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Role of Teacher in Career of Students

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1.छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher in Career of Students),छात्र-छात्राओं के करियर निर्माण में शिक्षक की भूमिका (The Role of Teacher in Building The Career of Students):

  • छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher in Career of Students) बहुत महत्त्वपूर्ण है।छात्र-छात्राओं को पढ़ाना अथवा पाठ्यक्रम पूर्ण करा देना ही शिक्षक का दायित्व नहीं है।आधुनिक युग में यदि छात्र-छात्राओं को शिक्षक न भी पढ़ाए तो भी छात्र-छात्राएं अनेक माध्यमों से पढ़ना-लिखना,पाठ्यक्रम का अध्ययन पूर्ण कर लेते हैं।जैसे वे कुंजियों,गाइड्स,पासबुक्स,यूट्यूब चैनल पर वीडियो को देखकर,विभिन्न वेबसाइट्स पर अध्ययन कर लेते हैं।
  • यदि फिर भी छात्र-छात्राएं उत्तीर्ण नहीं होते हैं तो इसमें इतनी हानि नहीं है।परंतु यदि छात्र-छात्राओं को पूर्ण रूप से दक्ष,संस्कारवान,आत्मनिर्भर नहीं बनाया जाए तो ऐसे छात्र-छात्राएं जीवन भर उद्दण्ड,अहंकारी,अयोग्य हो जाता है अर्थात् वह गलत दिशा की ओर अग्रसर हो जाता है।न स्वयं शांतिपूर्वक रहता है और न ही अपने आसपास के लोगों को शांतिपूर्वक रहने देता है।अपने आस-पास के लोगों को सताता रहता है तथा बात-बात पर उलझता रहता है।
  • अध्यापक को शिक्षण के समय यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सच्चे अर्थों में छात्र-छात्राओं का पूर्ण विकास करना है,सर्वांगीण विकास करना है तो उसके विकास के लिए किसी भी पक्ष को अधूरा नहीं छोड़ना है।चाहे वो आर्थिक पक्ष हो,शारीरिक पक्ष हो अथवा आध्यात्मिक पक्ष हो।केवल छात्र-छात्राओं को पाठ्यक्रम पढ़ाकर उत्तीर्ण करा देना ही उनका काम नहीं है वरन् जिस क्षेत्र में भी विद्यार्थियों को काम करना है उस समस्त क्षेत्र की वास्तविक जानकारी,ज्ञान और नैतिक शिक्षा भी देनी है।अन्यथा अनैतिक वातावरण में समय गुजारने वाले बच्चों को शिक्षा देना केवल खानापूर्ति करना है अर्थात् औपचारिकता ही है जिसे वे प्रमाण पत्र (डिग्री प्राप्त) करते ही भुला देंगे।
  • ऐसी शिक्षा जिससे छात्र-छात्राओं के समस्त पक्ष को समुन्नत किया जा सके इसके लिए अध्यापकों को स्वयं में ऐसी दक्षता व योग्यता पैदा करनी होगी क्योंकि भगवान कृष्ण जैसे ही अर्जुन को,समर्थ रामदास ही शिवाजी को,स्वामी विरजानन्द जैसे शिक्षक ही स्वामी दयानंद सरस्वती,स्वामी रामकृष्ण जैसे शिक्षक ही स्वामी विवेकानंद तैयार कर सकते हैं।
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2.वर्तमान शिक्षकों की वस्तुस्थिति (The Reality of Current Teachers):

  • आधुनिक युग में बहुत से शिक्षक छात्र-छात्राओं के साथ यार दोस्त जैसा व्यवहार करते हैं एवं बीड़ी-सिगरेट,शराब वगैरह पीते हैं।उनका नैतिक पतन इतना हो चुका होता है कि उन्हें देखकर यह कहा ही नहीं जा सकता कि वे वाकई में शिक्षक हैं।
  • बचे हुए शिक्षक हैं वे भी ऐसे शिक्षक हैं जो विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम पूर्ण कराने में लगे रहते हैं और पाठ्यक्रम को पूर्ण कराकर संतुष्ट हो जाते हैं।यही कारण है कि छात्र-छात्राएं आगे उन्नति नहीं कर पाते हैं।पाठ्यक्रम पूरा करवाना तो अध्यापक का कर्तव्य है ही उसे तो पूर्ण करवाना ही चाहिए।परंतु पाठ्यक्रम पूर्ण कराने के अतिरिक्त व्यावहारिक ज्ञान,करियर संबंधी परामर्श इत्यादि में छात्र-छात्राएं बुद्धि और विवेक का उपयोग कर सकें इसके लिए भी अध्यापक को उनको तैयार करना चाहिए।सामान्य तथा निम्न स्तर के बालक-बालिकाएं इस तरफ ध्यान नहीं देते हैं इसलिए वे करियर संबंधी निर्णय लेने में गलती कर बैठते हैं।उसका परिणाम वे आजीवन भुगतते रहते हैं।
  • आधुनिक युग में ज्ञान का विस्फोट हो रहा है। तकनीकी,वैज्ञानिक,आर्थिक तथा हर क्षेत्र में ज्ञान गुणोत्तर रूप से बढ़ रहा है।इसलिए अध्यापक को अपने ज्ञान को अप टू डेट तथा अपग्रेड करते रहना चाहिए।ऐसी स्थिति में छात्र-छात्राओं को करियर निर्माण में शिक्षक करियर काउंसलर (Career Counsellor) की श्रेष्ठ भूमिका अदा करनी चाहिए।
  • छात्र-छात्राओं के जीवन का निर्माण,करियर का निर्माण केवल पुस्तकों,सोशल मीडिया या इंटरनेट के माध्यम से नहीं हो सकता है।बल्कि ऐसे मनुष्यों की समीपता व उन्हें समझने से होता है जिन मनुष्यों का आचरण पवित्र,शुद्ध,निर्मल तथा निष्कलंक व सदाचार युक्त होता है।ऐसा मनुष्य शिक्षक ही होता है जो माता-पिता के बाद छात्र-छात्राओं के अधिक संपर्क में रहता है।
  • यदि शिक्षक इस जिम्मेदारी से यह कहकर मुक्त होना चाहे कि उसका कर्तव्य पाठ्यक्रम पूर्ण कराना है और इसी का उसे वेतन मिलता है।ऐसी स्थिति में उसे छात्र-छात्राओं,माता-पिता व समाज से यश,सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की आशा छोड़ देनी चाहिए।
  • यह बात कुछ हद तक ठीक है कि छात्र-छात्राओं के भविष्य का निर्माण करने का ठेका अकेले शिक्षक का नहीं है।परंतु यदि शिक्षक ऐसा सोचे तो इसका अर्थ यही है कि वे शिक्षा को केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखता है।ऐसी स्थिति में अनुमान लगाया जा सकता है कि देश के भविष्य की तस्वीर क्या होगी?
  • धर्मोपदेशकों,राजनीतिज्ञों,साहित्यकारों,समाज सुधारको,चिंतकों के संपर्क में छात्र-छात्राएं थोड़ी देर के लिए आते हैं।इतने से समय में वे तीव्र उत्तेजना तो पैदा कर सकते हैं परंतु वह पर्याप्त नहीं है।जैसे किसी पौधे को लगाने पर एक बार पानी देने से विकसित नहीं होता है बल्कि उसको विकसित करने के लिए नियमित रूप से पानी देना होता है और नियमित रूप से उसकी देखभाल करनी होती है।बालक-बालिकाओं को संस्कारवान,प्रतिभावान,तेजस्वी,प्रखर,करियर के निर्माण में श्रेष्ठ भूमिका इत्यादि का कार्य वही कर सकता है जो उनके नियमित संपर्क में आता है और इस कला को जानता हो।ऐसा व्यक्तित्व शिक्षक ही हो सकता है।
  • शिक्षकों को कानूनी रूप से तथा वेतनमान की शर्तों में उल्लेख न होने के कारण जिम्मेदारी को निभाने के लिए बाध्य तो नहीं किया जा सकता है परंतु नैतिक रूप से छात्र-छात्राएं,समाज,अभिभावक,माता-पिता उन्हें क्षमा नहीं कर सकते हैं यदि वे इस जिम्मेदारी को नहीं निभाते हैं।

3.शिक्षक वर्तमान शिक्षा का सही अर्थ समझें (Teachers Understand The True Meaning of Current Education):

  • वर्तमान शिक्षा में भौतिक शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।भौतिक शिक्षा के द्वारा अर्थोपार्जन अर्थात् रोजगार प्राप्त किया जा सकता है जिससे छात्र-छात्राएं अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सके।
  • सांसारिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए और जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन की आवश्यकता होती है और धनार्जन करना भी चाहिए।
  • संसार के सारे व्यवहार,नीति और संबंधों का निर्वाह के लिए धन की आवश्यकता है।परंतु धनार्जन के लिए छात्र-छात्राओं के करियर का निर्माण करना आवश्यक है।करियर अर्थात् पेशा इंजीनियर,डॉक्टर,वैज्ञानिक,गणितज्ञ,अध्यापक या अन्य कोई भी व्यवसाय हो सकता है।
  • छात्र-छात्राओं के करियर को सही दिशा,सही मार्गदर्शन व करियर निर्माण की अहम भूमिका वही निभा सकता है जो उसके सबसे अधिक संपर्क में रहता है और उसके व्यक्तित्व को जानता-समझता है।माता पिता के बाद अध्यापक ही सबसे अधिक निकट रहता है और छात्र-छात्राओं को जानता समझता है याकि उनके व्यक्तित्व को,उनमें छिपे हुए हुनर को जान-समझ सकता है।माता-पिता को बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने, धनार्जन करने से ही फुर्सत नहीं मिलती है।माता-पिता तो बालक-बालिकाओं का जन्मदाता है परंतु असली जन्मदाता तो शिक्षक को ही कहा जाना चाहिए यदि वह छात्र-छात्राओं को सही दिशा,मार्गदर्शन,शिक्षा,ज्ञान प्रदान करता है तो।

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4.करियर निर्माण में शिक्षक की भूमिका (The Role of The Teacher in Career Building):

  • वर्तमान युग में जिस कदर प्रतिस्पर्धा हो रही है उससे देखकर यही लगता है कि इस दौर में सामर्थ्यशाली ही टिकेगा।जिसमें क्षमता,सामर्थ्य पैदा करने का माद्दा है वह शिखर की ओर अग्रसर होगा और जिसमें नहीं है वह निम्न स्तर का जीवन व्यापन करेगा तथा गई गुजरी स्थिति में पड़ा रहेगा।
  • क्षमतावान,दक्ष,कौशलयुक्त तथा सही करियर के निर्माण के लिए छात्र-छात्राओं की क्षमता,योग्यता व रुचि को न केवल पहचानना आवश्यक है बल्कि उसके लिए उचित अवसर का मिलना भी जरूरी है। शिक्षा केवल साक्षर करना,डिग्री हासिल करने वाला अर्थ ही नहीं रखती है बल्कि छात्र-छात्राओं के करियर के लिए कौशल व पात्रता उत्पन्न करना भी शामिल है।
  • यदि छात्र-छात्राओं के करियर को शिक्षक सही दिशा दे सके,पहचान सके और उसे आगे बढ़ा सके तो न केवल माता-पिता का गौरव बढ़ता है बल्कि शिक्षक का गौरव भी बढ़ता है।
  • आज के नवयुवक भावी देश के नागरिक बनेंगे।अतः जिस तरह के छात्र-छात्राओं का निर्माण करेंगे उसी प्रकार का देश का विकास होगा।
  • भारत में वर्तमान में लगभग 30% युवावर्ग है। आधुनिक युग की आवश्यकताओं व परिवेश को देखते हुए माता-पिता,अभिभावकों के साथ-साथ शिक्षकों का दायित्व ओर भी अधिक बढ़ जाता है। ताकि वे युवावर्ग को सही दिशा और मार्गदर्शन,सकारात्मक विकास हो सके।
  • परंतु वर्तमान परीक्षा केन्द्रित पद्धतियों,सैद्धान्तिक शिक्षा के कारण युवावर्ग अफसर,क्लर्क इत्यादि ऐशोआराम के पद तो प्राप्त करना चाहता है परंतु अपने आपको किसी स्किल का निर्माण करने,करियर का निर्माण करने,कोई उद्योग प्रारंभ करने में दिशाहीन पाता है।वह कोई कार्य आरंभ करना चाहता ही नहीं है और यदि कार्य प्रारंभ कर भी देता है तो बीच में आने वाली कठिनाइयों,समस्याओं और बाधाओं से घबराकर अधूरा ही कार्य को छोड़ देता है और लक्ष्य से भटक जाता है।
  • ऐसी स्थिति में निराश,हताश व अकर्मण्यता के अपराध बोध से ग्रसित होकर गलत दिशा में,नशीले पदार्थों, मादक द्रव्यों को सेवन करने अथवा आपराधिक प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर हो जाता है।
  • नवी से 12वीं कक्षा तक के छात्र-छात्राओं को सही करियर के निर्माण, सही करियर चयन व मार्गदर्शन की आवश्यकता है।आज हर गांव,शहर में जगह-जगह शिक्षा संस्थान खुले हुए हैं।परंतु इन शिक्षा संस्थानों की सार्थकता तभी है जबकि युवावर्ग के निर्माण में शिक्षक महत्वपूर्ण और सही दिशा की ओर अग्रसर करने में अपनी भूमिका निभा सके।
  • वस्तुतः युवावर्ग को इन शिक्षा संस्थानों में सही करियर के चयन में कोई भूमिका अदा नहीं करते हैं। जो छात्र-छात्राएं करियर की दिशा पसंद करते हैं वह उनके लिए लाभदायक भी हो सकती है और हानिकारक हो सकती है।क्योंकि केवल पसंद के आधार पर करियर का चयन नहीं किया जा सकता है।पसंद के साथ उसमें योग्यता भी होनी चाहिए तथा क्षमता भी होनी चाहिए।
  • शिक्षा संस्थानों की प्रार्थना सभा,बालसभा,SUPW, NSS शिविर,गणित क्लब,गणित परिषद,विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को विभिन्न करियर आयामों,पाठ्यक्रमों,प्रतियोगिता परीक्षाओं,तकनीकी व व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों को रोजगारोन्मुखी व स्वरोजगार के साधनों की जानकारी देना आवश्यक है।साथ ही विभिन्न छात्रवृत्तियाँ,वित्तीय सहायताओं व ऋण सुविधाओं से भी परिचित कराना चाहिए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher in Career of Students),छात्र-छात्राओं के करियर निर्माण में शिक्षक की भूमिका (The Role of Teacher in Building The Career of Students) के बारे में बताया गया है।

5.छात्रों का देरी से आने का कारण (The Reason for Students to Come Late):

  • गणित अध्यापक (संदीप से):आज तुम लेट क्यों हुए?
  • संदीप:सर (sir) बस लेट हो गई थी।
  • गणित अध्यापक (राजेश से):तुम लेट क्यों हुए?
  • राजेश:सर (sir) बस लेट हो गई थी।
  • गणित अध्यापक (कमल से):आज तुम लेट कैसे हुए?
  • कमल:सर (sir) बस लेट हो गई थी।
  • गणित अध्यापक:कमाल हो गया,सब एक ही कारण से लेट हो गए।कम से कम बहाना तो अलग-अलग बनाते।
    तीनों छात्र:सर (sir) दरअसल हम तीनों एक ही बस से आते हैं।

6.छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher in Career of Students),छात्र-छात्राओं के करियर निर्माण में शिक्षक की भूमिका (The Role of Teacher in Building The Career of Students) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.छात्र-छात्राओं को करियर की जानकारी कैसे दी जाए? (How to Give Career Information to Students?):

उत्तर:उपर्युक्त आर्टिकल में बताए गए तरीकों के अलावा शिक्षा संस्थानों में करियर कक्ष,करियर कॉर्नर की स्थापना करके जानकारी दी जा सकती है।साथ ही अनुभवी करियर काउंसलर को शिक्षा संस्थानों में आमंत्रित करके वर्तमान समय में प्रचलित करियर की जानकारी छात्र छात्राओं को दिलाई जा सकती है।करियर काउंसलर से विद्यार्थी अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त कर सकता है।केरियर डे व अन्य आयोजनों के अवसर पर माता-पिता,अभिभावकों को आमंत्रित करके अथवा संपर्क करके छात्र-छात्राओं की रुचियों,क्षमताओं,पारिवारिक परिस्थिति,आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए करियर संबंधी विषय चयन हेतु प्रेरित किया जा सकता है।

प्रश्न:2.करियर परामर्श में शिक्षक कैसे सहायक है? (How a Teacher is Helpful in Career Counseling?):

उत्तर:युवावर्ग की वर्तमान आकांक्षाओं,मन में उत्पन्न होने वाली जिज्ञासाओं को शांत करने तथा करियर चयन हेतु उचित मार्गदर्शन प्रदान करने में करियर शिक्षक की प्रमुख भूमिका है।युवावर्ग में निहित क्षमता,दक्षता व योग्यता उत्पन्न करने में संकोच को त्यागकर युवकों के समुचित विकास में शिक्षक को अपने दायित्वों को निभाना आवश्यक है।ताकि ये युवक देश की आने वाली पीढ़ी के जिम्मेदार नागरिक बन सकें और सुनहरे भविष्य की कल्पना को साकार कर सकें।
प्रश्न:3.वास्तव में शिक्षा से क्या तात्पर्य है? (What does Education Really Mean?):
उत्तर:शिक्षा केवल सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त करना या डिग्री ले लेना नहीं है बल्कि इसका अर्थ है कर्म की आकांक्षा के अनुरूप युवावर्ग में कुशलता पूर्वक कार्य करने की पात्रता उत्पन्न करना।

प्रश्न:3.वास्तव में शिक्षा से क्या तात्पर्य है? (What does Education Really Mean?):

उत्तर:शिक्षा केवल सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त करना या डिग्री ले लेना नहीं है बल्कि इसका अर्थ है कर्म की आकांक्षा के अनुरूप युवावर्ग में कुशलता पूर्वक कार्य करने की पात्रता उत्पन्न करना।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher in Career of Students),छात्र-छात्राओं के करियर निर्माण में शिक्षक की भूमिका (The Role of Teacher in Building The Career of Students) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका
(Role of Teacher in Career of Students)

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छात्र-छात्राओं के करियर में शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher in Career of Students)
बहुत महत्त्वपूर्ण है।छात्र-छात्राओं को पढ़ाना अथवा पाठ्यक्रम पूर्ण करा देना ही
शिक्षक का दायित्व नहीं है।आधुनिक युग में यदि छात्र-छात्राओं को शिक्षक न भी पढ़ाए तो भी
छात्र-छात्राएं अनेक माध्यमों से पढ़ना-लिखना,पाठ्यक्रम का अध्ययन पूर्ण कर लेते हैं।

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