7Keynote for Using Adversity in Growth
1.प्रतिकूलताओं का उपयोग विकास में करने के 7 मूलमंत्र (7Keynote for Using Adversity in Growth):
- प्रतिकूलताओं का उपयोग विकास में करने के 7 मूलमंत्र (7Keynote for Using Adversity in Growth) के द्वारा जानिए की प्रतिकूलताएँ हमारे लिए कितना जरूरी है? हमारे व्यक्तित्व के विकास और उन्नति के लिए प्रतिकूलताएँ वरदान हैं।
2.छात्र-छात्राएं प्रतिकूलताओं का सामना करें (Students should face adversity):
- एक दृष्टिकोण से प्रतिकूलताओं का आना हमारे लिए अच्छा है।ये हमें बताती हैं कि हम क्या हैं और क्या बनना चाहिए।हर विद्यार्थी और गणितज्ञों व वैज्ञानिकों के जीवन में प्रतिकूलताएं आयी हैं और उन पर विजय पाने पर ही वे महान बने हैं।प्रतिकूलताओं पर “How Do Students Cope with Adversity” लेख पहले भी लिखा है।इसमें विस्तार से दृष्टांत के द्वारा समझाया गया है कि प्रतिकूलताओं से युक्त विद्यार्थी का जीवन ही सार्थक है।जैसे नमक के बिना रोटी खारी लगती है इसी प्रकार विद्यार्थी का जीवन सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन में मिठास नहीं आता है।
- प्रतिकूलताओं का डटकर मुकाबला करने पर ही विजयी हुआ जा सकता है।विषमताएं (Oddities),कठिनाइयां (Difficulties) प्रत्येक विद्यार्थी के जीवन में आती हैं,इनसे बचना संभव नहीं है।
- किसी विद्यार्थी के पास स्कूल की फीस जमा कराने की सामर्थ्य नहीं है,कोई विद्यार्थी कोचिंग करने में सक्षम नहीं है।किसी विद्यार्थी के नगर,कस्बे में उम्दा श्रेणी के स्कूल,कॉलेज नहीं हैं।कहीं पर योग्य टीचर्स नहीं हैं आदि।
- जीवन में सुख-दुःख,संपत्ति-विपत्ति का चक्र सदैव घूमता रहता है।यदि जीवन एकरस ही रहे तो जीवन अपना अर्थ ही खो देगा।संपूर्ण विकास के लिए,दोनों की समान रूप से आवश्यकता व उपयोगिता है।
- जीवन के कुछ नियम है,जिनके आधार पर संसार चलता है।प्रतिकूलताएँ जीवन-प्रवाह का एक सहज-स्वाभाविक क्रम है,जो आती हैं,कुछ देर रुकती हैं और बहकर चली जाती हैं।
- मनोविज्ञान जेम्स का कथन है कि ‘यह संभव नहीं है कि सदा अनुकूलता ही बनी रहे प्रतिकूलता न आएं।’दिन का कितना ही महत्त्व क्यों ना हो,परंतु उसका अवसान रात्रि काल में होता ही है,परंतु मनुष्य इस स्वाभाविक प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर पाता।अनुकूल परिस्थितियों में सुख का अनुभव करता (Experiencing happiness under favorable conditions) है और प्रतिकूल परिस्थिति में दुःख-पीड़ा का अनुभव करता है।
- वह जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चाहता है;जबकि यह संभव नहीं होता।परिस्थितियाँ इच्छानुरूप नहीं मिलतीं।कुछ मिलती हैं,कुछ नहीं मिलतीं।मनुष्य के व्यक्तित्व में बहुत कठोरता है।वह अपनी वैचारिक धारणाओं,मान्यताओं को परिवर्तित नहीं करना चाहता।वह सोचता है,जो मैंने सीखा है,वही सही है,जो इसके विपरीत है,वह गलत है।वह परिस्थितियों के प्रति नकारात्मक होता है;जबकि जीवन को नदी की भांति बहना चाहिए।
- वसुंधरा हमारी माता है,वह हमेशा सदैव ऐसी परिस्थितियाँ प्रदान करती है,ताकि हमारा विकास हो।हेगल कहता है-“विषम परिस्थितियाँ क्षमताओं को चुनौती देती हैं,इससे द्वन्द्व उत्पन्न होता है,जिससे संघर्ष करके विकास होता है।”
- यदि प्रतिकूलताओं के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक (positive outlook) रहे,लक्ष्य स्पष्ट हो,जूझने की क्षमता हो तो इससे व्यक्ति की आंतरिक शक्तियों का जागरण व विकास होता है,दस वर्ष में प्राप्त होने वाली उपलब्धि एक ही वर्ष में प्राप्त हो जाती है।प्रतिकूलताओं में चित्त का तीव्रता से परिष्कार होता है।
जीवात्मा अपने कर्मों का क्षय करने के लिए स्वयं को प्रतिकूलताओं में डाल देती है और इसीलिए कहा गया है:दुःख भगवान के हाथ का हथौड़ा है।इन्हीं से मनुष्य का विकास होता है।
3.प्रतिकूलताओं में सत्यम कोचिंग सेंटर का अनुभव (Experience of Satyam Coaching Centre Against Adversity):
- मनुष्य को परिस्थितियों का उपयोग करना नहीं आता; जबकि बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी अच्छी संभावनाएँ निहित होती हैं।
सत्यम कोचिंग सेंटर (Satyam coaching Centre Jaipur) में हमारा अनुभव रहा है कि केवल परिस्थितियों के सदुपयोग की कला आनी चाहिए।जिस प्रकार एक विद्यार्थी 90% पाकर खुश है कि भगवान ने उस पर बहुत कृपा करी है,जबकि दूसरा विद्यार्थी 90% पाकर नाखुश है क्योंकि उसको 96 प्रतिशत अंक प्राप्त नहीं हुए। - जीवन भी इसी तरह से होता है।विवेकवान व्यक्ति जीवन रूपी परीक्षा में प्राप्त हुई चीजों (अंको) को देखते हैं और पसंद रहते हैं;जबकि अन्य प्राप्त ना हुई चीजों (अप्राप्त अंकों) को देख-देख कर रोते कल्पते रहते हैं।
- विवेकवान व साहसी व्यक्ति प्रतिकूलताओं को अपने लिए वरदान बना लेते हैं,इसके विपरीत कायर व भीरु व्यक्ति प्रतिकूलताएं आने पर यही कहते देखे जाते हैं:’ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?’ उनके लिए प्रतिकूलताएं अभिशाप (Curse) बनकर बरसती हैं,कठिनाइयां नहीं,वरन् उनके प्रति भय ही उन्हें समाप्त कर देता है और वे जीवन का दाँव हार जाते हैं।इसके अतिरिक्त जिन व्यक्तियों का जीवन सुख-सुविधाओं (facilities) से पूर्ण होता है,जीवन में कोई बड़ी कठिनाई नहीं आती है तो वह व्यक्ति वृद्ध होकर भी बच्चा ही बना रहता है।
- अल्फ्रेड एडलर के अनुसार व्यक्तित्व के विकास (Development of Personality) में कठिनाइयों,प्रतिकूलताओं का होना आवश्यक है।अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘लाइफ शुड मीन टू यु’ में उन्होंने लिखा है कि ‘यदि हम किसी ऐसे व्यक्ति अथवा मानव समाज के विषय में कल्पना करें कि वे इस स्थिति में पहुंच गए हैं,जहां अब कोई कठिनाई नहीं रही तो हमारे विचार से ऐसे वातावरण में मनुष्य का विकास रुक जाएगा और जीवन बदसूरत हो जाएगा।’
- दुनिया में सम्भवतः ही कोई ऐसा व्यक्ति हो,जिसने संघर्ष नहीं किया हो और उसे कोई विशेष उपलब्धि या सफलता यों ही प्राप्त हो गई हो।प्रतिकूलताएं ही आन्तरिक शक्तियों का विकास कर महानता की प्राप्ति का राजमार्ग प्रशस्त करती है।जो लक्ष्य (aim) सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाए,बिना किसी कष्ट-कठिनाई के,वह लक्ष्य ही क्या? वह लक्ष्य महत्त्वहीन ही रहेगा,ना तो उसके प्राप्त होने पर आनन्दानुभूति होगी और न आत्मगौरव का एहसास।
- वस्तुतः जीवन फूलों की सेज नहीं,वरन् रणभूमि है,चुनौतियों की श्रृंखला है,जहाँ प्रतिकूलताओं का सामना करना ही पड़ेगा।
- प्रतिकूलताओं को अपने लिए सीढ़ी बना लेना चाहिए,चट्टान नहीं।प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर घबराने,भयभीत होने के बजाय इन्हें सहज रूप से स्वीकार करते हुए आत्मविश्वास व भगवत् विश्वास का संबल लेकर स्वयं को सतत प्रेरणा देते हुए,संदेह व भ्रमों की उपेक्षा करके इनसे जूझते हुए इनका उपयोग अपने विकास में करना चाहिए।जिसे एक बार जीवन में प्रतिकूलता का स्वाद प्राप्त हो जाता है,वह जीवन में सुखों की इच्छा नहीं करता।
- कठिनाइयों से जूझने पर मनुष्य फौलाद जैसा बन जाता है।जितने भी महान् गणितज्ञ और वैज्ञानिक हुए हैं वे दुनिया से कटकर प्रयोगशाला में एकांत में रहकर,प्रतिकूल परिस्थितियों को सहते हुए खोज कार्य में लगे रहते हैं।कठिनाइयों से जूझने के लिए “7 Spells of Dealings With Difficulties” लेख में बताया है कि ऐसे व्यक्ति मनोबल नहीं खोते हैं,हिम्मत नहीं हारते और धैर्य बनाएं रखते हैं।
4.कठिनाइयों को हैन्डल करें (Handle difficulties):
- (1.)कोई भी विद्यार्थी अपनी आंतरिक शक्तियों के परिणाम को उस समय तक नहीं जान सकता,जब तक कि किसी कठिन प्रसंग के समय या भारी विपत्ति में उसकी परीक्षा ना हो जाए।
- (2.)विद्यार्थी कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें पर फिर भी अपनी संपूर्ण आंतरिक शक्तियों को नहीं जान पाता है।जब तक किसी बड़ी आपत्ति,हानि अथवा शोक में उनकी परीक्षा नहीं हो जाती,तब तक वे यह नहीं बता सकते कि वे कितनी बड़ी कठिनाई का सामना कर सकते हैं और बड़ी आपत्ति के आ जाने पर वे कितनी वीरता दिखा सकते हैं।
- (3.)यदि तुम अपने ऊपर जिम्मेदारी लेना ही नहीं चाहते और यदि आराम की जिंदगी पसन्द करते हो और अध्ययन की कठिनाइयों और झंझटों को किसी दूसरे पर डालना चाहते हो,तो तुम भले ही गुलामी करते रहो,परंतु यदि तुम अपनी शक्ति से यथासंभव अधिक काम लेना चाहते और तुम्हारा उद्देश्य अपनी योग्यता की अधिक से अधिक वृद्धि करना है तो तुम उस समय तक अपने उद्देश्य की अच्छी तरह पूर्ति नहीं कर सकते,जब तक कि तुम केवल किसी दूसरे के बताए हुए मार्ग पर चलते रहोगे और सब काम उसी के विचारों के अनुसार करते रहोगे।
- (4.)अपने ऊपर भरोसा करने से डरो मत।प्रत्येक विद्यार्थी में नए कामों को करने की कुछ ना कुछ योग्यता होती है और आत्मविश्वास से इस योग्यता का विकास होता है।
5.कठिनाइयाँ हमारी सहायक भी तो हैं (Difficulties are also our helpers):
- (1.)हमें भगवान ने उतनी ही शक्ति दी है,जितनी की किसी अन्य विद्यार्थी को।जिस समस्या को दूसरे पार कर चुके हैं,उसे हम क्यों पार नहीं कर सकते हैं? कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी को एक ही तरीके से अध्यापक समझाता है।समस्या का हल करना विद्यार्थी की अपनी सूझबूझ और योग्यता का काम है।
- सभी विद्यार्थी अनंत शक्ति लेकर इस धरती पर पैदा हुए हैं।परंतु केवल पहचानने,भरोसा करने और उसके सदुपयोग का है।जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है,वे अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सदुपयोग करके कठिन से कठिन मंजिल को पार कर लेते हैं।
- (2.)हम व्यर्थ ही कठिनाई या समस्या उपस्थित होने पर रोते हैं।अपने भाग्य या भगवान को कोसते हैं।विपरीतता,समस्याएं तो पृथ्वी माता की प्रक्रिया है,भगवान का वरदान है,जिससे हम सचेष्ट होते हैं,जीवन की शक्तियों को उपयोग में लाते हैं और इससे सुखद और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है।
- कोई कठिनाई न हो तो हम प्यार करते हैं,किंतु कठिनाई में रोते हैं,चिंता,शोक में डूब जाते हैं।यह हमारे एकांकी दृष्टिकोण और अज्ञान का परिणाम है।कठिनाई की तरह,कठिनाई न आना भी जीवन का अभिन्न पहलू है।यदि कठिनाई ना रहे,तो हम कठिनाई से मुक्त जीवन से ऊब जाएंगे।कठिनाई मुक्त जीवन के नशे में एक दूसरे का नाश कर देंगे।इतना ही नहीं कठिनाई मुक्त जीवन का मूल्य ही नहीं समझ सकेंगे।रात्रि के अस्तित्व में दिन का महत्त्व है।कठिनाई और कठिनाई मुक्त जीवन का क्रम चलता ही रहता है।
- (3.)शांत,स्थिर,दृढ़ रहकर अपने कर्त्तव्य में लगे रहें।फिर आप विचलित नहीं होंगे।
- (4.)कठिनाइयों में धर्म और अध्यवसाय का अवलम्ब लीजिए।जिसमें धीरज है,जो परिश्रम से पांव पीछे हटाना नहीं जानता,सफलता की देवी उसी के गले में विजय माला पहनाती है।धैर्य प्रारंभ में कड़ुवा भले ही लगे,किंतु उसका फल मधुर होता है।
- (5.)आत्मनिर्भर बनने का और अपने में आत्मविश्वास जाग्रत करने का एक ही गुरुमंत्र है आप अपने जीवन में कठिनाइयों को आने दीजिए,दूसरों के दुःख तकलीफ और मुसीबतों में हाथ बँटाइए।दूसरों की सहायता कीजिए और भगवान आपकी सहायता करेगा।
6.विपत्तियों को कैसे जीतें? (How to conquer adversities?):
- (1.)विद्यार्थी दूसरों के कष्टों को समझेगा और अनुभव करेगा तो मालूम होगा कि बहुत से अन्य विद्यार्थियों से उच्च स्थिति में है।ऐसा दृष्टिकोण बना लेने से कठिनाई और कष्ट-तकलीफ की परिस्थितियाँ टल जाएँगी और अपने पीछे सफलता की राह बना जाएँगी।
- (2.)कठिनाइयां छोटे विद्यार्थियो को निस्तेज निष्प्राण बना सकती हैं,किन्तु महान् वे हैं,जो कष्टों तकलीफों की छाया में पलते हैं,औरों के कष्ट-तकलीफों में हाथ बँटाते हैं।पुरुषार्थ भी इसी का नाम है कि विद्यार्थी परिस्थितियों से संघर्ष करें।
- (3.)जगत में आकर जो पुरुषार्थी एवं आत्मविश्वासी विद्यार्थी अपनी पात्रता की वृद्धि कर लेते हैं,निश्चय ही वे उसकी कृपा का अधिक अंश पा लेते हैं।अपनी प्रयत्नहीनता को दोष न देकर भगवान को दोष देना अशिष्टता और अपराध है।
- (4.)इसी कारण हम आशा की ओर से अंधे होकर निराशा का हाथ पकड़े हुए जीवन का मार्ग टटोल कर ठोकरे खाते फिरते हैं।अपना हित चाहने वाले विद्यार्थी को भगवान को दोष देने के बजाय उसकी कृपा में कमी खोजने की बजाय अपने निष्क्रिय स्वभाव,अनुपयोगी प्रवृत्ति एवं निराशापूर्ण विश्वासों को दोष दें और अपनी कमियों,त्रुटियों एवं न्यूनताओं की खोज करें और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करें।
- (5.)अनुकूलताओं को गले लगाने और प्रतिकूलताओं से घृणा करने वाला विद्यार्थी जीवन में कभी उन्नति नहीं कर सकता।संसार में एकमात्र अनुकूलताओं की आशा लेकर चलने वाले विद्यार्थी को विफलताओं के क्षेत्र में भटकना पड़ेगा।अपने संपूर्ण मन-मस्तिष्क से जो अनुकूलताओं का ही उपासक बना रहता है और प्रतिकूलताओं के लिए जरा भी स्थान नहीं रखता,उसे यथासंभाव्य प्रतिकूलता के अवसर पर विचलित होकर अस्त-व्यस्त हो जाने के लिए सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए।
7.प्रतिकूलताएँ आवश्यक भी तो हैं (Adversities are also necessary):
- (1.)अनुकूलता में प्रसन्न और प्रतिकूलता में रोने वाले विद्यार्थी झूले की तरह आगे-पीछे जाते हुए एक ही स्थान पर रहते हैं,न आगे बढ़ पाते हैं और न उन्नति कर पाते हैं।
- (2.)भगवान को याद रखते हुए सदैव अपने कर्त्तव्य पालन (अध्ययन) करते रहना।कष्टों,समस्याओं,विपत्तियों (पाठ याद ना होना,सवाल हल ना पाना,टाॅपिक समझ में न आना) से मुक्त रहकर प्रत्येक परिस्थिति में परिपूर्ण रहकर कार्य करता है,वह अवश्य उन्नति के शिखर पर पहुंचता है।
- (3.)यह अहैतुक प्रसन्नता का दृष्टिकोण,भगवान में अडिग विश्वास और संसार के क्रियाकलाप को उसकी ही इच्छा समझने से उपलब्ध हो सकता है।
- (4.)विद्यार्थी जीवन जीवन का प्रारंभिक समय है इसमें सभी कष्टों,समस्याओं का निवारण नहीं हो सकता।कठिनाइयां जीवन का उसी तरह अंग हैं जिस तरह दिन के बाद रात्रि का होना,ऋतुएँ बदलते रहना।अतः आवश्यकता इस बात की है कि कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं को अपने ऊपर हावी न होने दिया जाए और उनके बीच से रास्ता निकाल कर आगे बढ़ते रहा जाए।
- (5.)कठिनाइयों को अपने ऊपर हावी ना होने देने का एक मार्ग व्यस्त रहना है।मनुष्य के व्यस्त रहने से कठिनाइयों के प्रति शोक,चिंता एवं तनाव में डूबने के लिए समय ही नहीं मिलेगा।व्यस्त मनुष्य को आंसू बहाने के लिए भी समय नहीं मिलता है।यह ठीक भी है।जो व्यस्त रहेंगे,उन्हें कठिनाइयों के संबंध में सोच-सोच कर दुःखी होते रहने का अवकाश ही कहाँ मिलेगा? इसके अतिरिक्त उन्हें जीवन का एक सहज क्रम मानकर भी निश्चिंत हुआ जा सकता है।
- निष्कर्ष (Conclusion):विपत्ति एक छात्र के जीवन में एक चक्करदार रास्ता नहीं है;यह पाठ्यक्रम का हिस्सा है।जो स्टूडेंट मुशकिलों से डर कर रुकते नहीं,बल्कि उन्हें अपना स्टेपिंग स्टोन बनाते हैं,वही असली टॉपर बनते हैं।’मुसीबत’ आपकी क्षमता को घटाती नहीं,बल्कि आपके अंदर छुपे हुए ‘लचीलापन’ (झेलने की शक्ति) को बाहर निकालती है.याद रखें,एक शांत समुद्र कभी भी एक कुशल नाविक (कुशल नाविक) नहीं बना सकता।
- उपर्युक्त आर्टिकल में प्रतिकूलताओं का उपयोग विकास में करने के 7 मूलमंत्र (7Keynote for Using Adversity in Growth) के बारे में बताया गया है।
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8.प्रतिकूलताओं का उपयोग विकास में करने के 7 मूलमंत्र (Frequently Asked Questions Related to 7Keynote for Using Adversity in Growth) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.कठिनाई क्यों आती हैं? (Why do difficulties arise?):
उत्तर:विपत्तियों,प्रतिकूलताएँ अथवा कठिनाइयां जीवन का सहज स्वाभाविक क्रम है।वे हमारे व्यक्तित्व और चरित्र को गढ़ने के लिए आती हैं,विद्यार्थी को शिक्षित करने के लिए आती हैं।
प्रश्न:2.कठिनाइयों से बचने का क्या उपाय है? (What are the ways to avoid difficulties?):
उत्तर:धैर्यपूर्वक सहन करने,व्यस्त रहने और विवेकपूर्वक उनका समाधान तथा अपने कर्त्तव्य का पालन करते रहने से कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है।
प्रश्न:3.विद्यार्थी की असली परीक्षा कब होती है? (When is the student’s real exam?):
उत्तर:विद्यार्थी की असली परीक्षा कठिनाइयों का सामना करने पर ही होती है।विद्यार्थी कितना विवेकवान,सिद्धांतवादी है और चरित्रनिष्ठ है,इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजर कर इस तप-तितिक्षा में पककर ही हो पाती है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा प्रतिकूलताओं का उपयोग विकास में करने के 7 मूलमंत्र (7Keynote for Using Adversity in Growth) की बेसिक टर्म्स के बारे में जान सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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