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Culture of Romance and Lust

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1.रोमांस व वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust),उच्च शिक्षा में रोमांस एवं वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust in Higher Education):

  • रोमांस व वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust) शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालयों,महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है।कोई समय था जब भारत में नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में शिक्षा अर्जित करने में छात्र-छात्राओं को ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था।शिक्षा को बेचना अपराध समझा जाता था।शिक्षा तपोनिष्ठ,चरित्रवान,सदाचारी आचार्यों द्वारा प्रदान की जाती थी जो छात्र-छात्राओं के प्रति मन-वचन एवं कर्म से समर्पित होकर विद्यादान करते थे।एक ऐसा दान जो मानवता और मानव समाज को सहज-सतत-सर्वांगीण विकास की ओर बढ़ते रहने की ऊर्जा देता रहे।
  • इसी देश में आज शिक्षा का स्तर,आचार्यों का स्तर,छात्र-छात्राओं का स्तर रसातल में पहुंच गया है कि इन शिक्षा मंदिरों में छात्र-छात्राएं वासना की पूर्ति के लिए जुगत भिड़ाते रहते हैं।आए दिन घर छोड़कर भाग जाते हैं।आचार्य शिष्याओं से प्रेमलाप करते हुए पाए जाते हैं।दोष किसका है शिक्षा प्रणाली का,आचार्यों का,माता-पिता का,समाज का या धर्माचार्यों का।
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2.रोमांस व वासना का कल्चर पनपने का कारण (Reason for the Development of Romance and Lust culture):

  • आधुनिक शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले इन शिक्षण संस्थानों में रोमांस,वासना,प्रेमालाप,मैथुनेच्छा तथा सेक्स के प्रति नई पीढ़ी के आकर्षित और संलग्न होने के कुछ कारण हैं:(1.)शिक्षा प्रणाली में नैतिकता,सदाचरण,आध्यात्मिक शिक्षा का अभाव (2.) नवधनाढ्य वर्ग के पास अकूत धन जमा होना (3.) मौजूदा दौर में प्राथमिकताओं का बदल जाना (4.)पश्चिमी जीवन शैली का प्रभाव (5.)बच्चों का जल्दी परिपक्व हो जाना (6.)माता-पिता,अविभावक,समाज तथा धार्मिक व आध्यात्मिक संगठनों द्वारा बच्चों को सदाचरण,नैतिकता की शिक्षा न देना,अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक न रहना (7.)फिल्मों,टीवी,मोबाइल आदि का दुष्प्रभाव।
  • प्रश्न है शिक्षा प्रणाली जीवन्त थोड़े ही है जो बच्चों को बिगाड़ रही है।वस्तुतः जैसी शिक्षा प्रणाली होती है उसी विषयवस्तु को आचार्य,अध्यापक तथा शिक्षा संस्थान पढ़ाने का प्रयास करते हैं,वैसी शिक्षा को जीवंत करने का वे प्रयास करते हैं।वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिकता,सदाचार,धार्मिक व आध्यात्मिक शिक्षा का अभाव है इसीलिए नवयुवा,छात्र-छात्राएं भटक रहे हैं।
  • वर्तमान शिक्षा प्रणाली दिशाहीन और निरुद्देश्य है।इस शिक्षा प्रणाली ने ही बच्चों को इस हालत में पहुंचाया है।उनके चारित्रिक विकास के बजाय चारित्रिक पतन होता जा रहा है।यह शिक्षा प्रणाली कागज की नाव सिद्ध हो रही है और कागज की नाव जीवन नैया का काम नहीं कर सकती है,संसार सागर में डुबो जरूर सकती है और डुबो ही रही है।ऐसे नवयुवकों ने,माता-पिता,आचार्यों ने,समाज ने इस हकीकत से आँखें मूँद रखी है और भुगत रहा है पूरा देश,समाज।
  • आज के भोगवादी एवं अर्थप्रधान युग में अधिकांश युवक-युवतियां एक-दूसरे को भोगने में दिलचस्पी लेते हैं।इसके लिए वे कुछ भी करने के लिए तैयार हैं,अपने आदर्श और सिद्धांतों को छोड़कर वे भेड़चाल में शामिल हो रहे हैं।अपनी उन्नति,विकास और प्रगति के लिए वे इसी राह पर चलना ही ठीक समझते हैं।लेकिन रोमांस और वासना की इस दलदल में चलने पर युवक-युवतियों को निराशा,कुंठा,जिल्लत और असफलता ही हाथ लगती है।इस रास्ते पर चलकर न केवल उनका भविष्य चौपट हो जाता है बल्कि अपने संगी-साथी का भविष्य भी चौपट कर देता है।चरित्रवान,सदाचारी बनने के लिए सही रास्ते पर चलना होगा।रोमांस,सेक्स व वासना की तरफ से ध्यान हटाना होगा।

3.सेक्स-फन प्रवृत्ति का दृश्य (View of the Sex-fun Trend):

  • दृश्य एक:एक युवक-युवती कॉलेज परिसर के बाहर खड़े होते हैं।तभी नेशनल हाईवे के उस कॉलेज कैंपस के पास आकर बस रूकती है।परिचालक पूछता है कहां जाना है? उत्तर मिलता है मेडिकल स्टोर।बस में सवार एक अजनबी ने पूछा यहां आस-पास कहां है मेडिकल स्टोर।परिचालक ने शराब की दुकान की ओर इशारा करते हुए कहा,यह है इनका मेडिकल स्टोर (शराब की दुकान का कोड वर्ड)।दोनों युवक-युवती शराब की दुकान के पास उतर जाते हैं।युवक युवती के कमर में हाथ डाले शराब की दुकान पर जाते हैं।वहाँ दोनों जमकर अंग्रेजी वाइन (शराब) पीते हैं।इतनी पी लेते हैं कि कदम लड़खड़ाने लगते हैं।युवक युवती को संभालकर लेकर आता है।हॉस्टल में सेक्स का लुत्फ उठाते हैं और रोजाना उनकी यही दिनचर्या रहती है।परीक्षा में आचार्य नकल करवा कर उत्तीर्ण करा देते हैं और इस प्रकार उन्हें डिग्री हासिल हो जाती है।
  • दृश्य दो:युवक और युवती कॉलेज परिसर में आमने-सामने पड़ जाते हैं।अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई कर रही युवती खुद आगे बढ़कर युवक को अपना परिचय देती है और बिना कोई भूमिका बांधे युवक के साथ सप्ताहांत साथ बिताने (लिव इन रिलेशनशिप) का प्रस्ताव रखती है।युवक बेझिझक प्रस्ताव मंजूर कर लेता है,लेकिन अगले सप्ताह के लिए।वह कहता है-इस सप्ताह पहले से मेरी किसी के साथ ‘डेट’ (किसी पुरुष और स्त्री द्वारा साथ-साथ समय बिताने के लिए पहले से नियत किया गया दिन) है।युवती को कोई एतराज नहीं है।वह जवाब देती है:दैट्स ग्रेट,आई विल हैव सम मोर टाइम विद माय ओल्ड बॉयफ्रेंड (बहुत अच्छा मैं अपने पुराने बॉयफ्रेंड के साथ कुछ ओर वक्त बिता सकूंगी)।
  • इस प्रेम कहानी में न तो पेड़ों के झुरमुट के नीचे मीठी-मीठी बातें करने के प्रसंग हैं और न ही सालों तक लिखे जाने वाले लम्बे-लम्बे प्रेम पत्रों का सिलसिला।बस एक चीज है-जो पसंद आया,उसके साथ झटपट वक्त बिता लेने,लम्हों को जी लेने और एक-दूसरे को भोग लेने की लालसा।यह किसी उपन्यास या कहानी का प्लॉट नहीं है और न ही किसी मुंबईया फिल्म का कथानक है।ये दृश्य उस सच्चाई का हिस्सा है,जिसे आज के तथाकथित प्रगतिशील व आधुनिक कहे जाने वाले परिवारों के युवक और किशोर महानगरों के हाई-फाई कॉलेजों में जी रहे हैं और अब यह अपसंस्कृति दिल्ली,मुंबई,मद्रास,कोलकाता और बेंगलुरु जैसे महानगरों की सीमा को लांघकर अपेक्षाकृत छोटे शहरों,गांव व कस्बों में भी पांव पसार चुकी है।
  • ग़ौरतलब है कि उपर्युक्त युवती की जिंदगी में शामिल दोनों युवक जानते हैं कि उस लड़की के जीवन में उनके अलावा कोई ओर भी है,पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।उन्हें इस बात का भी एहसास है कि कल उनकी जगह कोई तीसरा ले सकता है,लेकिन उनके लिए ये सारी चीज बेमायने हैं क्योंकि इस पीढ़ी के लिए प्रेम ‘फीलिंग’ (अनुभूति) नहीं ‘फन’ (वासना) है।इसीलिए सेक्स को लेकर भी उनके मन में कोई हिचक नहीं है।वे यह सुख पाने के लिए यौवन के पड़ाव तक पहुंचने का इंतजार करने को तैयार नहीं है।
  • एक सर्वे में पाया गया कि इस उम्र में छात्र न केवल विवाह पूर्व सेक्स संबंधों में लिप्त है,बल्कि वे बड़ी बेशर्मी से सेक्स,जुए और शराब के बारे में अपने नजरिये का इजहार भी करते हैं।इस बिगड़ैल पीढ़ी की एक 13 साल की लड़की का कहना है, “मैं सेक्स का आनंद लेने के लिए बड़ा होने का इंतजार क्यों करूं? इसमें आनंद मिलता है।मुझे यह सुख अभी पा लेने दें।” दिल्ली के एक हाई-फाई स्कूल के छात्र का कहना था, “मुझे अच्छा खाना,अच्छे कॉमिक्स और सेक्सी लड़कियां पसंद हैं।”सेक्स के बारे में नई पीढ़ी के बदलते नजरिये के कारण हमने ऊपर उल्लेख कर दिया है।

4.शिक्षा प्रणाली में बदलाव आवश्यक (Changes Needed in Education System):

  • बच्चों,किशोरों और नवयुवकों पर चढ़े रोमांस,वासना और यौन उत्तेजना से हर प्रबुद्ध वर्ग वाकिफ है।कम उम्र में सेक्स संबंध के कारण कई बच्चे मानसिक संतुलन खो सकते हैं।कईयों को निरंतर हताश,निराशा,कुंठा और जिल्लत मनःस्थिति का शिकार बनना पड़ सकता है।माता-पिता,अभिभावक,आचार्य,धर्माचार्य,समाज तथा प्रबुद्ध वर्ग चाहे जितनी ही चिंता जताएं,जब तक समाज पर ‘खाओ,पियो और मौज उड़ाओ’ संस्कृति का प्रभाव बरकरार है,तब तक बाल,किशोर व युवक-युवतियों के मनोविज्ञान में किसी सकारात्मक परिवर्तन की उम्मीद नहीं दिखती।
  • यह परिवर्तन शिक्षा प्रणाली के द्वारा ही संभव है।किसी भी व्यक्ति,बच्चे-बच्चियों की मानसिकता में परिवर्तन लाने के लिए शिक्षा पहले पायदान का काम करती है।
  • प्राचीन काल में शिक्षा के द्वारा चरित्रवान व सदाचारी युवक-युवतियों का निर्माण होता था।यदि कुछ बच्चे शिक्षा अर्जित नहीं करते थे तो माता-पिता,अभिभावक किस्से-कहानियों के द्वारा उनके चरित्र का निर्माण किया जाता था।परंतु आज के माता-पिता के पास बच्चों के निर्माण के लिए समय नहीं है।न वे स्वयं सदाचारी,चरित्रवान हैं जिसका प्रभाव बच्चों पर पड़े।कई माता-पिता सामाजिक कार्यों,क्लबों और अनेक संस्थाओं से जुड़े रहकर अपने शौक पूरे करने में व्यस्त रहते हैं।वे समाज और देश का तथाकथित कल्याण करने में व्यस्त रहते हैं और उनके बच्चों का दूसरे ढंग का कल्याण हो जाता है।इस तरह शिक्षा प्रणाली,आचार्यों,सरकार के साथ-साथ बच्चों की दुर्दशा के लिए माता-पिता भी जिम्मेदार हैं क्योंकि बच्चों को सरकार ने पैदा नहीं किए हैं और न सरकार बच्चों का पालन पोषण करती है।
  • पिछले 75 सालों में आजाद भारत में ऐसी कुछ भी कोशिश नहीं की गई कि देश के भावी नागरिक इन बच्चों को सही दिशा दी जाती जो उनके जीवन के हर क्षेत्र में व्यावहारिक रूप से उपयोगी सिद्ध होती।आज जो स्कूल कॉलेज में सिखाया जाता है वह व्यावहारिक जीवन में काम नहीं आता और जो व्यावहारिक जीवन में काम आता है वह किसी स्कूल में नहीं सिखाया जाता।
    आज नवयुवक-युवतियां जिस दिशा में अग्रसर है,उनको रोमांस,सेक्स तथा वासना के अलावा ओर कुछ दिखाई ही नहीं देता है,इसके लिए केवल वे ही जिम्मेदार नहीं है बल्कि उनके माता-पिता और देश के नेता जिम्मेदार हैं जो सरकार में है तथा अपने आपको देशसेवक,देशभक्त और देश के संरक्षक समझते हैं।आधुनिक युग में देश के जो नागरिक होने वाले हैं उनकी दुर्दशा के लिए देश की शिक्षा प्रणाली जिम्मेदार है जिसने बच्चों को यही नहीं सिखाया कि उनके लिए क्या हितकारी है और क्या हानिकारक है?
  • लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली के परिणाम अब सामने आ रहे हैं।शिक्षा प्रणाली में बदलाव के परिणाम लंबे समय बाद जाकर मालूम पड़ते हैं।हमारा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम को नैतिकता,सदाचारयुक्त,चारित्रिक,धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा से भर दिया जाए।परंतु नैतिकता,व्यावहारिक,चारित्रिक,आध्यात्मिक शिक्षा का थोड़ा-बहुत समावेश तो होना ही चाहिए।जैसे नमक के बिना रोटी बेस्वाद लगती है और ज्यादा नमक हो तो रोटी खारी लगती है।आज शिक्षा में कोई बदलाव किया जाएगा तो इसके बदलाव लंबे समय बाद जाकर मालूम पड़ेंगे।दरअसल आज पूरे देश का पोस्टमार्टम करने की जरूरत है वरना देश रसातल में पहुंच गया है।आज शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ,आचार्यों,माता-पिता,अविभावक,समाज,धर्माचार्यों,धर्मोंपदेशकों,टीवी के कर्ताधर्ता,फिल्मकारों तथा सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।सबसे पहले स्वयं को बदलना होगा तभी बच्चों में बदलाव किया जा सकेगा,चरित्र का निर्माण किया जा सकेगा।

5.माता-पिता क्या करें? (What Do Parents Do?):

  • बच्चा मां की गोद में आँखें खोलता है,माँ से बोलना सीखता है इसीलिए उसकी भाषा को मातृभाषा कहा जाता है फिर बच्चा बाप की अँगुली पड़कर बाहर निकलता है और मां-बाप की छत्रछाया में दुनिया देखता है,दुनियादारी सीखता है और एक दिन अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है।इस तरह बच्चे की मां,उसकी पहली गुरु होती है,पिता दूसरा गुरु होता है फिर बाद में शिक्षा देने वाले गुरु या गुरुवर्ग का नंबर आता है।
  • माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को अच्छे और बुरे का ज्ञान दें,हितकारी और अहितकारी के बारे में समझाएं,अच्छा व्यक्ति बनने के गुणों की शिक्षा देने के साथ ही साथ बुराइयों और बुरे कामों के प्रति सावधान भी कर दें ताकि बच्चे अनजाने में,भोलेपन और कौतूहल की भावना में बुरी हरकतें न करने लगें।माता-पिता को अपने मन से इस मानसिकता को निकाल देना चाहिए कि वे काम-काज की व्यस्तता के कारण बच्चों को समय नहीं दे पाते।उन्हें अपनी दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर बच्चों को देना ही होगा,बच्चों के साथ समय बिताना ही होगा।आपकी उचित प्रेरणा व मार्गदर्शन से ही बच्चा आगे बढ़ सकेगा।
    हमें यह समझ लेना चाहिए कि भारत चरित्रवान,सदाचारी,नैतिक युवकों से महान् बन सकता है।केवल मेरा भारत महान् कहने से काम नहीं चलेगा।भारत तो महान् है ही क्योंकि हाथी कितना भी दुबला हो जाए भैंसे से तो तगड़ा और बड़ा ही रहेगा।भारत महान् है,अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के कारण आज की बिगड़ैल पीढ़ी,अपराधी,दुराचारी पीढ़ी के कारण नहीं।पश्चिम रहन-सहन और मूल संस्कृति को भूलकर विदेशी सभ्यता की नकल करके बहुरूपिया बनने के कारण नहीं।दरअसल आज भारत आज के भारतवासियों के कारण महान् नहीं है बल्कि कई मानों में तो बाहर के कई देश भारत से ज्यादा महान् हैं।
  • भारतवासियों के कारण तो भारत तभी महान कहा जा सकेगा जब भारतवासियों में उत्तम चरित्र होगा,राष्ट्रभक्ति होगी,मानवीय उत्तम गुण होंगे जिसके कारण आज भी भारतीय संस्कृति प्राचीन और श्रेष्ठ मानी जाती है।
    उपर्युक्त आर्टिकल में रोमांस व वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust),उच्च शिक्षा में रोमांस एवं वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust in Higher Education) के बारे में बताया गया है।

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6.गणित पढ़ाने का सही स्थान (हास्य-व्यंग्य) (Right Place to Teach Mathematics) (Humour-Satire):

  • छात्र (गणित शिक्षक से):जी,मुझे किसी ऐसी जगह गणित पढ़ाओ जहां जरा भी भीड़-भाड़ व शोर-शराबा,हो-हल्ला न हो।
    गणित शिक्षक:ऐसी जगह तो जंगल में ही मिल सकेगी।

7.रोमांस व वासना का कल्चर (Frequently Asked Questions Related to Culture of Romance and Lust),उच्च शिक्षा में रोमांस एवं वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust in Higher Education) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.तीन एम से क्या तात्पर्य है? (What Do You Mean by 3M?):

उत्तर:तीन एम से तात्पर्य है:मनी,मसल और मोटर कार (दौलत,सुगठित शरीर और कार)।आजकल की फैशनपरस्त लड़कियों को तीन ‘एम’ की चाह होती है।अगर आपके पास मोटरसाइकिल है तो कोई भी लड़की आपको ‘डेट’ देने के लिए तैयार हो सकती है।अगर आपके पास कार है तो आप ‘कुछ’ ओर भी उम्मीद कर सकते हैं।इस बात में कुछ सचाई भी लगती है।बहुत सी छात्राएं धनी घरों के लड़कों से दोस्ती करना चाहती है क्योंकि उनसे हर महीने कीमती तोहफे मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

प्रश्न:2.क्या आजकल के युवक-युवतियों में वफादारी है? (Do Young Men and Women Have Loyalty?):

उत्तर:आजकल के युवक-युवतियां अटैच होना नहीं चाहते।उनका मकसद केवल अच्छी तरह वक्त बिताना होता है।प्राचीन समय में नारी-पुरुष के रिश्तों में वफादारी सबसे अहम चीज होती थी लेकिन आज के दौर की बात ही अलग है।आजकल के लड़के-लड़कियों के रिश्ते एक सप्ताह में ही खत्म हो जाते हैं।अगले सप्ताह उन्हें दूसरी गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड मिल जाते हैं।आजकल के युवक-युवतियों के मध्य कमिटमेंट (वचनबद्धता) जैसी कोई चीज नहीं है।

प्रश्न:3.आजकल के युवक-युवतियों के नजरिए में क्या बदलाव दिखाई देता है? (What Changes Do You See in the Attitudes of Young Men and Women Today?):

उत्तर:आजकल के युवक-युवतियों के पास धन की कमी नहीं है किशोर-किशोरियों के लिए प्रेम अब एक शगल का रूप ले चुका है।जहां लोक-मर्यादाओं के लिए कोई स्थान नहीं और न एक-दूसरे के साथ निभाने की कोई सात्विक शर्त।यह स्वेच्छाचारिता नई नस्ल को पतन की ओर धकेल रही है।प्रेम और सेक्स के बारे में युवा पीढ़ी के बदलते नजरिए की एक वजह तरक्की पाने के लिए चल रही चूहा दौड़ है।आज के युवकों और किशोर पर करियर बनाने की धुन कुछ इस तरह सवार है कि जज्बात,मोहब्बत और वफादारी जैसी चीजों के लिए उसके पास न तो वक्त है और न ही ऊर्जा।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा रोमांस व वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust),उच्च शिक्षा में रोमांस एवं वासना का कल्चर (Culture of Romance and Lust in Higher Education) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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