8 Best Technique to Change Perspective
1.रुख बदलने की 8 श्रेष्ठ तकनीक (8 Best Technique to Change Perspective),छात्र रुख कैसे बदलें? (How to Change Student Trend?):
- रुख बदलने की 8 श्रेष्ठ तकनीक (8 Best Technique to Change Perspective) के आधार पर आप जानेंगे कि यहाँ किस प्रकार के रुख बदलने की बात कही जा रही है? रुख दोनों तरफ हो सकता है सही दिशा की ओर और गलत दिशा की ओर।
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2.आनंद प्राप्ति,छात्र का लक्ष्य (Achieving joy is the student’s goal):
- यह सब कुछ ऐसा था जिसे जीवन के विभिन्न अवसरों,परिस्थितियों में रहते समय आपने अनुभव किया होगा।वस्तुतः जो भी कहा गया वह आज की युगीन परिस्थितियों में जीवन जीने वाले सामान्य विद्यार्थी की भोगी हुई हताशा,कुंठा आदि को ध्यान में रखकर ही कहा गया।एक ओर लोगों की श्रद्धा भावना का शोषण करके आडंबरों के माध्यम से परोपजीवी साधु-फकीरों की भीड़ तो दूसरी ओर जीवनलक्ष्य पहचानने की सामर्थ्य प्रदान करने में असमर्थ शिक्षा प्राप्त करके नास्तिक बनती युवा पीढ़ी (विद्यार्थी)।इन दो यथार्थों के बीच किस प्रकार ऐसा जीवन दिया जा सकता है जिसमें आनंद का अक्षुण्ण प्रवाह हो और जीवन गौरव गरिमा से अभिमंडित भी हो सके।
- हम देखते हैं कि आज विद्यार्थी का लक्ष्य आनंद प्राप्त करना है।दिन-रात उसी के प्रयत्न में लगे रहते हैं।जो जिस स्थिति में है उसी में उसे आनंद की अनुभूति हो रही है।गांव का रहने वाला इसलिए प्रफुल्लित है क्योंकि उसे मुक्त प्रकृति,स्वस्थ जलवायु और अनेक प्राकृतिक साधनों का भोग करने का अवसर मिलता है।शहर का निवासी भी उससे कम प्रसन्न नहीं।उसे अपनी तरह के साधन प्राप्त हैं।उसे शिक्षा,चिकित्सा,मनोरंजन,आवागमन आदि के ऐसे साधन-सुविधाएँ प्राप्त हैं जो गांव में उपलब्ध नहीं हैं।कोई एक स्थान पर स्थायी रहकर सुखी है,किसी को चलते रहने में आनंद आता है।किसी को पढ़ने में आनंद है,किसी को जाॅब में।इंजीनियर को अपना ही जीवन प्रिय है,गणितज्ञ को अपनी स्थिति।अपनी मौज की सामग्री हर कोई खोज रहा है और उसमें ही आनंद अनुभव करता रहता है।तात्पर्य यह है कि यहां सभी आनंद का ही जीवन जीना चाह रहे हैं।आनंद चिरस्थायी है या क्षणिक,उचित है या अनुचित,सात्त्विक है या असात्त्विक,विचारने के लिए इतना ही शेष रह जाता है।
3.सुख और आनंद में अंतर (Difference Between Happiness and Pleasure):
- आज हम जिस स्वाभाविक आनंद की बात करते हैं,वह वस्तुतः इंद्रियजनित सुख है।वह चिरस्थायी नहीं है,वह अस्थायी और कभी-कभी तो क्षणिक होता है।उदाहरण के लिए हम काम-भावना को ही लें।मन के छः विकारों काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और मात्सर्य में काम सबसे भयंकर है।वह इन सभी शत्रुओं का सेनापति है।कामसुख क्षणिक होने के साथ-साथ हमारे शरीर बल,मनोबल और प्राणशक्ति का बुरी तरह नाश करता है।स्वादिष्ट भोजन आनंददायक होता है,इसलिए सभी की यह कल्पना रहती है कि तरह-तरह की मिठाइयां,नमकीन,पकवान आदि प्राप्त किए जाएं।उनसे इंद्रियजन्य सुख मिलता भी है,किंतु इस आनन्द में दोष है।भोग से रोग उत्पन्न होते हैं।
- इस कहावत के अनुसार उन सभी सुखों को,जिनसे इंद्रियों के विषय तृप्त होते हैं,वास्तविक आनंद की कोटि में नहीं रखा जा सकता है।इन्हें सुख कहना ही उचित होगा।पूर्ण आनंद वह है जहां विकृति ना हो।किसी तरह की आशंका,अभाव या परेशानी ना उठानी पड़ती हो।सामाजिक जीवन में जो आनंद मिल रहा है,उसमें हमारा अभ्यास बन गया है।इसलिए वह अनुचित हो तो भी वैसा नहीं लगता।इसलिए आनंद की परख की कसौटी नियत की गई है।आनंद से शुद्धतम आनंद की प्राप्ति के लिए दृष्टिकोण परिमार्जन की आवश्यकता अनुभव की जाती है।
4.अपने आप को जानें (Know yourself):
- लौकिक आनंद सिद्धि दाता नहीं है।इससे जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता।विचार,बुद्धि,तर्क,विवेक की जो साधारण तथा असामान्य शक्तियां विद्यार्थी को प्राप्त होती हैं,वे केवल सुखों के अर्जन में ही लगी रहें तो इसमें कुछ अनोखापन नहीं।देखने वाली बात यह है कि जीवन दीपक बुझने से पूर्व क्या हमने अपने आपको पहचान (अंतर्निहित शक्तियों) लिया है कि हम कौन हैं अर्थात् हमारे अंदर कौन-कौन सी शक्तियां छिपी पड़ी हैं? इस प्रश्न का सुलझ जाना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।आत्मज्ञान आनंद का मूल है।विद्यार्थी इस विषय में अज्ञानी बना रहा तो लौकिक (सांसारिक और व्यावहारिक जीवन में) जीवन में भटकते रहना पड़ेगा।सिद्धि आत्मा की शरण में ही जाने से मिल सकती है।विद्यार्थी की अन्य आशंकाएं आत्मज्ञान के अभाव में दूर होना संभव नहीं है।
- हम यह जो प्रतिदिन आनंद प्राप्ति के साधनों में परिवर्तन और प्रयोग किया करते हैं,उससे भी स्पष्ट है कि हमें थोड़े आनंद की अपेक्षा अधिक शुद्ध और पूर्ण आनंद की तलाश है।एक कपड़ा पहनते हैं,तो दूसरी बार उस कपड़े की अच्छाइयां-बुराइयां ज्ञात हो जाती हैं,और दुबारा कपड़ा खरीदते समय यह ध्यान रहता है कि इस बार का कपड़ा पिछले दोषों से रहित और कुछ अधिक आकर्षक हो।पहली रुचि भी शुद्ध होती है,आनंद की भी शुद्धि होती है और हम एक ऐसा आनंद चाहते हैं,जो पूर्ण और स्थायी हो,ऐसा आनंद लौकिक जीवन में उपलब्ध नहीं है।तब फिर पारलौकिक जीवन की बात सामने आती है और आत्मा-परमात्मा पर भी ध्यान जाने लगता है।यह सिद्धि भगवान की शरण में जाने से मिल सकती है।
5.रुख में परिवर्तन आवश्यक (Change in attitude required):
- फिर भी विद्यार्थियों की समझ में यह बात नहीं आती है और वे लौकिक सुखों में आसक्त बने रहते हैं।कारण कि हमारा दृष्टिकोण जैसा बन गया है,उसमें कुछ परिवर्तन नहीं करना चाहते।सूर्य प्रतिदिन अपने उसी क्रम में निकलता है।उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण प्रतिदिन उगते रहने वाले सूर्य के जैसा ही होता है,किंतु यदि अपना थोड़ा दृष्टिकोण बदलें और विराट जगत की महान् क्रियाशील शक्ति के रूप में उस सूर्य का चिंतन करें तो वह महाप्राण अनेक विचित्रताओं से संयुक्त और जीवनवाला समझ में आएगा।
- दृष्टिकोण के परिवर्तन से समझने की स्थिति बदलती है और हम क्रमशः अधिक आनंद की ओर अग्रसर होने लगते हैं।दैनिक जीवन में ऐसी अनेक बातें आती है,जो यूं तो सामान्य सी लगती हैं,किंतु वे अपने भीतर बहुत बड़ा अनोखापन और विज्ञान छुपाए होती है।हमारा दृष्टिकोण बोधक न होकर उथला रपट जाने वाला होता है,इसलिए महत्त्वपूर्ण वस्तुओं को छोड़ जाते हैं,और केवल उन्हीं सुखों के चिंतन में लगे रहते हैं जो स्थूल प्रयोग में आ चुके होते हैं।
- दृष्टिकोण बदलता है तो सारी चीजें बदलती नजर आती हैं।ऋषियों ने बताया है-“यह संसार मरुभूमि है,इसमें सुख चाहते हो तो विद्या की शरण लो।आयु,श्री,यश और सांसारिक सुखों की उपलब्धि विद्या ग्रहण करने,अध्ययन-मनन-चिंतन करने या आत्मचिंतन में ही है।यह दिव्य संपदा है,पर यह बात समझ में नहीं आएगी,क्योंकि अभी तक हमने सुख और संसार के प्रति अपना रुख नहीं बदला।दृष्टिकोण बदल जाएगा तो सर्वत्र आनंद ही बिखरा दिखाई देगा।
- हम भोग से आनंद अनुभव करते हुए नहीं जानते कि इस संसार में और कुछ भी श्रेष्ठताएँ हैं।विचार द्वारा यदि आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व की बात समझ में आ जाए तो भोग की अपेक्षा त्याग में ही आनंद का अनुभव करने लगेंगे और तब दिन-प्रतिदिन मूल लक्ष्य की ही ओर बढ़ते चलेंगे।फिर यह शिकायत नहीं रहेगी कि अध्ययन में आनंद नहीं आता।दृष्टिकोण की उत्कृष्टता का सवाल है।जिस तरह संपूर्ण चेष्टाएं भौतिक उन्नति में लगी हैं उसी तरह आध्यात्मिक उपलब्धियों में भी मन लग सकता है,पर पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करना पड़ेगा,अपना हर कार्य इस दृष्टि से पूरा करना चाहिए कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं।
6.असली आनंद (Real joy):
- विद्या और अध्ययन में आनंद,भौतिक और स्थूल आनंद की अपेक्षा सहस्र गुना अधिक है।इसलिए विज्ञजन सदैव ही यह प्रेरणा देते हैं कि विद्यार्थी शारीरिक हितों को पूरा करने में ही न लगा रहे।विद्यार्थी जीवन जैसे असाधारण उपहार पर भी आंतरिक दृष्टि से कुछ विचार करें।बंधन मुक्त (दुर्गुणों से मुक्ति,विकारों से मुक्ति) आनंद ही स्थायी होता है।विषयजन्य सुखों की अनुभूति तो होती है,परंतु जिसे हम उचित समझते हैं,वह व्याधिकारक होती है। आनंद की कल्पना से किया गया कर्म यदि विक्षेप उत्पन्न करे तो उस आनंद को शुद्ध और पूर्ण विद्यार्थी के लिए उचित नहीं समझा जाएगा।
- प्रश्न यह नहीं है कि हम आनंद की प्रगति की ओर बढ़े।वह तो हम कर ही रहे हैं।हर घडी आनंद की खोज में ही हमारी जीवन यात्रा पूरी हो रही है।जो शर्त है वह यह है कि हमारा आनंद शाश्वत,निरंतर और पूर्ण किस तरह हो? इसके लिए कुछ बड़े परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है।घर गृहस्थ का परित्याग भी नहीं करना,विचित्र वेशभूषा भी नहीं बनानी,केवल इस जीवन का मूल्यांकन सच्चे दृष्टिकोण से करने की आवश्यकता है।हम शरीर के हित तो पूरे करें,किंतु शरीर में व्याप्त जो आत्मा है,उसे विस्मृत न करें क्योंकि आत्मिक शक्ति के जागरण से ही विद्यार्थी अध्ययन व जाॅब आनंद के साथ कर सकता है।आत्मा हमारे अज्ञान,आसक्ति और अभावों को दूर करने में सक्षम है।यह तीन परेशानियां-विघ्न पैदा ना करें तो जिस आनंद की तलाश में हम हैं,वह इसी जीवन क्रम से उपलब्ध हो सकता है।आत्मा के विकास से ही अबाध,शाश्वत आनंद की प्राप्ति हो सकती है।
7.विद्यार्थी क्या करें? (What should students do?):
- आज का समय भयंकर दुर्व्यसनों,अपराधों,दुर्गुणों से भरा हुआ है।ऐसे में अपने समय,श्रम,धन और प्रतिभा का सही उपयोग किया जाए।अपने लिए और जरूरतमंद छात्र-छात्राओं के लिए इनका सदुपयोग किया जाए।नशेड़ियों,दुर्व्यसनों,अपराधियों में लिप्त कुछ छात्र-छात्राओं को सन्मार्ग में लाया जाए जा सके तो आनंद प्राप्त होगा क्योंकि लोक कल्याण ही तो हमें सच्चा आनंद प्रदान करता है,साथ ही जीवन धन्य हो जाएगा और आने वाली पीढ़ी हमें साधुवाद देगी।देने के सुख से बढ़कर और कौन सा सुख है? अपने प्रिय के लिए अपना सब कुछ देकर भी आनंद की अनुभूति होती है।देवताओं से सहायता मांगने की बात तो सदा ही चलती है,पर कुछ विशेष समय ऐसे भी आते हैं,जब देवता मनुष्य से याचना करते हैं।ऐसे अवसर किन्हीं सौभाग्यवानों को ही मिलते हैं,जब वे देवताओं की मनोकामना पूरी करने में समर्थ हो सकें।
- दशरथ को देवताओं की सहायता के लिए जाना पड़ा था।अर्जुन भी गए थे।दधीचि ने उदारतापूर्वक उन्हें दान दिया था।कृष्ण साधु के वेश में कर्ण के पास पहुंचे थे।वामन ने बली के सामने हाथ पसारा था।राम ने शबरी से बेर की याचना की थी।सुदामा से तंदुल मांगे गए थे। अंगद और हनुमान ने देवताओं से अपनी कामनापूर्ण नहीं कराई थी,वरन उनकी पूर्ण की थी।इस प्रसंग में ऋषियों की परंपरा याद आ जाती है।विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र से,उद्दालक ने आरुणि से,चाणक्य ने चंद्रगुप्त से,समर्थ ने शिवाजी से,परमहंस ने विवेकानंद से,विरजानन्द ने दयानंद से कुछ मांगा था और सत्पात्र शिष्य ने जी खोलकर दिया भी था।बुद्ध और गांधी जी की झोलियां आदि से अंत तक फैली ही रही।देने वाले घाटे में नहीं रहे।लेने वाले जितने धन्य हुए,उससे अधिक श्रेय देने वाले को मिला।मांधाता ने शंकराचार्य को दिया था,इससे अधिक पाया।अंगुलिमाल और अम्बपाली,हर्षवर्द्धन और अशोक,बुद्ध को देते समय उदारता की चरम सीमा पर पहुंच गए थे।गांधी के सत्याग्रहियों ने अनुदानों की अपने दाँव पर झड़ी लगा दी थी।देखते हैं कि जो दिया गया था वह निरर्थक नहीं गया,परंतु असंख्य गुना होकर,उन उदारमनाओं के ऊपर दैवी वरदान की तरह इस प्रकार बरसा कि वे कृतकृत्य हो गए।
- धनी अकेले भामाशाह ही नहीं हुए हैं।मरण अकेले भगतसिंह के हिस्से में नहीं आया है।जेल अकेले नेहरू,पटेल ही नहीं गए हैं।मुसीबतें बहुतों को आती हैं,त्यागने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है।किसी से चोर छीनता है,किसी से बेटा।पेट भरने और तन ढकने के अतिरिक्त और किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता है।जब विरानों के लिए ही सब कुछ छोड़ना है तो परायों का स्तर ऊँचा क्यों न उठा लिया जाए।जब अपना उपार्जन,श्रम,सहयोग किसी को देना ही है तो,उन्हें देवताओं,ऋषियों एवं सदुद्देश्यों के लिए क्यों न दिया जाए? इस उदारनीति को अपनाने वाले घाटे में नहीं रहते हैं,लाभ पाते हैं,जबकि मोह के गर्त में धकेली हुई उपलब्धियां निरर्थक ही नहीं जाती,विघातक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न करती है।
- विद्यादान सबसे बड़ा दान है।कमजोर और असक्तजनों को विद्या दान देकर उनको ऊंचा उठाया जा सकता है।यदि कोई विद्यार्थी धन संपन्न है तो वह धन से गरीब,निर्धन छात्र-छात्राओं की सहायता करके मदद कर सकता है।जिसके पास जो है उसे अन्यों की मदद करके पुण्य का भागी बन सकता है और पाने वाला भी आगे उन्नति और प्रगति कर सकता है।भगवान ने मुक्तहस्त से आपको विद्या,धन,सुख-साधनों से संपन्न किया है तो उसका संग्रह करके रखने से उसका उपयोग नहीं है,उसका उपयोग जरूरतमंद का सहयोग करने में ही है।ऐसा करके आप देश व समाज को आगे बढ़ाने में सहयोगी बनेंगे।बस रुख बदलकर तो देखें।आप अस्थायी सुख के छोटे से दायरे से निकलकर अक्षय आनंद के साम्राज्य के अधिकारी बन जाएंगे।प्रयास कीजिए।यदि विद्या है तो विद्या से,धन है तो धन से,सुख-संपदा है तो सुख-संपदा से मदद का हाथ बढ़ाइए।अनेक बेसहारा खिलने से पहले ही मुरझा जाते हैं (अभावों के कारण),उन्हें मिलते हुए देखकर आप असीम आनंद का अनुभव करेंगे।
- उपर्युक्त आर्टिकल में रुख बदलने की 8 श्रेष्ठ तकनीक (8 Best Technique to Change Perspective),छात्र रुख कैसे बदलें? (How to Change Student Trend?) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स
8.सहयोग पाने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (How to Get Cooperation) (Humour-Satire):
- नीलमणिःमैंने गणित की कोचिंग 2 महीने की फीस देकर पूरे वर्ष कोचिंग कर ली।
नीरज:कैसे? - नीलमणि:मैंने गणित के टीचर को प्रारंभ में कहा कि वह उसे 2 महीने की फीस एक साथ दे देगा (बाद में),2 महीने बाद मैंने कहा कि उसकी परीक्षा आगे खिसक गई और वह उसे 2 महीने और पढ़ा दे,4 महीने की फीस एक साथ दे देगा।इस प्रकार से 12 महीने गुजर गए और अंत में मैं 2 महीने की फीस देकर चलता बना।
9.रुख बदलने की 8 श्रेष्ठ तकनीक (Frequently Asked Questions Related to How to Get Cooperation 8 Best Technique to Change Perspective),छात्र रुख कैसे बदलें? (How to Change Student Trend?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.रुख बदलने में क्या कठिनाई है? (What is the difficulty in changing the attitude?):
उत्तर:कठिनाइयां हमें डरावनी,भयंकर लगती है।समस्याओं से विद्यार्थी विचलित हो जाता है और वह सही रुख पर चलने से घबरा जाता है।
प्रश्न:2.समस्याओं से कैसे पार पाएं? (How to overcome problems?):
उत्तर:सफलता व असफलता जीवन के अंग हैं।इनसे घबराना नहीं चाहिए,परवाह नहीं करनी चाहिए।बार-बार प्रयत्न करते रहना चाहिए और आगे की ओर कदम बढ़ाते रहना चाहिए।
प्रश्न:3.क्या दूसरे रुकावट डालते हैं? (Do others interrupt?):
उत्तर:दूसरों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।कोई भी हमारा मार्ग नहीं रोक सकता है,दुःख नहीं पहुंचा सकता है।विद्यार्थी स्वयं ही अपना मित्र तथा स्वयं ही अपना शत्रु है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा रुख बदलने की 8 श्रेष्ठ तकनीक (8 Best Technique to Change Perspective),छात्र रुख कैसे बदलें? (How to Change Student Trend?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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