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Seven Wonders of World in Mathematics

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1.गणित में संसार के सात आश्चर्य (Seven Wonders of World in Mathematics),गणित में संसार के प्राचीन सात आश्चर्य (Ancient Seven Wonders of World in Mathematics):

  • गणित में संसार के सात आश्चर्य (Seven Wonders of World in Mathematics) भारतीय तथा पाश्चात्य देशों के नमूने हैं।मनुष्य ने अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास के क्रम में अन्य कलाओं को जन्म दिया है।इनमें चित्रकला,वास्तुकला तथा स्थापत्य कला एवं मूर्तिकला सबसे प्राचीन कलाएँ हैं।परंतु गणित भी कला और विज्ञान दोनों है।गणित के माध्यम से मनुष्य ने अपने अंतर्निहित विलक्षण प्रतिभा,विस्मयकारी खोजों और दृढ विश्वासों को एक रूप प्रदान करने का महान कार्य किया है। प्राचीन काल के कई गणितज्ञों ने तो गणित के प्रति त्याग और समर्पण के कारण अपना समस्त जीवन ही लगा दिया और अपने अथक परिश्रम,त्याग और समर्पण के बल पर गणित का एक भव्य महल खड़ा कर दिया है।गणितज्ञ आर्किमिडीज तथा महिला गणितज्ञा हाइपेटिया (Hypatia) ने तो गणित के लिए अपना बलिदान ही दे दिया।
  • हमने ऐसे ही सात आश्चर्यजनक गणित के आश्चर्यों को चुना है।प्रश्न उत्पन्न होता है कि सात ही क्यों,कम या ज्यादा क्यों नहीं।इनकी संख्या सात क्या 18 या 108 भी हो सकती है तथा इससे भी अधिक। वस्तुतः संख्या सात हमेशा से एक विशेष रहस्यात्मक संख्या मानी जाती थी।उदाहरणार्थ एक सप्ताह में सात दिन (सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार) होते हैं।सभी प्राचीन जातियों जैसे हिन्दू,ग्रीक,रोमन,हेब्रू तथा अन्य सभी का संख्या सात के अन्तर्निहित गुणों में बहुत विश्वास था।हिन्दू धर्म में तो सात का आध्यात्मिक महत्त्व भी है।
  • संसार के सात आश्चर्य भी इसीलिए चुने गए हैं जो निम्न हैं:(1.)मिस्र के पिरामिड (Pyramids of Egypt) (2.)बेबीलोन के झूलते उद्यान (Hanging Gardens of Babylon) (3.)ओलंपिया के ज्यूस की प्रतिमा (Statue of Zeus at Olympia) (4.)इफीसस में आर्टीमिस का देवालय (Temple of Artemis at Empesus) (5.)हेलीकारनेसस का स्मारक (Mausoleum of Halicarnassus) (6.)रोड्स की विशाल मूर्ति (Colossus of Rhodes) (7.)सिकंदरिया पेअराॅस नामक प्रकाश स्तंभ (The Pharos or Light House of Alexandria) हैं।
  • इनको पढ़कर हमारे दिमाग में विचार आया कि क्यों न गणित में संसार के सात आश्चर्यों का पता लगाया जाए।ढूंढने पर एक लंबी सूची बन गई।परंतु चूँकि सात आश्चर्यों का आर्टिकल तैयार करना था।उनमें से सात आश्चर्यों का चुनाव करना बड़ा मुश्किल हो गया था।क्योंकि गणित में सात ही क्या अनेक आश्चर्य हैं।बरहाल सात आश्चर्य का विवरण प्रस्तुत है:
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2.आर्किमिडीज की हृदविदारक मृत्यु (The Heart-Randing Death of Archimedes):

  • आर्किमिडीज की मृत्यु बहुत ही ह्रदय विदारक है। आर्किमिडीज साइराक्यूज के राजा हीरो के मित्र थे। मार्सेलस ने जब साइराक्यूज पर विजय पाई तो उसे गणितज्ञ आर्किमिडीज से मिलने की बड़ी इच्छा हुई।क्योंकि आर्किमिडीज की वजह से सेनापति मार्सेलस को साइराक्यूज को 3 वर्ष तक घेरा डाले रहना पड़ा था।मार्सेलस के सैनिक आर्किमिडीज को महादानव समझने लगे थे।मार्सेलस की इच्छा थी कि ऐसे महान् गणितज्ञ को सम्मानित करना चाहिए।आर्किमिडीज को ससम्मान बुलाने के लिए उसने अपने एक सैनिक को भेजा।
  • आर्किमिडीज उस समय समुद्र तट पर आड़ी तिरछी रेखाएँ बना रहा था।उसका ध्यान गणित की दुनिया में केंद्रित था।
    अचानक एक सैनिक धीरे-धीरे आर्किमिडीज की तरफ बढ़ा परंतु उस सैनिक की पदचाप से भी आर्किमिडीज की एकाग्रता भंग नहीं हुई।वह सैनिक बिल्कुल उसके निकट आ गया।उस सैनिक की छाया रेत पर खींची हुई रेखाओं पर पड़ी।
  • आर्किमिडीज ने बिना दृष्टि उठाए ही दृढ़ स्वर में कहा कि कौन हो तुम जो मेरे और सूर्य के बीच आकर खड़े हो गए।
    उस सैनिक ने कहा कि सेनापति मार्सेलिस ने तुम्हें बुलाया है।सैनिक ने फौजी आदेश सुनाया।
  • आर्किमिडीज ने बिना विचलित हुए कहा कि कौन सेनापति और कैसा आदेश?विजयी रोमी सेना के सैनिक को यह उपेक्षा सहन नहीं हुई।उसने अपनी तलवार उठाई और उस कर्मयोगी की ऐहिक लीला समाप्त हो गई।महान् गणितज्ञ आर्किमिडीज गणित के प्रेम में आनंद का अनुभव कर रहा था।वास्तव में आर्किमिडीज एक सच्चे कर्मयोगी थे।ऐसे कर्मयोगियों की वजह से ही आज गणित का इतना भव्य महल दिखाई देता है।गणित का विकास,शून्य की खोज तथा दाशमिक पद्धति की खोज न हुई होती तो मानव का जितना विकास अथवा यों कहें की गणित और विज्ञान का जो विकास देखने को मिलता है उतना नहीं होता।

3.भारत द्वारा शून्य की खोज (The Discovery of Zero by India):

  • शून्य की खोज विश्व का आश्चर्य ही है।प्रोफेसर हाॅलस्टीड के शब्दों में “शून्य के आविष्कार तथा इसके महत्त्व की जितनी भी स्तुति की जाए कम है। कुछ नहीं वाले इस शून्य को न केवल एक स्थानमान,चिन्ह या संकेत प्रदान करना बल्कि इसमें उपयोगी शक्ति भरना उस भारतीय मस्तिष्क की एक विशेषता है जिसने इसे जन्म दिया है।यह ‘निर्वाण (मोक्ष,मुक्ति)’ को विद्युत शक्ति में बदलने जैसा है।गणित के किसी भी अन्य आविष्कार ने मानव की बुद्धि एवं शक्ति को इतना अधिक बलशाली नहीं बनाया है।”
  • शून्य और अनंत गणित के दो अनमोल रत्न हैं।रत्न के बिना तो जीवन चल सकता है परंतु शून्य और अनन्त के बिना गणित में आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
  • शून्य का आविष्कार भारतीय गणितज्ञों के दिमाग की उपज है।आज जो दाशमिक पद्धति अर्थात् दस के आधार पर अंको को लिखने की पद्धति है वह भी पूर्णत: भारतीय पद्धति है।भारतीय गणितज्ञ अन्य अंकों की तरह शून्य को भी एक अंक की तरह मानते थे और उसे सूचित करने के लिए प्रतीक चिन्ह भी भारतीय गणितज्ञों ने दिया था।
    इस शून्य में बहुत कुछ छिपा हुआ है।जिस शून्य का अर्थ कुछ नहीं है।वही शून्य अंकों के बाद प्रयोग किया जाता है तो उसका महत्त्व बहुत बढ़ा देता है।
  • शून्य में किसी संख्या को जोड़ने पर वही संख्या प्राप्त होती है।शून्य का वर्ग (वर्ग,वर्गमूल,घन,घनमूल) करने पर भी परिणाम शून्य प्राप्त होता है।शून्य में किसी संख्या का भाग देने पर शून्य ही प्राप्त होता है।किसी संख्या की घात शून्य होने पर उसका मान एक होता है,चाहे वह संख्या कितनी बड़ी हो।किसी संख्या में शून्य को जोड़ने व घटाने पर भी संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
  • अंकों के दाई ओर इसका प्रयोग करने पर 10 गुना,100 गुना तथा अनेक गुना उसका मूल्य बढ़ा देता है।परंतु दशमलव के बाद और अंकों के बायीं ओर लगाने पर उसका संख्यात्मक मान घटा देता है।उदाहरणार्थ:457 के बाद शून्य लगाने पर 4570 में दस गुना मान बढ़ जाता है।इसी प्रकार 0.457 में दशमलव के बाद शून्य लगाने पर 0.0457 में 0.457 का मान घटा देता है।संभवतः शून्य का आविष्कार किसी ब्राह्मण, ऋषि या ज्योतिषी ने नहीं की थी।क्योंकि वेदों में इसका उल्लेख नहीं मिलता है।राजा-महाराजाओं द्वारा जो शिलालेख तथा ताम्रपत्रों में भी इसका उल्लेख नहीं मिलता है।
  • शिलालेख तथा ताम्रपत्र राज-ज्योतिषियों द्वारा लिखा जाता था।शून्य का आविष्कार किसी स्वतंत्र विचारक और गणितज्ञ के दिमाग की उपज लगता है।इसके व्यावहारिक महत्त्व के कारण इसका व्यावहारिक उपयोग होता रहा।प्रथम बार शून्य के आविष्कार का संकेत संखेड़ा से गुर्जर राजाओं का एक दान पत्र मिला है उसमें संवत् 346 अंकित है। इसमें शून्य का प्रतीक इसलिए प्रयोग नहीं हुआ क्योंकि यह शून्य वाले संवत् में नहीं लिखा गया। पहली बार आठवीं सदी के एक दानपत्र में शून्यवाली संख्या मिलती है।यह राघोली दानपत्र राजा जयवर्धन द्वितीय का है।इसमें संख्या 30 का प्रयोग हुआ है।इसमें शून्य का आकार छोटे वृत्त की तरह है।

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4.भारत द्वारा दाशमिक पद्धति की खोज (Discovery of the Decimal System by India):

  • आज जो दाशमिक पद्धति संपूर्ण विश्व व गणित में प्रयोग की जाती है।यह पूर्णतः भारतीय अंक पद्धति है।विज्ञान तथा गणित में भारतीय गणितज्ञों का सबसे बड़ा योगदान शून्य और दाशमिक पद्धति का है।हमारे प्राचीन भारतीय गणितज्ञ उच्च कोटि के गणितज्ञ थे जिन्होंने शून्य,दाशमिक पद्धति और अनंत सम्बन्धी खोज दी है।1 से 9 तक के अंकों का स्पष्ट उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।उदाहरणार्थ निम्न मंत्र का अवलोकन करें:
  • “सप्त होमा:समिधो ह सप्त मघूनि सप्तऋतवो ह सप्त।
    सप्त ज्यानि परिभूतमायन ता: सप्तगृघ्रा इति शुश्रुमावयम्”।।
  • भाषार्थ:सात (विषयों की) ग्रहण करने वाली (इन्द्रियाँ, त्वचा, नेत्र,कान, जिव्हा, नाक,मन और बुद्धि),सात ही विषय प्रकाश करने वाली (इन्द्रियों की सूक्ष्म शक्तियाँ),सात ज्ञान (विषय) और साथ ही गति (प्रवृत्ति) हैं।(वे ही) सात विषयों के प्रकाश साधन प्रत्येक प्राणी के साथ उन (प्रसिद्ध) सात इन्द्रियों से उत्पन्न हुई वासनाओं को प्राप्त हुए हैं,यह हमने सुना है।
    इसी प्रकार:
  • “सप्त च्छन्दांसि चतुरुत्तराण्यन्यो अन्यस्मिन ध्यार्पि तानि।
    कथं स्तोमा:प्रति तिष्ठन्ति तेषु तानि स्तोमेषु कथमार्पितानि”।।
  • भाषार्थ:(धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष) चतुर्वर्ग से अधिक उत्तम किए गए सात ढकने (मस्तक के सात छिद्र) एक दूसरे में यथावत जड़े हुए हैं।कैसे स्तुति योग्य गुण उन (मस्तक के गोलकों) में कैसे ठीक-ठीक जमे हुए हैं।
  • ऐसे संख्याओं के प्रयोग के अनेक मंत्र अथर्ववेद में उल्लेखित है।वेदों का रचनाकाल संभवतः ईसापूर्व 4000 के लगभग है।यानि आज से 6000 वर्ष पूर्व वेदों की रचना हुई है।इस प्रकार संख्याओं की खोज 6000 वर्ष (1 से 9) तक हो चुकी थी।
    दाशमिक स्थानमान पद्धति का आविष्कार बाद में हुआ है परंतु संख्या 1 से 9 तक का आविष्कार वैदिक कालीन है।संभवतः दाशमिक पद्धति का आविष्कार ईसा की पहली शताब्दी तक हो चुकी थी।यानी दाशमिक पद्धति तथा 0 से 9 अंकों का आविष्कार भारत में 2000 वर्ष पूर्व हो चुका था।
  • ऐसा समझा जाता है कि जब से मनुष्य का संसार में उद्भव हुआ तभी से संख्याओं की उत्पत्ति हुई।यह भारतीय गणितज्ञों की बहुत बड़ी उपलब्धि है।शून्य और 9 अंकों अर्थात् दस के आधार वाली यह संख्या पद्धति है इसलिए इसे दाशमिक पद्धति कहते हैं।प्रारंभ में संस्कृत में इन्हें एकम् (एक),द्वि (दो),त्रीण (तीन),चत्वारि (चार),पंचम (पाँच),षष्ठम (छ:),सप्तम (सात),अष्टम (आठ),नवम् (नौ) एवम् दशम् (दस) के रूप में अथर्ववेद में पाएंगे।आगे की संख्याएँ इन्हीं के आधार पर लिखी गई हैं जैसे एकादश=एकम्+दशम्=1+10=11

5.यूक्लिड की महान् कृति ऐलीमेन्ट्स (Euclid Great Work of Elements):

  • यूक्लिड के ज्यामिति के ग्रंथ का नाम ‘ज्यामिति’ या ‘एलिमेंट्स’ नहीं है।यूरोप की भाषाओं में यूक्लिड के ग्रंथ को ‘एलिमेंट्स (मूलतत्त्व )’ नाम से जाना जाता है।यूक्लिड ने अपना ग्रंथ यूनानी (ग्रीक) भाषा में लिखा था और इसका असली नाम था:स्टोइकेइया।स्टोइकेइया यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘किसी भी वस्तु की सबसे छोटी इकाई’।भाषाविद् इस शब्द को ‘सरलतम ध्वनि’ या ‘वर्णमाला’ के एक अक्षर के लिए इस्तेमाल करते थे।
  • यूक्लिड ने अपने ग्रंथ का नाम ‘ज्यामिति’ इसलिए नहीं रखा कि इस शब्द का अर्थ बहुत सीमित है।’ज्या’ का अर्थ होता है ‘भूमि’ और ‘मिती’ का अर्थ होता है ‘भूमि का मापन’।अंग्रेजी का ‘ज्योमेट्री’ शब्द यूनानी शब्द ‘जे-मेट्राइन’ से बना है और इसका भी अर्थ होता है:जे=भूमि और मेट्राइन=मापन।किन्तु यूक्लिड की ज्यामिति केवल ‘भूमि का मापन’ नहीं थी।यूक्लिड की ज्यामिति को आज हम ‘ज्यामिति के मूलतत्त्व’ या ‘प्राथमिक ज्यामिति’ के नाम से जानते हैं।यह नाम इसलिए कि यूक्लिड अपनी ज्यामिति से इस विज्ञान की कुछ प्रारंभिक अथवा मूल बातों की व्याख्या करना चाहते थे।
  • यूक्लिड के ‘मूलतत्त्व’ सिद्धि अथवा साध्य के मूलतत्त्व हैं।मूलतत्त्व विज्ञान के आधार स्तंभ होते हैं।मूलतत्त्व में उन सभी बातों का समावेश होना चाहिए जो उस विज्ञान के लिए परमावश्यक हो। साथ ही उनमें ऐसी किसी बात का समावेश नहीं होना चाहिए जो अनावश्यक हो।इसलिए अरस्तू ने कहा था कि सिद्धि के बेहतर होने के लिए जरूरी है कि अभिधारणाएं तथा परिकल्पनाएँ कम से कम हों।यूक्लिड ने ठीक यही किया।यूक्लिड की एलिमेंटस 13 पुस्तकों या खंडों में विभाजित है।इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यूक्लिड ने इस ज्यामितीय ज्ञान को एक ठोस तार्किक आधार शिला पर खड़ा किया।ज्यामिति के सिद्धांतों को एक विशिष्ट विधि का जामा पहनाया।
  • यूक्लिड की एलिमेंटस की रचना संभवतः 300 ईस्वी पूर्व हुई थी।इस पुस्तक का महत्त्व इसी से पता चल जाता है कि बाइबिल के बाद अन्य भाषाओं में सर्वाधिक अनुवाद यूक्लिड की पुस्तक एलिमेंट्स का हुआ है।इस प्रकार इतिहास में यह एक मील का पत्थर साबित हुई।

6.भास्कराचार्य की कृति लीलावती (Bhaskaracharya’s Work Lilavati):

  • भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा गणितशास्त्र पर लिखी गई कृति लीलावती एक अमर कृति है।भास्कराचार्य द्वितीय ने इस कृति की रचना आज से 850 वर्ष पहले की थी।भास्कराचार्य का जन्म 1114 ईसवी सन के लगभग हुआ था।इस ग्रंथ का अकबर ने फैजी द्वारा फारसी में अनुवाद कराया था।फैजी लिखता है कि लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री थी। लेकिन कई विद्वान इसे सही नहीं मानते बल्कि फैजी की कल्पना करार देते हैं।जो भी हो परंतु लीलावती को भास्कराचार्य ने इस ढंग से लिखा है कि इसकी विषयवस्तु और इसका पात्र लीलावती जीवंत हो उठता है।लीलावती में अंकगणित,बीजगणित तथा ज्योतिष का ज्ञान गागर में सागर की तरह है।डाॅ.स्पीडवुड ने रॉयल सोसाइटी के जर्नल में लिखा है, “भास्कराचार्य ने गणित ज्योतिष सिद्धांतों की स्थापना की है और जिस दर्जे की है उसकी तुलना हम आधुनिक गणित-ज्योतिष शास्त्र से कर सकते हैं”।भास्कराचार्य की कृति लीलावती को देखने तथा पढ़ने पर ज्ञात होता है कि भारत को जितना गणित और ज्योतिष ज्ञात था,यूरोप के किसी देश को उतना ज्ञात नहीं था।यदि भास्कराचार्य के बाद उन्हीं की योग्यता के गणितज्ञ हमारे देश में होते चले आते तो जो आविष्कार यूरोप में हुए हैं वे हमारे देश में भी हो सकते थे यानी भारत की दिशा और दशा ओर ही होती।

7.महिला गणितज्ञा हाइपेटिया का दु:खद अन्त (The Tragic End of the Woman Mathematician Hypatia):

  • प्राचीन जगत् की एकमात्र स्त्री गणितज्ञा थी हाइपेटिया।उसकी मृत्यु बहुत ही दर्दनाक और हृदय विदारक है।हाइपेटिया अलेक्जेंड्रिया की अकादमी में अरस्तू का दर्शन पढ़ाती थी।वह एक उच्च कोटि की गणितज्ञा थी।हाइपेटिया ने डायोफैंटुस के बीजगणित पर टीका लिखी थी।ऐसी विदुषी महिला गणितज्ञा हाइपेटिया को धर्मांध ईसाइयों ने थियोफिलस (अलेक्जेंड्रिया के बिशप) की आज्ञा से 415 ईस्वी में अलेक्जेंड्रिया नगर में जिंदा ही जला दिया।अलेक्जेंड्रिया के विशाल ग्रंथालय तथा हाइपेटिया के दहन के साथ ही यूनानी संस्कृति का लोप हो गया।हाइपेटिया का जन्म चौथी शताब्दी के मध्य में हुआ था और वह अलेक्जेंड्रियन दार्शनिक और गणितज्ञ थाॅन (Theon) की बेटी थी।थाॅन (Theon) उस समय सबसे सफल शिक्षाविदों में से एक था।उच्च श्रेणी के दार्शनिक की बेटी होने के नाते,उन्होंने अपने सामाजिक वर्ग में लड़कों के समान शिक्षा प्राप्त की।बहुत से लोग और युवा उसकी गणितीय प्रतिभा से प्रभावित थे और उसे अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया।तब छात्रों का एक घेरा उसके आसपास जमा हो गया था।
  • उसने एक एस्ट्रोलोबे,शंकु खण्डों (Conic Sections),आनाल के काॅन्फिक्स आफ एपोलोनिपस,हाइपरबोला,परवलय और ईलिप्स के विचारों को गणित में विकसित किया।
  • अफवाहें फैलाई गई कि हाइपेटिया अपने सार्वजनिक व्याख्यानों में ईसाई धर्म के खिलाफ बोलती है।धर्मांध ईसाइयों ने इसे गंभीरता से लिया और 415 ईस्वी में उसे अपनी गाड़ी से खींच कर पीटा और जला दिया गया।यद्यपि उनके जीवन को एक दर्दनाक और अनावश्यक अन्त किया गया लेकिन गणित और विज्ञान में उच्च उपलब्धि और उन्नति से भरा उसका जीवन प्रेरणादायक है।

8.पाइथागोरस तथा उसके शिष्यों द्वारा अपरिमेय संख्याओं की खोज (The Discovery of Irrational Numbers by Pythagoras and his Disciples):

  • पाइथागोरस एक उच्चकोटि के गणितज्ञ थे।उनके गुरु इतिहास प्रसिद्ध गणितज्ञ थेल्स (Thales) थे। पाइथागोरस का जन्म 580 ईसवी पूर्व सामोस में हुआ था।शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र इटली के क्रोटोना (Crotona) नगर को बनाया।उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की।यह विद्यालय आज के विद्यालयों जैसा नहीं था बल्कि हमारे प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की पद्धति का था।उसमें प्रवेश लेने वाले को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वे गुप्त विद्या को किसी बाहरी व्यक्ति के सामने प्रकट नहीं करेंगे।प्रत्येक खोज और आविष्कार को पाइथागोरस के नाम से जोड़ा जाए। इसलिए यह पता लगाना मुश्किल है कि कौनसी खोज पाइथागोरस ने की और कौनसी खोज उसके शिष्यों ने की।पाइथागोरस और उसके शिष्यों का विश्वास था कि यह विश्व संख्यामय है तथा विश्व की सभी घटनाओं को परिमेय (रेशनल) संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है।उनका पक्का विश्वास था कि विश्व का मूलतत्त्व संख्या ही है।मजेदार बात तो यह है कि उसकी यह मान्यता खोखले थी।पाइथागोरस को बाद में पता चला कि ऐसी संख्याओं का भी अस्तित्व है जो परिमेय नहीं है अर्थात् अपरिमेय (Irrational) हैं।परंतु अपनी इस खोज को छुपाए रखा और अपनी पुरानी मान्यता पर डटा रहा।उसने आदेश दे रखा था कि जो कोई इस खोज को बाहर प्रकट करेगा उसका बड़ा अहित होगा।परंतु पाइथागोरस के एक शिष्य ने क्रोटोन के हिपाक्स ने इस खोज को बाहरी दुनिया के सामने प्रकट कर दिया।संभवतः हिपाक्स ने ही इन अपरिमेय संख्याओं का पता लगाया था।इस रहस्य को प्रकट करने के कारण हिपाक्स का दुर्भाग्यपूर्ण अंत हो गया।
  • यूक्लिड के एलिमेंटस में 47वाँ प्रमेय पाइथागोरस के द्वारा ही खोजा गया था।जिससे पाइथागोरस प्रमेय कहा जाता है (समकोण त्रिभुज के संबंध में)। हालांकि इस प्रमेय को पाइथागोरस से भी पहले भारतीय गणितज्ञ बौधायन ने पता लगा लिया था। इसलिए इसे बोधायन प्रमेय भी कहते हैं।अपरिमेय संख्याओं की खोज भी पाइथागोरस और उसके शिष्यों को ही दिया जाता है।पाइथागोरस के स्कूल ने गणित के अनेक शब्दों को जन्म दिया।जैसे: मैथमेटिक्स (Mathematics),पैराबोला (Parabola),ईलिप्स (Ellipse) और हाइपरबोला (Hyperbola)।मिश्रवासियों को तीन ठोस ज्ञात थे घन (Cube),समचतुष्फलक (Tetrahedron),समअष्टफलक (Octahedron)।पाइथागोरस ने दो समठोसों समद्वादशफलक (Dodecahedron) और विंशतिफलक (Icosahedron) की खोज की।इस प्रकार ग्रीक गणित में पाइथागोरस का योगदान कम नहीं है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में गणित में संसार के सात आश्चर्य (Seven Wonders of World in Mathematics),गणित में संसार के प्राचीन सात आश्चर्य (Ancient Seven Wonders of World in Mathematics) के बारे में बताया गया है।

9.गणित छात्र का अजीब तर्क (The Mathematics Student’s Strange Logic):

  • गणित शिक्षक (मोहन से):सवाल हल करने के लिए 5 दिन पूर्व दिया था और आज हल करके लेकर आए हो।
    मोहन:सवाल को हल करने के लिए निर्देश था कि स्वयं हल करना है,किसी की मदद नहीं लेनी है।
  • गणित शिक्षक:फिर भी एक सवाल को हल करने में 5 दिन लगाओगे तो परीक्षा के प्रश्न पत्र में 25-30 सवाल आते हैं।उनको तीन-चार घंटे में कैसे हल करोगे?
  • मोहन:प्रश्न पत्र में यह निर्देश नहीं होता है कि स्वयं हल करें।इसलिए उनको आसपास के होशियार छात्र-छात्राओं को पूछ कर हल कर सकते हैं।
  • गणित शिक्षक:तुम तो बातें बनाने में तो होशियार हो और गणित के सवाल करने में फिसड्डी हो।यह होशियारी गणित के सवाल हल करने में लगाओ तो कुछ समझ में आए।लाओ सवाल कैसे हल करके लाए हो?
  • मोहन:यह रहा सवाल का हल।
  • गणित शिक्षक:इसमें तो माइनस (-) की जगह प्लस (+ ) और प्लस (+) की जगह माइनस (-) कर रखा है।
  • मोहन:सर (Sir) इतने से में क्या फर्क पड़ता है? बाकी सवाल तो सही है न।
  • गणित शिक्षक:ऐसा करता हूं यह सवाल 10 नंबर का है।इसमें से एक को शून्य की जगह और शून्य की जगह एक करके नम्बर (01) दे देता हूं इससे क्या फर्क पड़ेगा?

10.गणित में संसार के सात आश्चर्य (Seven Wonders of World in Mathematics),गणित में संसार के प्राचीन सात आश्चर्य (Ancient Seven Wonders of World in Mathematics) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.दाशमिक पद्धति का सर्वप्रथम कहां उल्लेख मिलता है? (Where is the first mention the decimal system?):

उत्तर:दाशमिक पद्धति तथा 0 से 9 तक के अंको का आविष्कार भारत में अब से दो हजार वर्ष पूर्व हो चुका था।प्रथम बार लिखित रूप में संखेड़ा से गुर्जर दानपत्र में चेदि संवत् 346 अंकित मिला है।

प्रश्न:2.गणित से क्या तात्पर्य है? (What is meant by mathematics?):

उत्तर:संख्याओं और आकृतियों का विज्ञान,संख्याओं का उपयोग करके गणना करने की प्रक्रिया गणित है।गणित की मुख्य शाखाएं हैं: अंकगणित,बीजगणित,ज्यामिति और त्रिकोणमिति।

प्रश्न:3.भारत में आधुनिक गणित के महान गणितज्ञ कौन हैं? (Who are Great Mathematicians of Modern India?):

उत्तर:डाॅ.गणेश प्रसाद,प्रोफेसर बीएन प्रसाद,डॉक्टर होमी जहांगीर बाबा इत्यादि।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित में संसार के सात आश्चर्य (Seven Wonders of World in Mathematics),गणित में संसार के प्राचीन सात आश्चर्य (Ancient Seven Wonders of World in Mathematics) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Seven Wonders of World in Mathematics

गणित में संसार के सात आश्चर्य
(Seven Wonders of World in Mathematics)

Seven Wonders of World in Mathematics

गणित में संसार के सात आश्चर्य (Seven Wonders of World in Mathematics) भारतीय तथा पाश्चात्य देशों के नमूने हैं।
मनुष्य ने अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास के क्रम में अन्य कलाओं को जन्म दिया है।

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