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9 Keynote to Avoid Habit of Forgetting

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1.भूलने की आदत से बचने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote to Avoid Habit of Forgetting),भूलने की आदत से कैसे बचें? (How to Avoid Habit of Forgetting?):

  • भूलने की आदत से बचने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote to Avoid Habit of Forgetting) के आधार पर आप भूलने के कारण जान सकेंगे और उन कारणों को दूर करने से अपनी याद करने की क्षमता को बढ़ा सकेंगे।
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  • काॅलेज और विश्वविद्यालयी छात्र-छात्राओं तथा प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाग लेने वाले अभ्यर्थियों के लिए विशेष रूप उपयोग लेख।

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2.आधुनिकता के दबाव से मस्तिष्क प्रभावित (The brain is affected by the pressures of modernity):

  • पुराने जमाने में आज की तरह व्यवस्थित शिक्षा संस्थान नहीं हुआ करते थे।उस समय ऋषि-मुनियों द्वारा जंगल-कानन में ‘गुरुकुल’ व्यवस्था की सबसे खास बात यह थी कि उन्हें गूढ़ से गूढ़ विद्या की शिक्षा भी मौखिक ही दी जाती थी।न कहीं किताबें थीं और ना लिखने के लिए कागज-कलम।शिक्षा के स्मृति पर आधारित होने के कारण स्मरणशक्ति सदैव परीक्षा की कसौटी पर रहती थी।लेकिन मौखिक रूप से बार-बार दुहराये जाने के कारण विद्यार्थी धीरे-धीरे सभी प्रकार की विद्याओं को साध लेता था।विद्यार्थी जब तक अपनी लक्षित विद्या में पारंगत नहीं हो जाता था तब तक उसे गुरुकुल में रहना पड़ता था।प्राचीन भारत में सैकड़ो वर्षों तक यही परंपरा चलती रही।
  • आज के अधिकतम सुविधा-संपन्न दौर में यांत्रिकता का प्रसार जिस तेजी से जीवन के हर क्षेत्र में बढ़ा है,उसमें एक तरफ प्रकट रूप में जहां लाभ दिखाई दिए हैं वहीं दूसरी तरफ प्रकट रूप में मनुष्य के सामने अनगिनत समस्याएं भी आयीं हैं।
    जीवन के दांव-पेंच अधिक से अधिक जटिल होते जाने का सर्वाधिक प्रभाव मानव के मस्तिष्क पर पड़ा है,जिससे न केवल उसकी एकाग्रता भंग हुई है बल्कि अब उसके दिमाग में आने वाली तमाम बातें कहीं अधिक विध्वंसात्मक और गैर-रचनात्मक होती गयी हैं। यांत्रिकता-भौतिकता के दबाव में मानव की मानवता का स्रोत जैसे सूखता गया है।ऐसे ही कठिन समय में लोगों को,खासकर छात्रों को अपने से एक आम शिकायत रहती है कि वे जो कुछ पढ़ते हैं वह उन्हें याद होना तो दूर रहा,समझ में भी नहीं आता।आज भले ही तमाम कार्य कंप्यूटर और अन्यान्य प्रकार की मशीने क्यों न कर लें लेकिन इन तमाम कार्यों के ऊपर और नयी खोजों के लिए तथा खोज लायक योग्यता हासिल करने के लिए मानव को अपना दिमाग इस्तेमाल करना ही पड़ेगा।ऐसे में अपनी एकाग्रता और उर्जा बनाए रखने के लिए अपने दिमाग और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण बहुत जरूरी हो जाता है।यदि ऐसा नियन्त्रण हो जाता है,तब भूलने और याद न होने की समस्या से पूरी तरह से या काफी हद तक छुटकारा मिल जाता है।

3.स्वाध्याय और अभ्यास जरूरी (Self-study and practice are necessary):

  • आज की बेहद अशांत और तनावपूर्ण परिस्थितियों में यदि धैर्य के साथ स्वाध्याय में अनवरत रत रहा जाए,तो कोई कारण नहीं की पढ़ी हुई चीज मन-मस्तिष्क में स्थान नहीं बना पाए।भारत के ऋषि-मुनियों ने स्वाध्याय को जीवन-निर्माण के प्रथम पांच नियमों में स्थान प्रदान किया है।स्वाध्याय,विद्याध्ययन तथा ज्ञानार्जन की वह प्रक्रिया है,जिसके द्वारा विद्यार्थी अर्जित ज्ञान एवं प्राप्त सूचनाओं को आत्मसात् करने में समर्थ होता है।स्वाध्याय यानी लीन होकर किसी चीज को पढ़ने और बार-बार पढ़ने से एक समय ऐसा जरूर आता है,जबकि वह न केवल कंठस्थ हो जाता है बल्कि पूरी तरह आत्मसात् भी हो जाता है।एक ही चीज को बार-बार पढ़ने और अंततः उसका सुफल सामने आने की तुलना पत्थर के उस कठोर सिल से की गई है जिस पर नर्म रस्सी के बार-बार आने-जाने से उस पर रस्सी का निसान।’
  • लेकिन स्वाध्याय का मतलब यह नहीं कि किसी पुस्तक को धारा प्रवाह पढ़ते गए और वह आत्मसात् हो गया।सच्चा स्वाध्याय तो पशुओं द्वारा की जाने वाली जुगाली के समान होता है।पशु भोजन कर लेने के बाद खाए हुए अन्न को जुगाली करके पचाता है।पशु द्वारा की जाने वाली जुगाली प्रायः हर समय होती रहती है।जुगाली की तरह ही पढ़े हुए को आत्मसात करना जरूरी होता है।प्रायः लोगों में बहुत कुछ पढ़ लेने का उतावलापन होता है।लेकिन बहुत अधिक पढ़ लेना महत्त्वपूर्ण नहीं है,महत्त्वपूर्ण है पढ़े हुए को आत्मसात् करना।जिस ज्ञान को पढ़ते समय हम अपने मन-मस्तिष्क में बैठाते जाते हैं,वही ज्ञान स्थायी होता है।
  • हम इस बात की परख अपने व्यावहारिक जीवन में भी कर सकते हैं कि विषय में गहराई तक पैठ बनाकर अध्ययन करने वाला ही परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करता है।ऐसा ही व्यक्ति सही मायने में विद्वान कहलाता है।जो पुस्तकों का केवल रट्टा मार लेना ही अध्ययन की इतिश्री मान लेते हैं,उन्हीं को परीक्षा भवन में छत निहारना पड़ता है।इसी संदर्भ में एक लोकोक्ति है कि ‘वह धन काम में आता है जो अंटी में हो तथा विद्या वह काम में आती है जो कंठ में हो।’ प्रसिद्ध विचारक एफ० ऑसबोर्न ने भी लिखा है कि, ‘अच्छी तरह पढ़ी हुई और आत्मसात की हुई कुछ पुस्तकें उन सैकड़ों पुस्तकों की अपेक्षा हमारे ज्ञान को अधिक पुष्ट करती हैं,जिन्हें हम गरारे किए हुए जल की भांति मुँह तक सीमित रखते हैं।

4.कम पुस्तकें पढ़े परंतु अध्ययन आत्मसात हो (Read fewer books but assimilate the study):

  • बहुत लोग पुस्तकों का विशाल भंडार यह सोचकर इकट्ठा करते जाते हैं कि कभी ना कभी उन्हें अवश्य पढ़ेंगे।कुछ ऐसे भी होते हैं जो देखा-देखी या दूसरों के कहने पर पुस्तकें जुटाते जाते हैं।लेकिन यदि उनसे यह प्रश्न किया जाए कि क्या उन्होंने उन सभी पुस्तकों को पढ़ा है तो उनका जवाब शायद ही हाँ में होगा।यदि पुस्तकों का ढेर जुटा लेने से ही कोई विद्वान या ज्ञानी बन जाता तो निःसंदेह उन गधों और खच्चरों को महान विद्वान होना चाहिए था,जिन पर प्राचीन बौद्ध तथा अन्य धार्मिक कृतियां लादकर महापंडित राहुल सांकृत्यायन तिब्बत से दुर्गम पहाड़ी दर्रों के रास्ते भारत लाए थे।यदि बहुत सारी पुस्तकों को ही अच्छी तरह पढ़कर आत्मसात किया जाए तो वह कहीं अधिक उपयोगी होता है।
  • क्षमता बढ़ते जाने पर पुस्तकों की संख्या भी बढ़ायी जा सकती है।स्वाध्याय के अभ्यास के साथ-साथ जैसे-जैसे ज्ञान में स्थायित्व आता जाता है,वैसे-वैसे अध्ययन-मनन के प्रति रुचि और लगन बढ़ती जाती है।इस प्रकार से अर्जित किया गया ज्ञान मस्तिष्क पर अमिट रेखा की भांति सदा के लिए अंकित हो जाता है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि स्वाध्याय वही सार्थक एवं प्रभावकारी सिद्ध होता है,जो नियमपूर्वक तथा व्यवस्थित ढंग से किया जाता है।एक विषय को पढ़ते समय यदि उसे अधूरा छोड़कर दूसरा विषय उठा लिया जाए तो दोनों ही विषयों से अर्जित ज्ञान विश्रंखलित और विखंडित हो जाता है।कुछ लोगों की यह कमजोरी होती है कि वे एक विषय को पढ़ते-पढ़ते दूसरे विषय पर फिसल जाते हैं।यह उनके अस्थिर चित्त की ओर ही संकेत करता है। अधूरे ज्ञान से अज्ञानी रहना ही बेहतर होता है,क्योंकि अधूरा ज्ञान सर्वत्र उपहास का पात्र बनता है।धैर्य के साथ किसी विषय को पूरा पढ़ना ही ज्ञान को सार्थकता प्रदान करता है।

5.ज्ञान प्राप्ति के माध्यम (Means of Enlightenment):

  • यह भी कोई आवश्यक नहीं है कि ज्ञान की प्राप्ति केवल पुस्तकों द्वारा ही हो।जीवन के अनुभवों और सत्संग द्वारा भी ज्ञानी बना जा सकता है।कबीर,सूर,तुलसी आदि ने किसी विद्यालय से व्यवस्थित शिक्षा नहीं प्राप्त की थी,फिर भी वे बहुश्रुत थे।उन्होंने स्वाध्याय सत्संग और अनुभवों द्वारा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को निकट से महसूस किया था।कबीर कहते भी हैं ‘मसि कागद छुयो नहीं,कलम गह्यो नहिं हाथ’ अर्थात् उन्होंने तो कभी कागज,कलम और स्याही को छुआ तक नहीं।इसके बावजूद उनकी विद्वता,उनका ज्ञान निर्विवाद है।ज्ञानी होने के लिए किसी विश्वविद्यालय की डिग्री का होना भी जरूरी नहीं है।उच्च शिक्षित व्यक्ति भी नासमझ और व्यावहारिक दृष्टि से मूर्ख हो सकता है जबकि गांव का अंगूठा टेक किसान भी बौद्धिक दृष्टि से होशियार और व्यापक अनुभवों से युक्त हो सकता है।यह भी देखने में आता है कि जीवन की बहुत सारी गुत्थियाँ अनपढ़ कहे जाने वाले लोग चुटकी बजाते ही सुलझा लेते हैं जबकि तथाकथित पढ़े-लिखे लोग किसी गूढ़ समस्या के सामने आते ही सिर पड़कर बैठ जाते हैं।

6.टीवी और केबल संस्कृति से अध्ययन प्रभावित (Studies influenced by TV and cable culture):

  • टीवी और केबल संस्कृति का प्रचार-प्रसार बढ़ने से लोगों का अध्ययन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।आज के व्यस्त समय में व्यक्ति को जो थोड़ा-बहुत अवकाश मिलता है उसमें से अधिकाधिक समय टीवी/केबल के प्रोग्राम देखने में खर्च या यों  कहिए व्यर्थ हो जाता है।इसी प्रकार ऑनलाइन सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं,फलतः लोग पुस्तकों को उतना समय नहीं दे पाते।इससे न केवल पुस्तकों में उनकी रुचि घटती गयी है बल्कि लगातार टीवी देखते रहने से उन्हें शारीरिक क्षति भी उठानी पड़ रही है।इसके बावजूद पुस्तक पढ़ने की दिशा में प्रगति नकारात्मक ही रही है।आज जबकि जीवन की भाग-दौड़ के बीच तनाव और अशांति बढ़ती ही जा रही है,ऐसे कठिन समय में स्वाध्याय ही सुकून और शीतलता प्रदान करता है।
  • पुस्तकें जीवन और संसार की परेशानियों से व्यक्ति को मुक्त करती हैं।यहां तक कि वे परेशानियों से निकलने का रास्ता भी सुझाती हैं।स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्ति की तरह थक कर सोने के लिए रात्रि की प्रतीक्षा नहीं करता।वह ज्ञानार्जन के प्रति सदैव सजग व जागरूक बना रहता है।जिज्ञासु अध्येता को पढ़ने की ललक कभी कम नहीं होती।ऐसा अध्येता पढ़े हुए को पूरी तरह गुनता भी है।जिज्ञासु अध्येता की ललक इतनी जबर्दस्त होती है कि वह यही कामना करता रहता है कि समय धीरे-धीरे व्यतीत हो ताकि वह अधिक से अधिक ज्ञान रस का आनंद ले सके।ऐसा ही व्यक्ति न तो स्वयं के लिए भार स्वरूप होता है और न समाज या परिवार के लिए।बल्कि वह तो अपने ज्ञान द्वारा दूसरों को भार से छुटकारा दिलाता है,उन्हें हर संभव मदद पहुंचाता है।
  • अंग्रेजी के सुविख्यात निबंधकार बेकन के मुताबिक स्वाध्याय उल्लास का,अलंकार का और योग्यता का कार्य करता है।’ स्वाध्याय में यह शक्ति छिपी होती है कि,वह ज्ञान के नित नए क्षितिज खोलता है।वह पर्दा पर पर्दा उठाकर अज्ञान के अँधेरे को दूर कर देता है।कालिदास पेड़ की जिस डाल पर बैठे थे उसी डाल को काट रहे थे,लेकिन मां सरस्वती का वरदान पाकर जब वे स्वाध्याय में लीन हो गए तब वही मूर्ख कालिदास,महाकवि कालिदास बन गए।डाकू वाल्मीकि भी जब क्रोंच पक्षी की मर्महित चीत्कार से व्यथित होकर स्वाध्याय में रत हुए तभी रामायण की रचना करके योग्य बन सके।यदि खोजा जाए तो ऐसे और असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे,जबकि बिना किसी व्यवस्थित शिक्षा के केवल तल्लीनता के साथ स्वाध्याय द्वारा ही मनीषी बनने में मदद मिली है।

7.प्रश्न:मैं जो पढ़ता हूं भूल जाता हूं,कोई दवा बताएं (I forget what I read,tell me some medicine):

  • यह समस्या आपकी ही नहीं आज के अधिकांश युवाओं के साथ है।दिमाग को यांत्रिक मशीन समझकर सभी बातें यंत्रवत् ठूँस लेने का प्रयास करना इसका मूल कारण है।अध्ययन के लिए एक उपयुक्त वातावरण का होना जरूरी है।मन तनावग्रस्त हो और आप जबरदस्ती पढ़ने बैठेंगे तो ऐसा पढ़ा हुआ शीघ्र ही विस्मृत हो जाएगा।अतः पढ़ते समय तनावमुक्त होकर बैठना चाहिए।अपने अध्ययन के लिए अपनी सुविधानुसार एक उपयुक्त कार्यनीति बनाएं।विषय को रटने की बजाय उसका एकाग्रता से अध्ययन करें तथा उस पर चिंतन-मनन करें।यदि संभव हो तो अपने सहपाठियों के साथ पढ़े गए विषय पर विचार-विमर्श कीजिए।अनेक बार ऐसा होता है कि हमें लगता है कि अमुक विषय पर हमारी पकड़ अच्छी है लेकिन परीक्षा में लिखते समय हम अपने विचारों को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं।अतः विषय को पढ़ते समय मुख्य बातों को नोट करते रहिए।जो भी अध्ययन किया हो उसे लिखकर देखना अत्यंत जरूरी है।ऐसी कोई दवा नहीं है जिसके द्वारा आप जो भी पढ़े तुरंत याद हो जाए।

8.प्रश्न:मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता,पढ़ता हूं तो नींद आती है (I don’t feel like studying,I feel sleepy when I study):

  • उत्तर:किसी भी कार्य में रुचि होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस कार्य को करते हुए हमारे मन में प्रसन्नता हो रही है या नहीं।यदि किसी कार्य को करते हुए मन में स्वाभाविक सहजता व प्रसन्नता नहीं है तो उस कार्य में हमारी रुचि नहीं होगी और हम उसे एक बोझ की भाँति समझने लगते हैं।यह एक प्राकृतिक नियम है कि जिस कार्य को करने पर मन में सुकून मिलता है,मन उसे बार-बार करने को प्रयत्नशील रहता है।दूसरी ओर,ऐसा कार्य जिसके करने से मन में तनाव उत्पन्न होने लगता है,मन हमेशा उससे दूर भागने लगता है।आपको पढ़ाई को एक बोझ समझकर नहीं वरन उसमें प्रसन्नता के साथ मन लगाने का प्रयास करना होगा।आप तनावमुक्त होकर पढ़ने बैठिए और मन में ऐसे विचार लाइए कि आज मैंने पढ़ा,पहले तो मैं पढ़ता ही नहीं था।
    इस विचार के साथ अपने को सुखद स्थिति में महसूस करने का प्रयास करें।स्वयं को दी गयी शाबाशी पढ़ाई को आपके लिए रुचिकर बनाने में मददगार साबित होगी।अपनी पढ़ाई को कुछ भागों में बांट लें तथा थोड़े से अधिक की ओर बढ़ें।आरम्भ में ही बड़े स्तर पर कार्य आरंभ करने से आपके मन को वह बोझ भी लग सकता है।साथ ही अपने कार्य की प्रगति का मूल्यांकन भी करते रहे।आपके मन को यह महसूस होता रहेगा कि आपने कितनी प्रगति की।जब मन प्रसन्नता व तनावमुक्त रहेगा तो नींद व डरावने सपने भी आने बंद हो जाएंगे।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में भूलने की आदत से बचने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote to Avoid Habit of Forgetting),भूलने की आदत से कैसे बचें? (How to Avoid Habit of Forgetting?) के बारे में बताया गया है।

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9.याद करने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (Manner of Remembrance) (Humour-Satire):

  • टीचरःछात्र से गणित का सवाल याद क्यों नहीं है,जा जाकर लाइन के पीछे जाकर खड़ा हो जा।
    थोड़ी देर छात्र पीछे जाकर वापस आगे आ जाता है।
  • टीचर (गुस्से से):तुझे मैंने कहा था कि सबसे आखिर में जाकर खड़ा हो जा।
  • छात्र:सर,लाइन के पीछे खड़ा होने से भूलने की आदत थोड़ी खत्म हो जाएगी।

10.भूलने की आदत से बचने के 9 मूलमंत्र (Frequently Asked Questions Related to 9 Keynote to Avoid Habit of Forgetting),भूलने की आदत से कैसे बचें? (How to Avoid Habit of Forgetting?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.हम भूलते क्यों हैं? (Why do we forget?):

उत्तर:पढ़े हुए का बार-बार अभ्यास न करने,एकाग्रतापूर्वक न पढ़ने,किसी विषय को अरुचिपूर्वक पढ़ने,समय-समय पर विषय की पुनरावृत्ति न करने,पढ़ने के बाद उसे न लिखने,पढ़े हुए की चर्चा,डिस्कस न करने आदि कारणों से हम भूलते हैं।

प्रश्न:2.क्या भूलने की बीमारी होती है? (What causes amnesia?):

उत्तर:भूलने की बीमारी को एम्नेशिया (amnesia) कहते हैं।डॉक्टर के उचित परामर्श से दवा लेकर एम्नेसिया की बीमारी दूर की जा सकती है।वैसे भूलने की आदत मनोवैज्ञानिक है जिसे मन की एकाग्रता और सतत अभ्यास से दूर किया जा सकता है।औषधि का प्रभाव भी तभी होता है।

प्रश्न:3.भूलने का यौगिक उपचार क्या है? (What is the yogic treatment for forgetfulness?):

उत्तर:शीर्षासन,पाद पश्चिमोत्तानासन,नाड़ीशोधन प्राणायाम,भस्त्रिका व कपालभाति प्राणायाम करना चाहिए।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भूलने की आदत से बचने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote to Avoid Habit of Forgetting),भूलने की आदत से कैसे बचें? (How to Avoid Habit of Forgetting?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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