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7 Spells to Be Efficient in Management

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1.प्रबंधन में कुशल होने के 7 मंत्र (7 Spells to Be Efficient in Management),प्रबन्धन में कुशल कैसे हों? (How to Be Expert in Management?):

  • प्रबंधन में कुशल होने के 7 मंत्र (7 Spells to Be Efficient in Management) के आधार पर आप जीवन का,जॉब का अथवा किसी भी क्षेत्र का प्रबंधन करने में कुशल हो सकेंगे।समय-प्रबंधन,तनाव-प्रबंधन आदि में प्रबंधन की हर कहीं आवश्यकता है।
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2.प्रबंधन आज के युग की आवश्यकता (Management is the need of today’s era):

  • प्रबंधन आज के युग की सर्वोपरि आवश्यकता बन गया है।आज के दौर में प्रबंधन में कुशलता सफलता की प्रतीक और पर्याय बन गई है।प्रबंधन का तात्पर्य है-शक्ति सामर्थ्य का,साधन-संसाधनों का समुचित विकास और सार्थक सुनियोजन।प्रबंधन की तकनीकों का सुनियोजन एवं विकास ही सभी मानदंडों एवं मापदंडों का आधार माना जाता है।घर से समाज तक,नौकरी-व्यवसाय से राजनीति एवं धर्म के अखाड़ों तक,सूचना क्रांति,शिक्षा एवं शोध का व्यापक व विराट परिदृश्य तथा व्यक्तिगत व सामूहिक जीवन के सभी क्षेत्रों में इन तकनीकों का उपयोग किया जाने लगा है।वर्तमान जीवन-दृष्टि अधिकतम सफलताओं को अर्जित करने की प्रतिस्पर्द्धात्मक दौड़ में विजयी बनने की चाहत देखती है,परंतु इसके लिए एक ही कारगर उपाय है-प्रबंधन की प्रक्रिया में सर्वाधिक कुशलता पाना।
  • प्रबंधन की मौलिक व आधारभूत-प्रक्रिया का मूल केंद्र है-स्वप्रबंधन।अर्थात् जीवन के सभी आयामों,पहलुओं के संयमित और सार्थक विकास व सुनियोजन की प्रक्रिया का अवलम्बन एवं अनुकरण।इन आयामों में शारीरिक,मानसिक एवं भावनात्मक आदि सभी पक्ष समाहित हैं।इन क्षेत्रों में समुचित संबंध-सुनियोजन,जीवन की बड़ी आवश्यकता माना जा रहा है।मात्र शरीर की सफलता,बुद्धि की प्रखरता एवं भावनाओं की सफलता ही अपने आप में पूर्ण नहीं है।यह जीवन का एकांगी पक्ष है।बुद्धि की धार के साथ संवेदना की धारा की भी जरूरत है और इन दोनों के साथ शारीरिक स्वास्थ्य भी नितांत अपरिहार्य है,परंतु आज की यह बड़ी विडम्बना है कि जिन्हें प्रबंधन के महारथी समझा जाता है,वे स्वयं के जीवन के इन पहलुओं का प्रबंधन कर पाने में अक्षम एवं असमर्थ हैं। प्रबंधन के इन महारथियों का निजी जीवन बिखरा,बँटा एवं विभाजित है,दूसरों को प्रबंधन समझाने वाले अपने जीवन से उतना ही असंतुष्ट एवं परेशान हैं।
  • उपर्युक्त तथ्य को सारेका के शोधपत्रों सहित अन्य मनोवैज्ञानिक निष्कर्षों में भी उजागर किया है।शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सकारात्मक आयाम हों या जीवनशैली की व्यवस्था,दोनों ही क्षेत्रों में प्रबंधन के जादूगरों एवं विशेषज्ञों को कमतर पाया गया है।अतः सबसे पहले स्वप्रबंधन की सही तकनीकों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है।जो अपने बँटे-बिखरे जीवन को सुनियोजित कर सके,ऐसे प्रबंधन की जरूरत है।यही कारण है कि अपने देश में इसकी सीमाओं को भेदकर सुदूर देशों में जीवन जीने की शैली सिखाने वाले हों या योग को आचार-विचार में लाने वाले योगाचार्य एवं योगवेत्ता,अत्यंत सफल हो रहे हैं।

3.प्रबंधन प्राचीन अवधारणा है (Management is an ancient concept):

  • यौगिक दृष्टि में जीवन की समग्रता का आकलन एवं विश्लेषण विद्यमान है।धार्मिक ग्रंथों और दर्शन में यत्र-तत्र इस तथ्य को अति सूक्ष्म रूप से अत्यंत गूढ़ रूप में आवृत्त किया गया है।संगठित,सक्षम एवं सबल व्यक्तित्व,साथ ही उसका समुचित सुनियोजन,यही यौगिक दृष्टि का सार-संक्षेप है।योग विज्ञान में न केवल ‘स्व’ की पहचान रेखांकित की गई है,बल्कि ‘स्व’ की शक्तियों के सही विकास में सही नियोजन की तकनीकें भी सुझाई एवं बताई गई हैं।रूडोल्फ वैलेंटाइन एवं विलियम बेस्ट ने भी स्वप्रबंधन की इस पहेली का हल यौगिक दृष्टि में ही खोजा और पाया है।
  • स्वप्रबंधन अत्यंत प्राचीन अवधारणा है।प्राचीन काल से लेकर आज तक भारतीय योगीयों ने ‘स्व’ को समझाने व विकसित करने की अनेक प्रक्रियाओं का विधान विनिर्मित किया है।हठयोग,राजयोग,भक्तियोग,ज्ञानयोग सभी की यौगिक तकनीकों का लक्ष्य ‘स्व’ सर्वांगीण विकास है।यम-नियम जहाँ मानवीय व्यवहार को परिष्कृत-परिमार्जित करते हैं,वहीं आसन,प्राणायाम,बंध,मुद्रा मानवीय शरीर को स्वस्थ-समर्थ बनाकर इसकी सुप्त एवं गुप्त क्षमताओं को जागृत करते हैं।प्रत्याहार,धारणा,ध्यान जैसी उच्चस्तरीय यौगिक प्रक्रियाओं में जीवन की अंतर्निहित समस्त क्षमताओं के जागरण का संपूर्ण विज्ञान समाहित है।स्वप्रबंधन की ये यौगिक प्रक्रियाएं प्रबंधन तकनीकों के रूप में एक नए युग का शुभारंभ है।इन्हें नवयुग का नवोन्मेष कहा जा सकता है।
  • स्वप्रबंधन परिस्थिति-परिवेश के अनुरूप अपनी अंतर्निहित क्षमता का समुचित सदुपयोग है।जीवन और परिस्थिति की सभी क्षमताओं का बेहतरीन सुयोग है एवं सामंजस्य है।क्षमताओं के विकास में बाधक-अवरोधक तत्वों का इसमें समुचित एवं समग्र समाधान मिलता है। भारतीय यौगिक दृष्टि में कर्म,विचार और भावना की शक्तियों को जानने-समझने और परिष्कृत करके,उन्हें व्यवहार में उतारने की कला का विज्ञान है-स्वप्रबंधन।इस संदर्भ में मनोविज्ञान की अवधारणा एकांगी है।इन सभी में अधूरापन है।यौगिक दृष्टि में स्वप्रबंधन का अर्थ बड़ा गहरा एवं समग्रता का बोध कराता है।
  • स्वप्रबंधन में ‘स्व’ का अर्थ बड़ा व्यापक है।’स्व’ को जीवन का सत्त्व,सार एवं सारांश माना जाता है।यह चेतना का मुख्य आधार है।सामान्य व्यक्ति के लिए ‘स्व’ ही जीव है।सामान्यतः जाग्रत,स्वप्न और निद्रावस्था से युक्त होने को जीव कहा जाता है,परंतु आध्यात्मिक मान्यता में जीव भगवान का अंशमात्र है।वेद,उपनिषद,वेदांत,गीता आदि में ‘स्व’ को ब्रह्मस्वरूप माना गया है।दार्शनिक चिंतन की अस्तित्व धाराएं थोड़ा बहुत परिवर्तित कर ‘स्व’ के इसी बोध को ग्रहण करती हैं;जबकि नास्तिक कही जाने वाली चिंतनशैली में ‘स्व’ को भिन्न-भिन्न अर्थ प्रदान किए गए हैं।पश्चिमी चिंतन में इस दूसरे पक्ष को अधिक प्रश्रय दिया गया है।मनोविज्ञान के मत में ‘स्व’ मुख्यतः व्यक्तित्व के रूप में परिलक्षित होता है।इसके अनुसार अनुभव का वह भाग,जिससे हमारा अपने होने का बोध होता है ‘स्व’ कहलाता है,परंतु यह मनोवैज्ञानिक बोध भारतीय ऋषियों-मनीषियों के ‘स्व’ अनुभव के बोध के समक्ष बालबोध की भांति ही है।परमात्मचेतना का अभिन्न अंग ‘स्व’ (आत्मा) ही वास्तविक अर्थों में व्यक्ति है।’स्व’ अर्थात् व्यक्ति का अभिव्यक्त होने वाला स्वरूप,जो व्यक्तित्व का सृजन करता है।

4.प्रबंधन के मुख्य उपकरण (Main Tools of Management):

  • प्रबंधन में ‘स्व’ के आधार पर ही स्वमूल्यांकन,स्वसम्मान,आत्मविश्वास एवं सफलता को परिभाषित किया जाता है,क्योंकि ये उसके प्रमुख तत्त्व हैं।स्वमूल्यांकन का तात्पर्य है-अपने जीवन-विकास की प्रक्रिया में सहयोगी एवं बाधक तत्त्वों की पहचान करना तथा अनुपयोगी तत्त्वों को हटाकर सहायक सद्गुणों के विकास की साधना के लिए अग्रसर होना।मानवीय गरिमा को अर्थ प्रदान करने वाली दैवी क्षमताओं को जीवन में समाहित करने तथा मनुष्यत्व के विकास में सहायक आदर्शों-सद्गुणों को धारण करने की चेष्टा ही,सच्चे कार्यों में स्वसम्मान है।अपनी आत्मसत्ता पर विश्वास,’स्व’ में सभी सफलताओं को प्राप्त करने तथा प्रत्येक प्रतिकूलताओं के समाधान की शक्ति-सामर्थ्य होने का दृढ़ विश्वास ही आत्मविश्वास है।यह साहस-सफलता एवं विजय का मूलमंत्र है।सफलता को मात्र पुरुषार्थ का संयोग माना जाता है,परंतु इसके मूल में वर्तमान की जीवन-दृष्टि और कर्म-पुरुषार्थ ही निहित है।
  • स्वशक्तियों का जागरण होने पर इसके प्रतिफल एवं परिणाम,इच्छाशक्ति,कल्पनाशक्ति,संकल्पशक्ति,सजल संवेदनों एवं रचनात्मक क्षमताओं आदि का विकास होता है।इच्छाशक्ति जीवन की रचनात्मक शक्ति है,जो हमारी समस्त संभावनाओं को साकार करने के लिए प्रेरित करती है।कल्पना मानवीय चेतना की वह दिव्य क्षमता है,जो मस्तिष्क केंद्र में निहित अपरिमित क्षमताओं को विकसित और समर्थ बनाती है।व्यक्ति जब अपनी कल्पना की तरंगों को बुद्धि से सँवारता है,कुकल्पनाओं को बुद्धि की कैंची से काटता है और सभी कल्पनाओं को एकत्रित करता है,तब संकल्प का अंकुरण होता है।इसमें जब हृदय की समूची भावनाएं,संपूर्ण प्राणशक्ति उँडेली जाती है,तब संकल्प शक्ति आकार पाती है।संवेदना अंतःकरण में विद्यमान जीवन की भावशक्ति है,जो जीवन के लौकिक-अलौकिक पहलुओं की यथार्थ अनुभूति कराती है।जीवन के शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक पक्षों में असंख्य रचनात्मक क्षमताएं मौजूद हैं।
  • संगीत,गायन,चित्रकला,नाट्य,नृत्य,अभिनय,वास्तु-शिल्प,खेल,व्यवस्थापन की कुशलता,शोध-अनुसंधान के वैज्ञानिक आयाम प्रकारांतर से जीवन की मौलिकता में सन्निहित रचनात्मक क्षमताओं के बहुविधरूप है।
  • स्वप्रबंधन के उपकरण हैं-बौद्धिक क्षमता,स्मृति क्षमता,स्वास्थ्य,दिनचर्या और आहार।बौद्धिक क्षमता ही व शस्त्र है,जिससे औचित्य-अनौचित्य,सच-झूठ,सही-गलत,अच्छे-बुरे में अंतर किया जाता है।इसी के कारण मनुष्य को विवेकशील प्राणी कहा गया है।स्मरणशक्ति मानवीय मस्तिष्क की प्रमुख विशेषता है,जिससे व्यक्ति की आयु,बुद्धिमत्ता,ज्ञान,मैत्री,ईमानदारी पूरी तरह प्रभावित होती है।स्वास्थ्य का संबंध शारीरिक,मानसिक और भावनात्मक तीनों तलों से होता है।दिनचर्या से तात्पर्य है-दैनिक क्रिया-कलापों में व्यवस्था स्थापित करना।आहार का प्रभाव व्यापक है।भोजन स्वास्थ्य की जरूरत है,स्वाद की नहीं।इन क्षमताओं का विकास करने पर ही सही माने पर हम समय का सुनियोजन,तनाव के क्षणों का सदुपयोग एवं आकर्षित व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते हैं।

5.स्वप्रबंधन के सोपान (Management Hierarchy):

  • जे० ग्रीनबर्ग (1990) के अनुसार हमारे शरीर को,मन को परिस्थितियों द्वारा दी जाने वाली तरह-तरह की चुनौतियों का नाम ही तनाव है।तनाव के कारणों को हटाकर रचनात्मक और सृजनशील कार्यों में प्रवृत्त होने पर तनाव भी सफलताओं में सहायक हो जाता है।पेनलोप (1999) के मतानुसार समय का अर्थ है-जीवन।इसलिए कहा गया है कि जो जीवन से प्यार करते हैं,वे समय से प्यार करें।स्वप्रबंधन की प्रक्रिया में आकर्षक व्यक्तित्व एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।आकर्षक व्यक्तित्व का निर्माण,शक्ति,सामर्थ्य और संवेदना के समुचित सहयोग एवं सम्मिश्रण से होता है। इसके लिए पहला कदम है-योगाभ्यास द्वारा सुगठित शरीर का निर्माण और मन को स्वाध्याय से क्षमतावान बनाना।इसके पश्चात क्षमताओं की अभिव्यक्ति स्थान-समय के अनुरूप करना।
  • समयानुरूप वेश-विन्यास का चयन करना,वाणी को स्पष्ट और प्रभावशाली बनाना तथा गरिमा के अनुरूप उठने-बैठने-चलने की क्रियाओं को करना।ये सभी बातें व्यक्तित्व को आकर्षक एवं मनोहर बनाती हैं।
  • मनुष्य जीवन अनन्त संभावनाओं और अद्भुत इच्छाओं का भांडागार है।इन्हें समुचित ढंग से सुनियोजित कर इनकी विशेषताओं के सदुपयोग करने की तकनीक स्वप्रबंधन में निहित है,जिसे निम्न सोपानों से प्राप्त किया जा सकता हैः(1.)निर्णय लेने की क्षमता का विकास,(2.) शालीन एवं मर्यादित व्यवहार,(3.)लक्ष्य निर्धारण,(4.)आत्मनिरीक्षण,(5.) क्रियात्मक मूल्यांकन, (6.)योजना तथा (7.)योजना का क्रियान्वयन।इन सोपानों से आगे बढ़ते हुए हम अंतर्निहित क्षमताओं की पहचान एवं उनका विकास कर सकते हैं,जिससे हमारा व्यक्तित्व विकसित एवं आकर्षक बन सकता है।

6.विद्यार्थी प्रबंधन की कला सीखें (Learn the art of student management):

  • उपर्युक्त विवरण से यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि प्रबंधन की कला विकसित करने के लिए क्या कुछ करना पड़ता है।व्यक्तित्व को पूरी तरह से कायाकल्प और रूपांतरण करना होता है।प्रबंधन के मुख्य तत्त्व हैं:स्वमूल्यांकन,स्वसम्मान,आत्मविश्वास एवं सफलता। अंतर्निहित शक्तियों का जागरण होने पर इच्छाशक्ति,कल्पनाशक्ति,संकल्प शक्ति,सजल संवेदना एवं रचनात्मक क्षमताओं का विकास होता है।प्रबंधन के उपकरण हैंःबौद्धिक क्षमता,स्मृति क्षमता,स्वास्थ्य,दिनचर्या और आहार।
  • हर विद्यार्थी में अनन्त क्षमताएं होती हैं परंतु उसका ठीक प्रकार से प्रबंधन करने के लिए निर्णय लेना होगा कि उसके लक्ष्य के लिए किन-किन सुप्त शक्तियों का जागरण करके,उन्हें विकसित करना है? एक सही निर्णय उसे उसकी मंजिल तक पहुंचा देता है और गलत निर्णय या सही समय पर निर्णय न लेने पर उसे भटका भी देता है।अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे अपने आचरण में विनम्रता,शालीन और मर्यादित व्यवहार अपनाना होता है।इसके साथ ही सही लक्ष्य का निर्धारण करना भी जरूरी है।सही लक्ष्य का चुनाव न करने से भी भटकाव पैदा हो जाता है।भटकने वाला अर्थात् बिना लक्ष्य के चलते रहने वाला और गलत लक्ष्य का चुनाव करने वाला कहीं नहीं पहुंचता है।कितना ही परिश्रम करते रहने पर भी उसका प्रतिफल दिखाई नहीं देता।जैसे पत्थर की चट्टान पर कितनी ही बारिश होने पर भी वृक्ष,पेड़-पौधे नहीं उग सकते हैं।
  • लक्ष्य के सही निर्धारण के साथ-साथ उसका निरीक्षण करते रहना जरूरी है।यदि योजना में कुछ बदलाव करना आवश्यक है तो आत्म-निरीक्षण के द्वारा और उसका मूल्यांकन करते रहना जरूरी है।कई छात्र-छात्राएं अध्ययन करते रहते हैं,करते रहते हैं परंतु उसका कोई सुखद परिणाम दिखाई नहीं देता है।कारण स्पष्ट है कि वे अध्ययन के प्रबंधन की कला से परिचित नहीं होते हैं।किस रणनीति,योजना और लक्ष्य के साथ आगे बढ़ा जाए उन्हें ज्ञात नहीं होता है।यदि लक्ष्य तय कर भी लेते हैं तो अपना आत्म-निरीक्षण नहीं करते हैं और न ही अध्ययन का मूल्यांकन करते हैं।योजना बना लेते हैं उसका क्रियान्वयन (Implementation) नहीं करते हैं।ऐसी स्थिति में उन्हें सफलता नसीब नहीं होती है।अपने अध्ययन और जीवन का प्रबंधन करने की कला उन्हें विद्यार्थी काल से ही सीख लेनी चाहिए ताकि जीवन के किसी मोड़ पर असफल ना हो।हालांकि यह कार्य इतना आसान नहीं है।इसके लिए तप और साधना करनी पड़ती है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में प्रबंधन में कुशल होने के 7 मंत्र (7 Spells to Be Efficient in Management),प्रबन्धन में कुशल कैसे हों? (How to Be Expert in Management?) के बारे में बताया गया है।

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7.प्रबंधन गुरु (हास्य-व्यंग्य) (Management Guru) (Humour-Satire):

  • माता-पिता (अपने बच्चे से):हमारा होनहार बच्चा बड़ा होकर क्या बनेगा?
  • पुत्र:मैं बड़ा होकर ऐसा मैनेजमेंट गुरु बनूँगा कि मेरे पास ट्रेनिंग लेने वाला छोटा बच्चा (3 साल का बच्चा भी) प्रबंधन के मंत्र सीख जाएगा।

8.प्रबंधन में कुशल होने के 7 मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 7 Spells to Be Efficient in Management),प्रबन्धन में कुशल कैसे हों? (How to Be Expert in Management?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.छात्र जीवन प्रबंधित न होने के क्या परिणाम है? (What are the consequences of student life not being managed?):

उत्तर:परीक्षा और अध्ययन में असफलता,चिंता,तनाव एवं द्वन्द्व तथा मानसिक समस्याएं इसी कारण पनपती है।

प्रश्न:2.छात्र को प्रबंधन की कला क्यों सीखनी चाहिए? (Why should a student learn the art of management?):

उत्तर:प्रबंधन से छात्र की जीवनशैली बाहरी और आंतरिक जीवन में सामंजस्य बनाने का कारगर उपाय सूझाती है।सामंजस्य सही हो तो जीवन में कुशलता,सफलता एवं क्षमता स्वयं ही विकसित हो जाती है।

प्रश्न:3.छात्र-जीवन प्रबंधन से क्या आशय है? (What do you mean by student life management?):

उत्तर:अध्ययन में,अपने लक्ष्य में अपने को इस तरह लगा देना कि उसका शत-प्रतिशत मुख्य कार्य या लक्ष्य को मिल जाए ताकि छात्र निर्धारित या कम समय में अपना लक्ष्य पा सके।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा प्रबंधन में कुशल होने के 7 मंत्र (7 Spells to Be Efficient in Management),प्रबन्धन में कुशल कैसे हों? (How to Be Expert in Management?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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