से समझें और गलत बातों को कंपनी देना छोड़े तथा सही बातों में मन को व्यस्त रखें।
(3.)दूसरों से वार्ता करते समय भी मन पर नजर रखें।कोई गलत बात सोच ले या कह दें तो मन को सही व अच्छी बात कहने के लिए प्रशिक्षित करें।

प्रश्न:2.अपने से बलवान शत्रु से कैसे निपटें? (How to Deal With an Enemy Stronger Than You?):

उत्तर:(1.) अपने से बलवान शत्रु से वैर,विरोध न करें।
(2.)अपने शत्रु की शक्तियों की पहचान करें तथा उससे झगड़ा बढ़ाने पर अधिक से अधिक कितना नुकसान हो सकता है इसका अनुमान लगाएं।यदि झगड़ा बढ़ाने पर थोड़ा सा नुकसान होता हो तो उसे सहने के लिए तैयार रहें।परंतु सब कुछ दांव पर लगा देना ठीक नहीं है।
(3.)आपका लड़ने का तरीका नैतिक होना चाहिए ताकि लोगों की सहानुभूति आपके साथ रहे।
(4.)आपका इक्का तभी निकाले जब वह बादशाह निकाले।शत्रु को कमजोर समझने की गलती न करें।
(5.)शत्रु के बारे में किसी से भी चर्चा न करें बल्कि ऐसे दर्शाएं जैसे आपका उससे कोई लेना देना नहीं है।
(6.)हमेशा अपने बचने का कोई न कोई रास्ता जरूर रखें।

प्रश्न:3.अपने शत्रु बनने से कैसे बचें? (How to Avoid Becoming Your Enemy):

उत्तर:(1.)मन बुराइयों,चुगली,ईर्ष्या,द्वेष में रस लेता है तो उस तरफ से मोड़कर मन को हमेशा अच्छी आदतों तथा अध्ययन में व्यस्त रखें।
(2.)मन अध्ययन करने में टालमटोल करता हो तो मन को विवेकपूर्वक वश में करके अध्ययन में संलग्न करें।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र-छात्राएं अपने मित्र कैसे बनें? (How Do Students Become Their Friends?),गणित के छात्र-छात्राएं अपने शत्रु न बनें बल्कि मित्र बनें (Mathematics Students Should Not Become Their Enemies But Become Friends) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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