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9 Technique of How to Make Resolutions

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1.संकल्प कैसे करें की 9 तकनीक (9 Technique of How to Make Resolutions),संकल्प क्या होता है और संकल्प क्यों किया जाता है? (What is Resolution and Why is Resolution Made?):

  • संकल्प कैसे करें की 9 तकनीक (9 Technique of How to Make Resolutions)  से आप समझ सकेंगे कि संकल्प विकल्पों से रहित होने की अवस्था होती है।मन पूरी तरह से आत्मिक नियन्त्रण में रहकर कार्य करता है।मन पर आत्मिक नियन्त्रण हो इसके लिए होश में रहना जरूरी है।
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2.संकल्प की भूमिका (The Role of Resolution):

  • संकल्प ऊर्जाधारा को एक दिशा देता है।संकल्प एक ऐसा बीज है,जो पड़ते ही अंकुरण आरंभ कर देता है और समस्त परिस्थितियों को अपने अनुरूप परिवर्तित कर देता है।संकल्पबल के पीछे सभी बरबस चलने लगते हैं।संकल्प सांसारिक,व्यावहारिक कार्यों,धार्मिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्राण है,जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्णता को प्राप्त नहीं होता है।संकल्प का तात्पर्य है-ऊर्जा के महाप्रवाह में से अपने अभीष्ट विचार-प्रवाह का चयन।संकल्प ऊर्जा के भंडार में आग लगाने जैसा है और जब आग लगती है तो उसे दिशा प्रदान करना संकल्प का कार्य होता है।बारूद की ढेरी में आग लगने से प्रचंड विस्फोट होता है,परंतु इस विस्फोट से उत्पन्न विपुल ऊर्जा को कहां ले जाया जाए,इस ऊर्जा से किस कार्य योजना को संपादित किया जाए? यह एक महाप्रश्न है।संकल्प उसका जवाब देता है,समाधान सुझाता है।ठीक इसी प्रकार जीवन में हमें करना क्या है? पाना क्या है? जाना कहां है? इन तमाम चीजों के लिए लक्ष्य निर्धारित किया जाता है,पर उस लक्ष्य की प्राप्ति संकल्प के बिना संभव नहीं है।संकल्प ही जीवन-ऊर्जा को निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंचाता है अन्यथा जीवन-ऊर्जा हाथ की मुट्ठी में बंद रेत के समान सरक जाती है।
  • धार्मिक कृत्यों के पहले संकल्प का विधान होता है।संकल्प होता है क्या है? किया क्यों जाता है? नासमझ मन एवं अबूझ विद्वानों ने इसे महज एक खानापूर्ति का माध्यम बना लिया है,परंतु गहराई से विश्लेषण किया जाए तो इसकी दार्शनिकता एवं वैज्ञानिकता बड़ी अनोखी है।किसी भी धार्मिक संकल्प के साथ कई तथ्य जुड़े हुए होते हैं।चूँकि संकल्प से व्यष्टि को समष्टि से,लघु को विभु से,सीमित को विराट से जोड़ा जाता है।अतः इसका संबंध सृष्टि के आरम्भ से वर्तमान तक एवं वर्तमान में व्यक्ति की अभीष्ट कामना में समाहित होता है।हमारा धार्मिक कार्य किसकी प्राप्ति के लिए है,उसके अनुरूप संकल्प की दिशा तय की जाती है।
  • संकल्प को मन-भावना की गहराई से उभारते हैं।संकल्प सहजता से स्फुरित होता है।इस स्फुरणा में ऊर्जा को दिशा देने की अनन्त सामर्थ्य होती है।इसी भावना के साथ अपने अस्तित्व को याद किया जाता है कि मेरी आत्मा इस ब्रह्मांड को तब से जानती है,जब ब्रह्मणो द्वितीय परार्द्ध में इसका आविर्भाव हुआ था।

3.संकल्प के विभिन्न चरण (Different Stages of Resolution):

  • इस आविर्भाव के साथ ही कालचक्र का जो प्रवर्तन प्रारंभ हुआ,उस प्रवाह के विभिन्न चरणों में मेरा भी कहीं-ना-कहीं कोई अस्तित्व था।कालचक्र मन्वंतर में परिवर्तित हुआ,फिर उसने युग में प्रवेश किया।वर्तमान स्थिति में कत्थ है-श्वेतप्रवाह कत्थ,मन्वंतर है-वैवश्वत और युग में कलयुग का प्रथम चरण है।सृष्टि के आराम से वर्तमान तक कालचक्र को स्मरण किया जाता है।
  • संकल्प के द्वितीय चरण में स्थान का जिक्र किया जाता है।सृष्टि का विशिष्ट ऊर्जा-प्रवाह समय को पार करते हुए उतरेगा तो किस स्थान पर।अतः संकल्प में स्पेस और टाइम (दिक्काल) दोनों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।अभी हम जंबूद्वीप के भारतवर्ष में और इसके भरतखंड में आते हैं।फिर अपने प्रदेश,जनपद,नगर एवं गांव की याद करते हैं।संकल्पित ऊर्जा हमारे इस स्थान पर उतरे,हम इस स्थान पर विद्यमान है।स्थान का भी महत्त्व है-संकल्प में।क्योंकि ऊर्जा का प्रवाह समय के साथ स्थान को भी स्पर्श करता है।
  • संकल्प के तृतीय चरण में इस स्थान विशेष की स्थिति को देखा जाता है कि उस समय मास,पक्ष,तिथि एवं दिन क्या है? नक्षत्रों की स्थिति,राशियों में ग्रहों की दशा का भी अवलोकन किया जाता है।ज्योतिष के इस रहस्य के पीछे एक ही तथ्य काम करता है कि जिस ऊर्जाधारा को आमंत्रित किया जा रहा है,वह नक्षत्र ग्रहीय दशाओं के भँवर में उलझ तो नहीं जाएगी।इसी कारण शुभ कर्म को ऐसे समय पर किया जाता है,जब ऊर्जा की विशिष्ट धारा को व्यक्ति के पास में आने में कोई व्यवधान,व्यतिक्रम ना हो।अलग-अलग प्रयोजनों के लिए अलग-अलग तिथि,वार एवं योग को देखा जाता है।रविपुष्य को संकल्प का सर्वोत्तम समय माना जाता है।देवी उपासना के लिए मंगल का योग श्रेष्ठ कहा गया है।महामृत्युंजय अनुष्ठान का संकल्प सोमवार को अधिक उपयुक्त माना गया है।शुक्रवार का दिन सरस्वती की उपासना से तथा गायत्री का संबंध सूर्य से होने के कारण रविवार का दिन अच्छा माना जाता है।गुरुवार भी इस हेतु पवित्र माना जाता है।
  • नौ ग्रहों के अनुष्ठान का संकल्प एवं जप का समय भी निर्धारित किया गया है।सूर्य के लिए रविवार प्रातः काल,चंद्रमा के लिए सोमवार संध्याकाल,मंगल के लिए मंगलवार प्रातः 8:00 बजे,बुध के लिए बुधवार 5 घड़ी दिन,बृहस्पति के लिए गुरुवार संध्याकाल,शुक्र के लिए शुक्रवार सूर्योदयकाल,शनि के लिए शनिवार संध्याकाल तथा राहु-केतु के लिए शनिवार की रात्रि का समय संकल्प हेतु उत्तम माना गया है।नवग्रह का संकल्प इस उपयुक्त काल में बड़ा प्रभावी माना गया है,क्योंकि इस समय विशिष्ट ग्रहों की ऊर्जा वातावरण में अपने समग्र रूप में व्याप्त होती है।अतः ऐसे शुभ मुहूर्त में संकल्प अत्युत्तम कहा गया है।
  • संकल्प के अंतिम चरण में व्यक्ति की स्थिति एवं उसकी साधना व कामना समाहित है।अनुष्ठान का संकल्प व्यक्ति स्वयं कर रहा है या किसी के लिए कर रहा है या फिर किसी सत्पात्र के माध्यम से कर रहा है,ध्यान देने की बात है।संकल्प में स्वयं या यजमान का नाम एवं गोत्र का उच्चारण किया जाता है।साधना या अनुष्ठान की शक्ति जिस किसी में बिखर न जाए और केवल संकल्पित व्यक्ति तक पहुंचे,इसीलिए नाम व गोत्र का उच्चारण करने का विधान है।फिर संकल्प में उस बात को उच्चारित किया जाता है,जिस कामना के लिए किया जाता है।अनुष्ठान या साधना की पूर्णता संकल्पित कामना की प्रगाढ़ता में पूरी होती है।पूरी साधना की अवधि में अपनी कामना को बनाए रखना चाहिए।इसका सतत स्मरण करते रहना चाहिए।इच्छित कामना की तीव्रता जब संकल्प में घुलती है तो ब्रह्मांड की ऊर्जातरंग आंदोलित-उद्वेलित हो उठती है और उस दिशा में बह निकलती है,जहां से उसका आह्वान किया जाता है।अतः  ऐसा प्रचण्ड संकल्प पूरा होकर ही रहता है।यदि यह पूर्ण नहीं हो पाता है तो इसका अर्थ है कि हमारे प्रयोग में कहीं कोई त्रुटि अवश्य है।

4.संकल्पों का प्रभाव (Impact of Resolutions):

  • संकल्प का बीज जब मन में डाला जाता है तो शरीर अनायास उस दिशा में चलने-बढ़ने लगता है।शरीर चिथड़ा-चिथड़ा हो जाए तो भी मन में पड़ा संकल्प का बीज अंकुरित,विकसित होने से रुकता नहीं है।स्वामी विवेकानंद अपने संन्यास व साधनाकाल में कुछ ऐसे ही संकल्प किया करते थे।उनके मन के अनुरूप शरीर कमजोर पड़ता था,परंतु शरीर को छोड़ा भी तो नहीं जा सकता।उनको जब जल-उपवास या कोई अन्य साधना करनी होती थी तो वे सबसे पहले मन में संकल्प के बीज बो देते थे कि इतने दिन तक शरीर को शारीरिक आवश्यकता की चीजों से मुक्त रहना है और सचमुच उस अवधि में आज्ञाकारी शिष्य के समान शरीर किसी प्रकार की कोई मांग नहीं करता था।ना तो भूख लगती थी,न नींद और न थकान ही आती थी।वे बड़े मजे से अपना कार्य पूरा करते थे।हां कार्य की समाप्ति पर जैसे ही मन से संकल्प को हटा लेते थे,शरीर पूर्ववत् अपनी आवश्यकताओं की मांग करने लगता था।संकल्प की ऐसी घटना योगियों की दैनिक दिनचर्या में समाहित होती है।

5.विकल्पों में गोते न लगाएँ और संकल्प कैसे पूरे करें? (Don’t dive into options and move towards resolution,How to complete resolutions):

  • पर हम है कि हमारा संकल्प सदा विकल्प की तलाश में जुटा रहता है।संकल्प के सामने विकल्पों का सघन वातायन खुलने लगता है और सच तो यह है कि हम विकल्पों के साथ संकल्प की अवधारणा करते हैं।अगर ऐसा नहीं होगा तो ऐसा करेंगे,वैसा नहीं होगा तो कुछ और करेंगे और अंत में संकल्प के लिए बैठा मन विकल्प की फेनिल लहरों में कहीं खो जाता है।दरअसल संकल्प,विकल्पों के पार होता है।संकल्प का मतलब है यह या कुछ नहीं।यह भी और वह भी,विकल्प का संकेत है।हमें बस यही करना है और इसके अलावा कुछ नहीं करना है,ऐसा संकल्प जब उठता है तो सभी मानसिक शक्तियाँ एकजुट होकर एक इच्छित दिशा की ओर ऐसे चलने लगती है जैसे-बंदूक से गोली और गोली अपने लक्ष्य को भेदकर ही रहती है।संकल्प उठे और लक्ष्य न मिले,ऐसा कैसे संभव है।संकल्प होगा तो इसकी सफलता भी होगी।हां संकल्प और सफलता के मायने अलग-अलग हो सकते हैं,परंतु सिद्धांत तो एक ही कार्य करता है।
  • हमें अंदर झांक कर देखना है कि हमारे संकल्प टूटते-बिखरते क्यों हैं? जरा बारीकी से देखें तो पता चलेगा कि हमारा संकल्प हमारी सामर्थ्य के अनुरूप नहीं था।सामर्थ्य के अनुरूप संकल्प हो और संकल्प छोटे से बड़े की ओर चले तो संकल्प का निर्वाह किया जा सकता है।संकल्प पूरा हो सकता है।बड़ा संकल्प अतिउत्साह में उठता है और रेगिस्तानी अंधड़ में बिखर जाता है।बिखरने का दर्द हमें हमारी असहायता एवं दुर्बलता का एहसास कराता है।यह बताता है कि हम कभी भी कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं कर सकते,जबकि छोटे-छोटे संकल्पों की पूर्णता हमें उत्साह और उमंगों से भर देती है और संकल्प लेने लायक मनःस्थिति विनिर्मित करती है।
  • संकल्प विकल्प की आंधियों में न समाए और अपने अभीष्ट को प्राप्त करे इसलिए आवश्यक है कि हमारे जीवन के अनुरूप छोटे-छोटे संकल्प लिए जाएं।छोटे-छोटे संकल्पों को पूरा करने का अभ्यास डाला जाए एवं इसमें आने वाले अवरोधों एवं समस्याओं का गहराई से निरीक्षण करते हुए समुचित ढंग से निराकरण किया जाए।किसी दिन सामान्य-सा दिखने वाला इंसान भी चमत्कारिक कार्य कर सकता है।वह कुछ ऐसा करके दिखा सकता है,जिससे कभी असंभव माना जाता था।संकल्प के साम्राज्य में असम्भव कुछ नहीं होता है।अतः हमें ऐसा संकल्प लेना चाहिए,जो हमारे जीवन की दिशा को सत्प्रवृत्तियों की ओर मोड़े,हमारे मन,विचार,भाव परिष्कृत हो तथा भौतिक जीवन सुखी व समृद्ध रहे।

6.संकल्पों और कामनाओं में अन्तर (Difference between Resolves and Desires):

  • संकल्प में निश्चित लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने की लगन होती है,उसमें प्रतिफल के लिए उतावली नहीं होती,उसका निश्चय होता है।उतावली में आदमी समय अधिक लगने पर अधीर हो उठता है।व्यवधान अड़ जाने पर भी उसे अपनाए रहने और कठिनाइयों से जूझते रहने का भी साहस नहीं होता।संकल्प में इच्छाशक्ति और भावनाशक्ति दोनों ही जुड़ी होती हैं।उसकी रूपरेखा विचारपूर्वक बनाई जाती है और उसे उपलब्ध करने के लिए जिन साधनों और सहयोग की अपेक्षा है,उनकी भी समय रहते व्यवस्था जुटा ली गई होती है।उसके पीछे सुनियोजित भावना रहती है,किंतु मनोकामना तो एक प्रकार का भावावेश है।उसके पीछे न दूरदर्शी विवेकशीलता का समावेश होता है और ना समुचित तैयारी वाली परिकल्पना एवं साधन-संपन्नता।
  • संसार का कोई भी कार्य इतना सरल नहीं है कि वह चुटकी बजाते तुरत-फुरत पूरा हो जाया करे।सभी प्रयासों के लिए प्रतिस्पर्द्धा में उतरना पड़ता है और अपनी क्षमता का इतना विकास करना पड़ता है कि कठिनाइयां विचलित न कर सके तथा देर लगने पर मन उतावली न करने लगे।कामनाएं उबलते दूध के समतुल्य खाली बर्तन को भी भरा दिखा देती है और कुछ ही समय में बैठ भी जाती है,किंतु संकल्प शब्दभेदी बाण की तरह है,जो निशाना भेदकर ही रहता है।हम कामनाओं की नहीं संकल्पों की पूर्ति में अपना पुरुषार्थ जुटाएँ यही मानवोचित है।

7.संकल्प बल के साथ यथार्थवादी बनें (Be realistic with the force of determination):

  • प्रगति की आकांक्षा आवश्यक भी है और उचित भी,पर उसकी सफलता के लिए यथार्थवादी चिंतन नितांत आवश्यक है।भावुकता,काल्पनिकता इस दिशा में सहायक नहीं,बाधक ही अधिक होती है।असफलता का एक ही झोंका ऐसे लोगों की उमंगों को तोड़-मरोड़ कर रख देता है और वे आरंभ में जितने उत्साही थे,अंत में उतने ही निराशावादी और शंकाशील बन जाते हैं। इसलिए अभिलाषाओं को मूर्त रूप देने के लिए यथार्थवादी चिंतन की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है।
  • अभिलाषा को सफलता की मंजिल तक पहुंचाने का दूसरा कदम है-सुदृढ़ संकल्प।जो निश्चय है,उसे पूरा करने के लिए अदम्य साहस और आगत अवरोधों से निपटने का अविचल धैर्य रखकर ही आगे बढ़ सकना संभव है।यदि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और हवा के अवरोध की कठिनाई हो तो ऊपर उछली गेंद सिद्धांततः अनंत अंतरिक्ष में भ्रमण करने लगेगी पर यथार्थवादी जानते हैं कि इस संसार में बिना अवरोध के गतिशीलता असंभव है।ऊपर उड़ान भरने से पहले गुरुत्वाकर्षण और वायु अवरोध से जूझने की पूरी तैयारी करने से ही ऊपर उड़ना होता है।प्रगति का पथ ठीक इसी प्रकार है।
  • सुखद कल्पनाओं का आनंद सभी लेते हैं,पर उन्हें पूर्ण करने को सफलता का गौरव प्राप्त कर सकना किसी-किसी के लिए ही संभव होता है।कल्पना की चिड़िया इस उन्मुक्त आकाश में कितनी ही ऊंची उड़ाने उड़ सकती है।उस पर कोई रोक-टोक नहीं,पर एक छोटा-सा सुनियोजित घोंसला तक बनाकर खड़ा करना हो तो बया जैसी तत्परता और तन्मयता का परिचय देना पड़ता है।प्रगति की अभीष्ट उपलब्धियां प्राप्त करने के लिए जिस सामर्थ्य की सर्वप्रथम आवश्यकता पड़ती है,वह है संकल्प शक्ति।
  • किसी कार्य के पक्ष-विपक्ष पर भलीभाँति मंथन करने के उपरांत जो निष्कर्ष निकलता है और अपनी क्षमता का अनुमान लगाकर जिसे करने का फैसला किया जाता है,उसे निश्चय कहते हैं।निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए साहस चाहिए और साथ ही यथार्थवादी विवेक भी। निश्चय को साहस का योगदान मिलने से जो दृढ़ता उत्पन्न होती है,उसे संकल्प कहते हैं।संकल्प की शक्ति असीम है।उसके द्वारा असंभव को संभव बना सकना शक्य ना हो सके,तो भी इतना निश्चित है कि कठिन लगने वाले कार्य सरल हो जाते है।ऊंचा उठने और आगे बढ़ने का श्रेय प्राप्त करने वालों में प्रायः सभी ने संकल्प शक्ति के सहारे अति महत्त्वपूर्ण श्रेय-संपादन किए हैं।

8.संकल्प बल की कमी कायरता है (Lack of determination is cowardice):

  • इच्छाशक्ति और संकल्प बल की कमी का नाम ही कायरता है।कायर व्यक्ति हर घड़ी डरते रहते हैं।उन्हें अपने चारों ओर आशंका,अविश्वास और असफलता के चिन्ह ही दीखते रहते हैं।थोड़ी-सी कठिनाई को देखकर वे बहुत घबराते हैं और जरा-सी विपत्ति आने में किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर पागलों जैसी चेष्टाएँ करने लगते हैं।हर समय चिंता,शोक,भय,आशंका में डूबे रहकर अपनी नींद हराम कर लेते हैं।कायर व्यक्ति निरंतर परेशान बने रहते हैं।कोई ना कोई छोटा-मोटा कारण उन्हें डराने और चिंतित करने के लिए पैदा होता रहता है।इसके विपरीत जिनमें साहस है,मनोबल है,वे मौत के साथ जूझते हुए भी हंसते हुए देखे गए है।
  • युद्ध के मोर्चे पर,जहां दोनों ओर से गोलियां सनसनाती रहती हैं,उस मौत के साए में भी वीर योद्धा हंसते,विनोद करते हैं।बड़ी से बड़ी आपत्ति में वे अपने धैर्य,साहस और विवेक को स्थिर रखते हैं तथा कठिन परिस्थिति आने पर दूने उत्साह से उसे पार करने का प्रयत्न करते हैं।डरते वे किसी से भी नहीं।अपने पर और अपने भगवान पर जिसे भरोसा है,वह क्यों किसी से डरेगा? क्यों निराश एवं हतोत्साहित होगा? सांसारिक सभी कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए मनोबल की आवश्यकता होती है,इसलिए जीवन की महत्त्वपूर्ण संपदाओं में मनोबल का होना एक बड़ी विभूति मानी जाती है।
    उपर्युक्त आर्टिकल में संकल्प कैसे करें की 9 तकनीक (9 Technique of How to Make Resolutions),संकल्प क्या होता है और संकल्प क्यों किया जाता है? (What is Resolution and Why is Resolution Made?) के बारे में बताया गया है।

Also Read This Article:आत्म-विश्वास और संकल्प-शक्ति तथा लक्ष्य

9.छात्र के संकल्प का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (Student’s Resolution Method) (Humour-Satire):

  • छात्रःसर,मेरी मां ने कहा है कि मैं गणित के सवाल हल करने के लिए कुछ संकल्प लूँ,आप संकल्प करने में मेरी सहायता करें।
  • टीचरःठीक है,मैं अपने प्रिंसिपल से पूछ कर बताऊंगा कि तुम्हें संकल्प कैसे कर करना है?

10.संकल्प कैसे करें की 9 तकनीक (Frequently Asked Questions Related to 9 Technique of How to Make Resolutions),संकल्प क्या होता है और संकल्प क्यों किया जाता है? (What is Resolution and Why is Resolution Made?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः

प्रश्न:1.संकल्प की ताकत क्या है? (What is the power of resolution?):

उत्तर:इतिहास पुराण सभी साक्षी हैं कि मनुष्य के संकल्प के सम्मुख देव,दानव सभी पराजित होते हैं।

प्रश्न:2.संकल्प कैसे होने चाहिए? (How should resolutions be?):

उत्तर:संकल्प शुभ और कल्याणकारी होने चाहिए।

प्रश्नः3.शुभ संकल्प क्यों आवश्यक है? (Why is good intention necessary?):

उत्तर:शुभ संकल्प और नेक इरादे ही पूरे होते हैं क्योंकि उन शुभ संकल्पों के साथ आत्मिक बल और भगवान की शक्ति कार्य करती है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा संकल्प कैसे करें की 9 तकनीक (9 Technique of How to Make Resolutions),संकल्प क्या होता है और संकल्प क्यों किया जाता है? (What is Resolution and Why is Resolution Made?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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