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Qualities of Textbook of Mathematics in hindi || गणित की पाठ्यपुस्तक

गणित की पाठ्यपुस्तक (Qualities ofTextbook of Mathematics)

1.पाठ्यपुस्तक की आवश्यकता (Need of the Text-Book of Mathematics) :-

Qualities of Textbook of Mathematics

Qualities of Textbook of Mathematics


प्रत्येक कक्षा तथा प्रत्येक विषय की पाठ्यपुस्तक का होना अनिवार्य है. पाठ्यपुस्तक में एक ही प्रकार की विषय सामग्री एक ही पाठ्यपुस्तक में उपलब्ध हो जाती है. पाठ्यपुस्तक के द्वारा विद्यार्थियों तथा अध्यापकों को यह ज्ञात हो जाता है कि उन्हें क्या-क्या पढ़ना और पढ़ाना है? पाठ्यपुस्तक के आधार पर विद्यार्थियों का मूल्यांकन किया जा सकता है.

2.गणित की पाठ्यपुस्तक के सिद्धांत (principles of Text-Book of Mathematics) :-

(1.)पाठ्यपुस्तक जिस कक्षा हेतु तैयार की जानी है उस कक्षा का पाठ्यक्रम निर्धारित कर लेना चाहिए. पाठ्यक्रम कक्षा के स्तर के अनुसार ही तैयार करना चाहिए इसके पश्चात् ही विषयवस्तु (content) का चयन करना आवश्यक है.
(2.)पाठ्यपुस्तक में गणित की विषयवस्तु तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गणित की विषयवस्तु का सम्बन्ध पिछली तथा आगे की कक्षाओं से सम्बंधित होनी चाहिए.
(3.)पाठ्यपुस्तक के निर्माण में इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए कि पाठ्यपुस्तक का व्यावहारिक जीवन से सम्बन्ध होना चाहिए अर्थात् विषय सामग्री ऐसी हो जो हमारे दैनिक जीवन में उपयोग आ सके.
(4.)पाठ्यपुस्तक में प्रश्नों तथा उत्तरों में शुद्धता होनी चाहिए जिससे विद्यार्थियों की पढ़ने में रुचि जाग्रत हो सके.
(5.)पाठ्यपुस्तक में केवल पुरानी सामग्री का समावेश ही न हो बल्कि नवीन खोजों का भी उल्लेख होना चाहिए जिससे पाठ्यपुस्तक नीरस न लगे. विद्यार्थियों की पाठ्यपुस्तक पढ़ने में रूचि व जिज्ञासा उत्पन्न हो सके.
(6.)पाठ्यपुस्तक में किसी भी विषय से संबंधित अभ्यास व प्रश्नों के देने से पहले उससे संबंधित सिद्धान्त को सरल व स्पष्ट भाषा में समझाना व उल्लेख करना चाहिए.
(7.)गणित की पाठ्यपुस्तक(Text-Book of Mathematics) में उदाहरण स्पष्ट हों जहाँ रेखाचित्र तथा तालिका का प्रयोग आवश्यक हो वहां अवश्य करना चाहिए.
(8.)पाठ्यपुस्तक के निर्माण में देश तथा समाज की आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए. पाठ्यपुस्तक का निर्माण विद्वान् तथा योग्य शिक्षाविदों विषय में पारंगत अध्यापकों ही करवाना चाहिए.
(9.)पाठ्यपुस्तक में सन्दर्भ पुस्तकों का उल्लेख भी करना चाहिए जिसमें देश विदेश के लेखकों की पुस्तकें हो. इससे विद्यार्थियों की विषय के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा और रुचि पैदा होगी.
(10.)देश के भिन्न भिन्न भागों के अनुभवी व विद्वानों को एक स्थान पर बुलाकर विचार-विमर्श करके फिर पाठ्यपुस्तक का निर्माण करना चाहिए.
(11.)पाठ्यपुस्तक के निर्माण में देश के विद्वानों तथा शिक्षाविदों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए. विदेशी विद्वानों के साथ साथ हमारे देश के विद्वानों व शिक्षाविदों का भी सहयोग पाठ्यपुस्तक के निर्माण में लेना चाहिए.

3.मूल्यांकन (Evaluation Text-Book of Mathematics) :-

 पाठ्यपुस्तक का निर्माण करने के बाद उसका मूल्यांकन भी करना चाहिए. विषय सामग्री के चयन में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का ध्यान रखा गया है या नहीं. पाठ्यपुस्तक की विषय सामग्री में तार्किक आधार भी है या नहीं. पाठ्यपुस्तक कक्षा के विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल है या नहीं. पाठ्यपुस्तक में गणित के पारिभाषिक शब्दावली का उल्लेख किया गया है या नहीं. पाठ्यपुस्तक में अभ्यास प्रश्न तथा उदाहरणों में अत्यधिक कठिन सामग्री तो नहीं रखी गई है. पाठ्यपुस्तक गणित शिक्षण के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक है या नहीं.

(4.)निष्कर्ष (conclusion) :- 

आधुनिक युग में गणित की पाठ्यपुस्तक(Text-Book of Mathematics) की विषय सामग्री इस प्रकार से रखी जाती है जिसकी व्यावहारिक जीवन से कोई संबंध नहीं है. विद्यार्थी अक्सर अध्यापकों से यही प्रश्न पूछते हैं कि आखिर इस गणित का हमारे जीवन में क्या उपयोग है. न तो भौतिक जीवन में और न ही आध्यात्मिक जीवन में इसका कोई सम्बन्ध हैं. सिर्फ मानसिक कसरत करने जैसी पाठ्यपुस्तक का निर्माण किया जाता है. मानव जीवन में कोई कार्य करने के लिए भारतीय दर्शन में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष. प्रथम तीन धर्म, अर्थ, काम भौतिक उद्देश्य हैं तथा अन्तिम उद्देश्य मोक्ष आध्यात्मिक उद्देश्य है. किसी विषय, कोई ढंग, कोई भी तरीका तथा कोई भी पद्धति अपनायी जाए तो हमें इन चार पुरुषार्थों या इनमें से अधिक से अधिक पुरुषार्थों की प्राप्ति होनी ही चाहिए तभी उसकी सार्थकता है. वर्तमान गणित की पाठ्यपुस्तकों से इन पुरुषार्थों का प्राप्त करना सम्भव नहीं है. अतः समय आ गया है कि हमें गणित की पाठ्यपुस्तकों का गहराई से अन्वेषण करना चाहिए. यदि गणित का अध्ययन करने से हमारी जिज्ञासा शान्त नहीं होती हो, रुचि नहीं बढ़ती है और गणित को हल करने में हमें आनन्द का अनुभव न होता हो और न ही हमारी जीवन की समस्याओं को हल करने में कोई योगदान हो तो ऐसी गणित आखिर हमारे कौनसे उद्देश्य की पूर्ति कर सकेगी, यह एक विचारणीय प्रश्न है? गणित की विषय सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो हमारे व्यावहारिक जीवन को खुशहाल, उपयोगी व सरस बनाए साथ ही हमारे अन्तिम पुरुषार्थ मोक्ष अर्थात् आनंद की प्राप्ति में सहायक हो.



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