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What is proud in Hindi

1.अहंकार क्या है? का परिचय (Introduction to What is proud in Hindi),अहंकार से कैसे मुक्त हों? (How to free from proud?):

  • अहंकार क्या है? (What is proud in Hindi),अहंकार से कैसे मुक्त हों? (How to free from proud?):हम प्रत्येक कार्य बोधपूर्वक तथा होशपूर्वक करते हैं,ध्यानपूर्वक करते हैं तो अहंकार से बच जाते हैं।अशुभ को छोड़ते जाएं और शुभ को धारण करते जाएं तो अहंकाररहित होते जाते हैं।अहंकार हमारे अन्दर कब प्रविष्ट हो जाता है पता ही नहीं लगता है इसलिए हर कृत्य सजग और जागरूक रहकर करने की आवश्यकता है।
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via https://youtu.be/wuqTuqh02ME

2.अहंकार क्या है? (What is proud in Hindi),अहंकार से कैसे मुक्त हों? (How to free from proud?):

  • अहंकार समस्त महान गलतियों का परिणाम होता है।
  • अहम का भाव रखना एक अक्षम्य अपराध है।
  • अहंकार नशे का मुख्य रूप है।
  • धनी को अपने धन का मद रहता है,घमंड रहता है परंतु गरीब के झोपड़े में क्रोध और अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं रहता।
  • घोड़े और हाथी के लिए व्यय साध्य चारा चाहिए किंतु अहंभाव के लिए किसी रसद की आवश्यकता नहीं होती है।
  • निरंकुशता से सेवा की कीमत बढ़ती है और अहंकार से घटती है।
  • अहंकार चुंबक की भाँति एक ही वस्तु का निर्देश करता है-स्व का;परंतु चुंबक की भाँति वह अपनी ओर आकृष्ट नहीं करता बल्कि अपने से दूर हटा देता है।
  • माया तजी क्या भया,मान तता नहिं जाए।
    जेहि मानै मुनिवर के ठगे,मान सवन को खाए।। (कबीर)
  • मनुष्य जितना छोटा होता है उसका अहंकार उतना ही बड़ा होता है।
  • अहंकारी व्यक्ति अहंकार से बहुत उत्तेजित हो उठते हैं।
  • अहंकारी मनुष्य केवल अपने ही महान् कार्यों का वर्णन करता है और दूसरों के कुकर्मों का।
  • अहंकारी मनुष्य में कृतज्ञता बहुत कम होती है क्योंकि वह यही समझता है कि मैं जितना पाने योग्य हूं उतना मुझे कभी प्राप्त नहीं होता।

3.अहंकार का दृष्टान्त (The Example of Ego):

  • नगर के विश्वविद्यालय में गणित के छात्र-छात्राएं आपस में मिल जुलकर रहते थे।किसी समस्या का समाधान या सवाल का हल आपस में वार्ता तथा विचार-विमर्श से हल कर लेते थे।धीरे-धीरे आपस में वार्ता तथा विचार-विमर्श करने से उनकी बुद्धि का विकास तीव्र गति से होने लगा।
  • उनमें चंचल नाम का एक विद्यार्थी था उसकी बुद्धि इतनी तेजी से विकसित होने लगी कि किसी भी सवाल को वह झट से हल कर देता था।कक्षा में अन्य छात्र-छात्राओं से वह बहुत आगे बढ़ गया।गुरुजी उसकी प्रशंसा करते थे।महाविद्यालय में फंक्शन होता था तो उसको सम्मानित किया जाता था।गुरुजी को कभी अवकाश मिलता तो वे उससे गणित की पहेलियों,गणित की गुत्थियों पर चर्चा करते थे।उसके द्वारा पहेलियों के हल,गणित के खेल,गणित की जटिल समस्याओं को हल करने पर गुरुजी उसकी खूब प्रशंसा करते थे।अधिक प्रशंसा से चंचल का दिमाग फिर गया।
  • आगे से वह किसी को कुछ नहीं समझता था।छोटे-बड़े तथा बराबर के मित्रों को गणित के सवालों में चुनौती देता और वे हल नहीं कर पाते तो उनकी हंसी उड़ाता था।अब वह अपने साथियों की ही नहीं बल्कि गुरुजी और गुरु पत्नी से भी शास्त्रार्थ करता था और उनसे धृष्टता कर बैठता था।परन्तु गुरुजी उसकी नादानी और बचपना समझकर उसे नजरअंदाज कर देते थे।
  • सभी छात्र-छात्राएं उससे परेशान हो गए।उन्होंने सभा करके उसको सबक सिखाने का निश्चय किया।सभी छात्रों में जो वरिष्ठ और बुद्धिमान था उसको उन्होंने चंचल को सही रास्ते पर लाने का काम सौंपा।उसका नाम श्यामसुंदर था।श्यामसुंदर एक दिन चंचल के पास गया और उससे नमस्कार की।चंचल ने पूछा कैसे आए हो? श्याम सुंदर ने कहा कि हम सभी में तुम बुद्धिमान,होशियार तथा चतुर हो इसलिए तुम्हें अध्यक्ष बनाया है।
  • चंचल सुनकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ।फिर श्यामसुन्दर ने कहा कि दूसरे नगर की गणित के छात्र-छात्राओं से गणित प्रतियोगिता है।उनको टक्कर तुम ही दे सकते हो।
  • हमने निश्चय किया है कि तुम उनके गणित के प्रश्नों के उत्तर दे सकते हो।हम जीत गए तो हमें इनाम मिलेगा साथ ही तुम्हारी प्रसिद्धि कॉलेज से बाहर अन्य नगर में भी फैल जाएगी।तुम्हारी प्रतिभा का लोहा दूर-दूर के छात्र-छात्रा मानने लगेंगे।चंचल ने हां कर दी।
  • दोनों विश्वविद्यालय के छात्रों ने मिलकर शास्त्रार्थ करने का दिन निश्चित कर दिया।चंचल घमण्ड में फूला हुआ था।उसने शास्त्रार्थ की कोई तैयारी नहीं की।निश्चित दिन दूसरे विद्यालय का छात्र शास्त्रार्थ करने आ गया।उसने कड़ी मेहनत की थी।उसके चेहरे पर तेज झलक रहा था तथा उसमें पूर्ण आत्म-विश्वास झलक रहा था।गणित प्रतियोगिता प्रारंभ हुई।दूसरे महाविद्यालय के छात्र ने गणित के ऐसे तीखे-तीखे प्रश्न पूछे थे जो चंचल ने सुने ही नहीं थे,उसका सर पूरी तरह चकरा गया।चेहरा बिल्कुल उतर गया।उसने समझ लिया कि उसे फंसाया गया है।परंतु अब क्या कर सकता था? पीछे हटने पर बदनामी होती तथा सारे नगर में उसकी हार का ढिंढोरा पीटा जाता।जब चंचल किसी सवाल व प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाया तो दूसरे महाविद्यालय के छात्र को विजयी घोषित करके इनाम दे दिया गया।चंचल का अहंकार जाता रहा तथा उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।उसने समझ लिया कि अहंकार की दलदल में वह फंस चुका है।
  • सारांश यह कि ज्ञान और विद्या पाकर अहंकार नहीं करना चाहिए।अपने से छोटे,बड़ों और बराबर वालों से विनम्रता पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।अहंकारी चंचल से उसी के महाविद्यालय के छात्र-छात्राएं दुखी हो गए तो उनकी बुद्धि और छल से चंचल को हार का मुंह देखना पड़ा और अपमानित हुआ वह अलग।उसने अपनी प्रसिद्धि फैलने की आस में भला-बुरा सोचने की शक्ति नहीं रही थी।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में अहंकार क्या है? (What is proud in Hindi),अहंकार से कैसे मुक्त हों? (How to free from proud?) के बारे में बताया गया है।
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